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शुक्रवार, 29 मई 2026

Nostalogia

कविता: स्मृतिलीनता


लोग लौट ही आते हैं 
तमाम अंतराल के बाद,

एकाएक एक रोज
छोटे से संवाद के बाद
वो बताते है पुराने दिनों की बात

उन दिनों जब संवाद
करना आसान न था
कभी छोटी से मुलाकात 
दो शब्द, चार बातें 
इनके सिवा ज्यादा कुछ और नहीं 
तमाम अव्यक्त भावनाओं के सिवा 
पुराने दिनों की यादें 
कुछ परिचित जगहे
कुछ परिचित अध्यापक 
एक दो नाम,
उन दिनों का
ढेर सारा संकोच 

फिर घूमकर वहीं
आ जाना कि 
उन दिनों मिलते तो 
ये होता, वैसा होता

 उन दिनों का 
तमाम अनकहा 
धीरे धीरे व्यक्त होता है
रह जाता है वर्तमान में
तमाम कुछ कहने को..

© आशीष कुमार, उन्नाव।
29 मई, 2026.




गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

Books are so precious

दिल है कि मानता नही ।

इन दिनों , मैं हिंदी भाषी क्षेत्र में नही रहता हूँ, इसके बावजूद कोई साहित्य का विशेषांक 17 साल बाद आये तो कैसे भी करके उसको हासिल कर ही लेता हूँ । इंडिया टुडे के शुरू के कुछ विशेषांक , किसी कबाड़ी वाले के ठेले से खरीदे थे , शायद अभी भी पैतृक घर के किसी कोने में पड़े हो । उन दिनों जब मैं ट्यूशन पढ़ाया करता था तो कबाड़ी वाले के ठेले अक्सर मेरे लिए काफी रूचि का विषय होते थे कई बार उनके कुछ पुरानी खाली डायरी, नावेल, सरिता, कादम्बनी आदि के अंक किलो के हिसाब से खरीद लेता था । घर में कुछ रहा हो या न रहा हो जब से मैं बड़ा हुआ किताबों का भण्डार लगा रहा तमाम कॉमिक्स,लुगदी साहित्य और न जाने क्या क्या । अक्सर घरों में दीवाली, होली में साफ सफाई के दौरान पुरानी किताबें कबाड़ समझ कर बेच दी जाती है , आप उनसे बचना , क्योंकि किताबें आपके घर की हैसियत भले न बताये पर आपके वक्तित्व का पता जरूर बताती है ।

आशीष, उन्नाव ।  

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