रविवार, 28 जून 2026

Fate


लघुकथा :- किस्मत  

- आशीष कुमार 

    वो अलग थी , सबसे अलग।  उस रास्ते से उनका कई बार गुजरना हुआ। दोनों बातें करते हुए गुजरते थे। लड़की बातों के साथ साथ तमाम चीजे सोचा करती थी। बस्ती पुरानी थी पर अब वहां विकास पहुंच रहा था। वो रास्ता काफी उबड़ खाबड़ था , उसमे तमाम गड्ढे भी हो गए थे। 

    उन्हें साथ हुए काफी वक़्त हो गया था , एक रोज उधर से जब जाना हुआ तो देखा वो रास्ता काफी अच्छी नई सड़क में बदल गया। बीच में पौधे , रोड में पेंट से मार्किग , किनारे हाइलाइटर , गहरा चमकता तारकोल , बेहतरीन तकनीक से बनी , समतल सपाट खूबसूरत रोड। 

" शायद एक दिन मेरी भी किस्मत ऐसे ही बदल जाये " उसने एकाएक कहा। 

" कैसे ? " लड़के ने चौंककर पूछा।  

" इस रोड की तरह " उसने जबाब दिया। 

 © आशीष कुमार , उन्नाव।  

28.06.2026 

सोमवार, 22 जून 2026

Make a Swing

 

 लघुकथा - झूला बना दो 

आशीष कुमार

    उनके बीच में हमेशा कुछ न कुछ गड़बड़ हो जाता था। कोई कहता कुछ था, पर सामने वाला समझता कुछ था। कुछ भाषा और कुछ बोली का असर था। वो हमेशा उसे छेड़ता कि 

"बचपन से ऐसी हो , या कोई खास ट्रेनिंग ली है। "

" मैं नहीं जानती ऐसा क्यों होता है , मैं तो सही ही बोलती हूँ सबसे। मैं हमेशा सही होती हूँ पर लोग मुझे समझ न पाते। " वो मासूमियत से जबाब देती।  

    फिर वो एक  कहानी सुनाती। उसे सजने-सवारने का शौक बचपन से था। उसे अपने हाथों में मेहँदी लगवाना बहुत पसंद था। तमाम बार वो अपने दोनों हाथों में मेंहदी लगवाती। कजरी तीज का त्यौहार था। पूरा शहर उल्लास से भरा। एक शाम वो बाजार गयी। 

     बाजार की तमाम भीड़ में उसका मन मेहँदी लगवा रहे लोगो में अटक गया। उसने भी एक अम्मा जी के पास जाकर बैठ गई। वो हमेशा अलग सोचती थी। 

    " अम्मा , मेरे एक हाथ  में झूला बना दो। " अम्मा को बताकर वो भीड़ में देखते हुए कुछ सोचने लगी।  अम्मा ने तेज हाथों से उसके दूध जैसी गोरे हाथों में मेहँदी रच दी। उठने से पहले उसने अपने हाथों में देखा , उसे झूला समझ न आया। उसने अम्मा से पूछा -

" ये क्या बना दिया अपने " 

"वही जो आपने कहा था—दूल्हा ," अम्मा ने कहा।  

 उस मासूम ने पूरे १५ दिन , अपने अनजान दूल्हे को हाथ में  बैठकर रखा। ये राज किसी को न पता चला।  

© आशीष कुमार , उन्नाव। 

२२ जून 2026  .








रविवार, 21 जून 2026

Dream

लघुकथा -  ख्वाब 

आशीष कुमार


" मैंने  हमेशा से एक ख़वाब देखा है  कि मुझे किसी से बहुत गहरा प्रेम हो , इतना कि मैं उसके बगैर जी न सकूँ ? " उसने  खनकती आवाज में कहा। 

" तो फिर क्या तुम्हें हुआ , मिला कोई ऐसा जिसके बगैर जिंदगी जीना मुश्किल लगे " विभव ने सब जानते हुए भी पायल के मुँह से सुनना चाहा। 

" अब तुम ये पूछ रहे हो , जान बूझ के अनजान बन रहे हो " पायल मुस्कुरा उठी। काफी दिनों के बाद , दोनों साथ बैठे थे। 

" पर मेरा पूरा ख़्वाब जानना चाहोगे "

" हाँ क्यों नहीं " 

" मैंने हमेशा से यही सोचा है कि मुझे सच्चा प्रेम हो फिर वो मेरा दिल तोड़ दे , बगैर कुछ जबाब दिए अचानक से गायब हो जाये। ऐसे जाये कि फिर वो कभी न मिले। दूसरे शब्दों में कहूँ तो मैं बेइंतिहा पीड़ा झेलना चाहती हूँ "

" ये क्या बात हुयी ? ऐसा सोचने की कोई खास वजह ?" विभव ने हैरानी से पूछा " 

" हाँ , मेरे ऐसे ख़्वाब की वजह है। मैंने कहीं पढ़ा था कि जिंदगी में सफल होने के लिए दिल टूटना जरूरी है , मैं बस सफल होना चाहती हूँ , बगैर दिल टूटे मैं कुछ न कर सकती हैं। " पायल ने अपनी बात पूरा करते ही उठकर चली  गयी। 

© आशीष कुमार , उन्नाव 

21 जून 2025

गुरुवार, 18 जून 2026

Money Plant

 

मनीप्लान्ट 


    मेरी  याद में मनीप्लान्ट का जो पौधा याद आता है , वो पौधा मेरे गांव वाले  घर के आँगन का था। आँगन से एक अंदर से नाली जाती थी। उसी के पास , एक टूटी बाल्टी में मिट्टी भर का लगा दिया गया। वो मनीप्लान्ट कहां से आया था , इतना याद नहीं। यह जरूर है , उन्हीं दिनों इससे जुड़े मिथक सुने। जैसे कि मनीप्लान्ट को हमेशा चुरा के लाना चाहिए , इसको लगाने से घर में पैसा आता है। 

    वैसे तो किसान परिवार में , किस्मत से ज्यादा मेहनत पर जोर दिया जाता है। यह मेरी खुद की धारणा है जो समय के साथ आयी है। जैसे हमारा परिवार , उतना धार्मिक नहीं रहा कभी , घर में मंदिर रहा पर रोज उसमें दिया जले , पूजा पाठ हो , ऐसा न होता था। आज सोचता हूँ कि शायद नियमित पूजा पाठ न करने की वजह , समय का आभाव रहा हो।  

    तो वो मनीप्लान्ट शुरू में काफी छोटा था , उसको लेकर मुझे काफी उम्मीदें थी। ऐसा लगता था कि जैसे जैसे यह बड़ा होगा , घर में चीजें ठीक होंगी। वो पेड़ सालों-साल घर में रहा , हमेशा हरा भरा और खूब फैलाव लिए हुए। बाल्टी से निकलकर छज्जे तक फ़ैल गया , दोनों तरफ  दीवालों में डोरियों से वो फैलता ही गया। मनीप्लान्ट का वो पेड़ , सबके लिए पेड़ था , मेरे लिए उम्मीद की किरण। मेरे मन में हमेशा रहा कि मनीप्लान्ट के पेड़ से किस्मत जुडी है। यह मेरे बचपन की बात है , बालमन के कोमल सपने।  

    इसके बाद , एक दूसरा मनीप्लान्ट  पेड़ घर के बाहर लगाया गया। यह काफी बाद की बात है , इसका भी हवाला नहीं है कि आया कहाँ से। यह मनीप्लान्ट की दूसरी किस्म थी। यह बेहद बड़े पत्तो वाला मनीप्लान्ट था। यह पेड़ बड़ा मिलनसार किस्म का था , अपने आस पास के पेड़ों से लिपट गया और उनके साथ साथ बड़ा हुआ। यह पेड़ बगैर किसी देख रेख के ही प्रगति करता गया। इसके पत्ते बहुत ज्यादा बड़े और गहरे हरे रंग के थे। अब तक मैं पढ़ाई लिखाई चप्पल घिसाई के दौर से गुजरता हुआ तमाम संघर्ष , असफलताओं की पीड़ा भुगतने के बाद सफलता का स्वाद चख  चुका था। 

    तमाम सालों से बाहर हूँ पर साल में कई बार घर जाना होता रहा। आँगन का मनी प्लांट न रहा वजह आँगन ही न रहा , उसकी जगह नया निर्माण हो गया पर घर के बाहर वाला मनीप्लांट बढ़ता रहा , वो इतना प्रबल और विशाल था कि उसको बीच बीच में काटना पड़ता। यूँ तो मनीप्लान्ट का पेड़ नाजुक होता है पर मेरे घर के बाहर वाला पेड़ को काटने के लिए कुल्हाड़ी का उपयोग करना पड़ता। 

    मेरी नौकरी बदलती रही , शहर बदलते रहे। अहमदाबाद में रहने के दौरान मुझे याद है न कि मेरे वहां वाले  घर में यह रहा या नहीं। दिल्ली में यह शुरू से जीवन का अभिन्न अंग रहा। यही पर पहली बार मेरे बेहद खुबसूरत मनीप्लाँट देखे। गमले में बीच में नेट के सहारे , करीने से तराशे , सवारे हुए मनीप्लान्ट। तमाम बार अलग अलग जगह से खरीद कर लाये गए , जो कुछ महीने तो खूब अच्छे चलते पर धीरे धीरे वो खत्म हो जाते।  

    इस दौरान मैंने देखा कि इनको मिटटी की जरूरत नहीं , यह किसी भी बोतल में पानी भर कर रखे जा सकते है। उसके बाद से ये मेरे ऑफिस की टेबल का जरुरी हिस्सा बन गया। किसी भी ऑफिस में रहा तो मेरे टेबल पर पहले दिन से ही मनीप्लान्ट का पौधा रहा। कोविड के दिनों में , अपनी टेबल के सामने ४ गमले मनीप्लान्ट के रखा दिया , इससे सोशल डिस्टन्सिंग हुयी।  तमाम बार लोग इसे देखते और हैरान होते।  गमलों से एक तरह का बैरियर बना था। हलांकि उन दिनों फ्रंट पर रह कर काम किया करते थे , सरकारी अफसरों विशेषकर प्रशासन में खुद के बजाय जनता के हित सबसे ऊपर थे। इसलिए यह गमले वाली डिस्टन्सिंग बस अपने मन के लिए थी। मैं उनमें फोकस करके विचारों में डूब सकता था। अपने ऑफिस, वर्तमान से परे जाकर सोच सकता था। पेड़ , प्रकृति में तनाव से मुक्ति की विशेष शक्ति होती है।  

    लिखने पढ़ने वाले लोगों या कहे रचनात्मक लोगों का कॉफ़ी हाउस से विशेष जुड़ाव होता है। कनॉट पैलेस पर तमाम कॉफ़ीहाउस थे। मै पहली बार जहाँ गया वो वही था जिसे मैंने सुना था। आपको शायद न पता हो यह प्राचीन  हुनमान मंदिर के पास की बिल्डिंग के ऊपरी माले पर है , बहुत पुराना। मैंने सुना है , पुराने दिनों में तमाम लेखक , कलाकार यहां आ चुके है। बहुत ही साधारण सी सजावट , बहुत सामान्य से पैसे में कॉफ़ी और उसके साथ तमाम स्नैक्स मिल जाते है।  

    कभी अगर अपने मिजाज के लोग मिले और अंतरंगता अगर इस हद तक हुयी कि मिलते है तो मेरी पहली कोशिस वही रहती है , इंडियन कॉफ़ी हाउस , कनाट पैलेस ऊपरी मजिल वाला। कितनी मुलाकातें , कितनी ही यादे। तमाम बीतती शामों में , कॉफ़ी के बाद बगल की खुली छत पर चहलकदमी , चलते चलते तमाम विचार , तमाम कहानियाँ। ऐसी ही एक शाम कॉफी के बाद , मैंने उससे जिसे मनी प्लांट वाली कहानी सुनाई थी और अपने जीवन की तमाम उपलब्धियों का इसे क्रेडिट दिया था।  उसको भी इस पर यकीन सा हो गया था , मैंने उसे प्रेरणा थी कि यही कॉफ़ी हाउस से मनी प्लांट चुरा लो , बस एक छोटी सी डाल।  उसे यकीन न था कि पर मैंने कहा कि यह चल जायेगा। बाद के तमाम महीनों में उसके रूम में एक बोतल के पानी में वो मनीप्लांट चलता रहा। वैसे आज देखूँ तो उसके जीवन में भी चीजे ठीक हो गयी है क्या इसको क्रेडिट उसी मनीप्लांट को दिया जाय ? 

    खैर मेरे पास मनीप्लान्ट की कहानियाँ उतनी लम्बी और बड़ी है , जितना मेरे गांव वाले घर के बाहर वाले पेड़ की विशालता और फैलाव। उनपर फिर कभी।  क्या आपने  इंडियन कॉफ़ी हाउस , कनॉट पैलेस की कॉफ़ी पी है ?

- आशीष कुमार , उन्नाव।  

१८ जून २०२६।  













  

सोमवार, 15 जून 2026

Without you

 उसके बिना 


    अपने भी जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर , यह जरूर सुना होगा कि किसी के चले जाने का बाद ही उसका महत्व पता चलता है। मैंने भी बड़ी शिद्द्त से यह महसूस किया है, उन दिनों जब वो साथ था तब उसका जिंदगी में  होना सामान्य सी बात थी, अब जब वो हमेशा के लिए खो गया है , मैंने उसे हर रोज याद किया है।  

    जब यमुना एक्सप्रेस पर आगरा से दिल्ली की तरफ आते है तो कुछ टोल के पास एक बड़ा सुन्दर मंदिर का बोर्ड दिखाई पड़ता है। मुझे लगभग 7 साल हो गए, इस रास्ते आते जाते और लगभग हर बार ही इसको देखा। मैं प्रेममंदिर वृंदावन के बोर्ड की बात कर रहा हूँ जो टोल के पास लगे है। तमाम लोगों से इसकी भव्यता , विशालता के  बारे में सुना भी था।  

    कहते है किसी जगह या मंदिर में तब तक  जाना होता नहीं जब आपको वो बुलाये न।  पिछले तमाम सालों से मथुरा , वृन्दावन के पास से गुजरना हुआ पर कभी उधर जाना न हुआ।  पिछले साल , सावन के महीने में कुछ संपर्कों के चलते वृन्दावन जाने का अवसर मिला। होस्ट बड़े सज्जन थे। सैकड़ो मंदिर में कुछ सबसे महत्वपूर्ण की लिस्ट बना दी और उनका क्रम बता दिया। सब जगह बड़ी सुविधा से दर्शन हो गए। बांके बिहारी जी मंदिर में स्थानीय पुलिस  के सहयोग से  काफी सुविधा से दर्शन हो गए। 

    मेरी लिस्ट में सबसे अंत में प्रेम मंदिर था। शाम हो गयी थी. धीरे धीरे बारिश भी  हो रही थी।  मंदिर काफी बड़ा और सुन्दर  बना है। जूते जमा करने की व्यस्था थी और तमाम लोगों ने ऐसे खुले में भी जूते डाल दिए थे। लाइन जरा लम्बी थी। इससे पहले भी मैंने अपने जूते तमाम मंदिर के बाहर ऐसे ही डाल दिए थे। यहाँ पर भी एक कोने में रखकर मंदिर दर्शन के लिए चला गया। करीब 30 मिनट के बाद जब लौटा और अपने जूतों के पास गया तो वो वहाँ न थे। एक पल को यकीन न हुआ कि जूते चोरी भी सकते हैं पर वो हो चुके थे।  ठीक उस क्षण तक वो मेरे तमाम जूतों में महज एक जोड़ी जूते थे  पर खोने के बाद , दिल बैठ सा गया। 

    पिछले साल रनिंग का जोश सा आया था , उससे जुडी तमाम चीजों,  तमाम अलग अलग कम्पनी के जूते , अलग अलग जगह से खरीदे थे। सकनी , होका , ब्रुक्स , नाइके , एसिक्स , प्यूमा  आदि। इनमें से कुछ बहुत मुश्किल से मिले थे। 

    मेरा जो जूता प्रेम मंदिर खोया था , वो HOKA का नीले कलर के जूते थे। ठीक से से याद नहीं कि दिल्ली से लिए थे या गुरुग्राम से। एमआरपी 14000 के आस पास था , मुझे ९००० के मिले थे। शुरू में उन्हें ज्यादा पहनता न था , एक रेस में आजमाया तो बड़ा अच्छा लगा। उनका वजन काफी कम था और बाउंस अच्छा था , शायद कॉर्बन प्लेट वाले थे। उसके बाद तो वो मेरे रेगलर जूतों की तरह हो गए।  उनकी एक और खास बात थी कि लसेस खोले बगैर भी पहना और उतारा जा सकता था।  

    तमाम बार उनके लिए अलग अलग तारीफ सुनी थी। एक शिमला की रेस थी , किसी ने कहा ये कहाँ से लिए , इम्पोर्टेड है क्या ? बड़े अच्छे लग रहे हैं.... धीरे धीरे वो मुझे काफी प्रिय हो गए। इसलिए जब वृन्दावन गया  तो कोई रेस न थी , बस वो कम्फ़र्टेबल थे इसलिए साथ थे। 

    जैसा मैंने शुरू में लिखा , जबतक  चीजे हमारे साथ होती है , उनकी हमें कदर न होती है। उनके खोने के बाद  वो बड़ा याद आये। विशेषकर जब उन्हें स्टोर में पता किया  तो पता चला अब वो नही आ रहे। एक दो बार संयोग बना। एक सज्जन मुझसे मिलने ऑफिस  आते थे। तमाम बार बोलते थे कि सर कोई हेल्प चाहिए तो बताइये , मेरा अमुक काम है , अमुक शहर में होटल है आदि आदि।  मै बाहर आता जाता रहता हूँ आदि।  एक पल को मन में ख्याल आया बोलूं मेरे लिए बाहर से होका के जूते ला सकते हो क्या ? पर ख्याल मन में रह गया कि कौन अहसान ले और फिटिंग का इशू अलग। 

    यूँ तो कुछ और जूते कलेक्शन में जुड़ गए है, पिछले दो सालों में लगभग 2500 km के आस पास रनिंग हो गयी , तमाम शूज फटने को आये। उन सबके बीच मुझे होका का नीला वाला शूज बहुत याद आता है। जैसे कि कोई मोहब्बत की दास्ताँ जो ठीक से शुरू भी हुयी , उसका अंत आ गया।   पिछले दिनों , यमुना एक्सप्रेस से आना जाना हुआ और टोल के पास प्रेममंदिर के होर्डिंग को देख , होका की बड़ी याद आयी।  

( प्रसंगवश , इन दिनों फिल नाईट ( funder नाइके ) की बुक शू डॉग पढ़ी जा रही है ).

- आशीष कुमार , उन्नाव।  

15 जून, 2026 . 




 

शुक्रवार, 29 मई 2026

Nostalogia

कविता: स्मृतिलीनता


लोग लौट ही आते हैं 
तमाम अंतराल के बाद,

एकाएक एक रोज
छोटे से संवाद के बाद
वो बताते है पुराने दिनों की बात

उन दिनों जब संवाद
करना आसान न था
कभी छोटी से मुलाकात 
दो शब्द, चार बातें 
इनके सिवा ज्यादा कुछ और नहीं 
तमाम अव्यक्त भावनाओं के सिवा 
पुराने दिनों की यादें 
कुछ परिचित जगहे
कुछ परिचित अध्यापक 
एक दो नाम,
उन दिनों का
ढेर सारा संकोच 

फिर घूमकर वहीं
आ जाना कि 
उन दिनों मिलते तो 
ये होता, वैसा होता

 उन दिनों का 
तमाम अनकहा 
धीरे धीरे व्यक्त होता है
रह जाता है वर्तमान में
तमाम कुछ कहने को..

© आशीष कुमार, उन्नाव।
29 मई, 2026.




शनिवार, 4 अप्रैल 2026

समय समय की बात है

 

समय समय की बात है 

- आशीष कुमार 


    2014 के आस पास की बात है। उन दिनों फेसबुक पर बहुत सक्रिय हुआ करता था। फेसबुक के जरिये उनसे जुड़े। वो उस साल आईपीएस में चयनित हुए थे। अहमदाबाद में ही थे वो , जितना मुझे याद आता है , किसी चयनित व्यक्ति से रूबरू होने के वो गिने चुने अवसर में एक था। उन दिनों कस्टम हाउस , अहमदाबाद में एक्साइज  इंस्पेक्टर के तौर पर जॉब कर रहा था। वही वो मिलने आ गए , मै बड़े गर्व से बाकि लोगो से परिचय कराया कि ये मेरे मित्र है और इनका इसी साल आईपीएस में चयन हुआ है।  

    विदाई के वक़्त हम ऑफिस के बाहर चाय की एक टपरी पर खड़े होकर चाय पी रहे थे तो वो बोले ये अपना ही कोई भाई बंधू होगा। वो पीछे राजस्थान से थे और तमाम लोग अहमदाबाद में ऐसे काम किया करते थे। उनका कहने या जतलाने का आशय यह था कि वो बड़ी सामान्य पृष्टभूमि से आते थे। मुझे हमेशा से यह चीज बड़ी आकर्षित करती थी ,वही भाव राजा का बेटा अगर राजा बना तो क्या बड़ी बात हुयी , बड्डपन तो वो है कि किसान का बेटा राजा बने।  

     हम सम्पर्क में बने रहे। 2015 वाले upsc के मैन्स में  अहमदाबाद वाले सेंटर पर फिर मिलना हुआ , वही अंतरंगता , प्रेमभाव के साथ वो मिले। उस साल भी वो दोबारा से चयनित हुए , आईपीएस में ही हिमाचल कैडर मिला। पीछे 2014  वो उत्तर प्रदेश कैडर में  आईपीएस चुने गए थे। उसके बाद शायद उन्होंने ने एग्जाम न दिया और उत्तर प्रदेश में ही जॉब करने लगे।  

    अलीगढ़ में वो पोस्टेड थे। कभी कभी बात हो जाती थी। मेरा भी 2018 में चयन हो गया था। अब ज्यादा आत्मविश्वास के साथ सम्पर्क था। अलीगढ़ के दिनों में ही एक मित्र रविंद्र यादव का फोन आया। एक सिफारिश थी, आज सोचता हूँ कि ऐसी सिफारिश अगर आज आये तो एक पल में मना कर दू। सिफरिश थी- किसी की मौत हो गयी थी और परिवार वाले पोस्टमार्डम न कराना चाह रहे थे। जब से क्राइम तक पर शम्स की स्टोरी सुनना शुरू किया तब से ये समझ आ गया कि पोस्ट मार्डम जरूर कराना चाहिए , खास तौर पर जब घर वाले मना कर रहे हो। मैंने अपने उसी आईपीएस  मित्र से बात हुयी और उनका काम हो गया।  

    एक और घटना याद आती है , वो महोबा में पोस्टेड थे। अपने प्रदेश में जितने आईएएस, आईपीएस से सम्पर्क होता है , कही न कही मुँह से निकल ही जाता है। अमुक हमारे बड़े खास है कुछ ऐसा। एक हमारे परिचित या यूँ कहे दूर के रिश्तेदार उसी जिले में परिवहन विभाग में बड़े अधिकारी थे। उनका फोन आया कि आप पुलिस कप्तान साहब को जानते हो क्या ? मेरे हाँ कहने पर और तस्कीद करने लगे अच्छे से जानते हो क्या। जितना समझ आ रहा था कुछ न कुछ अवैध उगाही का मामला रहा होगा। परिवहन विभाग की छवि कुछ ऐसी ही है पुलिस ने मामला बना दिया होगा तो वो भागे भागे फिर रहे थे। खैर आदमी पूरी बात बताता तो है नहीं। उनकी भी सिफारिश की और उनका भी काम हो गया।  

    जितना मुझे याद है , वो काफी साधारण तरीके से रह थे।  दरअसल हर किसी की जिज्ञासा होती है कि किस सीट पर कितना पैसा छाप रहा है , उनका जिला अवैध खनन के लिए जाना जाता था। जितना मैंने उनकी बातचीत से समझा था , उनका परिवार बड़ा साधारण जीवन जी रहा था। बच्चे सामान्य स्कूल में पढ़ रहे थे। तभी वो घटना हुयी। 

 यह इतना चर्चित मामला है कि गूगल में एक शब्द डालने से सैकड़ो कहानियाँ निकल आएंगी। मैंने जब सुना यकीन न हुआ। यहाँ से मैं कहूँगा कि जब बुरा समय आता है तो आप बच न सकते। उनके जिले में एक व्यक्ति आरोप लगा कर आत्महत्या कर लेता है।  इसके आगे की तमाम कहानी न मुझे पता है और न किसी तरह की टिप्पणी करने की पोजीशन में हूँ। 

    कम से कम 2 साल , पुलिस अपने ही विभाग के उच्च अधिकारी को खोजती रही और न खोज पायी। उनके बारे में जानने का एकलौता साधन इंटरनेट और समाचार पत्र थे। मेरा बड़ा मन था किसी तरह से उनका सम्पर्क मिले। सिविल सेवा के तमाम ग्रुप में उनका नया नंबर जानने की इच्छा होते हुए भी कभी मांग न सका। फिर एक दिन मैंने पढ़ा कि उन्होंने सरेंडर कर दिया अब वो लखनऊ जेल में थे।  यहाँ भी जाने का दिल किया , उनसे उनका हाल और उनका उस आत्महत्या का वर्जन जानने की इच्छा थी। मुझे कभी भी यकीन न हुआ कि इसमें उनका कोई लेना देना हो सकता है।  

    मेरे जेहन से यह चैप्टर क्लोज हो गया था। इसी साल की बात है , ठीक से याद नहीं , शायद जनवरी की बात होगी। मेरे व्हाट ऍप स्टेटस पर उनका उसी पुराने नंबर से रिस्पांस आता है तो एक पल को मुझे यकीन न हुआ। छोटी सी चैट के बाद , मैंने कहा कि मैं किसी दिन आराम से लम्बी बातचीत करता हूँ। उनको काल करने के लिए फुर्सत न मिली , दिन टलते गए। कैसी फितरत है , जब सम्पर्क न था तो बड़ा याद करता रहा और अब जब सामने से जबाब आया तब वक़्त न मिल रहा।  

    इस होली में घर में फुर्सत से लम्बी बातचीत हुयी। पोस्ट लम्बी होती जा रही है और उनकी बातचीत में तमाम चीजे जानने को मिली । जैसे कि उस मर्डर में उसके ही बिजनेस पार्टनर की बड़ी संदिग्ध भूमिका था और भी तमाम बातें। इनको अफ़सोस यह है कि किसी जूनियर ने विविध तरीक़े के आश्वासन दिया था , इसके चलते ही इन्होने सरेंडर में इतनी देरी की, इस देरी के चलते तमाम नुकसान हुए।  अब उनके ऊपर और भी  तमाम और मुकदमे थोप दिए गए।

    उनकी जिंदगी वहीं आकर खड़ी हो गयी। अहमदाबाद में फैमिली के साथ रह रहे हैं। बॉम्बे में प्राइवेट जॉब की बातचीत चल रही है। उनके तमाम बैचमेट भी यह कहानी पढ़ेंगे , कैडर मेट भी। मुझे नाम बताने की जरूरत नहीं है। उनका वही पुराना नंबर ही चल रहा है। अच्छे में तो हर कोई साथ देता है , उन्हें तमाम तरह की मदद की जरूरत है। जब भी दिल्ली आना होगा , मेरी मुलाकात होगी , जो अपने से बन पड़ेगा करुँगा।  

 उस घटना का राजनीतिकरण हो गया था इसके चलते ही चीजे इतना बिगड़ी। इसके चलते ही उन्हें किसी से भी सहयोग न मिल पाया। लोग चाहकर भी सच का साथ  न दे पाए।   मुझे इतना पता है कि सिर्फ आरोप लगाने से , अपराध कभी  साबित न होगा और किसी जिले के पुलिस कप्तान को किसी व्यक्ति की हत्या/ आत्महत्या के लिए सीधे तौर पर कैसे ठहराया जा सकता है। एक न एक दिन , सच जरूर सामने आएगा और वो वापस जरूर आएंगे।   

© आशीष कुमार , उन्नाव।  


शुक्रवार, 27 मार्च 2026

खड़े होकर ध्यान

खड़े होकर ध्यान 


    जहाँ मै रहता हूँ , वहीं पर एक पार्क है , इतना सघन की जंगल का अहसास होता है। जिम के बाद , मन हुआ कि आज वहीं जाकर थोड़ी देर ध्यान लगाता हूँ।  यूँ तो पार्क में तमाम बेंच है पर एक काफी भीतर हट है , उसके पास पास काफी नीरवता रहती है। बड़ी उम्मीद से उधर गया तो देखा वहाँ पहले से कोई मौजूद है , इसलिए आगे बढ़ गया। इसके आगे कोई जगह न थी जहाँ सहजता से ध्यान लगाया जा सके। यूँ ही चलते चलते ख्याल आया की क्यूँ न खड़े होकर ध्यान लगा लिया जाय। वहीं रुक गया , सहजता से आंखे बंद की, तमाम विचार धीरे धीरे स्थिर होने लगे। मन प्रकति , हवा , पक्षिओं के संगीत पर टिकने लगा। 


    इंस्टाग्राम पर मुझे रील्स में सबसे ज्यादा वो पसंद आती है जो फनी होती है। एक रील याद आती है , जिसमें एक बाबा जी कहते है मैं रोज रात में २ बजे उठकर ध्यान लगाता हूँ , पिछले ५० साल से लगा रहूं पर आज तक न लगा। कितनी फनी पर सही बात बोली। ध्यान लगना होता है  मिनट में भी लग जाता है अगर न लगना होगा तो सालों कोशिस करते रहो न लगेगा। मेरे साथ अच्छी बात है कि मेरा मिनट में लग जाता है , यह अलग बात है कि कोई नियमित अभ्यास नहीं करता , बस लग जाता है। ५ मिनट भी अलग ध्यान लगा लिया तो मेरी जुबान भारी हो जाती है। कहने का मतलब मौन स्वतः आ जाता है , कुछ बोलने का मन न करता। पूरे दिन बगैर बोले रह सकता हूँ पर दिन ऐसे कहाँ होते है , किसी न किसी वजह से बोलना ही पड़ता है , बड़ा कष्ट होता है , जब ध्यान से आया मौन तोडना पड़ता है। 

    ध्यान कहाँ से आया पता नहीं पर बस आ गया। अहमदाबाद के दिनों में मित्र राजेश सोनी ( sdm ,हरियाणा ) के साथ , अहमदाबाद के बाहर एक आश्रम जाया करता था , हर रविवार। क्या शानदार जगह थी। आश्रम , मंदिर जाने ले लिए कभी उत्सुक न रहा , सच तो ये है कि मन हमेशा संदेह से भरा रहता था। पर इस जगह जाकर मेरी काफी धारणा बदल गयी। वहा की तमाम बाते है पर  बात ध्यान की चल रही तो वही पर फोकस करते है। वहां जाकर मैंने एक अनोखी बात देखी , वहाँ पर प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ कर ध्यान प्रकिया का अभ्यास कराया जाता था। १ घंटे चुपचाप आंखे बंद करके , ध्यान साधना होता था। मुझे ठीक से याद है कि वो १ घंटा वाकई बड़ा भारी होता था , कोई फोन नहीं , कोई बात नहीं , कुर्सी में पीठ टिका कर बस बैठे रहो। अक्सर मै सो जाता रहा वो भी बड़ी गहरी नींद में। लगभग ४००- ५०० लोग उस बड़े से ध्यान केंद्र में एक साथ ध्यान लगाते थे। बड़ी सकारात्मक ऊर्जा महसूस होती थी।  

ध्यान के बाद , बड़ा सात्विक सा नाश्ता भी दिया जाता था। यह सब निःशुल्क होता था। कुछ लगातार रविवार के बाद राजेश सोनी की पहल पर एक गुरु जी ने गुरु मन्त्र दिया। एक बंद कमरे में बैठकर ध्यान लगवाया और अंत में हाथ पकड़ कर गुरु मन्त्र दिया। मेरा मन यह सब शंका से देख रहा था। मै सोच रहा था , इससे कुछ नहीं होता पर हुआ। उनकी सहजता , सरलता और सेवा भाव धीरे धीरे मन में विश्वास जगाने लगा। एक कार्ड भी बनाया गया।  

दिल्ली आने के बाद मैंने उसको बहुत मिस किया , शुरू में यहाँ के केंद्र खोजने की कोशिस की , राजेश से बात हुयी तो बताया कि कहीं आउटर में है। धीरे धीरे व्यस्तता बढ़ती गयी।  अहमदाबाद के वो कुछ रविवार मेरे जीवन की सबसे सकारात्मक रविवार थे।  

© आशीष कुमार , उन्नाव। 

२८.०३.२०२६ 

( नोट :- काफी दिनों बाद , पुराने दिनों की शैली में यह उक्त सृजन , मेरे कुछ मिनट के खड़े खड़े ध्यान को जाता है। मौन जारी है देखते है कितने घंटे चल पता है। )











मंगलवार, 13 जनवरी 2026

World Book Fair Delhi

 पुस्तक मेला 


वक़्त कितना बीत जाये पर अख़बार पढ़ना बंद न होगा , प्राय सुबह सुबह टैब में पढ़ लेते है। उसी से पता चला पुस्तक मेला लगने वाला है, फिर कुछ मित्रों ने याद दिलाया। आज भी सोच रहा हूँ जाऊ या न जाऊ। मेरे पुराने परचित सोच रहे होंगे भला मेरे जैसा पुस्तक प्रेमी ऐसी दुविधा में क्यू है।  

मेरी दुविधा की वजह, शायद वही है जो आपकी भी होगी। मेरे ख्याल से पीछे 5 ... 6 साल ने शायद ही कोई ऐसा साल रहा हो जब प्रगति मैदान के पुस्तक मेला जाना न हुआ हो। हर साल , आगे पीछे जरूर गया। खूब घूमा और किताबे भी खूब खरीदी। अफ़सोस पुरे पुरे साल बीत गए , किताबे ज्यों का त्यों रखी है. सुरेंद्र मोहन पाठक के नावेल से लेकर बारेन बुफेट के एनुअल स्पीच का कलेक्शन , ज्योतिष , और भी विविध विषय पर पता नहीं क्यों अब पढ़ा न जाता है। 

न पढ़ने की तमाम बार वजहों को विश्लेषित भी किया है। फ़ोन , टीवी पर ott कंटेंट , पढ़ने की उपयोगिता न समझ आना के साथ साथ सबसे बड़ी वजह फिटनेस के प्रति नया प्रेम है। जब से मैराथॉन में रूचि जागी समय समझ ही न आता है कि वक़्त कहां चला जाता है। सुबह स्ट्रेंथ ट्रेनिंग कर ली तो पुरे दिन शरीर आराम मांगता है , हर वक़्त बुखार , खुमारी सी चढ़ी रहती है।  अब जाकर एक चीज समझ आयी है पढ़ाई लिखाई और वर्कआउट दोनों एक साथ करना बड़ा मुश्किल है, खासकर जब आप फुल टाइम जॉब भी कर रहे हो। 

पुस्तक मेले में कुछ दिन और  बचे है ये पता है कि जाऊंगा तो जरूर और बुक का ढेर भी आएगा , ये भी तय सा है कि बस वो किताबें हर साल की तरह अनछुई ही रह जाएगी।

© आशीष , उन्नाव। 

13 जनवरी , 2026 .  


शनिवार, 20 दिसंबर 2025

Blocking

लघुकथा :  ब्लॉकिंग 

उससे मिलने के पहले ब्लॉकिंग क्या होती है उस लड़के को पता न था। कभी ऐसी नौबत न आई थी। लोग आते और ठहर जाते, यह अलग बात थी कि नए नए परिचय की गर्मजोशी धीरे उदासीन सामान्य जान पहचान में बदल जाती। 

उससे जितनी तेजी से बात हुई, उतनी ही बातें बिगड़ गई। तमाम लोग कहा करते थे कि उससे बात करना जैसे रूह को रूमानी अहसास दिलाना सा है। उसे क्या पता था वो तो बस एक बंद दुनिया से निकल कर एक आभासी दुनिया में आई थी। 
बात की शुरुआत, पद से हुई थी, उस लड़की को लड़के के पद ने आकर्षित किया था पर जब बात शुरू हुई तो हर चीज पसंद आने लगी। जल्द ही वो इतने करीब आ गई कि उसे हर वक्त उसका ही ख्याल आने लगा। 

उसका कभी मन न लगता, लड़का अति व्यस्त था, उसके सपने असीम थे, उनको उसे पूरा करना था। लड़की , लड़के की व्यस्तता, उसे अपनी बेरुखी करना लगती थी। इसे में वो परेशान होकर उसे ब्लॉक करती थी। इसके बाद उसकी बेचैनी और बढ़ जाती फिर वो अनब्लॉक करके उसे, उसकी तस्वीरें, उसकी पोस्ट देखा करती थी। 
तो बात का अंत समय न देने से हुआ और एक रोज वो हमेशा से खुद को ब्लॉक करके हमेशा के लिए चली गई, लड़का अपने असीम सपनों को पूरा करने की जद्दोजहद में खो गया। 

© आशीष कुमार, उन्नाव।
20.12.2025 

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