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शुक्रवार, 27 मार्च 2026

खड़े होकर ध्यान

खड़े होकर ध्यान 


    जहाँ मै रहता हूँ , वहीं पर एक पार्क है , इतना सघन की जंगल का अहसास होता है। जिम के बाद , मन हुआ कि आज वहीं जाकर थोड़ी देर ध्यान लगाता हूँ।  यूँ तो पार्क में तमाम बेंच है पर एक काफी भीतर हट है , उसके पास पास काफी नीरवता रहती है। बड़ी उम्मीद से उधर गया तो देखा वहाँ पहले से कोई मौजूद है , इसलिए आगे बढ़ गया। इसके आगे कोई जगह न थी जहाँ सहजता से ध्यान लगाया जा सके। यूँ ही चलते चलते ख्याल आया की क्यूँ न खड़े होकर ध्यान लगा लिया जाय। वहीं रुक गया , सहजता से आंखे बंद की, तमाम विचार धीरे धीरे स्थिर होने लगे। मन प्रकति , हवा , पक्षिओं के संगीत पर टिकने लगा। 


    इंस्टाग्राम पर मुझे रील्स में सबसे ज्यादा वो पसंद आती है जो फनी होती है। एक रील याद आती है , जिसमें एक बाबा जी कहते है मैं रोज रात में २ बजे उठकर ध्यान लगाता हूँ , पिछले ५० साल से लगा रहूं पर आज तक न लगा। कितनी फनी पर सही बात बोली। ध्यान लगना होता है  मिनट में भी लग जाता है अगर न लगना होगा तो सालों कोशिस करते रहो न लगेगा। मेरे साथ अच्छी बात है कि मेरा मिनट में लग जाता है , यह अलग बात है कि कोई नियमित अभ्यास नहीं करता , बस लग जाता है। ५ मिनट भी अलग ध्यान लगा लिया तो मेरी जुबान भारी हो जाती है। कहने का मतलब मौन स्वतः आ जाता है , कुछ बोलने का मन न करता। पूरे दिन बगैर बोले रह सकता हूँ पर दिन ऐसे कहाँ होते है , किसी न किसी वजह से बोलना ही पड़ता है , बड़ा कष्ट होता है , जब ध्यान से आया मौन तोडना पड़ता है। 

    ध्यान कहाँ से आया पता नहीं पर बस आ गया। अहमदाबाद के दिनों में मित्र राजेश सोनी ( sdm ,हरियाणा ) के साथ , अहमदाबाद के बाहर एक आश्रम जाया करता था , हर रविवार। क्या शानदार जगह थी। आश्रम , मंदिर जाने ले लिए कभी उत्सुक न रहा , सच तो ये है कि मन हमेशा संदेह से भरा रहता था। पर इस जगह जाकर मेरी काफी धारणा बदल गयी। वहा की तमाम बाते है पर  बात ध्यान की चल रही तो वही पर फोकस करते है। वहां जाकर मैंने एक अनोखी बात देखी , वहाँ पर प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ कर ध्यान प्रकिया का अभ्यास कराया जाता था। १ घंटे चुपचाप आंखे बंद करके , ध्यान साधना होता था। मुझे ठीक से याद है कि वो १ घंटा वाकई बड़ा भारी होता था , कोई फोन नहीं , कोई बात नहीं , कुर्सी में पीठ टिका कर बस बैठे रहो। अक्सर मै सो जाता रहा वो भी बड़ी गहरी नींद में। लगभग ४००- ५०० लोग उस बड़े से ध्यान केंद्र में एक साथ ध्यान लगाते थे। बड़ी सकारात्मक ऊर्जा महसूस होती थी।  

ध्यान के बाद , बड़ा सात्विक सा नाश्ता भी दिया जाता था। यह सब निःशुल्क होता था। कुछ लगातार रविवार के बाद राजेश सोनी की पहल पर एक गुरु जी ने गुरु मन्त्र दिया। एक बंद कमरे में बैठकर ध्यान लगवाया और अंत में हाथ पकड़ कर गुरु मन्त्र दिया। मेरा मन यह सब शंका से देख रहा था। मै सोच रहा था , इससे कुछ नहीं होता पर हुआ। उनकी सहजता , सरलता और सेवा भाव धीरे धीरे मन में विश्वास जगाने लगा। एक कार्ड भी बनाया गया।  

दिल्ली आने के बाद मैंने उसको बहुत मिस किया , शुरू में यहाँ के केंद्र खोजने की कोशिस की , राजेश से बात हुयी तो बताया कि कहीं आउटर में है। धीरे धीरे व्यस्तता बढ़ती गयी।  अहमदाबाद के वो कुछ रविवार मेरे जीवन की सबसे सकारात्मक रविवार थे।  

© आशीष कुमार , उन्नाव। 

२८.०३.२०२६ 

( नोट :- काफी दिनों बाद , पुराने दिनों की शैली में यह उक्त सृजन , मेरे कुछ मिनट के खड़े खड़े ध्यान को जाता है। मौन जारी है देखते है कितने घंटे चल पता है। )











शनिवार, 1 अगस्त 2020

FRIENDSHIP DAY


आज किसी ने फ़्रेंड्स डे के लिए व्हाट्स एप पर विश किया तब ही याद आया इसके बारे में। इन दिनों इतने दिन मनाये जाने लगे हैं कि आये दिन कुछ न कुछ होता ही है।

मित्रता दिवस पर एक बात याद आ गयी। पिछले साल की बात होगी। मेरे फोन पर एक कॉल आयी। अहमदाबाद से कोई था। बोला कि " सर , आप मेरी दुकान पर चाय पीने आया करते थे, sir मैंने चाय की एक नई दुकान खोली है..बड़ी मेहरबानी होगी अगर आप उद्घाटन पर आए .." मैंने दिमाग पर बहुत जोर डाला पर याद न आया कि कौन है ये..एक गुजराती जब हिंदी बोलता है तो चीजें समझी तो जा सकती हैं पर पूरी तरह से स्पष्ट नहीं।
वो कह रहा था कि अमुक भाई ने no दिया है , आप लाइब्रेरी आया करते थे , वही मेरी दुकान है ..
मेरा मन खुशी से अभिभूत था कि उसके बुलाये में कितना प्रेम व सम्मान है .. पर मै तब तक अहमदाबाद छोड़ चुका था, इसलिए उसे विन्रमता से मना करते हुए यह वादा किया कि जब अहमदाबाद आना होगा तब उसके दुकान पर चाय पीने जरूर आऊंगा।

हालांकि आज तक न जान पाया कि वो कौन सी दुकान से था। शायद पुरानी किसी पोस्ट में अहमदाबाद की चाय की दुकानों पर लिख चुका हूँ। क्या गजब चाय बनाते हैं.. खूब गाढ़ी, कड़क , खुशबूदार। खेतला आपा ( खेत के भगवान यानी सर्प ..यही लोगो है उनका) की s.g. highway ( सरखेज- गांधीनगर राजमार्ग ) वाली दुकान तो बहुत ही नामचीन है। एक बार मे 400 - 500 लीटर के भगोने में चाय बनती है जो 10- 15 मिनट में खत्म भी हो जाती है .. टोकन के लिए लाइन लगती है। मेरे ख्याल से वो 24 घंटे खुली रहती है।

अब उसकी कई फ्रेंचाइजी खुल गयी हैं। शायद राजकोट से यह शुरू हुई थी। उनकी चाय का बड़ा यूनिक से टेस्ट है। मैं जहां तक सोच पता हूँ मेरे पास जिस दुकान का फ़ोन आया था वो शुभ लाइब्रेरी के पास थी। काफी पुरानी दुकान थी। बहुत ही कड़क चाय होती थी। वो अपने समय से ही चाय देता था, अगर जल्दी देने को कहो तो भड़क जाता था, उसका कहना था कि जल्दी के चक्कर मे टेस्ट से समझौता नहीं कर सकता।

मुझे अहमदाबाद की तमाम चाय की दुकानें याद आती हैं। स्पीपा ( गुजराती सिविल सेवा का संस्थान ) , सेटेलाइट के गेट के दिनों तरफ की दुकानों की चाय बहुत सही मिलती थी। एक पुदीना वाली चाय की बड़ी फेमस दुकान थी, जहां एक बार dr के साथ , बारिश में चाय पकौड़े खाने गए थे। न्यू राणिप , जहां मैं रहता था, वहां पर भी एक बहुत सही दुकान थी। अच्छा चाय भी बजट के अनुरूप मिल जाती थी। रेहड़ी वाले अध्दि चाय मांगते जो 5 रुपये में मिल जाती थी। वो दिन में कई चाय पीते।  तमाम किस्से हैं वहां के चाय से जुड़े ..

वैसे आपको यह तो याद है ही न , हमारे माननीय  के जीवन में चाय का बड़ा महत्व रहा है वो भी गुजरात से ही है और आज किस मुकाम पर हैं वो.. इसलिए जब मुझे अहमदाबाद से चाय की दुकान के उदघाटन के लिए प्रेम से बुलावा आया तो यह मेरे लिए बड़े ही सम्मान की बात थी, पर परिस्थिति वश उसमें जा न सका।

 तमाम पाठकों को मित्रता दिवस की शुभकामनाएं

(सृजन वंदे भारत मिशन की ड्यूटी पर एयरपोर्ट जाते समय, )
© आशीष कुमार, उन्नाव
2 अगस्त , 2020।

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