BOOKS

बुधवार, 28 मार्च 2018

An evening in mukherjee nagar, delhi

भइया क्या चाहिए ?


हमेशा की तरह इस बार शुरुआत खाने से हुई । अग्रवाल स्वीट्स में इमरती खाने से हुई , काफी अरसा हो गया था इसे खाये हुए । इसके बाद कुछ पत्रिकाओं , किताबों की खरीद और फिर यूँ ही घूमना और भीड़ को देखना । जब भी मुखर्जी नगर आना होता है लगभग यही रूटीन रहता है। शाम का वक़्त, सैकड़ो युवा चाय, काफी , मोमोज, रोल खाने में मस्त और हाँ किताबों , नोट्स, फ़ोटोकॉपी खरीदने में व्यस्त। इस भीड़ में मैं कुछ पढ़ने की कोशिस करता हूँ । एक युवा , पीठ पर बैग लटकाये, रोल खाने में व्यस्त। शायद किसी कोचिंग से 4 घंटे की क्लास करके निकला होगा। सोचता हूँ क्या सपना लेकर यह यहां आया होगा।
एक फोटोकॉपी की दुकान के सामने से गुजरा तो दूर से ही लड़के ने पुकारा -भइया क्या चाहिए ? मैंने गंभीरता से कहा - स्टूल ।
वो अकबकाते हुए मुझसे पूछा -स्टूल?
"हाँ , वो अंदर जो स्टूल पड़ा है वो यहां बाहर लाकर डाल दो । मैं तापमान नापने वाला हूँ और कुछ देर यहाँ बैठ कर तापमान नापना चाहता हूँ।"
पता नही उसको मेरी अलंकारिक भाषा समझ आयी या नही पर उसने बाहर स्टूल लाकर डाल दिया। लगभग 30 मिनट , वहाँ बैठा , भीड़ को पढ़ता रहा।
( ठीक 4 घण्टे पहले , बत्रा सिनमा के सामने की घटना )

मंगलवार, 6 मार्च 2018

दुक्खम सुक्खम : A novel by Mamta Kaliya



दुक्खम सुक्खम  : ममता कालिया का व्यास पुरुस्कार से सम्मानित उपन्यास 


274 पेज का यह नावेल वर्ष 2010 में प्रकाशित हुआ था। इसे 27 वा , 2017 का व्यास सम्मान दिया गया है । 9 दिसंबर की पोस्ट में मैंने लिखा था कि इसे पढ़ने वाला हूँ। तब इसे धीरे धीरे पढ़ता रहा और पिछले दिनों इसे खत्म कर लिया। इस नावेल को खरीदने के बजाय हिंदी समय की वेबसाइट पर जा कर इसे पढ़ता रहा। डिज़िटल संस्करण का फायदा था कि इसे आप चाहे जहाँ पढ़ सकते है। 

ममता जी के एक साक्षात्कार में मैंने पढ़ा था कि यह नावेल उनके पिता की कहानी है। पुरे नावेल में यह बात जेहन में रही और मैंने निष्कर्ष निकला कि कवि मोहन उनके पिता है और उनकी दो बेटी है।  छोटी बेटी के रूप में स्वंय ममता जी ने अपने आप को चित्रित किया है। नावेल के अंतिम पन्नों में काफी बेबाकी से एक किशोर लड़की का चित्र खींचा है। यह उपन्यास दरअसल महात्मा गांधी के महिलाओं पर पड़े प्रभाव की पृष्ठभूमि में लिखा गया.

कथानक वहाँ से शुरु होता है जहाँ कविमोहन , आगरा में रह कर पढ़ाई कर रहा है। आजादी के 20 , 30 पहले से कहानी शुरू होती है। कवि की माँ , पिता , उसकी पत्नी के बारे बताते हुए नावेल आगे बढ़ता है। देखा जाय तो ममता जी का यह नावेल एक परिवार की पूरी कहानी है। हर छोटी -बड़ी घटना है इसमें। कवि की माँ यानि ममता जी की दादी , गाँधी जी के विचारों से बहुत प्रभावित है। वो एक गीत गाया करती थी - 

कटी जिंदगानी , कभी दुक्खम , कभी सुखम। 

इसी से इस नावेल का शीर्षक लिया गया है। सच में नावेल में सुख और दुःख के विविध प्रसंग है। कहानी वहां खत्म हो जाती है जहां कवी की माँ मर जाती है।  कवि की छोटी बेटी यानि ममता अपनी दादी को बहुत याद करती है। मथुरा , आगरा , दिल्ली और पुणे तक यह नावेल फैला है। पुणे में कविमोहन रेडियो में कार्य कर रहे होते है। समग्रतः यह नावेल पठनीय है खास तौर पर आप आराम से , सकून से ज्यादा दिमाग पर जोर न  डालते हुए कुछ सरस् पढ़ना चाहते हो तो इसे पढ़ सकते है। 



आशीष कुमार 
उन्नाव , उत्तर प्रदेश।  

A very bad time for me and my family



प्रिय दोस्तों , 23 फरवरी 2018 को मेरे छोटे भाई विकास ( आयु -25 वर्ष ) जोकि लेखपाल के तौर पर जॉब कर रहा था एक सड़क दुर्घटना में  मौत हो गयी है। 2010 में पिता जी मौत के बाद धीरे धीरे परिवार में चीजे काफी हद तक व्यस्थित हो गयी थी पर इस दुखद घटना की क्षति कभी न हो सकेगी। मन में बहुत दुःख है , धीरे धीरे उबर रहा हूँ। अब जब कि सब कुछ बहुत अच्छा और सही चल रहा था , इस तरह भाई का जाना मुझे अंदर से तोड़ दिया है। अभी भी पूरी तरह से यकीन नहीं हो रहा है कि वह अब नहीं रहा। उस पर विस्तार से लिखना है पर अभी मै इस स्थिति में नहीं हूँ कि उस पर ज्यादा बात कर सकूं।  

दो और भी बातें है जो निश्चित ही बेहद प्रसन्नता का विषय होती अगर वो होता पर अब मुझे विशेष खुशी नहीं हो रही है हालांकि यह मेरी हॉबी से जुडी चीजे है-

प्रकाशन विभाग से छपने वाली दो पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ प्रकाशित हुयी है -
 १. बाल भारती ( मार्च 2018 अंक )- कहानी - एंजेल और उसकी सफाई सेना 
२.  कुरुक्षेत्र ( मार्च 2018 बजट अंक ) - लेख - समावेशी शिक्षा की ओर बढ़ते कदम 

अगर संभव हो तो पढ़ कर बताना कैसी लगी ?

-आशीष 

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