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शनिवार, 21 नवंबर 2020

बथुए का साग और मास्टर जी

 

बथुए का साग और मास्टर जी 


आज जब सब्जी वाले के ठेले पर बथुए का साग देखा तो बहुत खुशी  हुयी। delhi में देशी चीज मिल जाये तो अलग ही आनंद मिलता है। वैसे कुछ दिनों से  पालक तो थोक के भाव खूब मिल रही थी पर बथुआ पहली बार दिखा। अब तो बढ़िया स्वादिष्ट साग व् पराठे बनेंगे , यही ख्याल बुनते हुए घर आ रहा था , इसी वक़्त मास्टर साहब याद आ गए। 

कक्षा 9  व 10 के समय वो मेरे अध्यापक थे। उनकी छवि बहुत सख्त व कंजूस किस्म के इंसान की थी। Government school me पढ़ाने के साथ साथ अलग से टूशन भी पढ़ाया करते थे। स्कूल से दूर एक बाग में नलकूप की एक कोठी थी , उसी में वो पढ़ाया करते थे। गुरु जी के बारे में तमाम कहानियां छात्रों के बीच में प्रचलित थी।जैसे कि उनके पास बहुत पैसे है फिर भी बड़ी कंजूसी से रहते है , एक कथा के अनुसार किसी बदमाश किस्म के छात्र ने गुरु जी को देसी असलहा दिखाकर उनसे उनकी सायकल लदवाकर 100 मीटर तक चलवाया था। दरअसल गुरु जी स्कूल में बहुत ज्यादा ही पीटा करते थे , इसके लिए भी लोग कहते थे जैसे कोई धोबी अपने खोये गधे को मिलने पर तबियत से पीटता है , वैसे ही गुरु जी छात्रों को पीटा करते थे। खैर वो अलग ही दौर था , अलग ही स्कूल हुआ करते थे , जहाँ अभिवावक खुद जाकर बोलते थे कि मास्टर साहब लड़का बिगड़ने न पाए मतलब बस हाथ पैर न टूटे बाकि चाहे जैसे पीटो। 


    

वैसे  तो तमाम किस्से है, जैसे कि एक जाड़े की सुबह मै tution जरा देर से पहुँचा तो गुरु जी ने बॉस के चार डंडे कस के हाथ में चिपका दिए , इस आरोप के साथ की रास्ते में कहीं आग लगाकर तापने बैठ गया होगा। उम्र 14 की थी , घर से स्कूल 10 किलोमीटर दूर था। सुबह 6 बजे पहुंचना था , पहला दिन था न पहुंच पाया तो गुरु जी ने माहौल बनाने के लिए पीट दिया। मेरे साथ दो चार और साथी थे वो पिटे। गुरु जी को टूशन के पैसे से बड़ा मोह था। डरे भी रहते कि कहीं कोई देख न ले , शिकायत न कर दे। आते व् जाते वक़्त सख्त हिदायत दे रखी थी कि एक साथ न निकलना ( वरना लोग देखते कि गुरु जी टूशन से बहुत पैसे छाप रहे हैं ). मेरे साथ में एक दलित छात्र भी टूशन पढ़ा करता था , उसको वो बड़ा बेइज्जत करते। उम्र छोटी थी पर इतना जरूर समझ आता कि उसके साथ वो ठीक न कर रहे है।किसी को fee देने में जरा भी देर हुयी कि समझो गुरु जी का पारा चढ़ा। 


गुरु जी को मुझसे कुछ स्नेह सा था। स्कूल के रास्ते में एक मेला लगा करता था। गुरु जी को मेरी आर्थिक स्थिति का ज्ञान था।एक दिन बोले मेला देखने जाओगे , मैंने कहा- नही , वो बोले अरे चले जाओ 2 रूपये मै दे रहा हूँ बस अगले महीने ध्यान से वापस जरूर कर देना। दो रूपये को कैसे खर्च करना है वो भी बता दिया पर मैंने गुरु जी को मना कर दिया। वजह आप समझ ही सकते हैं। 


गुरु जी की एक ही बेटी थी , सुनने में आता था कि उन्होंने अपने भाई के बेटे को गोद सा लिया है पर वो लड़का गुरु जी के सिद्धांतो में खरा न उतरा। बथुए के साग वाली बात भी बता रहा हूँ बस थोड़ी सी भूमिका और बना लूँ। उन्हीं दिनों उनकी बेटी , माँ के साथ आगे की पढ़ाई के unnao में जाकर रहने लगी। गुरु जी हर सप्ताह के अंत में वहाँ जाते और सोमवार को वापस आ जाते। शनिवार को जब वो गांव से उन्नाव जाते तो तमाम राशन पानी में बथुआ भी जाया करता। गुरु जी बथुए की दिल खोल कर प्रसंशा किया करते। मसलन कि बहुत पौष्टिक , सेहत के लिहाज से बहुत उपयोगी चीज है , बथुआ। आप सोच रहे है कि इसमें क्या खास बात है--- रुकिए गुरु जी बथुआ भी बाजार से न खरीदा करते थे। उनके अनुसार वो अपने गांव के कुछ छोटे छोटे लड़कों से यह काम कराया करते थे। उनके अनुसार 50 पैसे , एक रूपये में यह लड़के झोला भर बथुआ ला दिया करते है। मुझे उस टाइम भी यह लगता था कि गुरु जी उन लड़कों को इतने कम रूपये देकर शोषण कर रहे हैं पर कही दूसरे बहाने से मुझे पीट न दे , इसलिए मै भी इस अन्याय पर चुप ही रहा। 

पढ़ाई के बाद कुछ दिन तक तो गुरु जी से सम्पर्क रहा पर धीरे २ वो टूट गया।अब खबर न है कि वो किस हाल में हैं और अब बथुआ तोड़ कर लाने पर गांव के छोटे छोटे लड़कों को कितने रूपये देते हैं।  

©आशीष कुमार, उन्नाव।

21 नवंबर, 2020।

 






 









 

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