BOOKS

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

Two book of Neeraj Musafir

नीरज मुसाफिर की दो किताबे

दो किताबें और आ गयी । अब लग रहा कि काफी लोड हो गया है । अब जब तक सारा खत्म न हो जाये  तब तक कोई नया आर्डर नही ।

आज जो किताबे आई है वो यात्रा विवरण है । नीरज जी के बारे में अभी हाल में ही सुना था फेसबुक पर ।
दुनिया में विरला ही कोई होगा जिसे घूमना पसंद न हो । पर यायावरी करना सबके बस की बात नही । जरूरी नही कि आपके पास बहुत पैसा हो तो घूम सको। ये किताबे कम पैसे में घूमने का विवरण देती है । एक में तो सायकल से ही घूमने का विवरण है ।

समय मिलने पर , मैं भी घूमने का प्लान बना ही लेता हूँ पर अभी तक पुरे मन के साथ नही घूम सका हूँ, कुछ प्रतिबद्धता है ।
भारत सरकार, अपने कर्मचारी को हर 4 साल में भारत घूमने का ख़र्चा देती है (LTC)।
मेरी एक लैप्स हो गयी निकल ही न पायाअब जब भी निकलूंगा  तो एक बार में ही सब खत्म कर दूंगा पता नही जिन्दगीं की   दौड़ भाग कब खत्म होगी ।

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

Pushpashpant ji ki ek book

पुष्पेश पंत जी की एक बुक

पहले पहल इनके लेख किसी पेपर में पढ़े थे । बहुत अच्छे लगे थे । फिर इन्हें एक रोज शुक्रवार पत्रिका में कढ़ी के बारे बताते पढ़ा तो चौक गया , लगा कि ir का एक्सपर्ट  आदमी  ये क्या  करने लगा पर कुछ लोग बहुआयामी पतिभा के धनी होते है । पंत जी का लेखन भी बहुआयामी है ।
ये किताब मैंने जून 17 में अमेज़न से ली थी । बुक के आर्डर में भी एक बवाल हो गया था सोचा था उस बवाल पर अलग से पोस्ट लिखूंगा पर वक़्त न मिला । आज जिक्र हुआ तो कुछ बता देता हूँ दरअसल ये बुक का प्राइस 125 रूपये था और डिलीवरी चार्ज 175 रूपये, जबकि मैंने कई बुक एक साथ ली थी ताकि फ्री डिलेवरी मिले । जब आर्डर दिया था तब अमेज़न ने फ्री डिलेवरी दिखाया था ।
मैंने इसके बिल को भी सभाल कर रखा था ताकि अपने तमाम पाठको को अमेज़न की लूट दिखा सकूँ वो किस तरह से ठगते है ।
खैर , मेरी प्रवत्ति तो 10 रूपये भी बर्बाद न करने की है यहाँ तो बात 175 की थी। यह तो वही मसल हो गयी 9 की लकड़ी और 90 रूपये चिराई । अब ज्यादा विस्तार में न बताने का वक़्त नही है बस अंत में हुआ ये कि मुझे सेलर ने सम्मानपूर्वक 175 रूपये का चेक भेज दिया साथ में यह आग्रह कि उसे मैं अमेज़न पर 5 स्टार दे दू । गनीमत यह है उसका नाम नही बता रहा हूँ यही काफी है ।
अब पुस्तक के बारे में।कुछ पुस्तके होती सरल है पर आप चाह कर भी तेजी से नही पढ़ सकते वजह उनमे ज्ञान दबा दबा कर भरा जाता है।इस पुस्तक में बहुत से कांसेप्ट है जो बेहद सरलता से समझाये गए है,
मजा आ गया पढ़ कर , यह अलग बात है देखने में यह बुक बेहद पतली है पर इसको पढ़ने में काफी वक़्त लग गया । कम से कम एक दर्जन बैठक में खत्म हो पायी है । यह पुस्तक सीधा सीधा upsc के mains के gs के कोर्स से जुडी है पर आप इसे शौकिया तौर भी पढ़ सकते है ।

आशीष , उन्नाव ।

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

diwaswapn : A novel by GijuBhai



दिवास्वप्न : गिजुभाई का एक नावेल 


पिछले कुछ दिनों से गिजुभाई का प्रसिद्ध नावेल दिवास्वप्न पढ़ रहा था। वैसे गिजुभाई का नाम शायद आपके लिए नया हो। मैंने भी इनके बारे काफी देर से जाना। ये गुजरात के प्रसद्धि शिक्षाविद थे। इन्होने ने शिक्षण पर बहुत सुंदर पुस्तकें लिखे है। इनका जोर प्राथमिक शिक्षा में अमूल चूल बदलाव पर था।  यह खेल के जरिये शिक्षा देने पर जोर देते थे। रटने पर जोर देने के बजाय , बच्चों को खेल के जरिये सरल तरीके से ज्ञान देने पर जोर था। गाकर , अभिनय , चित्र बनाकर बच्चों को भाषा , व्याकरण , भूगोल आदि विषय को आसानी से बच्चों को सिखाया जा सकता है।  

दिवास्वप्न (1932 ) में प्रकाशित हुआ था। इसमें एक शिक्षक लक्ष्मीशंकर एक विद्यालय में अपने अनूठे प्रयोग करते है। वह बच्चो को साफ सफाई , अनुशासन आदि के बारे सरलता से अपने प्रयोगों के जरिये प्रेरित करते है। उनको , अन्य शिक्षक के प्रतिरोध , व्यंग्य आदि का सामना करना पड़ता है पर अंत में वह सफल होते है।  

आज के समय में भी गिजुभाई जैसे शिक्षको की जरूरत है। पिछले दिनों , मेरी एक मित्र से बात हुयी उन्होंने बताया कि उनकी ढाई साल की बेटी पढ़ने के लिए स्कूल जाने लगी है। दिल्ली से है वो। कम उम्र में बच्चों को स्कूल भेजने की बात सुनी थी पर इतनी कम उम्र में , मुझे बहुत हैरानी हुयी। उन्होंने बताया की 10000 फ़ीस ली है। मेरे ख्याल से इतने रूपये के अगर बच्चे को खिलौने दे दिए जाय या फिर उसे नई नई जगहों पर घुमा दिया जाय तो बच्चे का मनोरंजन के साथ साथ ज्ञान परिवर्धन भी हो जायेगा।  प्लेस्कूल के नाम पर इन दिनों कम उम्र के बच्चों के मन पर बहुत बोझ डाला जाने लगा है। दिवास्वप्न का डिजिटल अंक , इंटरनेट पर मुफ्त उपलब्ध है। इसके न केवल शिक्षको वरन अभिवावकों के साथ साथ शिक्षा नीति निर्माण से जुड़े लोगों को जरूर पढ़ना चाहिए।  

आशीष कुमार 
उन्नाव , उत्तर प्रदेश।  




शनिवार, 9 दिसंबर 2017

Vyas prize Mamta kaliya



ममता कालिया जी को व्यास सम्मान दिया गया है । पिछले दिनों उनके एक नावेल दौड़ के बारे में लिखा था ।
व्यास सम्मान उनके नावेल दुखम सुखम् के लिए दिया गया है, आपको अगर यह नावेल पढ़ने की इच्छा हो तो आप गूगल में hindisamay की वेबसाइट पर जाकर उपन्यास सेक्शन में ममता कालिया लिंक पर पा सकते है, दौड़ भी वहाँ पर उपलब्ध है ।.

जल्द ही मैं भी उसे पढ़ने वाला हूँ, आप भी पढ़े और अपनी राय दे तो अच्छा लगेगा ।Ias की तैयारी करने वाले अक्सर अपनी हॉबी को लेकर बहुत sure नही होते । अगर आप भी किसी दुविधा से गुजर रहे हो तो मेरी राय माने और अपनी हॉबी रीडिंग नावेल बना ले , हिंदी या अंग्रेजी अपनी सुविधानुसार । नावेल मैं बताता रहूंगा काफी नावेल ऑनलाइन pdf में free में ही मिल जायेगे । 

इस हॉबी की सबसे खास बात यह है कि ias या pcs में सेलेक्ट न भी हुए तो आपको ज्यादा दुःख न होगा क्योंकि नावेल रीडिंग , आपके जीवन में , आपकी सोच में अलग किस्म का बदलाव लाएगी ।



आशीष, unnao।

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

Daar se bichhudi : A novel By Krishna Sobti

डार से बिछुड़ी : कृष्णा सोबती जी का एक नावेल 





कृष्णा सोबती जी को इस साल (2017 ) ज्ञानपीठ अवार्ड दिया गया है। काफी पहले उनके कुछ नावेल पढ़े थे पर समझ न आये , वजह उनकी पंजाबी मिश्रित हिंदी। मुझे कुछ कुछ मित्रों मरजानी का कथानक याद भी है।  

आईएएस मैन्स के लिहाज से भी कृष्णा जी काफी महत्वपूर्ण है। इस साल भी उन पर टिप्पणी  पूछी गयी थी।राजेंद्र यादव द्वारा सम्पादित एक दुनिया समानांतर में भी उनकी एक कहानी  ' बादलो के घेरे ' संकलित है।  

कल उनका चर्चित नावेल , डार से बिछुड़ी पढ़ा।  इसमें पाशो की कहानी है। पाशो , खत्री परिवार में जन्मी होती है पर सारा जीवन उसे भटकना पड़ता है , उसकी माँ शेखों के घर भाग जाती है , इसके चलते पाशो को उसके मामा , मामी बहुत तंग करते है। पाशो एक दिन घर छोड़ कर भाग जाती है , पहले शेखो के घर , फिर बूढ़े दिवान एक घर।  वहां उसे एक बच्चा होता है पर बूढ़े दीवान मर जाते है तो उस बूढ़े दीवान का भाई शोषण करता है और उसे बेच देता है। पाशो , अब जिस घर जाती है वहां पर एक बूढ़ा और उसके 3 बेटे होते है। मझला बेटा पाशो को महत्व देता है। इस दौरान चिलियाँ वाली लड़ाई (1849) शुरू हो जाती है , फिरंगी और पंजाबी लोगों के बीच। एक रोज मझला भी मारा जाता है। पाशो भटकती रहती है। अंत में , उसे उसका भाई , माँ मिल जाती है। तमाम संघर्ष , शोषण के बाद नावेल का सुखद अंत दिखाया गया है। नावेल पढ़ते समय मुझे यशपाल कृत दिव्या याद आया। दिव्या भी इस तरह भटकती और अंत में मारिश के साथ सुखद अंत होता है।  

( चित्र में कृष्णा जी का एक और नावेल ऐ लड़की का भी दिख रहा है। उसको भी पढ़ चूका जल्द ही उस पर भी लिखूंगा ) 

अशीष कुमार 
उन्नाव , उत्तर प्रदेश।  

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

Desh Birana : A Novel by Suraj Prakash


देश बिराना : सूरज प्रकाश जी का लिखा एक नावेल 



204 पन्नों में सिमिटा यह नावेल (2010 में प्रकाशित ) कुछ रोज पहले पढ़ना शुरू किया था। पीडीऍफ़ में निःशुल्क उपलब्ध है। ऑफिस में समय मिलने पर पढ़ता गया। कुछ पङने पढ़ कर लेखक के बारे में जिज्ञासा हुयी , तुरत फुरत उन्हें मेल भी कर दिया , उधर से दूसरे रोज जबाब भी आ गया। अच्छा लगा कि बड़े लोग , इतने भी व्यस्त नहीं होते। 

नावेल के बारे में बात कर ली जाय। नावेल के क्रेन्द्र में सिख नौजवान गगनदीप  है जो 14 साल में घर से भाग जाता है , पहले बॉम्बे भी लन्दन। सेल्फ मेड है , लंदन में छल से उसकी शादी होती है गौरी से पर उसके साथ हो घुटता रहता है , अंत में उसे मालविका से साथ जुड़ते , वापस लौटते दिखाया जाता है। मालविका भी एक पंजाबी लड़की है जो लन्दन में योगा टीचर है , जिसका अतीत बहुत कड़वा है। उसके घर वाले लन्दन में रहने वाले बलविंदर नाम झूठे इंसान के साथ शादी कर देते है। नावेल में दीप के घर के कड़ुए प्रसंग भी चलते रहते है , उसके पिता उसे बस पैसे के लिए ही मतलब रखते है , बहन की दहेज हत्या हो जाती है। नावेल में समकालीन समय के तमाम विसंगतियों के बारे में चर्चा है। आपकी पढ़ने की इच्छा हो तो मै सूरज प्रकाश जी साइट का लिंक दे रहा हूँ , जैसा कि उन्होंने बताया था कि उनका सारा लेखन ऑनलाइन निशुल्क उपलब्ध है , आप भी पढ़िए , अच्छा लगेगा।  

( एक योजना के तहत मै समकालीन समय के हिंदी नावेल को पढ़ रहा हूँ, उम्मीद से अधिक तेजी से नावेल खत्म हो रहे है बस उनका रिव्यु लिखने में थोड़ा आलस हो रहा है , फिर भी समय समय पर आपको छोटा ही सही पर उनसे परिचय करता चुलुंगा।  ) 

आशीष कुमार 
उन्नाव , उत्तर प्रदेश।  

सोमवार, 4 दिसंबर 2017

neem ka ped

नीम का पेड़ 


यह नावेल , राही मासूम रजा ने लिखा था। यह भी लघु नावेल और उनकी लिखी अंतिम कृति  है। कभी मुझे उनका आधा गावं भी पढ़ने को मिला था पर पढ़ न सका। वजह उस नावेल की भाषा। वैसे भी आधा गांव को हिंदी के कुछ प्रसिद्ध आंचलिक उंपन्यास में गिना जाता है। आधा गांव , में गंगोली गांव की भाषा मेरे लिए काफी अवरोध वाली थी। इसलिए जब नीम का पेड़ पढ़ने बैठा तो लगा यह भी पूरा न पढ़ सकूगा।  

धीरे धीरे पढ़ा और 3 बैठक में खत्म हो गया। लघु नावेल ( 100 से भी कम पन्ने ) जरूर है पर कथा काफी विस्तार में है। कहानी नीम का पेड़ कहता है जिसे बुधिया ( दलित ) ने अपने बेटे सुखिया के जन्म पर लगाया था। देखा जाय तो यह नावेल आजादी के बाद की राजनीति को क्रेन्द्र में रखता है। दलित , मुस्लिम के m.p. , mla बनना , दूषित राजनीति के बारे में कथा है। जमींदारी के ढलान , उसका राजनीति में परिवर्तन को दिखाया गया है। देश के टुकड़े होने तथा आजादी के बाद सपने टूटने की कथा है। 
राही जी को महाभारत के डायलॉग लेखन के लिए भी जाना जाता है। नीम के पेड़ में मुस्लिम समाज के बारे में लिखा गया है इसलिए भाषा थोड़ी , बहुत कठिन लग सकती है पर ज्यादा अवरोध नहीं है। कथा , सरस , रोचक है। इस नावेल पर  टीवी सीरियल भी बना था , जिसमे पंकज कपूर ने बुधई राम का रोल निभाया था।   

आशीष कुमार 
उन्नाव , उत्तर प्रदेश।  

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

Ta ta professor by Manohr shyam joshi

ट टा प्रोफेसर

पिछले दिनों 10 नावेल मंगवाए है ऑनलाइन । कृष्णा सोबती, राही मासूम रजा , मनोहर स्याम जोशी आदि की किताबें है । 

अभी जोशी जी का संक्षिप्त किंतु बहुत रोचक नावेल खत्म किया । जोशी जी को बहुत पहले पढ़ा था । उन्नाव के गांधी पुस्तकालय में एक ही पुस्तक में उनके तीन नावेल सकलित थे , कसप, हरिया हरक्लिज की हैरानी , एक और जिसका नाम अब याद नही । उस समय जोशी जी को पढ़ना बहुत अच्छा लगा । उनके कुछ प्रसंग बहुत भाये थे जैसे एक चरित् था जो किसी के घर जाता और जैसे ही उससे चाय के बारे पूछा जाता वो समझ जाता कि अब यहाँ से विदा लेने का वक़्त आ गया ।

जोशी जी की एक खास लेखन शैली है , उनकी कथा शैली में बहुत रोचकता होती है, अनोखे व्यंग्य होते है । टाटा प्रोफेसर एक उत्तर आधुनिक नावेल है । एक प्रोफेसर पर क्रेंद्रित इस नावेल का सार यह है कि 'काम मनुष्य को कामुक से अधिक कामिक बनाता है और अस्तित्व को एक कॉमिक कामुक और कास्मिक त्रासदी बना देता है । '

नावेल को पढ़ते हुए मुझे लगा कि भूमिका पढ़ रहा हूँ पर नावेल उसी रूप में ही खत्म हो गया । जोशी जी कहानी लिख नही रहे बल्कि वो कहानी कह रहे है ।
वैसे आपको यह पता ही होगा कि जोशी जी दूरदर्शन पर आने वाले लोकप्रिय सीरियल हम लोग, बुनियाद के लेखक भी रहे है और उन्हें उत्तर आधुनिक समय के सर्वश्रेष्ठ रचनाकार माना जाता है । जादुई यथार्थवाद को भी उनसे जोड़ा जाता है ।वैसे अपने सुधी पाठकों से जानना चाहता हूँ कि उत्तर आधुनिक और जादुई यथार्थ वाद से आप क्या समझते है ?☺

ASHEESH KUMAR 

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

Creativity


रचनाशीलता का सीधा संबंध मन की मुक्ति से होता है यानि जितना आप सहज और सुकून में होंगे उतना ही आपके पास विचारों का जमावड़ा होगा। आपको बहुत कुछ नया और अनोखा सूझेगा करने के लिए।

पिछले कुछ महीनों में मैं छुट्टी पर था न जाने कितने ही विचार , संकल्पना। सोचता था यह लिखूंगा , वह लिखूंगा। बिलकुल अलग , अनूठी चीजे। जैसे ही ऑफिस जॉइन किया , धीरे धीरे सब ठप होने लगा। वही रूटीन सी जिंदगी। वैसे भी लम्बी छुट्टी से लौटने पर ऑफिस में बहुत काम जमा हो जाता है , जम कर काम पड़ रहा है। यह लगातार तीसरा शनिवार होगा जिसमें भी काम जारी रहेगा। अब न वो पहले सा सकून है , न ही वे अनूठे विचार। कितनी ही चीजों पर लिखने के लिए वादे कर रखे है खुद से पर ऐसा लगता है वो सुनहरे दिन आने से रहे। बहुत पहले गेहूं और गुलाब ( रामवृक्ष बेनीपुरी ) पर एक निबंध पढ़ा था। चाहत तो गुलाब की है पर गेहूं बगैर काम नहीं चल सकता। मतलब यह कि नौकरी न करोगे तो गेहूं कैसे मिलेगा। इसलिए गुलाब के बारे में यानि सौंदर्य के बारे सोचना , कल्पना करना अच्छी बात है पर गेहूं की फ़िक्र में गुलाब के ख्याल मरते जा रहे है।  

आशीष कुमार 
उन्नाव , उत्तर प्रदेश।  

रविवार, 12 नवंबर 2017

one year of Demonetization


नोटबंदी के १ साल 

नोटबंदी के एक साल पूरे हो गए है। इतना समय किसी योजना का सटीक विश्लेषण करने के लिए  काफी होता है। नोटबंदी के लाभ और हानि को लेकर विद्वान एक मत नहीं है। नोट बंदी के होने वाले लाभों में सबसे महत्वपूर्ण से कुछ कर-आधार का बढ़ना , बैंको के पास काफी मात्रा में पूंजी जमा होना , कर अनुपालन की दर  बढ़ना को माना जा सकता है। निश्चित ही इन बिंदुओं के आधार पर नोटबंदी का कदम भारत की इकोनॉमी के लिहाज से काफी लाभदायक रहा  है। आयकर विभाग के पास बहुत विशाल मात्रा में डाटा इकठ्ठा हो गया है जरूरत है उसका सही विश्लेषण कर, कर चोरी करने वालो को पकड़ना और उनको सख्त सजा देना। आयकर विभाग प्रोजेक्ट इनसाइट जैसी योजना के जरिये बड़ी लगन से जुटा है। 

अगर नोटबंदी के दूसरे पहलू की बात की जाय तो नोट छापने की लागत , लगभग 99 प्रतिशत नोटों का वापस आना दिखलाता है कि इस कदम के काफी उद्देश्य पूरे न हुए। नोटबंदी  भारत के  असंगठित क्षेत्र के लिए बेहद घातक रही  है। बहुतायत छोटी फर्म बंद होने की कगार में आ गयी। इसका असर बेरोजगारी  पर पड़ा साथ ही कृषि पर दबाव भी बढ़ा। चूँकि कृषि , उद्योग अन्योन्याश्रित होते है इसके चलते भारत की विकास दर निम्नतर स्तर पर आ गयी है। उम्मीद की जा रही थी कि भारत 2017 में लगभग 9 प्रतिशत की दर से विकास करेगा पर यह 5.7 प्रतिशत पर ही आगे बढ़ रहा है। डिजिटल पेमेंट के लिए कई तरह के कदम यथा भीम एप , प्रोत्साहन जैसे लकी ग्राहक योजना आदि के बावजूद इसका प्रचलन उम्मीद से कम हो रहा है। शुरू के दो महीनों की तेजी को छोड़ दे तो भारतीय , डिजिटल पेमेंट के लिए अनिच्छुक दिखते है।

समग्रतः नोटबंदी के 1 साल बाद भारत अपनी पूर्ण क्षमताओं के बावजूद  भले ही कई तरह की चुनौतियों से जूझ रहा है पर भारत की इकोनॉमी असंगठित से संगठित होने की ओर  तेजी से बढ़ रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह भारत में समावेशी विकास में सहायक होगी।  


आशीष कुमार 
उन्नाव , उत्तर प्रदेश।    












A very motivational story : Finally she got a government job


और अंततः उसे सरकारी नौकरी मिल गयी


भूमिका - काफी समय से पहले मैंने एक योजना के तहत मोटिवेशनल स्टोरी /लेख लिखना बंद कर दिया था और अपना लेखन समंसामियक विषयों की ओर मोड़ लिया था। हालांकि मोटिविशनल लेख को लोग ज्यादा पसंद कर रहे थे उसके बावजूद मैंने अपनी योजना के अनुरूप उनको लिखना बंद कर दिया था।

पिछले काफी समय से जब मै एकांतवास कर रहा था ( मतलब फेसबुक , ब्लॉग आदि से कटा था ) मुझे तीन कहानियां लिखने के विचार सूझ रहे थे। पहली कथा डॉक्टर की , दूसरी कथा रोबोट की और तीसरी एक लड़की की। इनका यही क्रम था। जब डॉक्टर के बारे में लिखने के बारे में सोच रहा था तो लगा कि इसकी कहानी शानदार है। फिर रोबोट के बारे जब सोचना शुरू किया तो लगा कि यह पोस्ट तो लोगों के दिलों में पढ़ाई की आग लगा देगी। आपको जिज्ञासा हो रही होगी कि आखिर रोबोट कौन है? दरअसल पिछले दिनों में  लड़का मिला जिसको देखकर लगा कि चिंतक जी के बाद यही गुरु बनाने के लायक है , उसके बारे  ज्यादा बाते फिर कभी , बस रोबोट के मतलब बता देता हूँ उसके पढ़ाई के घंटे  देख कर मेरे मन में शीर्षक के तौर पर रोबोट का ही खायल आया।  आईये आप उसकी बात शुरू करे जिसकी कहानी आज आप पढ़ने वाले है। कॉपी पेस्ट के दौर में आपको सचेत करते हुए बता दू यह कहानी आशीष कुमार , उन्नाव , उत्तर प्रदेश द्वारा उनके ब्लॉग व फेसबुक पेज  हेतु लिखी गयी है। )


मुझे ठीक से यह  याद नहीं  है  कि बात 2013 या 2014 की है पर इतना जरूर याद है कि शुरुआती दिनों में मैंने उसे झिड़क दिया था ( उसके मुताबिक मै उन दिनों भाव खाता था ) वजह थी उसके हर रोज , सुबह , शाम गुड मॉर्निंग तथा गुड नाईट के मेसेज। मेरी यह समस्या रही है कि लोगो की हेल्प करना तो बहुत अच्छा लगता है पर जैसे मुझे अहसास होता है कि मेरे समय जाया हो रहा तो बहुत ऊबता हूँ। यही कारण था कि उसकी यह हरकत मुझे अच्छी न लगती थी। उस डॉट के बाद जब उसने अपने बारे में बताया तो मुझे बहुत दुःख हुआ।

वो एक गावं से थी। पिता जी की मौत हो गयी थी। माँ और एक छोटे भाई के साथ जीवन संघर्ष कर रही थी। वह टूशन पढ़ाती थी (  इंटर मैथ के , मेरे लिए यह काफी महत्व की थी , दरअसल इंटर के दिनों से ही मेरी मैथ खराब होती गयी। हलांकि मैंने  मैथ से b.sc. कर रखा है और सेन्ट्रल गवर्नमेंट की उस जॉब में हूँ जिसके लिए अच्छी मैथ सबसे जरूरी है। दरअसल अपनी अंकगणित शानदार रही है और एग्जाम में वही काम आती है। कैलकुलस को मैंने जॉब के एग्जाम में ज्यादा उपयोगी न पाया। ). चुकि वो गांव से थी , गरीब थी ,छोटी उम्र में आत्मनिर्भर थी , मेरे उसके साथ सम्पर्क गहन होते गए। मुझे ऐसे लोगों से बहुत जुड़ना बहुत अच्छा लगता है जो अपनी दम पर , अपनी किस्मत बदलने के लिए जूझते है। 

अपनी बात का कोई निश्चित टाइम न था। 3  महीने , 6 महीने में उसकी काल आती थी। उन दिनों जिओ का जमाना न था , उसके फ़ोन जब तक रूपये होते तब तक बात करती -नहीं तो पुरे हक से कहती मुझे काल करो। बात अपनी 30 से ४० मिनट होती। वही पढ़ाई लिखाई की बाते , घर की , माँ की , गांव की बाते। अक्सर वो आईएएस के बारे  पूछती , किताबे के नाम आदि। सच कहु तो मुझे उसे झूठी दिलाशा देनी पड़ती कि पढ़ती रहो  जॉब जरूर लगेगी। वो उस राज्य से है जहां पर सरकारी जॉब के लिए सबसे ज्यादा करप्शन है , समझ रहे हो न अरे वही जहाँ एक पूर्व  cm जेल में है। खैर समय गुजरता रहा। लोग आते है जुड़ते है और चले जाते है वजह मेरे स्वभाव को झेलना, सबके वश की बात नहीं। वो जुडी रही और अपने संघर्ष में लगी रही। बीच में कोई प्राइवेट स्कूल ज्वाइन कर लिया था। तमाम बाते है पर उनका कोई विशेष मतलब नहीं। एक और बात जरूरी लग रही है बताना , कभी उसने अपने घर के संघर्ष के चलते परेशान होकर  जहर पीकर आत्महत्या करने की कोशिश भी की थी और यह राज उसके अनुसार मेरे अलावां दुनिया में कोई नहीं जानता कि वो आत्महत्या थी। मुझे लगता है कि इतना काफी है यह समझने के लिए वो किस परिवेश से थी , वो अपने खेत में काम करती , भैंस का दूध दुहती , गोबर फेकती और मन में कही न कही आगे बढ़ने की आस लिए जीवन जीती जा रही थी।

इस ऑक्टूबर एक रोज मुझे अपने नंबर पर मैसेज मिला कि उसने मुझे कॉल लगाई थी। दरअसल पिछले ३ महीनों से मेरा मोबाइल अक्सर बंद ही रहता। यह वह समय था जब  मुझे अपने 10 मिनट भी  बहुत कीमती लग रहे थे पता नही  क्या सोचा और उसे फ़ोन लगाया।  कुछ फॉर्मल बातों यथा कैसे हो , घर में सब ठीक है आदि के बाद उसने कहा सर, एक ख़ुशख़बरी है। मेरा  क्रेन्दीय विद्यालय में टीचर के पद पर सिलेक्शन हो गया है। सफलता की खबर हमेशा बहुत ऊर्जादायक होती है। अपने आँखो से मैंने न जाने कितने लोगो को संघर्ष करते और सफल होते देखा था पर इसकी बात निराली थी। काफी देर तक बात होती रही , उसका कहना था कि इस सफलता की एक बड़ी वजह आप है आपसे मैंने बहुत कुछ सीखा है। देखा जाय तो मैंने तो समय ( वैसे यह बहुत कीमती चीज है ) को छोड़ कुछ न दिया। फेसबुक की दोस्ती , कभी कोई रूबरू मुलाकात नहीं फिर भी मुझे बेहद खुशी हुयी शायद आपको भी पढ़कर बहुत खुशी महसूस हो रही होगी।

मैंने इन दिनों लोगों तो तमाम तरह का रोना देखा है - जनरल कैटगरी से हूँ , वेकन्सी नहीं आती है , सब पैसे से होता है , नौकरी पाने के लिए अच्छी कोचिंग की जरूरत होती , लड़की  हूँ , घर में पढ़ाई का माहौल नहीं है। मेरे घर वाले एग्जाम दिलाने बाहर नहीं जाते। वो भी जनरल कैटेगरी से ही है बाकि परिवेश ऊपर बता ही चूका हूँ। मैंने उससे हर पहलू पर विस्तार से बात  की  मसलन इंटरव्यू देने कहाँ गयी , कैसे गयी , क्या पहना था आदि आदि। उसे 60 में 52 अंक मिले , उसका कहना था कि अगर उसके पास शूज होते तो शायद 55 मिल जाते क्युकी उनके बगैर सैंडल में अटपटा महसूस कर रही थी।

उसकी जॉइनिंग भी हो गयी है। उसका कहना था कि वो काफी बदल गयी है , मुझे लग रहा था कि शायद पहनावे में बदलाव हुआ पर नहीं मैंने उसे हमेशा कम आँका। पिछले 4 सालों से टच में होने के बावजूद मेरे पास उसकी कोई तस्वीर न थी। एक आध बार उसने व्हाट एप  पर अपनी किसी फोटो की फोटो खींच कर भेजी थी पर मेरे दिमाग में उसका कोई चित्र था। हालांकि फेसबुक पर मै कभी किसी लड़की को रिक्वेस्ट सेंड नहीं करता और लड़की की  रिक्वेस्ट आने पर उसकी तस्वीर मांगने पर पूरा जोर देता हूँ वजह हमेशा यही लगता है कि आखिर कोई अनजान लड़की मुझे रिक्वेस्ट क्यू सेंड करेगी। इसको कभी इंसिस्ट न किया। ग्रामीण परिवेश , अपने आप में विश्वास की वजह होता है।  

मै  अभी उसके व्यक्तित्व में आये बदलाव की बात कर रहा था। जोइनिंग के बाद उसने अपनी नई तस्वीर भेजी। सच कहता हूँ मै स्तब्ध रहा गया। उसने अपने बॉब कट बाल कटा लिए थे। सबसे पहला ख्याल दंगल  गर्ल ( वो दंगल फिल्म का वो गाना तो सुना ही होगा , नेकर और टी शर्ट पहन कर आया ----------)  का आया। संयोग से यह भी उसी स्टेट से है। मैंने पूछा यह क्यों और कब क से। "बस मेरी मर्जी , पिछले कई महीनों  से ऐसे ही हूँ।" उसने कहा।  

अब जा कर यही निष्कर्ष निकला जा सकता है। उसे अपनी मर्जी से जीना था। रूढ़ियाँ उसे पसंद नहीं। यह अंतिम बात सुनकर आपको कैसा लग रहा है। भारतीय समाज में लड़की के बाल , लड़कों जैसे रखने का चलन नहीं है।  मुझे तो उसके बाल कटाने में भी लड़कियों की मुक्ति नजर आयी। हर लड़की की यह इच्छा होती है कि वह अपनी मर्जी से जिए , उसे कोई रोके , टोके न। मैंने इस बात तो हमेशा जोर दिया है कि अगर तुम्हे आजादी चाहिए , अपनी जिंदगी अपनी शर्तो पर जीनी है तो अपने पैरों पर खड़ी हो जाओ। रात दिन एक कर दो। जरूरी नहीं कि आईएएस , pcs ही बनो पर कुछ न कुछ अपने दम पर करो। 

मेरे तमाम पाठकों , विशेष कर लड़कियों के लिए इससे उम्मदा, मोटिवेशनल उदाहरण कोई नहीं हो सकता है।  अब वो आईएएस की तैयारी में लगी है ,  होगा या न होगा अलग बात है पर उसने  जो आदर्श सामने रखा है , उससे मै बहुत प्रभावित हुआ। जाते जाते आपके लिए एक प्रश्न छोड़ कर जाता हूँ उत्तर जरूर देना।  

एक लड़की जिसके माता पिता दोनों क्लास वन अधिकारी , 4 साल दिल्ली में आईएएस की कोचिंग , दिल्ली के नामचीन कॉलेज से पढ़ाई , अनुसूचित जाति ( इसका उल्लेख करना जरूरी न था पर इसको लेकर काफी बवाल हुआ था उस वक़्त अपनी राय न रखा था आज रख रहा हूँ , भारत में आरक्षण एक बड़ा और जटिल मुद्दा है। निश्चित ही कम से कम इतने आमिर और सशक्त परिवेश की लड़की द्वारा आरक्षण का लाभ लेना उचित न था। ऐसा करके वह अपने ही समुदाय / वर्ग का हिस्सा खा रही है। उन दिनों जब आईएएस टॉपर को लेकर विवाद हुआ था तो मेरी यही सोच थी कि इसका सलेक्शन तो तय ही था पर कोटे को लेकर वह अपने ही वर्ग की गरीब , कमजोर लड़की का हिस्सा , सीट खा गयी ) की लड़की आईएएस में जबरदस्त रैंक लाती है। पहला प्रयास , 21  साल की आयु , नाम का उल्लेख जरूरी नहीं पर आईएएस की तैयारी से जुड़ा हर कोई समझ सकता है कि मै किसकी बात कर रहा हूँ ?

आपके सामने दो लड़कियों की कहानी रख दी है। ऊपर वाली लड़की की नौकरी कोई बड़ी नहीं है , नीचे वाली लड़की की नौकरी सबसे बड़ी है। आप बताईये आप के लिए कौन ज्यादा प्रेरक है , सारी बातों को ध्यान  में रख कर सोचिये , किसकी  उपलब्धि बड़ी है और क्यों ? 

( Dear reader, above mentioned girl is one of from you , even your views & comments will be read by her . Thanks , keep reading .)

- आशीष कुमार 
उन्नाव , उत्तर प्रदेश।  
( e mail- ashunao@gmail.com )

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

Rehan pr Ragghu : a novel by Kashinath Singh


रेहन पर रग्घू 


कल और आज दोनों दिन में काशीनाथ सिंह का कालजयी उपन्यास रेहन पर रग्घू पढ़ डाला। काशीनाथ को मैंने काफी देर से जाना पर जब से जाना तब से वह मेरे पसंदीदा लेखक रहे है। काशी का अस्सी को काफी पहले पढ़ लिया था। देखा जाय तो काशी का अस्सी उनका अब तक का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। उनको साहित्य अकादमी का हिंदी के लिए 2011  पुरुस्कार रेहन पर रग्घू ( 2008 में प्रकाशित ) के लिए दिया गया 

यह नावेल काफी हद तक ममता कालिया के नावेल दौड़ से समता रखता है। इसका फलक हालांकि ज्यादा विस्तृत है। नावेल में रघुनाथ क्रेद्रिय चरित्र है उसकी , उसके 2 पुत्र संजय व धनन्जय तथा बेटी सरला की कहानी ही विस्तार लेती है। बड़ा बेटा संजय बहुत महत्वाकांक्षी है, अमेरिका जाने के लिए पिता की मर्जी के खिलाफ सोनल  से शादी करता है बाद में यह अमेरिका में अंजली से शादी कर लेता है , वजह क्युकि आरती के पिता गुजराती आमिर है। सोनल  भी अमेरिका से लौटकर बनारस में अपने पुराने प्रेमी समीर के साथ रहने लगती है। 

रघुनाथ के छोटा बेटा अपने बड़े भाई से भी आगे निकल जाता है। नोयडा में एक विधवा के साथ , उसकी दौलत के लालच में साथ रहता है। रघुनाथ की बेटी सरला , अपने घर से दूर रहती है। पिता की इज्जत और अपनी मर्जी की शादी के निर्णय के बीच दुविधा में रहती है। शादी तो नहीं करती पर वह एक नीची जाति के pcs अधिकारी के साथ घूमती फिरती है। यह pcs अधिकारी शादीशुदा है पर पत्नी के साथ नहीं रहता है। 

नावेल में और भी बहुत कुछ है पर सब कुछ बेहद निर्मम यथार्थ। बनारस के एक गांव पहाड़पुर की कहानी है जो कुछ समय के लिए बनारस के आनंद विहार में चलती है जहां पर रघुनाथ की बहु सोनल अपने प्रेमी समीर के साथ रहती है हालाकि सोनल ने अपने ससुर रघुनाथ तथा सास शीला की खूब सेवा की है। नावेल के अंत में रघुनाथ को अपने आप अपहरण होते दिखाया गया है वह जानना चाहते है कि क्या उसके आमिर बेटे , उसे बचाने के लिए फिरौती देना पसंद करेंगे। यह प्रश्न अनुत्तरित रहता है।  

नावेल पढ़कर मुझे कई तरह के भाव आये। निश्चित ही यह अपने समय की विद्रूपता को ही वर्णित करता है। रिश्तों में कोई मिठास नहीं , हर कोई उलझा हुआ है। सबके अवैध सम्बन्ध है किसी न किसी के साथ। रघुनाथ जोकि एक टीचर है अपनी सहायक टीचर के साथ जुड़े है। अतीत में लारा के साथ भी उसका छोटा सा प्रकरण है। इसी तरह सरला भी अपने टीचर के साथ जुडी थी। पुरे नावेल में ऐसे प्रसंग यत्र तत्र बिखरे पड़े है। गांव व शहर का टकराव , उलझाव भी है। मैला आंचल की तरह इस नावेल में गांव में जाति की प्रबलता , बदलाव को दिखलाया गया है। ठाकुर , अहीर तथा चमार के सम्बन्ध को काफी गहनता से चर्चा की गयी है। दशरथ के बेटे जसवंत ने टैक्टर का लेकर गांव की इकॉनमी को बदल दिया। पहले चमार , ठाकुर के खेत जोतते थे, अब अहीर दसरथ के सामने ठाकुरों को खेत जुटाने के लिए टाइम लेना पड़ता है। गोदान में सिलिआ ( चमार ) और पंडित के लड़के में प्रसंग में जो दलित चेतना ( पंडित के बेटे के मुँह में हड्डी डालकर अशुद्ध करना ) दिखाई गयी थी वह इस नावेल में काफी आगे बढ़ी दिखाई गयी है।  इसमें चमारों ने पुरे प्लान के तहत एक ठाकुर पहलवान को बेहद बुरी तरह ( जननांग काट कर ) से मार देते है वजह वही पहलवान , चमार की बीवी के साथ जोर व दबाव के सम्बन्ध बनाये दिखाई देता है।   

काशीनाथ की भाषा , उनकी कथा को काफी रोचक व सरस् बना देती है। लोचे ( इसमें बड़े लोचे है ), लौड़े ( तुम जैसे लौंडो को मै पढ़ाया करता था ), जैसे शब्द समकालीन यथार्थ को बखूबी दिखलाने में सक्षम है।  

--आशीष कुमार 
    उन्नाव , उत्तर प्रदेश।  

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

Daud : A novel by Mamta Kalia


दौड़ : ममता कालिया का एक नावेल 


काफी अरसे के बाद कोई हिंदी नावेल पढ़ा और उसे खत्म किया। काफी समय से उपन्यास खरीदता जा रहा था पर उनको शुरू कर कभी पूरी तरह से खत्म न कर पाता। 

यह नावेल 2000 में प्रकाशित हुआ था। आकार में यह लघु उपन्यास है। इसकी विषय वस्तु बहुत ही रोचक व सारगर्भित है। ममता कालिया ने अपने समय की तमाम विडंबनाओं को इसमें समेट दिया है। पवन , उसके छोटे भाई सघन तथा इनके माता रेखा व पिता राकेश की कहानी पुरे उपन्यास में फैली है। एक संयोग ही है कि इसमें अहमदाबाद का जिक्र भी हुआ है। दरअसल मै पिछले 6 सालों से अहमदबाद में ही रह रहा हूँ तो कई प्रसंग जैसे मेम नगर , एलिस ब्रिज आदि मुझे काफी रोचक लगे। मेम नगर में मै 4 साल रहा भी हूँ।  

पुरे नावेल में पीढ़ी अंतराल ,  बाजारवाद , उपभोक्तावाद के विविध पहलू छाये हुए है। पवन , अहमदाबाद mba करता है और नौकरी बदलता रहता है। स्टेला से शादी करना उसके लिए बस एक डील है। अपने परिवार की इच्छा के विपरीत सामूहिक विवाह में अपनी शादी करता है। दरअसल उन दोनों के पास वक़्त की बेहद कमी है।  छोटा बेटा सघन चीन चला जाता है और उसके माता पिता , बूढ़ा बूढी कॉलोनी में अकेले रह जाते है।  ममता कालिया ने इस लघु उपन्यास में यह दिखाया है कि लोगो के घरो में ओवन , वैक्यूम क्लीनर जैसी आधुनिक चीजे है पर उनके पास उनके बेटे नहीं है। एक जगह रेडीमेड बेटे का जिक्र कर ममता ने अपने समय की तमाम विद्रूपताओं को उजागर कर दिया है। 

हालांकि मैंने काशी नाथ का नावेल रेहन पर रग्घू पढ़ा तो नहीं है पर उसमे भी इस तरह की समस्या को ही दिखाया गया है।  दरअसल उदारीकरण के बाद जिस तरह से संयुक्त परिवार टूट कर एकल परिवार में बनने लगे और दो नौकरी का चलन बढ़ा उससे भारतीय समाज में पश्चिम जैसे समस्याओं की झलक मिलने लगी। सन 2002 के परिवेश को ममता ने इस लघु उपन्यास में समग्रता  समेटने की कोशिश की है और वह इसमें पूर्णता सफल भी है।  अगर आपको भी यह नावेल पढ़ना हो तो नीचें लिंक से फ्री में डाउनलोड कर सकते है।  


आशीष  कुमार 
उन्नाव , उत्तर प्रदेश।  











शनिवार, 4 नवंबर 2017

we have to fill the gap between Men and Women

दो सूचकांक के निहितार्थ 


आज के समय में  किसी देश की स्थिति का अनुमान प्रायः विविध सूचकांकों से आधार पर लगाया जाता है. भारत को पिछले दिनों दो विरोधी स्थितियों का सामना करना पड़ा। एक ओर भारत ने विश्व बैंक द्वारा जरिये किये जाने वाले इज ऑफ़ डूइंग बिजनेस इंडेक्स (2004  में शुरू )में अपने रैंक भारी इजाफा किया। इसमें भारत ने 2016 की रैंक 130 से 2017 में 100 स्थान में आ गया है। 30  स्थान की बढ़त , निश्चित ही भारत में कारोबारी माहौल में किये गए सुधार का परिणाम माना जा सकता है। 

इससे इतर एक दूसरे महत्वपूर्ण सूचकांक में भारत को कई स्थानों को गवाना पड़ा है। विश्व के महत्वपूर्ण थिंक टैंक विश्व आर्थिक परिषद ( ) द्वारा जारी ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स ( 2006  में शुरू ) में भारत 2016  में  87  के मुकाबले 2017 में 108 स्थान पर है। यह सूचकांक भारत में लैंगिक विभेद की गिरती स्थिति को दिखलाता है। इस सूचकांक का निहितार्थ यह है कि भारत में पिछले साल के मुकाबले इस साल महिलाओं और पुरुषों के बीच विषमता बढ़ी है। इसको आप शिक्षा , सामाजिक , आर्थिक व न्याय के क्षेत्र में विभेद के रूप में समझ सकते है।  

हम प्रायः समावेशी विकास की बात करते है जिसका सरल आशय प्रगति और विकास का लाभ समाज के हाशिये पर खड़े , वंचित वर्ग को समरूपता से वितरित करने से है। ऊपर के दो आकंड़ो से यही लगता है कि विकास तो उलटी दिशा में हो रहा है। अगर कारोबार में आसानी हो रही है तो उसका लाभ महिलाओं को भी मिलना चाहिए। उनकी आर्थिक दशा पर भी इसका पड़ना चाहिए।  

भारत में रोजगार के क्षेत्र में महिलाओ की भागीदारी पश्चिम की तुलना में बेहद निम्न है। इसके पीछे शिक्षा , स्वास्थ्य में लड़कियों के साथ होने वाले विभेद के साथ साथ हमारी पितृसत्तामक सोच भी है। यह वही बात है जो पश्चिमी स्त्री विमर्शक सिमोन द बुआ ने कही थी कि स्त्री पैदा नहीं होती , स्त्री बना दी जाती है। इसलिए भारत की सरकार के साथ साथ समाज को भी इस विषम स्थिति में बदलाव लाने के बहुआयामी प्रयास करने चाहिए। आप ऐसे समाज में शांति , स्थिरता व् समरसता की उम्मीद नहीं कर सकते है जो स्त्री को दोयम दर्जे में रखता हो , भले ही यह समाज कितनी ही आर्थिक प्रगति कर ले , कितना ही समद्ध क्यों न हो।  


आशीष कुमार 
उन्नाव , उत्तर प्रदेश। 

My letter published in Yojna issue October 2017







प्रिय दोस्तों , कैसे है आप सभी। एक लम्बे अंतराल के बाद आप से मुखातिब हो रहा हूँ। पिछले माह ( अक्टूबर ) में मेरा एक पत्र योजना में प्रकाशित हुआ है। आप भी पढ़िए और बताइये कैसा है। पात्र में अंत में दो बहुत सुन्दर लाइन भी है जिनका उपयोग आप किसी भी निबंध /लेख /उत्तर में प्रयोग कर सकते है।


अगर यह पढ़ने में न आ रहा हो तो इसे डाउनलोड करके देख सकते है।  धन्यवाद। 

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

Media reality

हरकारा

सनसनी को
समाचार बनाकर
दिखला रहा है हरकारा
हत्याओं से नही
हत्यारों से नहीं
हत्याओं से भरे समाचारों के
कम बिकने के आसरो से
घबरा रहा है हरकारा

सुल्तान अहमद की कविता

सोमवार, 28 अगस्त 2017

75 years of Quit India Movement


भारत छोड़ो के 75 साल 


हाल में ही भारत छोड़ो आंदोलन के 75 वर्ष पुरे हुए है। इस विशेष अवसर पर हमारे प्रधानमंत्री ने आज के युवा वर्ग से एक आह्वान करते हुए कहा कि आज भारत को कई समस्याओं यथा गरीबी , कुपोषण , जातिवाद को भारत से छोड़ने के लिए बाध्य करना है। इस अवसर पर एक विशेष कार्यक्रम 'संकल्प से सिद्धि ' की घोषणा भी की गयी। ऐसी आशा की गयी कि अगर हम आज उक्त वर्णित समस्याओं को दूर करने का संकल्प ले तो 2022 में भारत इन समस्याओं से आजाद हो जाएगा। जैसे 1942 के ठीक 5 वर्ष  बाद 1947  में भारत को ब्रिटिश शासन से आजादी मिल गयी थी।  

प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों देश के जिलाधिकारियों से सीधे संवाद किया। उन्हें फाइलों से भारत निकल कर जिले की हकीकत को देखते हुए काम करने को कहा गया। हर किसी को अपने स्तर पर लक्ष्य तय करने को कहा गया। निश्चित ही यह प्रशासन के परम्परागत रूप से काफी बदला नजर आता है। भारत को आजाद हुए 70 साल होने को है , इसके बावजूद भारत कुछ गंभीर विसंगतिओं का देश कहलाता है। एक भारत महाशक्ति कहलाने का आतुर दिखता है और कुछ मायने में महाशक्ति कहा भी जाने लगा है तो दूसरी ओर भारत में सबसे जयादा कुपोषित , गरीब , स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित आबादी रहती है। 

 जब भारत आजाद हुआ था तब भारत के समक्ष बेहद गंभीर चुनौती थी - शरणार्थी मुद्दा , राज्यों की एकता , भाषायी चुनौती , कश्मीर का मसला। निश्चित ही भारत ने आजादी के बाद काफी प्रगति की है। शिक्षा , खाद्य सुरक्षा , सीमा रक्षा , तकनीक  ऊर्जा के मसलों पर भारत ने सापेक्ष रूप में खूब प्रगति की है। भारत इन सालो में एक जटिल समस्या से जूझता रहा वह है विषमता। चाहे यह वर्गगत हो या क्षेत्रगत , भारत दोनों ही नजरिये से असफल रह है। ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार , आजादी से समय से अब तक भारत में अमीर और गरीब के बीच की खाई और चौड़ी हुयी है। आखिर इसकी वजह क्या हो सकती है ?

दरअसल विकास के लाभ , भ्रस्टचार के चलते कुछ वर्गो तक ही सीमित रहे या कहे उनके द्वारा लपक लिए गए। भारत में अक्सर नीति पंगुता बनाम क्रियान्वयन असफलता पर बहस की जाती है। मेरे हिसाब से दोनों ही मसलों में भारत असफल रहा। लाइसेंस राज में लोग अपने उद्योग के विकास के बजाय मंत्रालय में जोड़ -तोड़ में लगे रहे। इसी तरह देश के एक प्रधानमंत्री ने खुद स्वीकारा कि दिल्ली से आने वाले 1 रूपये में मात्र 15 पैसे ही गरीब को पहुंच पाते है। आशा की जानी चाहिए कि  प्रधानमंत्री जी के इस नए, जोशीले नारा 'करेंगे और करके रहेंगे ' मात्र एक वाक्य न बन कर रह जाये।  समस्त देशवासी इस दिशा में गंभीरता से प्रयास करेंगे।

आशीष कुमार
उन्नाव , उत्तर प्रदेश।  

शनिवार, 12 अगस्त 2017

20 years OF BIMSTEC


बिम्सटेक के 20 वर्ष 


हाल में ही नेपाल में बिम्सटेक के विदेश मंत्री स्तर की बैठक संपन्न हुयी। पिछले कुछ सालों में यह क्षेत्रीय संगठन भारत तथा पड़ोसी देशों के लिए सबसे लोकप्रिय , उपयोगी मंच बनकर उभरा है। 1997 में स्थापित यह बहुआयामी मंच , सार्क के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। विदित हो कि आंतकवाद, सम्पर्क के मसले पर पाकिस्तान के अड़ियल रुख के चलते सार्क की उपयोगिता कम होती जा रही है। पिछले सार्क की बैठक जोकि पाकिस्तान में होनी थी , भारत के साथ साथ श्रीलंका , भूटान के विरोध के चलते स्थगित हो गयी थी।  

बिस्मटेक के नेपाल बैठक में आतंकवाद के प्रति कड़ा रुख अपनाये जाने , क्षेत्रीय सहयोग वृद्धि , शांति व स्थिरता के लिए मिलकर काम करने की बात कही गयी है।  बिम्सटेक के इस साल अपनी स्थापना के 20 वर्ष पूरे हो रहे है। इन दो दशकों में इस संगठन ने आपसी सहमति , सहयोग के मसले पर काफी प्रगति की है। विज्ञानं , तकनीक , क्षेत्रीय सुरक्षा , आतंकवाद , व्यापार , सम्पर्क जैसे महत्वपूर्ण मसलों पर काफी प्रगति हुयी है। 2014 में ढाका में इसका सचिवालय स्थापित किया गया था।  2016 में भारत ने गोवा में आयोजित ब्रिक्स देशों की बैठक के साथ इस संगठन के सदस्य देशो को आमंत्रित कर , इसके बढ़ते महत्व को प्रतिबिम्बित किया था।  

बिम्सटेक , भारत की एक्ट ईस्ट , नेबरहुड फर्स्ट पालिसी के नजरिये से काफी महत्व रखता है। भारत , म्यांमार , थाईलैंड के बीच त्रिपक्षीय मार्ग बनाने की बात की जा रही है। भारत -म्यांमार -कलादान मल्टीमॉडल मार्ग को भी स्थापित किया जाना है। यह भारत के पूर्वोत्तर भाग में नए विकास -प्रगति के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित होगा। भारत ने इस साल साउथ एशिया सेटेलाइट को लांच किया है जो इस क्षेत्र के देशों को निःशुल्क उपग्रह सेवाओँ के लाभ प्रदान करेगा। आशा की जा सकती है कि भारत , इस मंच को अपने अनुभव , प्रगति को साझा करते हुए नई उचाईयों तक ले जायेगा। 

आशीष कुमार 
उन्नाव , उत्तर प्रदेश।  

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

WOMEN SECURITY : ANALYSIS


 महिला सुरक्षा : एक विश्लेषण 

चंडीगढ़ में एक आईएएस की बेटी के साथ हुयी घटना , उस पर पुलिस की ढीली कार्यवाही से एक फिर भारत की परम्परागत , रूढ़िगत सोच दिखाई दे रही है। निश्चित ही उस लड़की ने बेहद साहस दिखाते हुए पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाई। आमतौर पर इस तरह की पीछा किये जाने की , गंदे कमेंट करने की गतिविधि एक भारतीय लड़की के लिए आम बात है। प्रायः लड़कियों को इस तरह के मामलों को अनसुना करने की हिदायत दे दी जाती है। पुलिस के पास , आम नागरिक कतराता है वजह पुलिस का असहयोग और उदासीनता का रवैया। चंडीगढ़ के उक्त मामले में भी पुलिस ने दबाव में कार्यवाही में शिथिलता बरती। वास्तव में पुलिस अक्सर सही धारा में केस नहीं दर्ज करती। रिपोर्ट में सारे खेल छुपे होते है। लड़की ने अपहरण के प्रयास के तहत रिपोर्ट दर्ज करानी चाही पर पुलिस ने सिर्फ छेड़खानी का मामला दर्ज किया। इससे केस कमजोर पड़ गया और आरोपी को जमानत मिल गयी। अपहरण के केस में उसे जमानत न मिलती।  पुलिस को कई CCTV  में कोई भी फुटेज न मिली। पुलिस की इसी तरह की गतिवधियों के चलते उनकी समाज में छवि खराब हुयी है। पुलिस सुधार के लिए बनी कई समितियों में यह कहा गया है कि उसे राजनीतिक दवाब में काम नहीं करना चाहिए। यहां पर यह जान लेना उचित है कि पुलिस , राजनीतिक दबाव में कार्य क्यू करती है ? उत्तर है कि  पुलिस अधिकारियों के कार्यकाल की कोई निश्चित सुरक्षा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने भी पुलिस सुधार पर चर्चित मामले प्रकाश सिंह में इस दिशा में कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे जिनका अनुपालन नहीं किया गया। 

किसी भी राष्ट की प्रगति के लिए जरूरी है कि वहां पर महिलाओं की सभी तरह की गतिविधिओं में समान भागीदारी बढ़े। भारत का मानव विकास सूचकांक , ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में बेहद निम्न स्थान है। इसका के बड़ा कारन , भारत में महिलाओं की सुरक्षा की लचर स्थति है।  केवल आर्थिक विकास ही , भारत के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। सरकार को समाजिक विकास पर भी ध्यान देना होगा। इस तरह की घटनाओं में ही नहीं वरन सभी घटनाओ में जहाँ न्याय की अवहेलना होती हो , सक्रिय भूमिका निभानी होगी। समाज में इस तरह की घटनाये न हो , इसके लिए केवल पुलिस या सरकार का ही दायित्व नहीं है। आमजन को भी अपनी परम्परागत सोच में बदलाव लाना होगा। हमें पितृसत्तामक सोच से निकलना होगा। महिलाओं के लिए सामान अधिकारों की बात करनी होगी। तभी समाज में शांति व स्थिरता आएगी और देश सम्पूर्ण , समावेशी प्रगति के पथ पर गतिमान हो सकेगा।  

आशीष कुमार 
उन्नाव , उत्तर प्रदेश।   

50 years of ASEAN


आसियान के 50 साल 

इस वर्ष आसियान , अपनी स्थापना के 50 साल मना रहा है। 1967 में स्थापित यह 10 देशों का संगठन , विश्व के सबसे सफल क्षेत्रीय संगठन बनकर उभरा है। आसियान देशों ने आर्थिक , सामरिक , संस्कृतक मसलो पर अच्छी , सफल भूमिका निभाई है। इसने अपने सदस्य देशों के आन्तरिक मसलों पर भी हस्तक्षेप किया ताकि संगठन में मजबूती व स्थिरता बनी रहे। इसका अच्छा उदाहरन म्यामार है , जहाँ पर सैनिक शासन की जगह  लोकत्रांतिक शासन की शुरुआत हुयी है। इसके रीजिनल इकनोमिक कॉम्प्रिहेंसिव पहल में कई देश शामिल होने के लिए उत्सुक है। भारत भी इसका सदस्य बन चूका है। भारत तथा अन्य दक्षिण एशिया के देशों को अपने क्षेत्रीय पहल सार्क को , इस तरह की सफलता नही मिल पाई है। साफ्टा पर सहमति बनने के बावजूद , अभी भी इन देशों के बीच संपर्क और व्यापार को ज्यादा सफलता नही मिल पाई है। सार्क देशों को भी , आसियान से प्रेरणा लेते हुए , आपसी मतभेद को भुला कर अपने आर्थिक , सामरिक तथा राजनीतिक संबंधो को वरीयता देनी चाहिए।  

आशीष कुमार , 
उन्नाव , उत्तर प्रदेश।  

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