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सोमवार, 20 जुलाई 2026

बेबसी

लघुकविता : बेबसी 

 प्रिय तुम जानती भी हो,या नहीं,
कि मैं बेबस सा हूँ,दिल से मजबूर हूँ
तुम्हारे लिए ,तुम्हारे एकनिष्ठ  प्रेम में।

चाहता हूँ कि, तुम भी चाहो मुझे
 उसी शिद्दत व बेकरारी से
देखो उन्हीं तीखी, गहरी नजरों से
जिनसे मैं तुम्हे देखा करता हूँ 
अक्सर अपनी मुलाक़ातों में ।


© आशीष कुमार, उन्नाव ।
5 फरवरी, 2020, हैडो, पोर्ट ब्लेयर।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

Bin fere ki mohabt



कविता :- बिन फेरे की मोहब्बत 

-आशीष कुमार 



इस कदर वो मोहब्बत करने लगी थी वो
बिन फेरे के ही व्रत रखने लगी थी वो,
दुनिया से सामने न सही, छुपाकर ही सही
मेहंदी में मेरा नाम, रचने लगी थी वो।



उसकी मोहब्बत की इंतिहा तो देखिए
पाने की जरा भी उम्मीद न थी फिर भी
टूटकर बेतहाशा चाहने लगी थी वो।।

© आशीष कुमार, उन्नाव।
20 जून, 2021.

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

with my eyes

मेरी नजर में तुम 

तुम्हारी सूरत
जैसे सौम्य मूरत

तुम्हारी आँखे
मीठा सा शर्बत

तुम्हारी नजर
कतई जहर

तुम्हारे काले बाल
जैसे रेशमी जाल

तुम्हारी मुस्कान
बसती मेरी जान

तुम्हारे लब
लाल गुलाब
तुम्हारी सांसे 
दहकती आग

तुम्हारी बातें
शुद्ध शहद

तुम्हारी कमर
नदी का मोड़

तुम्हारे पाव 
पीपल की छांव 

तुम्हारा बदन
अनमोल रतन

तुम्हारा अहसास 
नाजुक खरगोश

तुम्हारा प्यार
असीम ताकत

©आशीष कुमार, उन्नाव
28 अप्रैल 2021


बुधवार, 29 जुलाई 2020

AKELE ME

अकेले में 

पहले के दिनों में
जब भी अकेले होता
मिलता स्व से 
करता चिंतन, मनन
व आत्मावलोकन।

इन दिनों
जबकि मैं 
आपके प्रेम में हूँ,
अकेले में मेरे विचारों 
का क्रेंदबिंदु केवल व केवल
आपका ही ख्याल आता हैं।

अकेले में 
बुनता हूँ तुमसे जुड़े 
तमाम ख्वाब
हवा देता हूँ 
तमाम कल्पनाओं को

अकेले में 
सोचा करता हूँ 
तुम्हारी बिल्लौरी आँखों
की असीम गहराई,
घनी बदली सरीखे
तुम्हारे लहराते बालों
से खेला करता हूँ.

अकेले में याद आती 
आपकी वो चितवन,
मोहक मुस्कान,
हँसमुख चेहरा
साथ ही वो 
तमाम कहानियाँ
जो तुमने सुनाई 

आशीष कुमार , उन्नाव
29 जुलाई , 2020 


मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

Talk vs meeting

बात बनाम मुलाकात

प्रियतमा 
तुमने जो कहा
बात होते रहने 
जरूरी है बेहद

मैंने कहा बात के साथ
मुलाकात भी जरूरी है
समय समय पर

बात होने पर
भले ही तुम्हारे मधुर शब्द
मेरे अंतस में
घोलते है प्रेमरस

पर मुलाकात होने पर
तुम्हें नजरों से छुआ जा सकता है
आँखों से पिया जा सकता है
चंद पलों में 
असीम जिया जा सकता है

मादकता से भरपूर
नशे से चूर, 
तुम्हारे चन्दन बदन पर
अंगुलियों से बनाये जा सकते हैं
तमाम चमकते चाँद

पकड़ी जा सकती है पोरों से
तमाम जिंदा मछलियाँ
उगाये जा सकते है 
लाल दहकते गुलाब

© आशीष कुमार, उन्नाव।
14 अप्रैल, 2020 (लॉक डाउन दुबारा बढ़ने का दिन)



शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

Media reality

हरकारा

सनसनी को
समाचार बनाकर
दिखला रहा है हरकारा
हत्याओं से नही
हत्यारों से नहीं
हत्याओं से भरे समाचारों के
कम बिकने के आसरो से
घबरा रहा है हरकारा

सुल्तान अहमद की कविता

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