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शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

दिव्या : यशपाल का उत्कृष्ट उपन्यास

दिव्या
  • 1945   में लिखित बौद्धकालीन उपन्यास 
  • ' दिव्या ' इतिहास नही , ऐतिहासिक कल्पना मात्र है 
  • इतिहास विश्वास की नही , विश्लेष्ण की वस्तु है . 
  • मनुष्य भोक्ता नही करता है . 
  • यशपाल जी मार्क्सवादी विचारधारा के लेखक है , इस नावेल में इसी विचारधारा की पुष्टि होती है।  
  • बौद्ध धर्म , हिन्दू धर्म की विसंगतियों का चित्रण , चर्वाक दर्शन को सबसे ज्यादा महत्व 
  • ' मारिश' के विचार , एक प्रकार से यशपाल जी के विचार है।  
  • ' जन्म का अपराध ? '  कथानक के शुरु मे ही पृथुसेन के द्वारा , एक महत्वपूर्ण प्रश्न को उठाया गया है।  
  • ' देवता का विधान केवल विश्वास और अनुमान की वस्तु है ' कह कर यशपाल अपने समय की जटिल प्रश्नों से जूझने की कोशिस करते है।  
  • ' मै वर्ण का न्याय नही , धर्म का न्याय चाहता हूँ '  पृतुसेन 
  • ' मुर्ख , तू ने और तेरे स्वामी ने परलोक देखा है ? यह विश्वास ही तेरी दासता है।  तू अपने पर स्वामी के अधिकार को स्वीकार करता है , यही तेरी दासता का बंधन है। ....... तू स्वत्रंत 'कर्ता'  है।  स्वत्रंता का अनुभव करना ही जीवन है----- चर्वाकवादी मारिश का कथन 

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