गुरुवार, 13 अगस्त 2026

TEA and Maska Bun

 

चाय और मस्का बन 

आशीष कुमार

तमाम बार कुछ विषयों पर लिखते हुए ऐसा लगता है , इस पर लिख चुका हूँ। पीछे पलटकर देखने की आदत न है इसलिए चेक भी न करता हूँ।  पर फिर सोचता हूँ कि अगर लिखा भी होगा तो क्या हुआ , इस बार कुछ नया होगा। 

जितना मुझे याद आता है , मस्का बन से पहला परिचय , इलाहाबाद में हुआ था। एक टाइप टेस्ट देने गया था। अरविन्द ( कमांडेंट , SSB ) के पास हॉस्टल में रुका था। सुबह पास के चौराहे पर चाय पीने गए , वही पहली बार मस्का बन खाया। काफी बड़ा था। चाय खत्म हो गयी वो न खत्म हुआ। फिर तमाम जगहों पर खाया और चाय के साथ खाने के लिए मेरी पसंदीदा चीजों में वो एक है।  

कई बार चाय को देश का राष्ट्रीय पेय पदार्थ कहते है। पिछले दिनों , लखनऊ में शर्मा जी चाय पर जाना हुआ। मस्का बन , समोसा और कुल्हड़ वाली चाय। काफी दिनों बाद , अच्छी चाय पी। 



अहमदाबाद के दिनों में भी कुछ चाय की टपरी फेमस थी। एक सरखेज गाँधी नगर हाईवे पर खेतला आपा की चाय , दूसरा स्पीपा के बाहर वाली टपरी , तीसरा शुभ लाइब्रेरी के पास वाली कड़क चाय। खेतला आपा  वाली चाय बहुत विशाल मात्रा में बनती थी। हमेशा लाइन लगी रहती थी। पूरी पूरी रात वहाँ भीड़ रहती। 



स्पीपा के पास वाली चाय पर सिविल सेवा की तैयारी कर रहे लोगो की भीड़ रहती थी। मेरा उधर कभी-कभी ही जाना होता था। देखा जाए तो शुभ लाइब्रेरी वाली चाय मैंने सबसे ज्यादा पी होगी। बहुत कड़क चाय होती थी। चाय बनाने वाला , घंटो चाय में चमचा डाल कर उसे घोटता रहता।  घंटो असर रहता था उसका। दोपहर में एक गिलास चाय , देर शाम तक दिमाग को एक्टिव रखती थी। 

मुझे अब याद आया , उन्नाव के दिनों में बहुत ज्यादा चाय पीता था। उन दिनों , लोगों के घर जाकर टूशन पढ़ाने का काम था। लगभग हर जगह चाय दी जाती थी। उस चाय के सहारे , 5 से 6  घंटे , सायकल से एक घर से दूसरे घर जाना होता था। कई बार चाय और नाश्ता इतना ज्यादा हो जाता था कि घर आकर खाना बनाने और खाने का मन न होता था।  आज पीछे पलट के देखता हूँ तो खुद को ही यकीन न होता है कि वैसे भी दिन थे क्या ?

" हमने जो गुजारी है , 

तुम पर गुजरती तो 

तुम गुजर ही जाते " 


 तो चाय पीने का कोटा , कई साल पहले ही पूरा हो चुका था। अब एक चाय भी भारी लगती है , पेट में एसिड सा बनने लगता है।  इसलिए इन दिनों , कॉफ़ी पसंद आती है. सुबह-सुबह खुद से बीन्स ग्राइंड करके , खुद से  ब्लैक कॉफ़ी पीना एक आदत बन चुकी है।

© आशीष कुमार, उन्नाव। 

13 अगस्त , 2026 .  










मंगलवार, 11 अगस्त 2026

7 YEARS IN AHMEDABAD



7 साल अहमदाबाद में (०१) 


जनवरी 2012 की एक रात मैंने जब साबरमती ट्रेन अहमदाबाद के लिए पकड़ी थी तो मैं पूरी तरह से निश्चित था कि बस कुछ महीने की जॉब है , जल्द ही नई नौकरी मिलेगी और मैं अहमदाबाद छोड़ दूँगा। वो  समय मेरे जीवन कुछ ऐसा समय था जब मुझे हर साल नई नौकरी मिल रही थी। एक नौकरी ज्वाइन करता तो अगली बड़ी नौकरी का रिजल्ट आ चूका होता। मैं सेंट्रल एक्साइज एंड कस्टम विभाग में इंस्पेक्टर बन चूका था। सिविल सेवा 2011 की मुख्य परीक्षा  अच्छी गयी थी और मैं उम्मीद कर रहा था कि जल्द ही परीक्षा पास कर लूँगा।  

कुछ महीने बाद इंटरव्यू कॉल भी आ गयी। अब उम्मीद बढ़ गयी थी।  मेरी वर्तमान जॉब बढ़िया थी , शहर बढ़िया था पर मन संतुष्ट न था। मैंने UPSC को कम करके आँका था। इंटरव्यू तो फेल हुआ ही , अगले साल का PRE एग्जाम भी फेल हो गया। मुझे ठीक से याद है वो जुलाई 2012  के आखिरी दिन थे। जिस दिन PRE का रिजल्ट आया , बहुत बड़ा सदमा लगा कि अब इस अजनबी शहर में रहना पड़ेगा। 

उन दिनों मैं मेम नगर एरिया में रहता था। उसी दिन शाम को हिमालया मॉल गया और क्रोमा स्टोर  से एक लैपटॉप खरीदा। उसके बाद दिसंबर 2012  तक जी भर कर फिल्में देखी। टोरेंट का दौर था। हिंदी , अंग्रेजी फिल्मों के साथ चीनी ,कोरियन , जापानी फिल्में देखता गया। मन में यह था कि इतना फिल्में देखो कि उनसे ऊब जाओ। क्या दिन , क्या रात , फिल्में चलती रही और समय गुजरता रहा।

जीवन  के साथ प्रयोग करने की पुरानी आदत थी । इससे पहले के दौर में फिल्मों की तरह नॉवेल , कथा कहानी का पढ़ने का जूनून सवार हुआ था। दिन / रात , महीने साल केवल एक ही काम पढ़ना। हिंदी , बंगाली , मलयालम , मराठी , कन्नड़ , रुसी मतलब अनुवाद में जो मिले बस पढ़ जाओ।  पहले इन चीजों का जिक्र किया करता था कि इतने नावेल पढ़ चूका हूँ पर अब लगता है कि उनका का कोई मतलब नहीं। मैंने जो भी नावेल पढ़े थे वो केवल मनोरंजन की दृष्टि से पढ़े थे। अगर आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ता तो शायद कुछ और ही व्यक्तित्व होता। 


अहमदाबाद मेरे लिए अजनबी जगह थी। उन दिनों मुझे इस शहर में सबसे ज्यादा जो चीज हैरान करती थी वो यह कि इस शहर में साइकिल से चलने वाले लोग न के बराबर है। सड़कों पर दो पहिया से ज्यादा चार पहिया वाले वाहन थे। घर कम थे , फ्लैट अधिक। शहर में समृद्धि हर तरफ देखी जा सकती थी। मैं उत्तर प्रदेश के एक सामान्य जिले से लम्बा ग्रामीण जीवन जीकर आया था। इसलिए शहर के साथ ताल मेल जल्द न बैठा सका। 

हम जहाँ रहते थे वहाँ से कुछ दुरी पर ही अहमदाबाद का सुप्रसिद्ध ड्राइव इन सिनेमा था। प्रायः मैं, मनोज श्रीवास्तव के साथ टहलते हुए फिल्म देखने चले जाते। मनोज श्रीवास्तव हमारे जिले उन्नाव से ही थे। हम पहले से परिचित थे और यहाँ पर भी एक ही विभाग में सहकर्मी थे। इसके चलते ज्यादा अहमदाबाद के शुरुआती साल ज्यादा कठिन न लगे।  

जहाँ मैं रहता था वहाँ से ऑफिस 2 किलोमीटर दूर था। दोनों ही साल मैं पैदल ही ऑफिस आता जाता रहा। इस समय मैं फील्ड में जॉब कर रहा था। मेरा काफी लोगों से मिलना होता , अक्सर मुझे लोग कहते कि " फिर मिलेंगे" मैं उन्हें हाँ भी करता पर मैं जानता था कि मैं उनसे कभी नहीं मिलूंगा।

कुछ दिन तक हमने बाहर होटल में खाना खाया। अहमदाबाद में मुझे एक और अनोखी चीज लगी। यहाँ पर अनलिमिटेड थाली का चलन खूब था। हर बजट के लिए थाली। 50 रूपये से लेकर 100 रूपये वाली। उन्हीं दिनों एक होटल पर  हार्दिक थककर से मुलाकात हुयी। दरअसल मैं और मनोज खाने के बाद कुछ upsc पर बात कर रहे थे। उन बातों को सुनकर हार्दिक ने हमसे बात की पहल की। हार्दिक से लम्बी और गहरी दोस्ती हुयी। उनसे जुडी इतनी बातें है कि उन पर अलग से पोस्ट लिखी जा सकती है। लिखूंगा कभी। इन दिनों वो इसरो में क्लास वन अधिकारी है। उनकी कहानी भी बड़ी मोटिवेशनल है।


बाद में मैंने अपने रूम में खाना बनाने लगे। मैं और मनोज दोनों ही खाना बनांने में कुशल थे। होटल में अधिक दिन खाना सेहत के लिहाज से अच्छा न था। उसी साल कुंदन कुमार से भी परिचय हुआ। वो हमारे विभाग में ही थे और हमसे सीनियर थे। उस साल मैं pre फेल हुआ था और उनका पहली बार मैन्स देने का अवसर था। यह भी अजीब बात है कि हम पहली बार मुखर्जी नगर के एक रूम में मिले। वो दिल्ली में कोचिंग के लिए थे और संयोग से मैं भी किसी काम से दिल्ली गया था।


 इसके बाद मुझे अपने ऑफिस के मुख्यालय में पोस्ट दी गयी। यह ऑफिस , मेरे रूम से लगभग 5 किलोमीटर दूर था। इतनी दूर पैदल जाना संभव न था। काफी दिनों से एक अच्छी साइकिल लेने का मन था। जल्द ही एक गियर वाली काफी महॅगी साइकिल खरीद ली। रेड कलर की साइकिल से घूमने में खूब मजा आता था। कुछ दिन ऑफिस उससे गया। जल्द ही मुझे अहसास हुआ कि इससे इज्जत की बाट लग जाएगी। जिस ऑफिस में बहुतायत लोग कार से आते थे और कुछ लोग मोटर साइकिल से आते थे वहां पर साइकिल से जाना मुझे अजीब लगने लगा। कभी कभी सोचता कि अगर कोई कुछ कहेगा तो बोल दूंगा कि मेरे एक महीने की सैलरी से बाइक मिल जाएगी पर जल्द ही मुझे बाइक लेनी पड़ी।

बाइक लेने का सबसे प्रमुख कारण , अहमदाबाद का ट्रैफिक था। दूसरा साइकिल बहुत नाजुक थी। अक्सर उसमें कुछ न कुछ  बिगड़ने भी लगा था। साइकिल के दिनों सबसे ज्यादा फ़ायदा मुझे अपनी बेली पर दिखा। उतना फ्लैट कभी नहीं रहा। मुझे आज भी लगता है कि फिटनेस के लिए साइकिल से बेहतर कोई चीज नहीं।

© आशीष कुमार , उन्नाव , उत्तर प्रदेश। 







































हरे पत्थर वाली अँगूठी

कविता : -हरे पत्थर वाली अँगूठी 

    उसके संघर्ष के 
दिनों में
किसी ने दी थी 
 एक चांदी 
की अँगूठी 
जिसमें जड़ा था
हरा पत्थर,

पत्थर सौभाग्य का
व अंगूठी उनके
मूक प्रेम का प्रतीक
थी, जिसे उसने
पहना बड़े चाव से
कुछ दिनों या 
फिर कुछ
महीनों तक

फिर उसने 
अंगूठी को सम्भालकर
रख दिया,
उस डिब्बे में
जहाँ वो रखता था
अपनी सबसे कीमती चीजें

जीवन अपनी
गति से चला
वो उससे तेज चला
इस कदर की तेजी
कि सब पीछे छोड़ते हुए
उसे पहुँचना था आसमान

हरे पत्थर  वाली अंगूठी 
जोकि मौन प्रेम व
सौभाग्य की प्रतीक थी
उसे खूब फली,
उसे दी नित नई
उचाईयां।

आसमान की ऊचाइयों
से उसे एक दिन
जब उसे अपना
संघर्ष भरा अतीत
याद आया तो
उसने पाया कि


इस सुहाने सफर
में वो अँगूठी
जाने कब कहाँ
खो गयी,
ठीक उनके मूक
प्रेम की तरह ।

©आशीष कुमार, उन्नाव।
19 मई 2021।

रेशमी बाल

कविता : रेशमी बाल

प्रिय तुम्हारे चमकते 
रेशम जैसे बाल,
छितरे रहते ज्यों
आकाश में
घने काले बादल ।

बड़ा सुखद लगता है
उनमें अगुलियां फेरना,
लेना उनकी खुसबू
खूब गहरे, भीतर तक।

प्रिय जब जब तुम
मेरे करीब होती हो,
अक्सर उलझ जाते हैं
मेरे हाथ, अगुलियां।

प्रिय जब तुम विदा लेती हो
छूट जाते है अक्सर
कुछ एक बाल, मेरे साथ
जो हर वक़्त याद दिलाते हैं
कि तुम मेरे साथ हमेशा हो
अटूट, अभिन्न, अविभाज्य।

14 जनवरी, 2020
©आशीष कुमार, उन्नाव।




सोमवार, 10 अगस्त 2026

Share Market

 

शेयर मार्केट - एक कथा 

- आशीष कुमार ,

    पिछले दिनों की बात है , एक मित्र के साथ नगरपालिका मार्किट , कनाट पैलेस में कुछ खाने गए थे। एंट्री गेट पर गार्ड , भले  मेरी तलाशी ले रहा था, पर उसकी नजर मोबाइल की स्क्रीन पर थी। शेयरमार्किट के चार्ट पर उसकी नजर थी। मैंने अपने साथी से कहा देखा, इसे। मेरे दिमाग में चलने लगा कि इसकी कितनी सैलरी होगी और इसका कितना बड़ा पोर्टफोलियो होगा। 

    दूसरा वाकया और भी बढ़िया है , जहाँ मैं बाल कटाने जाता हूँ , उसके मालिक/कारीगर की बात। वैसे तो वहाँ एक दर्जन कारीगर होंगे पर मेरे बाल वही काटता है। उसी दौरान शेयर मार्केट की बात होती है। मुझे उसकी बातें बड़ी हैरान करती है। पहला कि वो विदेशी बाजार ( अमेरिकी ) में इन्वेस्ट करता है , उसकी वजह डालर और रुपए के अंतर् को बताता है। वो टेस्ला की बात करेगा , एलन मस्क की बात करेगा। 



ऐसी वैसी बातें भी नहीं , काफी गहन और शोधपरक। इतनी गहरी कि मुझे कुछ देर हाँ हूँ करने के बाद , उसकी बस बातें सुननी होती है। एक दिन कहने लगा , मस्क की कम्पनी  एम्प्लोयी पर कैपिटल में सबसे अच्छी है , मै हैरान था कि ये बाल काटने वाला है या कोई नामी गिरामी इन्वेस्टर। फिर उसने tcs जैसी कंपनी से तुलना करके बताया कि ये एम्प्लॉय और ग्रॉस कैपिटल का रेश्यो क्या होता है। मस्क की वो ब्रेन वाली कम्पनी का भी काफी ज्ञान दिया। उसके बारे में पढ़ा जरूर है पर जिसका नाम मैं बार बार भूल जाता हूँ। 

some poems by me

फिर एक दिन मैंने उसका पोर्टफोलियो देख लिया, 70 लाख की वैल्यू का पोर्टफोलियो। २०१४  से सीमित ही सही पर शेयर मार्किट में ध्यान देने लगे  हैं पर इतनी बड़ी वैल्यू का पोर्टफोलियो , मैंने सामने  से तो किसी का  न देखा। इसके बावजूद वो मेरे बाल काटने में लगा था. उसका इंडियन शेयर मार्किट में इंट्रेस्ट जरा कम रहता है पर उसे इधर के तमाम नामी गिरामी शेयर के नाम , दाम सब मुँह जुबानी याद रहते है।  

शेयर मार्किट में ने न जाने कितने लोगो को बनाया है और कितने ही इसमें बर्बाद हुए है। मेरी इसमें सीमित समझ के आधार पर यह कह सकते है कि इसमें अंत में वही लोग बचे रहे हैं जो ट्रेडिंग और ऑप्शन ट्रेडिंग से दूर रहते है। लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट को छोड़ दे तो शेयर मार्किट  पूरी तरह से तुक्केबाजी है। 

check some stories

© आशीष कुमार , उन्नाव। 

10 अगस्त , 2026 









गुरुवार, 30 जुलाई 2026

ओल की सब्जी

 संस्मरण :- ओल की सब्जी 

आशीष कुमार

    वैसे मेरे घर में इसे सूरन के नाम से जानते थे और कभी कभी त्यौहार में इसकी सूखी सब्जी बनती थी. इसे  पूरी के साथ खाया जाता था. मुझे कभी विशेष अच्छी न लगी। इसका एक नाम ओल भी होता है यह मुझे बहुत समय के बाद पता चला। 

लखनऊ के एक सरकारी हॉस्टल में , मेरे कुछ बढ़िया मित्र बने। शिवेंद्र , इंदरजीत राणा , अरविन्द , सूर्यप्रकाश से बढ़िया दोस्ती हुयी। सबसे अच्छी बात सारे ही, एक एक करके सरकारी नौकरी में सेलेक्ट हो गए।  वो इलहाबाद में रहा करते थे। उनके सम्पर्क में आने के बाद , इलहाबाद की दुनिया पता चली। वहाँ कभी रहा नहीं पर मुझे वो अच्छा लगने लगा। मै 4 .. 5 महीने में वहां किताबें लेने के बहाने और कुछ एग्जाम के चलते वहां आना जाना शुरू किया। 

यह 20 साल पुरानी बात होगी। एक मित्र से बातचीत हुयी और शाम को उनके पास पहुँचा। एक अच्छे मित्र की तरह वो बाहर गली में लेने आये। इलहाबाद की तमाम यादों में , यह विशेष याद आता है कि सभी को मित्र की आवभगत करने पर बड़ा जोर रहता था। ये मित्र गोरखपुर के थे। शिवेंद्र भाई  आज भी सम्पर्क में है। कुछ संघर्ष के बाद सीपीओ एग्जाम से केंद्रीय बल में दरोगा हुए , फिर बाद में उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा हो गए।   

शाम को शिवेंद्र भाई ने पूछा कि क्या खाओगे मेरे जबाब था कुछ भी।  पहले पनीर की बात हुयी फिर वही बोले पनीर तो बड़ा कॉमन हो गया है। आज आपको ओल की सब्जी खिलाते है। मैं जीवन में पहली बार ओल का नाम सुन रहा था और जैसा कि मै खाने में बड़ा चूजी रहा  हूँ , अगर पसंद ना आये तो थाली में खाना छोड़ देने की बड़ी बुरी आदत थी। 

जब सब्जी के ठेले पर ओल लेने गए और वहाँ सुरन देखा तो मैं मुस्कुराया कि यह तो सुरन है। खैर , सब्जी आयी और बननी शुरू हुयी। मुझे पता था कि ये कैसी सब्जी बनेगी और इसको लेकर कोई खास उत्साह न था। मैं बगल के रूम में और साथी मित्रों से गप्पे लड़ाने में व्यस्त था। 

सब्जी जब बनकर तैयार हुयी तो क्या बेहतरीन खुसबू आ रही थी। सबसे हैरान तब हुआ , जब इसे मैंने रसेदार रूप में देखा। पनीर की तरह टुकड़े , फ्राई करके डाले गए थे। बाकि स्टूडेंट लाइफ मे लड़को से बेहतर ग्रेवी कौन ही बना सकता है। मिक्सी न थी पर ढेर सारा प्याज को कूकर में ही गलाकर , उसमें खड़े मसाले गिलास में कूट के डाले गए थे।  बहुत ही  बढ़िया खुसबूदार , गाढ़ी  ग्रेवी बनी थी। 

उस शाम मैंने एक नए स्वाद को जाना। वहां से लौटकर जब घर में माँ से इसे बनाने को बोला तो वो भी हैरान थी। मेरे घर में सालों से इसे सूखी सब्जी के रूप में बनाया जा रहा था , रसेदार रूप में पन्नीर की तरह से फ्राई करके, जब यह बना तो फिर सुखी सब्जी के रूप में हमेशा के लिए बनना बंद हो गया।  मैं ओल की रसेदार सब्जी से इतना प्रभावित हुआ कि आगे के सालों में इसका गुणगान , हर किसी करीबी से करता रहा। दर्जनों घरों में , इसको रसेदार रूप में बनवाने के पीछे मेरा हाथ रहा। दरअसल मेरे उन्नाव की तरफ इसे त्यौहार की सब्जी के रूप  में जाना जाता था।  आज भी पनीर की तुलना में यह मुझे ज्यादा पसंद है। अब तो  इसे व्यसायिक खेती करवाने का भी प्लान बना रहा हूँ।   

 © आशीष कुमार , उन्नाव 

31 जुलाई , 2026 .










      










सोमवार, 20 जुलाई 2026

बेबसी

लघुकविता : बेबसी 

 प्रिय तुम जानती भी हो,या नहीं,
कि मैं बेबस सा हूँ,दिल से मजबूर हूँ
तुम्हारे लिए ,तुम्हारे एकनिष्ठ  प्रेम में।

चाहता हूँ कि, तुम भी चाहो मुझे
 उसी शिद्दत व बेकरारी से
देखो उन्हीं तीखी, गहरी नजरों से
जिनसे मैं तुम्हे देखा करता हूँ 
अक्सर अपनी मुलाक़ातों में ।


© आशीष कुमार, उन्नाव ।
5 फरवरी, 2020, हैडो, पोर्ट ब्लेयर।

अवैध ठेला

लघुकथा : अवैध ठेला 

    शाम 4 बजे से रात 9 तक तमाम ग्राहकों की  हाय किचकिच के बाद जब उसने अपने बोरे के नीचे से रूपये निकाल कर गिने। यही वो पल होते है जब वो अपनी कमर सीधी करता है और लाभ की खुशी उसके चेहरे से झलकती है। आज 2000 की सब्जी , बड़े बाजार से लाया था और कम से कम 700 रूपये का लाभ होने की सोच रहा था। सरसरी तौर पर उसने नोटों को गिना केवल 1900 रूपये। उसने कुछ हैरान होते फिर गिना 1900 रूपये ही थे। सारी सब्जी बेचने के बाद भी बस 1900 रूपये। ऐसा कैसे ? उसे कुछ याद आया 7 बजे दो सिपाही आये थे 100 रूपये की सब्जी ले गए थे। उनसे पैसे लेने का कोई तुक नहीं। एक बार उसने माँगने की कोशिश की थी तब सिपाही ने बताया कि उनकी पगार बड़ी ही कम है अब जब पगार कम है तो भला उनसे कैसे रूपये मांगे । 




    अगले घंटे नगरपालिका से कोई आकर धमका रहा था कि अवैध जगह पर ठेला क्यों लगा रखा है , देखते नहीं इससे कितनी तकलीफ होती है। 500 रूपये लेकर नगरपालिका को उसके ठेले से  कोई शिकायत नहीं थी। रात 10 बजे घर पहुंचा तो उसके मन में भूख न थी। भूखे पेट वो सोच रहा था कि यह धंधा अब उसके बस का नहीं है।  

© आशीष कुमार , उन्नाव।   
20 JULY, 2026.


गुरुवार, 16 जुलाई 2026

Tell No one by Harlan Coben


"Tell No One"


           किताबें पढ़ना हमेशा से मेरा पसंदीदा शौक रहा है। बचपन से ही जब भी समय मिलता, किसी न किसी किताब के साथ बैठ जाता था। पढ़ते-पढ़ते कब समय निकल जाता, इसका एहसास भी नहीं होता था। लेकिन नौकरी की व्यस्तताओं और जीवन की भागदौड़ में यह आदत कहीं पीछे छूट गई। काफी समय बाद मैं फिर से एक पूरी अंग्रेज़ी किताब पढ़ने जा रहा हूँ। इसलिए Harlan Coben की Tell No One मेरे लिए सिर्फ एक उपन्यास नहीं, बल्कि अपनी पुरानी पढ़ने की आदत को फिर से जीवित करने की एक नई शुरुआत है।इसी सोच के साथ मैंने Harlan Coben का उपन्यास "Tell No One" मंगाया है।



    Harlan Coben का नाम मेरे लिए नया नहीं था। Netflix पर उनकी कुछ वेब सीरीज़ देखने का मौका मिला था। उनकी कहानियों की सबसे बड़ी खासियत मुझे यही लगी कि वे शुरुआत से ही आपको अपने साथ बाँध लेती हैं। हर एपिसोड के बाद मन में एक ही सवाल आता था—"आखिर आगे क्या होगा?" शायद यही वजह रही कि मैंने तय किया कि अब उनकी कहानी को स्क्रीन पर नहीं, किताब के पन्नों पर महसूस किया जाए।



"Tell No One" की कहानी भी पहली नज़र में बेहद रोचक लगी। एक पति, जिसकी पत्नी की हत्या हो चुकी है, आठ साल बाद अचानक ऐसे संकेत पाता है जो उसकी पूरी दुनिया बदल देते हैं। क्या उसकी पत्नी सचमुच मर चुकी है? अगर हाँ, तो ये संदेश कौन भेज रहा है? और अगर नहीं, तो इतने सालों तक वह कहाँ थी? बस यही रहस्य इस किताब को पढ़ने के लिए काफी है।

लेकिन मेरे लिए यह किताब सिर्फ एक थ्रिलर नहीं है।यह मेरी नई पढ़ने की आदत की शुरुआत है।

मुझे हमेशा लगता है कि एक लेखक जितना लिखता है, उससे कहीं ज़्यादा उसे पढ़ना चाहिए। लिखने के लिए शब्द तो मिल जाते हैं, लेकिन विचार, दृष्टिकोण और कहानी कहने का तरीका पढ़ने से ही विकसित होता है। मैं हिंदी में लिखता हूँ, लेकिन अब चाहता हूँ कि दुनिया के अच्छे लेखकों को भी पढ़ूँ। शायद उनकी शैली से कुछ सीख सकूँ, शायद अपने लेखन को थोड़ा और बेहतर बना सकूँ।

आज जब अधिकांश लोग मोबाइल स्क्रीन पर कुछ सेकंड की रील देखकर आगे बढ़ जाते हैं, तब किताब के साथ कुछ घंटे बिताना अपने आप में एक अलग अनुभव है। किताब आपको जल्दी नहीं करती। वह आपको रुकना, सोचना और कहानी के साथ जीना सिखाती है।

मुझे नहीं पता कि "Tell No One" पढ़ने के बाद यह मेरी सबसे पसंदीदा किताब बनेगी या नहीं, लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि यह किताब मुझे फिर से पढ़ने की दुनिया में ले जाने वाली पहली सीढ़ी है।

उम्मीद है कि इस एक किताब के बाद मेरी अलमारी में Harlan Coben की और भी किताबें होंगी, और उनके साथ-साथ दूसरे लेखकों की भी। क्योंकि अब महसूस होने लगा है कि अच्छी किताबें सिर्फ समय नहीं बितातीं, वे इंसान को भीतर से थोड़ा बेहतर भी बना देती हैं।

मैं चाहता हूँ कि आने वाले समय में मेरी पहचान सिर्फ एक लेखक के रूप में नहीं, बल्कि एक अच्छे पाठक के रूप में भी बने। शायद हर अच्छा लेखक बनने से पहले एक अच्छा पाठक बनना ज़रूरी होता है।

© आशीष कुमार, उन्नाव

17 july , 2026. 

Bin fere ki mohabt



कविता :- बिन फेरे की मोहब्बत 

-आशीष कुमार 



इस कदर वो मोहब्बत करने लगी थी वो
बिन फेरे के ही व्रत रखने लगी थी वो,
दुनिया से सामने न सही, छुपाकर ही सही
मेहंदी में मेरा नाम, रचने लगी थी वो।



उसकी मोहब्बत की इंतिहा तो देखिए
पाने की जरा भी उम्मीद न थी फिर भी
टूटकर बेतहाशा चाहने लगी थी वो।।

© आशीष कुमार, उन्नाव।
20 जून, 2021.

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