BOOKS

मेरी कलम से लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मेरी कलम से लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

THAT OLD LADY'S BLESSINGS



हर किसी के जीवन में वो दौर जरूर आता है जब वो बहुत ज्यादा परेशान होता है। हर तरफ निराशा ही निराशा ही नजर आती है। मेरा भी वही दौर चल रहा था परीक्षा पर परीक्षा दिए जा रहा था पर सफलता दूर दूर तक नही नजर आ रही थी।
ऐसे ही मै किसी परीक्षा को देकर लखनऊ से वापस उन्नाव आ LKM से वापस आ रहा था।  सामने की सीट पर एक छोटा सा बच्चा अपनी दादी के साथ बैठा था।  बहुत चंचल था वो।  थोड़ी देर में मुझसे हिल मिल गया।  उसकी दादी से बात होने लगी और बातो बातो में पता चला कि वो एक मुश्किल से गुजर रही है।  दरअसल वो जल्दबाजी में लखनऊ से चलते वक्त अपनी पर्स , बाथरूम ( जिस घर वो गयी थी )  में छोड़ आई थी और इस समय उनके पास १ रुपया भी नही था।  उन्होंने ने बताया कि ट्रेन की टिकट  भी नहीं ली है। उनकी मुश्किल यह थी कि  वह कानपुर सेंट्रल में उतरने के बाद आगे कैसे जाएगी। हालांकि वह कह रही थी कि कोई ऑटो कर लेंगी जो उन्हें उनके घर तक छोड़ आएंगे और घर पहुंच कर पैसे दे देगी।

                                     THAT  OLD KIND LADY  BY  IAS KI PREPARATION HINDI ME


महिला सभ्रांत घर की लग रही थी। मुझसे बात करते वक़्त कुछ परेशान सी लग रही थी। मेरा स्टेशन उन्नाव आने वाला था। मेरे पास उस वक़्त २० या ३० रूपये से अधिक नहीं रहे होंगे पर मेरे दिल ने कहा  इनकी कुछ हेल्प करनी चाहिए। मैंने उनसे पूछा कानपुर से आपके घर तक टेम्पो से जाने में कितने रूपये लगेंगे उन्होंने कहा १० रूपये।  मैंने उन्हें १० रूपये देते हुए कहा  यह रख लीजिए। उन्होंने बहुत मना किया पर मैंने उनके पोते को यह कहते हुए पकड़ा दिए कि आप इसको बिस्कुट दिला देना।

यह कोई बड़ी बात नहीं थी पर असल बात उसके बाद शुरू  होती है। ठीक उसी रात , एक साथी ने अलाहाबाद से फ़ोन किया कि  मेरा DATA ENTRY OPERATOR ( SSC ) में AIR 108 के साथ सिलेक्शन हो गया है . यह सफलता में पहली  सुचना थी उसके बाद एक के बाद एक बहुत सारी सफलताये मिली . अब आप भी समझ रहे होंगे कि उपर की घटना क्यू महत्वपूर्ण थी .

मै कभी भी किसी भिखारी को भीख नही देता . कितना भी दयनीय क्यू न हो अगर वो रूपये मांग रहा है तो मुझसे एक रुपया भी नही पा सकता है ( यह अलग बात है कि मेरा दिल जब करता है तो किसी को भी स्वेच्छा से हेल्प कर देता हूँ . )

जैसा कि आप जानते है कि मै गावं से हूँ . मै 9 और १० अपने घर से 8 KM  दूर स्कूल से किया है . मेरी उम्र थी 13 - 14 साल . रोज साइकिल चला कर आता जाता था . एक रोज मुझे रास्ते में एक उम्रदराज आदमी मिला था . गर्मी में पैदल चला जा रहा था . मैंने उसको अपनी साइकिल में  बैठाकर अपने गाव की बैंक तक छोड़ा था . मन को बहुत खुशी मिली थी .

आज भी मैंने कुछ ऐसा ही काम किया है जिससे मन को बहुत संतोष मिला है और दिल कहता है कि उसका आशीर्वाद कुछ नया लेकर आएगा . उसकी कहानी फिर कभी जब उसका फल मिलेगा तब . पर सभी पाठकों से यह जुरूर कहना चाहूँगा कि भले मंदिर , मस्जिद , गुरुद्वारा मत जाईये  पर आपके जीवन में अगर कभी कुछ अच्छा काम करने का मौका मिले तो उसे छोड़ना मत. अगर आपके जीवन में कुछ ऐसा हुआ है तो जरुर शेयर करिये . याद रखिये यह ऐसे काम है जिनसे दुनिया खुबसूरत बनी हुयी है बाकि तो मोह माया है .





गुरुवार, 7 जनवरी 2016

First time in restaurant



जीवन में कुछ ऐसी घटनाये होती है जो जेहन से कभी नही उतर पाती . १२ एक town से पास किया था . graduation करने के लिए अपने जिले के head quarter   में आ गया . यह शहर तो नही था पर मुझे शहर जैसी ही feeling उन दिनों आती थी .
मै कुछ भी नही जानता था . हर चीज से डर लगता था . १२ वी के एक और साथ ने भी मेरे साथ ही admission लिया था . यह बहुत गहरे मित्र थे . इनके बारे में बहुत सी रोचक बाते है जो आने वाले समय में बताता रहूँगा . आज उनकी ही एक छोटी सी याद .... उनके लिए कुछ नाम सोचना पड़ेगा .. क्या लिखू .. वो पढाई के साथ साथ कपड़े भी बेचते थे  cycle  पर .. इसलिए आप इनको कपड़े बेचने वाला कह सकते है .

एक दिन जब ये college  में मिले तो अपने एक अनुभव को मुझसे share  किया . पिछली शाम वो अवस्थी रेस्ट्रोरेन्ट गये थे . हमारे शहर में दो ही रेस्टोरेंट थे एक अवस्थी , दूसरा railway station ( Unnao) के सामने मनोरंजन रेस्टोरेंट ...
इनके बारे में मेरे कुछ ख्याल थे जैसे कि यह काफी महगे होते है इनमे बड़े लोग ही जाते है ... मै बस सोच कर रह जाता कि शायद  कभी इनमे मै भी जाकर कुछ खा सकू ..

जब उन साथी ने बताया कि वो बस १० रूपये में २ समोसे खा कर ही रेस्ट्रोरेन्ट का  experience  ले चुके है तो मेरे मन भी रेस्ट्रोरेन्ट में जाने की बड़ी लालसा जागी . साथी ने बताया कि कैसे  waiter  टेबल पर पानी दिया और साथी ने उससे news paper  मांग पढ़ा . मैंने उससे कहा कि मुझे भी वो ले चले न पैसे मै लगा दूंगा . वो हँसते हुए बोला अभी  चलो इसमें क्या है – साथी के साथ मै भी  restaurant गया . उस दिन न्यूज़ पेपर तो पढने तो टेबल पर नही मिला पर मेरे लिए बहुत नये अनुभव का दिन था . इस पहले कभी टेबल पर बैठ कर कुछ भी नही खाया था . गावं में तो दुकान पर खुले में समोसे बिकते थे और सब खड़े होकर ही समोसे खाया करते थे .

यह  बिलकुल सच्ची कहानी है .. आज मै सोचता हूँ कि मै कमजोर और दब्बू था .. मन में कितनी हीनता थी उन दिनों . उस दिन से लेकर आज तक मुझे याद नही कितनी जगह और कितने महगी महगी जगह होटल में खाना खाया पर वो पहले पहल रेस्टोरेंट में १० रूपये के समोसे जिन्दगी में कभी भुलाये नही जा सकेगे .

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

भाई कुछ लगा लो ?


           New car लेकर kanpur जाना हुआ।  एक शॉप पर रुक कर कुछ खरीद रहा था।  एक आदमी पास आया और बोला " आपकी कार बहुत चमक रही है। " मै मुस्कराया और बोला "अभी जल्दी ही निकली है तो चमकेगी ही"।  वो कुछ बेचैन लग रहा था।  वो बोला "भाई साहब , कार में कुछ लगा लीजिये , बहुत चमक रही है कही नजर न लग जाये।  कुछ कालिख पोत लीजिये। मै हँसने लगा और बोला कालिख तो मिल नही रही है आप कहो तो एक black पालीथीन पीछे एंटीना में लटका लूँ । हँसी मजाक करने की मेरी भी बहुत आदत है।  

           खैर वहां  से मै निकल कर बेनाझाबर रोड तरफ आ गया।  कार में कुछ सजवाना चाहता था।  नयी कार थी। Road पर डर लग रहा था कही कोई खरोच न मार दे। अचानक मेरी नजर अपने कार में अगले दरवाजे पर गयी मेरा दिल धक से रह गया।  वाइट कलर पर निशान तुरंत पता चल जाते है।  मैंने दुखी मन से दरवाजे पर हाथ फिरा कर देखा तो मुस्कुरा उठा।  निशान न थे।  वो काली ग्रीस थी जो किसी  न जाने कब पोत थी। 

शनिवार, 3 जनवरी 2015

PART: 3 सफेद सूट वाली लडकी ?

PART: 3

सफेद सूट वाली लडकी   ?


मुझे पता नही क्या हुआ और मैंने ऐसा DECISION क्यू लिया बस  उस SATURDAY  कॉलेज से लौट कर घर जाने का मन न हुआ।  दिल ने कहा  ये घुटन भरी LIFE अब मै नही जी सकती।  एक ऐसी जिंदगी जिसमे मेरी कोई सहमति नही बस मॉम , डैड की मर्जी के अनुसार चलना। मै क्या करना चाहती हूँ उन्होंने कभी जानना ही नही चाहा।  दिल ने कहा  बस  इस उबन भरी जिंदगी से कही  दूर चली जाऊ जहां मै अपनी शर्तो पर जी सकु , 
स्कूटी STAND पर ही लगी रहने दी।  ऑटो पकड़ कर RAILWAY STATION चली गयी। मुझे पता नही था जाना कहा है।  बस पहले प्लेटफॉर्म पर पहली जो गाड़ी खड़ी थी उसी में चढ़ ली।  COACH के बाहर मैंने ऐसे सीट देख ली थी जहाँ  आसानी से कुछ देर बैठा जा सकता था।  मेरे पास TICKET नही था और चालाकी क्या होती है जानती भी नही पर जब आप अपनी धुन में होते है रास्ते अपने आप सूझने लगते है।  

सीट पर जाकर देखा एक लड़का बैठा था। मुझे देखते ही उसने  मेरे लिए आधी  सीट छोड़ दी।    ज्यादा तो नही पर मुझे इतनी समझ तो  आ  ही गयी थी कि  चिपकू लड़को से कैसे बचा जाय।  सीट पर बैठने से पहले अपना APPLE PHONE कान में लगा कर झूठे ही  फुसफुसाने लगी। इससे दोहरा असर होता एक उसको मुझसे जान पहचान करने का अवसर न मिलता दूसरा मै जताना चाहती थी कि  वो मेरे फ़ोन का SILVER C  वाला एप्पल का लोगो देख ले और समझ ले कि मै  कोई मामूली लड़की नही हूँ। आप सोच रहे होंगे मै किस तरह की लड़की हूँ।    आप मुझे गलत मत समझईये प्लीज जो सच्चाई है वही  बता रही हूँ।  
ये मेरी उम्मीद से परे  थे मुझे सीट पर बैठे ५ मिनट हो गए थे अभी तक उस लड़के ने  एक  बार भी  मेरे चेहरे पर नजर नही डाली थी।  मै अब अपने फ़ोन पर गेम खेलने लगी थी।  मै  चाहती थी कि  मै  व्यस्त दिखू  ताकि वो मुझसे चिपके नही। वो  अच्छी कद और शक्ल  का था।  उसकी एथलेटिक बॉडी को देख कर ऐसा  लगा   कि  किसी आर्मी या पोलिस में जॉब करता है।  कॉलेज के लड़को जैसा नही था।  कोई फैशन नही जैसे किसी छोटे शहर का हो।  मैंने एक  दो बार जब भी चोरी से उस पर नजर डाली वो मेरी ड्रेस  को घूर रहा था। वैसे मेरी ड्रेस घूरने लायक थी आज कॉलेज में BEAUTY CONTEST  था।  उसके लिए मैंने  वाइट कलर का FROCK SUIT पहना था। मेरी ड्रेस इतनी अच्छी थी कि  मै  बता नही सकती।  आम तौर पर मै  JEANS TOP पहनना पसंद करती हूँ।  मै  कम्पटीशन में जीत गयी थी।  मन में इतनी उलझन थी कि DRESS  चेंज किये बगैर मै  अपनी उस जिंदगी से भाग ली।

ये  कैसी उलझन थी ? मै  चाहती थी कि  उसका ध्यान  मेरी तरफ भी  जाये  और  मै  उदासीनता भी दिखा रही थी। उसकी ख़ामोशी अखरने लगी थी।  ट्रैन के कोच की SIDE SEAT पर एक स्मार्ट लड़के एक साथ सीट शेयर कर रही थी और वो लड़का मेरी ड्रेस और बालो में ही उलझा रहे।  मै बात करने के लिए बेचैन हो रही थी।  पागल एक बार मेरे चेहरे पर भी नजर डाल  तो सही मेरी काली गहरी आखो में डुंब न जाये तो कहना।  न जाने कितने लड़को ने मुझसे बात करनी चाही पर मैंने उन्हें कभी भाव न दिया और आज जब मै तुम्हारे बारे में जानने के लिए बेचैन हो रही हूँ तब तू चुप बैठा है। मै  सच में बहुत ज्यादा उत्सुक हो रही थी आखिर ये शक्स है कौन ? 

शायद मै  ही पहल कर उस लड़के से बात शुरू  देती पर तभी  एक और घटना हो गयी।  मेरी  सीट के पास  एक   शख्स आ कर खड़ा हो गया। उसका चेहरा लोहे जैसा सख्त दिख रहा था। BLACK COAT और हाथ में ब्रीफ़केस लिए वो अजनबी किसी विलेन जैसा लग रहा था।  आते ही उसने मुझे सीट से उठा दिया।  मै अपना   बैग उठा कर आगे बढ़ आयी।  मेरे पास कोई विकल्प नही था।  रिजर्वेशन की बात छोड़ो  मेरी पास तो टिकट भी नही थी।  

मुझे  बहुत शर्मिदगी हो रही थी।  उस सहयात्री ने मेरे बारे में क्या सोचा होगा ? मै  कितनी घटिया लड़की हूँ  जो झूठ मूठ  ही उसकी सीट पर अपना अधिकार जता रही थी।  मै कोच में आगे बढ़ आई दरवाजे के पास अपना PHONE  चार्ज करने लगी।  TRAIN में बहुत भीड़ थी।  दिवाली की छुट्टी में सभी अपने अपने घर जा रहे थे।  और एक मै  थी जो अपना घर छोड़ कर जा रही थी।   मै  उस बारे में अधिक सोचना नही चाहती थी।  बस  मैंने जो निर्णय लिया था वो सही था मैंने अपने आप को समझाया।  

रात  के १२ बज रहे थे।  फ़ोन तो चार्ज हो गया था  खड़े खड़े मेरे पैर दुखने लगे थे पर मै  क्या करती मेरे पास उसी जगह खड़े रहने के सिवा  दूसरा विकल्प न था। गाड़ी रुक रही थी शायद कोई STATION आ रहा था।  तभी मैंने देखा मेरा सहयात्री , उस अजनबी साथ मेरी  ओर  चले आ रहे थे।  मै  घूम कर खड़ी हो गयी मै  उसकी नजरो का सामना कैसे करती  ?  

वो दोनों उतर  रहे थे। समझ नही आ रहा था कि  वो दोनों  परिचित है या अपरिचित।  दोनों में कोई बातचीत नही।  बस  अजनबी के पीछे मेरा सहयात्री चला जा रहा था।  मेरी SIXTH SENSE ने कहा  ' कुछ तो गड़बड़ है। '  मैंने अपना CHARGER  निकाल  कर बैग में रख लिया। मै  भी उस स्टेशन पर उतर रही थी।     
       
STORY OF A REAL HERO

( कहानी जारी है >>>>>>>) © आशीष कुमार

नोट : अगर आप भी हिंदी प्रेमी है तो प्लीज इस ब्लॉग को अपने मित्रो को शेयर करे , पोस्ट को फेसबुक पर शेयर , ईमेल सब्क्रिप्शन ले और सबसे जरूरी अपने महत्वपूर्ण कमेंट देना मत भूले। आप की राय मेरे लिए महत्वपूर्ण है।  यह मुझे और अच्छे पोस्ट लिखने के लिए प्रेरित करेगी। 

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

क्या फर्क पड़ता है ?

क्या फर्क पड़ता है ?


कुछ बहुत सामान्य सी घटनाये बहुत आसामान्य बन जाती है कम से कम 10 साल पुरानी घटना होगी पर मन से मिटी नही ।


शहर से गावं बस से जा रहा था काफी भीड़ थी । एक जगह नवविवाहित युवती बस में चढ़ी । भीड़ काफी थी मेरी सीट के सामने ही खड़ी हो गयी । मेरी नजर उसको देखते हुए कुछ सोचने लगी उसने साड़ी इतने अच्छे से पहन रखी थी उसका जरा भी हिस्सा नजर नही आ रहा था । आमतौर पर इस तरह से साड़ी को लपेटना जिसमे जरा भी पेट नजर न आये ग्रामीण क्षेत्र में आश्चर्य की बात थी । मै मन ही मन उसकी इस बात की प्रशंसा कि कितनी अच्छी है जिसे अंग प्रदर्शन कि जरा भी इच्छा नही है । पता नही मै क्या सोचने लगा था कि यह भारतीय संस्क्रति की प्रतीक है आदि आदि । 5 मिनट बाद उसने अपने ब्लाउज से पान मसाला निकाल कर अपने मुहं में डाला उसके रंगे दंत शेष कहानी बयाँ कर गये ।

इस लोक सभा के चुनाव में ड्यूटी करने के लिए SDM के साथ एक मीटिंग थी । जब उनसे मिलने गया तो अपने ही विभाग के एक साथी भी मिल गये । जूनियर थे । विभाग में जल्द ही आये थे । मीटिंग खत्म होने के बाद तय हुआ कि कुछ चाय पानी हो जाय । ये साथी बहुत स्मार्ट लग रहे थे । एकहरा बदन लम्बे बेहद गोरे और जुबान इतनी मीठी जैसे शहद । पास की tea शॉप पर हम दोनों पहुचे । तब तक साथी ने मुझे गोल्ड फ्लैक की डिब्बी मेरी और बढ़ाते हुए सिगरेट ऑफर की । ऐसे पल मेरे लिए बहुत दुविधा भरे होते है ऐसा नही कि मैंने कभी सिगरेट नही पी पर असहज महसूस होता है मना करू तो वो असहज फील करेगा । "पीता नही हूँ पर साथ दे सकता हूँ " ऐसा बोलना ज्यादा सुरक्षित होता है मेरे लिए ।


 इस विषय में विस्तृत व्याख्या फिर कभी आज to the point बात यह कि क्या फर्क पड़ता है आप क्या है और कहाँ है, आप कितना सुंदर दिखते है ? यह शायद मेरी नादानी नासमझी है जो नशेबाजी को रूप या कुरूपता से जोड़ बैठा । पर मुझे अपने स्मार्ट जूनियर को सिगरेट का लती (15-16 per day) देख बहुत दुःख हुआ ।उसने शुरु क्यूँ कि इस प्रकरण पर फिर कभी पर आपकी इस बारे क्या राय है ?

©आशीष कुमार 

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

A post regarding Vodafone ad

वोडाफ़ोन के बहाने 

कुछ चीजे कभी कभी इतनी चौका जाती है कि पूछिए मत . एक साथी को ऑफिस में वोडाफ़ोन कि नयी कॉलर tune के लिए इतना ज्यादा  बेचैन देखा  , बहुत देर तक सर्च करते रहे पर अंततः हार मान कर बोले " भाई जो भी हो है बहुत मस्त tune "मुझे भी वोडाफ़ोन के तीन नये ऐड याद आ गये . इतने अच्छे और हट कर है कि चाहे जितना देखो उबन नही होती .मुझे वो पुराने ऐड याद है जिसमे एक छोटा कुत्ता हमेशा आपके पास कुछ जरूरत की चीज लेकर खड़ा रहता था . खास कर वो जिसमे एक छोटी सी लडकी को चोट लगी होती है और डॉगी बैंडेज का बॉक्स  लेकर खड़ा रहता था .

फिर आये जूजू . क्या कमाल का कांसेप्ट था . कितनी तरह के वो ऐड बनाये गये थे . आम  तौर पर लोग ऐड आने से उबते है पर मुझे इतने ज्यादा भाए कि यू ट्यूब पर कितनी ही बार देखा .इन दिनों तीन नये ऐड आ रहे है वोडाफ़ोन के . तीनो थीम बहुत हट और बहुत अलग है .पहले में एक गली में बैंड बजाने वाला  आदमी कुछ बजा रहा होता है लोग उसे अनसुना कर रहे है फिर वो आदमी ढेर सारे यंत्रो को मिलकर कुछ अलग और नये अंदाज में पेश करता है और इस बार भीड़ उसे सुनने के लिए जमा हो जाती है . इस भीड़ में एक आदमी है हरे रंग का चश्मा लगाये . उसकी हँसी की स्टाइल ही अलग है .

दूसरा वोडाफ़ोन के ऐड उसी हरे चश्मे वाले व्यक्ति से शुरु होता है इस बार एक जूस बनाने वाली बड़ी सी लकड़ी की मशीन है सारे गावं वाले अपने अपने घरो से फल लाकर देते है . एक व्यक्ति एक संतरा जिस भाव से देता है उसको आप महसूस करिये . खैर जूस तैयार होता है और डॉन ( हरे चश्मे वाला व्यक्ति ) उसको चखता है चारो तरह खामोशी है फिर एक जर्बदस्त शोर उठता है जूस लाजबाब है काश थोडा हमे भी चखने को मिलता ...

तीसरा और मेरी नजर में सबसे बेहतरीन ऐड वो है जिसमे एक चोटहिल व्यक्ति एक गावं पहुचता है वहां के गाव वाले उसकी सेवा , आवभगत करते है उनका पंखा भी बहुत अलग है और अंत में एक गाड़ी आती मैंने आज तक वो गाड़ी नही देखी है बड़े से पहिये है और उसमे बीच में बैठ कर आपको अपने हाथो से उसे चलाना है . मैंने इसके बारे में खूब सोचा ऐसा लगा प्राचीन समय में शायद ऐसी गाड़ी चलती रही होंगी ..... आज के समय भी वैसी गाड़ी कहा चलती है ? आपको कोई जानकारी है क्या ?

तीनो ही ऐड अपनी पुरानी और अलग थीम के चलते मन में कुछ ऐसे बैठे कि एक पोस्ट ही लिख डाली . वैसे तीनो से ही आपको बहुत सीख मिलती है .

पहले से ....... सफल होने के लिए लाइफ में आप को हट कर और मौलिक सोचना होगा

दुसरे से  ....... साथ मिलकर ही आप अलग तरह का स्वाद ले पायेगे .

तीसरे से ..... कभी कभी अजनबी लोगो को अपनी सेवा , आवभगत से हैरान से कर के      

                  देखिये ..आपकी जिन्दगी की उबन दूर हो जाएगी .

बुधवार, 18 जून 2014

क्या दया दुःख का कारण है ?

क्या दया दुःख का कारण है ?

बहुत सी बाते हमे तब तक समझ न आती है जब तक स्वम अनुभव न की जाय। दो बरस पहले यही अहमदाबाद की बात है। दीपावली के २ या ३ रोज पहले की बात होगी। मेरे रूम पार्टनर मनोज श्रीवास्तव शाम को ऑफिस से लौट कर आये तो काफी परेशान थे। मुझे लगा कि हमेशा की तरह ऑफिस की प्रॉब्लम होगी पर उनकी परेशानी का कारण कुछ और था। दरअसल जब वह पैदल घर लौट रहे थे कुछ कुछ अधेरा हो गया था। उन्होंने एक बुढ़िया को सड़क के किनारे मिट्टी की दिवाली बेचते देखा था। एक दीपक जला कर वह बुढ़िया अपने दोनों पैरो बीच सर गड़ाए बैठी थी। बुढ़िया की अवस्था और गरीबी उनके मन को बहुत द्रवित कर दिया था। मुझे बार बार यही कह रहा था कि पता नही आज रात उसके पास क्या कुछ खाने को होगा। उसकी दिवाली कैसे मनेगी। उस रोज मुझे मनोज की बात का ज्यादा कुछ असर न हुआ था मुझे लगा पता नही इनको क्यू ऐसी चिता होने लगी।
पर जब चीजे सामने आती है तब आप उनसे निरपेक्ष नही रह सकते है। ऑफिस के करीब मै भी रहता हु और पैदल ही आता जाता हूँ। अहमदाबाद का सबसे पॉश एरिया मेमनगर को माना जाता है चारो तरफ आसमान से बाते करती इमारते खड़ी है। सारे शहर के लोग यहाँ पर शॉपिंग करने आते है। देर रात तक चहल पहल बनी रहती है। यही मानव मंदिर के पास साम्राज्य टावर है १०, १० मंजिल के ५ , ६ ब्लॉक होंगे। अंदर स्वीमिंग पूल भी है। वीक एंड पर मैं भी वहाँ स्वीमिंग करने चला जाता हूँ। पर इस टॉवर के बाहर वो बैठता है. रोज तो नही दिखता पर जिस रोज दिखता उस रोज सारा दिन उसके बारे में सोचता रहता हूँ। इतनी कड़ी धूप में वो सारा दिन कोने में बैठा रहता है। कई बार एक फटी टाट की पल्ली तान लेता है और अपने ग्राहकों का इंतजार करता है। मै एक पोलिश करने वाले , चप्पल सिलने वाले की बात कर रहा हूँ। सामने एक मैदान से होकर जब भी गुजरता हूँ हमेशा सोचता हूँ यह दिन में कितने रूपये कमा पाता होगा। १०० रूपये या २०० इसके घर में कौन कौन होगा। तरह तरह के प्रश्न , मुझे भी उस रोज की तरह जब मनोज परेशान था उलझन होती है। समझ में नही आता ये विद्रूपता क्यू है। इस चका चौंध भरे शहर में इनका जीवन कैसी बीतता होगा। आखिर क्यू ये हाशिये पर है। ऐसे समय में मुझे निराला जी की प्रसिद्ध कविता "वह तोड़ती पत्थर " याद आती है शायद ऐसे ही कुछ मनोभाव रहे होंगे उनके मन में। ऎसे लोग से निरपेक्ष न रह पाने के एक वजह और भी। आप उन्हें इतनी मेहनत करते देखते है उनकी काम में तल्लीनता आप का ध्यान खीच ही लेती है। हो सकता है आज इस पोस्ट के भाव को पूर्ण रूप में न ले पर एक रोज आप भी ऐसे ही किसी को देख कर दिल में रो देंगे। न जाने कब ये विषमता और गरीबी खत्म होगी।

यह वो नही है पर उसका के साथी है। एक रोज उसके पास बैठ कर गुरुकुल रोड में गुजरने वाली bmw , ऑडी , मर्सडीज को देखते हुए ऊपर लिखे मनोभावों को महसूस कर रहा था

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

इलाहाबाद पूर्व का आक्सफोर्ड (2)

इलाहाबाद पूर्व का आक्सफोर्ड (2)

पूर्व में मैने जिक्र किया था कि लगातार पढाई करने में इलाहाबाद का कोई जवाब नहीं है । एक वाकया याद आ रहा है मेरी ट्रेन पयाग स्टेशन से रात में 3.50 बजे थी मै पास ही एक लाज में वऱिष्ठ गुरु के पास ठहरा था मै परेशान था कि मै उतने सुबह कैसे उठ पाउगा ? गुरु ने कहा कि परेशान मत मैं उठा दूगा । मै बहुत थका था लेटते ही नींद आ गई । गुरु जी वर्णवाल वाली भूगोल पढ़ रहे थे । रात में १ बजे नींद खुली तब भी गुरु जी पढ़ रहे थे । मैं पुनः एक सो गया । 3 बजे मुझे उठाया तब भी वह पढ़ रहे थे मुझे बहुत आश्चर्य हुआ मैंने पूछा कि क्या मेरे लिए जग रहे थे? वो बोले कि मैं तो रोज ही 4 बजे तक जग कर पढता हूँ । यह 2008-09 की बात होगी मुझे यह बात बहुत नयी लगी । एक स्कूल के दिनों में मम्मी रोज सुबह मुझे 5 बजे उठा देती थी मैं कम्बल या चद्दर ओढ कर बैठता था उसका बहुत सहारा मिला करता था मौका देख कर सो जाता था पर मम्मी बहुत सख्त थी बीच बीच में पूछती रहती सो रहे हो मैं चिल्ला कर कहता कहॉ सो रहा हूँ । पर वो अक्सर मुझे सोते देख मेरे सामने से किताब हटा कर पूछती पढ़ रहे हो? जाहिर है कि मैं पकड़ा जाता क्योंकि चौक कर जगने पर देखता कि किताब सामने न होने पर भी चिल्ला कर बोल रहा हूँ ।
तैयारी के दिनों मे कुछ घन्टे खुद ही पढ़ने लगा पर इलाहबाद वाले गुरु की लगन देख कर असली गति आयी । पढ़ने का जनून सा हो गया । चितक जी की भी बात जोड कर कहूं तो चाहे जितनी गर्मी लगे चाहे जितना पसीना बहे पढते रहो कितना ही जाड़ा क्यों न हो पढते रहो किसी के लिए नहीं अपने लिए । आप एक सफलता के लिए परेशान हो मैं कहता हूँ आप इतना करो तो सही असफलता नामक शब्द आप के शब्द कोश से मिट जायेगा ।

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

इलाहाबाद : पूर्व का आक्सफोर्ड वाला शहर

इलाहाबाद : पूर्व का आक्सफोर्ड वाला शहर 

मेरे बड़ी हसरत रही है कि किसी नामचीन विश्वविद्यालय से पढाई करू और तैयारी करने के लिए इलाहाबाद में रहूँ । दोनों ही इच्छा अधूरी रह गयी । इलाहबाद से मेरी दोनों तरह की यादें जुड़ी हैं । इसी शहर में मेरे सारे पढाई से जुड़े मूल डाक्यूमेंट रेलवे स्टेशन पर किसी ने पार कर दिया तो दूसरी ओर चिंतक जी जैसे अजीज दोस्त दिये । इन्द्रजीत राना, अरविन्द चौधरी (दोनों असिस्टेंट कमांडेंट ), शिवेन्द (सीपियो इंसपेक्टर ), अमित गुप्ता ( पी. सी. एस. आयोग ) अनिल साहू (टी. जी टी ) जैसे मित्रों की लम्बी फेरहिस्त है जिनकी कहानी सुनकर सुस्त से सुस्त युवा भी दिलोजान से पढाई करने लगे.. जिनकी जीवन कथा मायूस, हताश युवा के लिए अमृत से कम न होगी । इस ब्लॉग  के माध्यम से बहुत नये इलाहाबादी मित्र जुड़ गए हैं मुझे टूटे हुए अंतराल जुड़ने की ख़ुशी है ।
मुझे जरा हिचक हो रही हैं इस पर  ऐसी पोस्ट करते हुए क्योंकि इसमें डायरेक्ट पढाई से जुड़ा कुछ भी नहीं है । पोस्ट करने के पीछे कुछ मित्रों का इलाहाबाद से जुड़े संस्मरण लिखने का पुराना आग्रह था । पहले ही स्पष्ट कर चुका हूँ कि मैं इलाहाबाद में कभी भी नियमित नही रहा हूँ । मेरे सारी पढाई मेरे शहर उन्नाव में ही हुई हैं । इलाहाबाद मैं २ , ३ महीने में एक दो दिन के किताबें खरीदने जाता था इस दौरान ही मैने इस खूबसूरत शहर को जाना । २० , २५ दिनों के अनुभवों के आधार पर ही लिखने की जुर्रत कर रहा हूँ । गलती से अगर शहर के अनुरूप न बन पड़े तो माफ करना । यह 2006 से 2010 तक के दौरान का इलाहाबाद है ।
मैने बताया कि इलाहाबाद किताबो के लिए जाता था पता है क्यों क्योंकि इलाहाबाद का खरा दावा है कि उससे सस्ती किताबें कोई शहर उपलब्ध नहीं करा सकता है । आप हैरानी होगी कि यहाँ योजना, कुरूक्षेत्र मे भी कुछ ऱुपये की छूट मिल जाती हैं. दर्पण, कृानिकल की बात ही मत करिए ।
इलाहाबाद की सबसे अच्छी बात, चीजों का सस्ता होना है उन दिनों समोसा और चाय 1 रूपये में मिला करती थी (ताज़ा रेट क्या है? ) । किसी यार दोस्त की आवभगत 10 रूपये में अच्छे से की जा सकती है । शहर में बहुत ही मिठास है यहाँ पर अनजान मित्र का भी स्वागत बहुत हर्ष से किया जाता है । खाना बनाने खासकर पनीर में बड़े बड़े खानसामे मात खा जाय । खाने से याद आया कि दोपहर में बहुतायत साथी दाल चावल ही बनाते हैं (थे ) इससे दोहरा फायदा होता है समय की बचत और पेट भी हल्का (है न सीखने वाली बात ) । दोपहर में हल्की नींद लेना वहाँ के जीवन का अनिवार्य हिस्सा हैं.. अ.. अ.. क्या लगता कि वो यह सब करते हैं तो पढते कब है?
अगर आप को कभी कोई इलाहाबादी यह कहे कि पढ़ने में अभी तुम बच्चे हो तो बुरा मत मानना । जितनी देर, एकाग्र होकर वह पढ सकते हैं आप से शायद ही हो पाये । चिंतक जी वाली कहानी याद है न कैसे मुझे डॉटा था कि इस कमरे में भी बात नहीं होगी । सब बातें ठीक है पर एकाग्रता से समझौता नहीं ।
इलाहाबाद से मैने बहुत कुछ सीखा है पर एक जरुरी चीज़ न सीख पाया.. वह है सर कहना । शायद यह छोटे शहर के, साधारण कालेज की पढ़ाई का नतीजा है कि हमउम्र के लिए सर नहीं निकल पाता । इलाहाबाद मे सर के विशेष मायने है सर मतलब केवल रोब गाठने से नहीं है । सर आप के हर काम में मदद करते हैं... कमरा दिलाना, सामान, किताबें, प्रेम मोहब्बत से लेकर मार पीट तक... ( भागीदारी भवन में एक सर काफी परेशान लग रहे थे पता चला कि किसी को साथी के रूम पर पुलिस गई थी सर उसको हास्टल में छुपाने के लिए परेशान थे ) भागीदारी भवन में ही मुझे किताब की जरूरत थी मैने एक मित्र को रूपये दिए । मित्र जब किताब लाये तो पता चला कि उसके दाम बढ़ गये । मैने जब रूपये देने चाहे तो नाराज होकर बोले कि सर कहने के मायने जानते हो । इलाहाबाद मैं सच में नहीं जानता था ( राना सर किरण इतिहास के 10 रूपये आज भी मुझ पर उधार है पर मैं उन्हें चुका नही सकता शायद कभी नहीं )


यदि आप इस बार आईएएस के प्रीएग्जाम में बैठने जा रहे है तो आपके लिए कुछ जरूरी सलाह



नोट: इस पोस्ट के लिए अपने गैलेक्सी फोन का जिसके चलते इतनी बड़ी पोस्ट हिंदी में लिख पाया और एक ३ घण्टे के ट्रेन सफर का आभारी हूँ । इलाहाबाद क्या आप इसे पढ़ रहे है ? पोस्ट जारी रहेगी । इलाहाबाद के मित्र कृपया इसे शेयर करे.. बदलाव के बारे में बताएं

शनिवार, 15 मार्च 2014

WE ARE ON FACEBOOK NOW

दोस्तों , मुझे खुशी हो रही है कि मैंने कुछ सार्थक कार्य शुरू किया है। बहुत तेजी से नये मित्र हम तक पहुँच रहे है। आज से मै आप से नियमित संवाद  करता रहूगा।  अब समय है आप के बारे में जानने का और हमारे बारे में भी।  इस पेज पर आपको आईएएस के लिए सामग्री से ज्यादा , उससे जुड़े अनुभव के बारे में पढ़ने को मिलेगा। कहा भी गया है कि अनुभव कि कोई किताब नही होती है यह आप को खुद जानना होता है।
इस पेज पर कुल चार तरह के लोग आ सकते है।  पहले वो जो अभी शुरुआत करने जा रहे है (सबसे ज्यादा ) दूसरे वो जो तैयारी कर रहे है (सबसे महत्वपूर्ण क्योकि अनुभवी है ) तीसरे वो जो मैदान से बाहर हो चुके है  चौथे वो जो सफलता पा चुके है (दुर्लभतम )
जो मेरे लिए नये है कृपया  आप मुझे मेसेज कर बता दे कि आप किस वर्ग में है चाहे तो आप सार्वजानिक तौर पर पोस्ट कर सकते है।   ताकि मुझे पता चले कि कैसी पोस्ट करना ज्यादा जरूरी है।
कुछ अपने पेज के बारे में। मै इस पेज में अभी मोटिवेशनल पोस्ट ज्यादा करुँगा। 24 अगस्त 2014 को प्रारम्भिक परीक्षा होगी। 20 दिसंबर २०१४ से मुख्य परीक्षा होनी है।  मई माह से आपको मै मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन से जुडी पोस्ट प्रस्तुत करने कि कोशिश  करुगा। जून से अगस्त तक   प्रारम्भिक परीक्षा पर जोर रहेगा।
आप से निवेदन है कि यहाँ पर सामग्री से ज्यादा आप आईएएस से जुड़े अनुभव प्रस्तुत करे।  ज्यादा नही तो कम से कम इस दिनों आप क्या पढ़ रहे है इतना ही पोस्ट कर दे। हिन्दी में पोस्ट करना  जटिल है पर अगर कर सकते है तो जरुर करे। हिंदी में पढ़ना ज्यादा अच्छा लगता है।
(इस पेज पर आप और मुझ में कोई अंतर नही है बस साथ साथ चलना है। उन दोस्तों का विशेष तौर पर धन्यवाद जो इस पेज के साथ अपना जुड़ाव समझ कर यहा पर  ज्यादा से ज्यादा सक्रियता दिखा रहे है। मै आपसे कल तक के लिए विदा लेता हुँ धन्यवाद )
IAS KI PREPARATION HINDI ME


सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

Beggary in india



भीख : कुछ विचार 
मै और मनोज सुबह नास्ता करने के लिए निकले। गुरकुल रोड (अहमदाबाद) में एक हनुमान जी का मंदिर है। उसी के पास  रोड पर ही भिखारिन बैठी थी। सामने मंदिर से एक  युवती निकली। मैंने उत्सुकतावश वहा नज़र टिका दी कि देखे कितने रूपये देती है। युवती ने 500 रूपये का नोट उस भिखारिन को थमा दिया। मुझे ये बात हजम न हो पाई कि जो 500 भीख दे सकती है वो कैसी जॉब करती होगी। मैंने मनोज इस बारे में बात की उसने काफी संतोषजनक जबाब दिया। कई बार हम पॉकेट जब हाथ डालते है तो खुले रूपये न होने पर ऐसे ही करना पड़ता है। मैंने भिखारिन पर फिर नजर डाली मुझे लगा कि आज के लिए उसके पास रुपए हो गये है शायद अब वो वहा से चली जाये। मै गलत था उसने तेजी से नोट अंदर रख लिया और दूसरे लोगो से भीख मागने लगी।

आश्रम एक्सप्रेस से अहमदाबाद से दिल्ली  जा रहा था। कैंट स्टेशन से एक छोटी लड़की चढ़ी। वो करतब दिखा रही थी। एक छोटे लोहे के छल्ले से निकल रही थी (ऐसे करतब आपको हर ट्रैन में देखने को मिल सकते है ) . खेल दिखाने के बाद उसने भीख मांगना शुरू किया। मै दुविधा में था मुझे भीख देना पसंद नही क्योंकि जरूरतमंद लोगो की मदद करना उचित होता है। लड़की को चंद सिक्के देने से कुछ भला न होने वाला था। मेरे पास बैग में काफी पेन पड़े थे। मैंने उसे एक पेन दे दिया। लड़की भी थोडा हिचकी और मुझे भी अजीब लग रहा था कि मैंने क्या किया। खैर काफी दिनों तक मै उसके बारे में सोचता रहा कि उसने पेन का क्या किया होगा। पता नही उसे पढ़ना लिखना आता भी होगा या नही। मुझे लगता है कि मैंने उसको कुछ हद तक सोचने पर मजबूर कर दिया  था ।
इसी ट्रैन में मेरे साथी कुंदन भी थे पुरानी दिल्ली में उतरने पर इसी बात होने लगी। वो बहुत नाराज थे कि लड़की को ऐसे करतब दिखने कि क्या जरूरत है।  उनका कहना था कि जब हर जगह  जगह सरकारी स्कूल है फीस भी नही लगती है। तो उसे ये सब करने कि क्या जरूरत है। मै उसे पेन देकर बहुत अच्छा किया। कुंदन ने बताया कि उन्होंने एक बुढ़िया को भीख दी क्योंकि वो बहुत लाचार थी। मै इस बारे सहमत न हूँ कई बार पेपर में ऐसी न्यूज़ पढ़ने को मिलती है कि कुछ भिखारियो के पास मरने के बाद लाखों रूपये मिले।
ऐसे बहुत सी घटनाये है पर यक्ष प्रश्न है कि भीख देनी चाहिए या नही। अगर देनी चाहिए तो किसको ? अगर हम  भीख देते है तो कुछ लोगो को आश्रित बना रहे होते है। वास्तव में जिन्हे सच में हेल्प कि जरूरत होती है वो कभी मांग ही नही पाते है। अगर आप ऐसे लोगो कि हेल्प कर पाते है तो निश्चित ही आप को अच्छा लगेगा। अगर समय हो तो आप भी अपने विचार प्रस्तुत करे। 





















गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

SAVE MONEY EARLIER, ENJOY LIFE IN FUTURE

           


           अपनी संस्कृति में बहुत सी अच्छी बाते है। हमें बचपन से ही सिखाया जाता है कि बुजुर्गो का कहना मानना चाहिए। मुझे एक सज्ज्न की दी हुई सीख बहुत प्रभावी लगी।  शायद यह आपको भी बहुत अच्छी लगी ।

              इस जॉब से पहले मै लखनऊ में INDIAN ARMY ऑडिटर के पोस्ट पर job  करता था।  अपने शहर UNNAO से रोज ट्रैन से LUCKNOW जाता था।  ट्रेन में हर रोज नये नए लोग मिलते थे। सबके पास कुछ न कुछ विशेष हुआ करता था बात करने के लिये।  मुझे उनके बारे ठीक से याद नही पर उनकी सलाह हमेशा याद  रहेगी।  मेरी नयी नयी जॉब थी। मुझे अपनी सैलरी बहुत लगती थी।  २००० रूपये महीने से सीधे २२००० रुपए मिलने लगे तो ऐसा ही महसूस होता है। पर महीने के अंत में मेरे अकाउंट में कुछ भी न बचता था।  ब्रांड का भूत उन दिनों बहुत हावी रहता था।  Army  की कैंटीन से न जाने क्या क्या खरीद लिया करता था।  

            उस रोज अंकल जी ने एक बात कही थी कि बेटा अभी कुछ साल बहुत सभल कर खर्च कर लो आगे बहुत मौज करोगे।  कभी भी रूपये कि किल्लत न होगी। यह बात मेरे मन में बैठ गयी।  उस रोज से सिर्फ जरूरत कि चीजे लेने लगा। एक example के तौर पर मुझे job करते ४ वर्ष हो गये है पर bike २ महीने पहले ही खरीदी वो भी भाई के लिए।  मुझे उसकी जरूरत ही नही लगती है। ऐसी बहुत सी चीजे है पर सार यही कि जहाँ तक हो अपनी आवश्कताएं सीमित रखकर बहुत सकून पाया जा सकता है।  पिता जी कि  death  के बाद सब कुछ मेरे पर आ गया था पर सब कुछ धीरे धीरे ठीक होता गया।  आज सब कुछ बहुत  अच्छा है दोनों भाइयो को job मिल गयी है बहुत ही सस्ती पढाई करके वो दोनों ही जॉब पा गये है। 

               Economics  तो मैंने कभी नही पढ़ी पर उन अंकल जी कि सीख में सबसे बड़ी इकोनॉमिक्स economics नजर आती है।  मुझे लगता है मुझे शायद ही कभी पैसे की किल्ल्त हो। बहुत अच्छा लगता जब किसी यार दोस्त को मै हेल्प कर पाता  हूँ खास कर जिनसे मै कभी उधार लिया करता था। अंकल जी पता नही कहा है पर मेरा जीवन तो सदा उनका आभारी रहेगा।

  © आशीष कुमार 
मेरी कुछ रोचक पोस्ट

बुधवार, 10 जुलाई 2013

लघु कथाः गिरगिट

लघु कथाः गिरगिट
आशीष कुमार

गिरगिट आमतौर पर पेड़ों या झाडि़यों पर नजर आता है, पर उस दिन सिंह साहब के लाॅन में जाने कहाॅ से आ गया था। उस समय सिंह साहब लाॅन में बैठकर एक गभ्भीर समस्या पर विचार कर रहे थे। सुबह पत्नी का नर्सिंग होम से फोन आया था, कह रही थी ‘‘ जाॅच करा ली है। इस बार भी लड़की है, अबार्सन करवा लें क्या?‘‘ पूछा था। दो लड़की पहले से ही हैं और अब फिर ! समस्या वाकई गम्भीर थी। इतने बड़े शहर के एस.पी. रहते सिंह साहब का कितने ही अपराधियों से सामना हुआ था, कभी परेशान नहीं हुए। आज पसीना आ रहा था।

अरे ! सिंह साहब चैंक गये, गिरगिट यहाॅं कहाॅं से आ गया? अजीब होता है यह! कभी इस रंग में कभी उस रंग में! सिंह साहब ने गिरगिट को भगाना चाहा पर जाने क्या सोचकर रूक गये। शायद वह गिरगिट को रंग बदलते देखना चाह रहे थे।

  पर वह समस्या़...........! वैसे जहाॅं दो लड़कियाॅ हैं वहाॅं एक और सही। यॅू भी आजकल लड़का लड़की में भेद कहॅ रहा। भ्रूणहत्या होगी तो पाप भी सिर पर आयेगा। पर .....लड़के की बात ही कुछ और होती है।

अरे! गिरगिट ने वाकई रंग बदल लिया था। सिंह साहब गिरगिट को हरी घास के रंग में देखकर चकित हो गये। किस फिराक में है यह! पास में जरूर कोई शिकार होगा।

सिंह साहब ने पुनः सोचा-आजकल लड़की को पालना पोसना कितना कठिन हो गया है। सबसे कठिन शादी करना। कंगाल हो जाउॅगा मैं दहेज चुकाते चुकाते।सिंह साहब ने सिगरेट ऐश ट्रे  में कुचल दी।

गिरगिट ये किस रंग में हो गया है कुछ लाल पर पीलापन लिये। अरे हाॅ पास में ही तो वह झींगुर है।शायद उसे ही खायेगा.... । सिंह साहब ने उठकर गिरगिट को कुचल देना चाहा। पर.......छोड़ो भी, खाने दो। सभी खाते हैं, इस बेचारे का तो भोजन है। सिंह साहब पुनः कुर्सी पर बैठ गये।

......आजकल तो बेटा होना ही सबसे बड़ी सम्पत्ति है। लड़का होना तो आजकल स्टेटस सिम्बल भी बन चुका है। कितनी आशा थी मिसेज सिंह को। इस बार जरूर लड़का होगा। कितनी ही बार कह चुकी थी। गिरगिट ने अपनी करीब एक फुट लम्बी जीभ निकालकर झींगुर को निगल लिया। सिंह साहब ने यह भी देखा। जाने क्या सोचा। तभी मोबाइल की रिंगटोन बज उठी।

मिसेज सिंह कह रही थी-‘‘ अबार्शन करा लिया।‘‘ सिंह साहब प्रसन्न हो गये। पत्नी ने समाजशास्त्र में पी.एच.डी. की है। इस बात का अहसास आज वास्तव में हो रहा था।

(अविराम त्रैमासिक में प्रकाशित) 
©Asheesh Kumar

शुक्रवार, 21 जून 2013

लग्गड़ की दौड़

लग्गड़ की दौड़
आशीष कुमार

             राग दरबारी में एक पात्र है लग्गड़। जो कि तहसील में एक दस्तावेज की नकल पाने के लिये महीनों चक्कर लगाता है। नकल देने वाला बाबु कुछ रिश्वत की माॅग करता है न मिलने पर लग्गड़ को चक्कर लगवाता रहता है।

           कुछ ऐसा ही घटित हुआ हमारे साथ। 19 जून 2010 को मेरे पिता जी की आकस्मिक मृत्यु हो गयी थी। सरकारी योजना के तहत परिवार को एकमुश्त 20000 रू की मदद मिलनी थी। उस वक्त धन की वाकई बहुत जरूरत थी। फार्म भर दिया गया। अच्छा गाॅव में कुछ व्यक्ति इस तरह की दौड़ भाग में बहुत दक्ष होते है। कई लोग बता गये कि पाॅच सात हजार खर्च कर दो हम दिलवा देगें। मै उन्नाव जिले के मुख्यालय में काफी समय से रह रहा था। मुझे यकीन था कि कुछ न कुछ जुगाड़ कर मै रिश्वत देने से बच जाउगाॅ। उन्नाव के विकास भवन के पास में ही मै रहता था। अपने कनिष्ठ बन्धु को मैने समझा दिया कि रोज विकास भवन जाकर बाबू से मिलते रहो एक न एक दिन काम जरूर हो जायेगा।

            वर्ष 2010 के अंत से शुरू हुई दौड़ भाग अनवरत चलती रही। हमने भी सोच रखा था कि रिश्वत नही देनी है पैसा मिले चाहे न मिले। मैं सरकारी सेवा में आ गया। परिस्थितियाॅ काफी बदल चुकी थी। अब पैसा का कोई मतलब न था पर दौड़ भाग जारी थी। मेरे छोटे दोनो भाई चक्कर काटते रहे पर पैसा न मिला। बाबू ने भाई से एक मार्कर भी माॅग लिया।एक भाई ने दिमाग लगा कर सूचना के अधिकार के तहत दबाव बनाना चाहा। पता नही उनकी आर टी आई कहीं दूसरे विभाग पहुॅच गई। इससे भी बात न बनी। 

            कनिष्ठतम भाई ने अभय ने हार कर एक बाबू से रिश्तेदारी निकाली उनको 500 रू दिये। यह वर्ष 2012 की बात है। कई बार धन उन्नाव से गाॅव की बैंक तक भी पहुॅच गया पर बैंक मैनेजर ने उसे पुनः उन्नाव भेज दिया। समझ न आ रहा था किया क्या जाय। 

             घटनायें बहुत है उनका विश्लेषण किया जाना यहाॅ सम्भव नही। एक आम आदमी तक किसी सरकारी योजना का धन पहुॅच पाना बहुत कठिन है। विशेषकर जब आप लग्गड़ की तरह नियम से सरकारी काम कराना चाहे। 19 जून 2013 को पिता जी के निधन को 3 वर्ष हो गये। भाई ने खबर दी आज ही पूरे 20000 रू बैंक में माता जी के खाते में आ गये हैं।

                   विडम्बना यही है कि कभी इतने रू मेरे परिवार की वार्षिक आय भी न हुआ करती थी। सोचिये उस वक्त इस सहायता की कितनी जरूरत थी। आज यह मेरे 15 दिन का वेतन है। अब इसका मूल्य नहीं।
  यक्ष प्रश्न यह है कि क्या प्रशासन आने वाले लग्गड़ों की दौड़ को आसान कर सकेगा ? 

©ASHEESH KUMAR, UNNAO

संत और बेरोजगार

               बहुत रोज से कुछ लिखना चाह रहा था पर लिख न पा रहा हॅू क्योंकि अब चिंतन मनन के लिये समय न मिल पाता है। कुछ पुरानी प्रकाशित रचनाओं को ही सोचा डिजटिल रूप में एकत्र कर लूॅ।इसी कडी़ में एक लघु कथा प्रस्तुत है। यह दैनिक जागरण में 2003 में प्रकाशित है। वर्ष 2008 में दैनिक जागरण की साहित्यिक वार्षिकी ’पुनर्नवा’ में इसका पुर्नप्रकाशन हुआ है।

लघु कथा :संत और बेरोजगार 

             विजय जी बेरोजगार थे। अविवाहित थे। आयु चालीस पार कर चुकी थी। इस पर वह बहुत सनकी थे। एक महफिल में किसी से उलझ गऐ। ज्यादातर लोग विजय जी की बात स्वीकार कर लेते थे पर वह न माना। वह भी बेरोजगार था। तर्क पर तर्क करता चला गया। विजय जी को अपशब्द भी कहना शुरू कर दिया। आखिरकार विजय जी ही शान्त हो गये। वह भी लड़-झगड़ कर महफिल से चला गया। उसके जाने के बाद विजय जी अपने रंग में आ गए। उसे पीठ पीछे जमकर कोसा। अन्य लोगों से कहने लगे मुझ जैसे संत को गाली दी है, इसकी या इसके परिवार में कोई मौत के करीब है। उस बेरोजगार को विजय जी की बातें जाननें को मिल गयी पर वापस उलझनेे नहीं आया।

महीने भर बाद बेरोजगार के अध्यापक पिता मर गए, दिल का दौरा पड़ा था। बेरोजगार खुश था क्योंकि उसे अपने पिता की जगह नौकरी मिल गई थी। नौकरी मिलते ही बेरोजगार सभ्य हो गया। विजय जी के अहसान को बेरोजगार ने भुलाया नहीं। उसकी कोशिशों से विजय जी कोसने वाले संत के रूप में विख्यात हो गए। 

©आशीष कुमार

बुधवार, 19 जून 2013

Change In Hindi Language




पिछले दिनों जब घर  उन्नाव गया तो पड़ोस के एक मित्र ने कहा और ब्रो ........ जब तक मै कुछ समझता बन्धुवर ने पूछा कैसे हो डयूड.........। अब भाषा का ऐसा रूप देख कर बडा़ आश्चर्य हुआ। मुझे लगा मै रहता हूॅ मेगा सिटी में तो बन्धु मुझसे इतनी अपेक्षा तो कर ही सकते थे कि मैं ब्रो और डयूड जैसे आधुनिकता दर्शाने वाले शब्दों को प्रयोग कर ही रहा होउगाॅ। नही मित्र ऐसी शब्दावली मेरे बस की नही। बस डर इस बात का है कि बोली से ही भाषा उपजती है और आने वाली हिन्दी भाषा का रूप विकृत न हो जाय. 

आज के समय में हर कोई आधुनिक बनने , दिखने की कोशिश में लगा है। पता नहीं हमको क्या हो गया है कि हम अपनी जड़ो को भूलते जा रहे है। दरअसल पश्चिमी संस्कृति में इस तरह लिप्त हो गए है कि हम अपने संस्कारो को ही भूलते जा रहे हैं। अपनी बोली , भाषा की मिठास , भला अंग्रेजी क्या मुकाबला कर पायेगी। इसलिए जब तक जरूरी न हो हिंदी में बात करना ही उचित होगा।  

Featured Post

SUCCESS TIPS BY NISHANT JAIN IAS 2015 ( RANK 13 )

मुझे किसी भी  सफल व्यक्ति की सबसे महतवपूर्ण बात उसके STRUGGLE  में दिखती है . इस साल के हिंदी माध्यम के टॉपर निशांत जैन की कहानी बहुत प्रेर...