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बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

हाल के दिनों की किताबें


    किताबें मुझे हमेशा से प्रिय रही हैं। शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट से गुजरना हुआ हो और बुक स्टाल पर न गया हो। यह अलग बात है कि मध्यमवर्गीय, ग्रामीण मानसिकता या यूँ कहें, छात्र जीवन की मानसिकता कि कोई चीज लिखित मूल्य पर न लेना, से बाहर आने में वक़्त लगा। पहले किताबें उलट-पलट करके अक्सर मैगज़ीन लेकर चल देता था।

अच्छी किताबें नोट करता था और उन्हें ऐमज़ॉन से ऑर्डर करता था, प्रायः 20% छूट के साथ मिल जाती थीं। तमाम बार दिल्ली पुस्तक मेले से ४–५ हजार की किताबें खरीद लेता था। कुछ पढ़ता था और कुछ विशेष तौर पर भेंट करने के लिए रखता था। जो भी मेरे प्रिय लोग रहे, उनको पुस्तकें जरूर दी हैं। तमाम बार खुद की पढ़ी हुई, तमाम बार कोरी, नई-नवेली।

पीछे से और पीछे जब दिल्ली एयरपोर्ट से आना हुआ तो बुक स्टाल से गुजरा और कुछ पुस्तकें खरीदीं। अंग्रेजी में। एक बुक 100 इयर्स ब्लूप्रिंट करके है, दक्षिण भारत के एक डॉ. ने अपने अनुभव को समेटा है, विषय हेल्थ, फिटनेस, दीर्घायु से जुड़े हैं। इन दिनों मुझे इस विषय पर पढ़ना बहुत अच्छा लगता है।

इस बार जब दिल्ली एयरपोर्ट से गुजरना हुआ तो मुझे अपने कुछ उच्च अधिकारियों को भेंट करने के लिए पुस्तकें लेनी थीं। तीन पुस्तकें लीं। एक हिंदुत्व पर थी, किसी अमेरिकन लेखक (भारतीय मूल के) ने अपने बच्चे को सरल भाषा में हिंदुत्व क्या है, समझाने के लिए लिखी थी। एक पुस्तक सद्गुरु की इनर इंजीनियरिंग थी। तीसरी पुस्तक हॉवर्ड बिज़नेस रिव्यू का १०० इयर्स वाला संकलन था।

हर पुस्तक का अपना महत्व था, पहली पुस्तक भेंट के लिए थी। विषय तो जिन्हें देनी थी, उनके अनुकूल था, पर दिक्कत यह हुई कि इंग्लिश भाषा में थी। पर यह सोचकर कि भेंट में भावना देखी जाती है, न कि ऐसे नीर-क्षीर विवेक लगाया जाता है। उम्मीद है, उन्हें पसंद आई होगी।

दूसरी पुस्तक अपने लिए थी। एक समय के बाद व्यक्ति को ओशो भी अच्छे लगने लगते हैं, अध्यात्म में बड़ा मन लगता है। ऐसा ही कुछ मेरे साथ हो रहा है। सद्गुरु पर पहले एक पुस्तक पढ़ चुका था। किसी लेखिका की बड़ी अच्छी बुक थी। काफी रोचक और तथ्यों के साथ। शायद उनकी जीवनी थी। गौरतलब है कि सद्गुरु (जग्गी वासुदेव) को पहले-पहल मैंने सामान्य ज्ञान के एक तथ्य के रूप में जाना था। उन्हें उस साल पद्म विभूषण मिला था। भारत रत्न के बाद, दूसरे नंबर का पुरस्कार। ऐसे में जानना तो बनता था कि आखिर उनका क्या योगदान है, तब जाना।

पीछे बंगलौर भी जाना हुआ, वक़्त भी था, पर वहाँ न गया जहाँ जाने के लिए लोग लालायित रहते हैं। गुरु, संत, महात्मा के प्रति सम्मान भी है, पर भीतर कहीं न कहीं आशंका भी रहती है कि सब व्यापार है। खैर, हम किसी पर कोई टिप्पणी करने के योग्य कहाँ। जब मैंने इनर इंजीनियरिंग पुस्तक देखी, वो भी हिंदी में, तो तुरंत खरीद ली। काफी नाम सुन रखा था।

क्या गजब पुस्तक मिली। बेहतरीन, लाजवाब, सच में यह पुस्तक पढ़कर बड़ा मजा आया। यह अलग बात है कि मतलब की बातें अंत के कुछ पेज में हैं। इससे जुड़ी एक बड़ी रोचक कहानी है। पीछे, हमारे यहाँ एक अति उच्च अधिकारी का दौरा हुआ। मैं परेशान कि उन्हें कुछ तो देना है। ख्याल आया कि यह इनर इंजीनियरिंग ही पढ़कर दे देता हूँ। यहाँ और कुछ भी तुरंत भेंट करने योग्य वस्तु का मिलना बड़ा कठिन है। इसके चलते मैंने २०० पेज से अधिक की किताब न केवल दो रातों में पढ़ी, वरन् उसके नोट्स भी अपनी डायरी में बनाए। इस तरह से पढ़ी किताब भेंट के तौर पर दे दी। अब इसमें मुझे शर्म भी न आती कि पढ़कर देना कितना उचित है।

तीसरी पुस्तक इस मायने में विशेष है कि यह अब तक मेरी खरीदी पुस्तकों में सबसे ज्यादा मूल्य की है। पुस्तक में 30 लेख हैं और यह 1600 रुपये की है। मैंने खूब सोचा, इससे पहले की सबसे कीमती पुस्तक कोई याद न आई। UPSC की परीक्षा भी पास कर ली, पर इस स्तर पर किताबें न खरीदीं। मैंने सुना है, डॉक्टरों और इंजीनियरिंग की पुस्तकें काफी महँगी आती हैं। मेरी जानकारी में UPSC की शायद ही कोई पुस्तक 1000 रुपये से ऊपर आती हो।

खैर, काफी देर सोचा, फिर ले लिया। हॉवर्ड का नाम काफी है। विषय अलग-अलग हैं और काफी रोचक और शोधपरक हैं। चूँकि इंग्लिश में है, इसलिए पढ़ने की गति उतनी तेज न है।

मुझे यहाँ एक बहुत अच्छा पुस्तकालय भी मिल गया, जिसमें हिंदी की बेहतरीन किताबें हैं, प्रायः राजा राम मोहन राय, कोलकाता के सौजन्य से भेंट की हुई। अगर आप किसी भी पुस्तकालय जाएँ और ऐसी भेंट वाली किताबें न मिलें, ऐसा न हो सकता है। काफी सारी पढ़ी हुई किताबें फिर से पढ़ रहा हूँ और बहुत आनंद भी आ रहा है।

इन्हीं में एक किताब, विमल मित्र द्वारा संपादित अज्ञेय का गद्य संकलन, पढ़ा। 900 पेज से ऊपर, यह मेरी पढ़ी गई सबसे मोटी पुस्तकों में से एक होगी। शायद इतनी मोटी किताबें भी गिनी-चुनी होंगी। शेखर एक जीवनी (इतना प्रसिद्ध) होने के बावजूद अब पढ़ा गया है। पहले कोशिश की थी, पर भाषा की दुरूहता, क्लिष्टता ने पढ़ने न दिया।

यहाँ पुस्तकों के खंड अस्त-व्यस्त हैं। तस्लीमा नसरीन की आत्मकथा का चौथा खंड मिला तो ले आया और कुछ पन्ने पढ़कर वापस कर दिया। (सालों पहले भी ऐसा किया था, विवादित क्यों है, यह पढ़ना था, पर मिला नहीं तो मन न किया।)

नई पुस्तकों में बच्चन की आत्मकथा का चौथा भाग दशद्वार से सोपान तक भी है। बड़ी रोचक और प्रवाहमयी भाषा है, किसी भी दिन एक अच्छी बैठक में  खत्म हो जाएगी। बाकी खंड हो सकता है यहाँ न मिलें, पर मेरी प्रतीक्षा सूची में सबसे ऊपर रहेंगे।

मलयालम की साहित्यकार कमला दास की आत्मकथा, माय स्टोरी भी लाया। वजह इसका विवादित होना, और यह पढ़कर कि विवाद की वजह क्या थी, पूरा पढ़ने का मन न किया। इंग्लिश भाषा में होना भी एक वजह हो सकती है।

अंत में एक पुस्तक जो कि हिंदी सूक्ति संकलन है, तीन खंडों में प्रकाशित, बहुत बढ़िया किताब मिली। इसमें 1600 पुस्तकों से लगभग हर विषय पर 20000 अच्छी लाइन्स, कहावतें, शेर-शायरी आदि हैं। पुस्तकालय में जब किताब उलट-पलट रहा था तो एक उक्ति दिखी—

“अपनी प्रिय स्त्री, राजा, छोटे भाई और (उसका नाम न याद आ रहा) के पास खाली हाथ कभी न जाएँ।”

तो क्या इसी वजह से पुस्तकें भेंट करने की आदत है, भगवान जाने। शेष फिर कभी।

विदा।

© आशीष कुमार, उन्नाव।
२१ अक्टूबर, २०२६।

बुधवार, 29 जनवरी 2025

एक अद्वितीय लड़की की अद्वितीय प्रेम कथा



    कितना ही वक़्त गुजर गया पर आज भी उसका जिक्र होते ही चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान आ जाती है। कल बम्बई वाले मित्र से बातों ही बातों में उसका जिक्र हुआ , शाम क्या देर रात तक , उस मजेदार घटना को सोच सोच कर मुस्कुराता रहा।  

    कहानी को लिखने के लिए समझ नहीं आ रहा कैसे कड़ियाँ जोड़ी जाय। बात सिविल सेवा तैयारी के  दिनों की है, एक सरकारी संस्थान में तैयारी के लिए जुड़ा था। एक्साइज इंस्पेक्टर वाली नौकरी से जो भी समय बचा उधर चला जाता था। उन्ही किन्ही दिनों में उसे देखा था. आज मुझे उसकी ठीक से शक्ल ठीक से याद न आ रही है पर कुछ तो खास था। क्या खास था यह लिख पाना कठिन है। भीड़ में भी उसे पहचाना जा सकता था, हालांकि उसे हमेशा ही अकेले ही देखा था। कहानी आगे बढ़े उससे पहले कुछ बाते बतानी जरूरी हैं , मुश्किल से 3 या 4 बार ही उसे सामने से देखा था और आज तक उससे कभी बात न हुयी , उसके बाद ही ये कहानी लिखी जा रही है।  


    तो उसे मैंने जब ही देखा अकेले ही देखा , नजर बरबस ही उस पर अटक जाती। नजरे कभी न मिली पर एक गहन आकर्षण में डूबता चला गया। एक रोज उसी संस्थान के हाल में कोई कार्यक्रम हो रहा था. हम मित्रों का एक समूह बैठा था, बात क्या हो रही थी याद  न रही पर इतना याद रहा कि कोई बोला कि उसके बारे में सोचना भी मत , मैंने पूछा क्यूँ ? जबाब आया . बहुत बड़े घर की है, ऐसे ऐरे गेरे को भाव न देती। मै चुप रह गया, दरअसल दूसरा प्रदेश , भाषा अलग.... काफी सालों से अहमदाबाद में रहने के बावजूद वहां उस तरह से घुल मिल न पाया। स्पीपा से कुछ साथी मिले पर कभी कोई खास अंतरंगता न आ पायी। मेरे ज्यादातर दोस्त नौकरी वाले थे , साथ तैयारी करने वाले थे।  

गुजरात भवन में 2015 वाला इंटरव्यू देने के लिए ठहरा था।  मेरे साथ एक गुजरात के साथी थे। वो बहुत गंभीर थे पुरे दिन पढ़ा करते थे , मेरे लिए दूसरी बार इंटरव्यू था। मैं बहुत आराम से था। पता नहीं क्यू जब तक आखिरी अटेम्प्ट तक बात न पहुंची मै कभी गंभीर क्यू न हो पाया।  एक शाम की बात है , साथी से कुछ देर गप्पे हो जाती थी। ऐसे भी बातो बातो में बात स्पीपा तक पहुंच गयी। मैंने ऐसे ही बोला यार मुझे तो कोई अब तक खास लड़की न दिखी हाँ एक लड़की जरूर ऐसी थी जो बहुत अट्रैक्टिव लगती थी। मुझे ठीक से याद नहीं मैंने क्या विवरण दिया पर आगे जो कुछ हुआ वो वाकई बहुत हैरानी भरा था। 

मेरे साथी चुपचाप पूरी बात सुनते रहे और फिर बोले अब तुम रुको जरा..... उन्होंने फेसबुक खोला और एक प्रोफाइल पिक दिखाते हुए बोले इसी की बात कर रहे हो न......... मेरे विस्मय का ठिकाना न रहा मैं हैरान उसी लड़की  की फोटो को सामने देख रहा था। बगैर नाम बताये वो साथी कैसे उसे खोज के दिखा दिया यह मेरी समझ से परे था। वो मुस्कुरा था कि तुम अकेले नहीं हो , तुम्हारे जैसे तमाम है जो उसके अनोखे , अद्वितीय सौंदर्य की मार से कोई नहीं बचता अदि आदि। हम दोनों बहुत देर तक हँसते रहे। काफी देर तक इस बात पर खोजबीन चलती रही कि आखिर ऐसा क्या है..... हम दोनों एक निष्कर्ष पर पहुँचे कि उसकी आँखे बहुत मादकता से भरी है चेहरे में एक अलग किस्म का गुमान रहता है इसी के चलते वो भीड़ में भी बहुत अलग दिखती है आदि आदि। मुझे साथी के शब्द याद है उसका कहना था कि वो कामदेव की अवतार है..... मै उसे ठीक करते हुए बोला कि कामदेव नहीं रति बोलो, कामदेव तो पुरुष थे। मेरे साथी भी कभी उस लड़की से बात तक न की थी पर जानकारी पूरी  रखे थे।   

उस साल हम दोनों ही UPSC के इंटरव्यू में फेल हो गए। 2016 में पता चला कि उस अलग सी दिखने वाली लड़की का सलेक्शन हो गया। मेरे साथी का पता नहीं पर मै उस साल प्री फ़ैल हो गया था। 2017 में मै और मेरे साथी दोनों ही सलेक्ट हो गए। रैंक भी आस पास ही थी।  साथी का गुजरात में DSP पद पर भी चयन हुआ था और उसने अपना स्टेट ही चुना नौकरी के लिए। कुछ दिन तक हम टच में रहे फिर गैप आता गया। पर मुझे पूरा भरोसा है कि उन्हें यह संस्मरण जरूर याद होगा आखिर सिर्फ विवरण के आधार पर फेसबुक से किसी को खोज निकलना , उनका ही हुनर था।  

मेरे मुंबई वाले साथी भी 2016 में चंयनित है उसी लड़की वाली  सर्विस  में।  मेरे अजीज मित्र , मेरे लिखने के बड़े प्रशंसक भी है , उनका कहना है यह कहानी उस तक जरूर पहुंचा दी जाएगी। यह कहानी दो टुकड़ो में लिखी गयी है पहली बार जब मेरे बॉम्बे वाले साथी दिल्ही आये थे तक इसकी शुरआत हुयी थी और इसी साल के इसी महीने में जब वो दोबारा मिले तो उन्होंने इसका जिक्र किया । मैने वादा किया था कि कहानी जल्द ही पूरी करके शेयर करूंगा।  


(इस कहानी के सभी पात्र , विवरण काल्पनिक है , जीवंत बनाने के लिए कुछ सजीव से विवरण का सहारा लिया गया है ) 

© आशीष कुमार, उन्नाव। 
29.01.25


























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