गुरुवार, 16 जुलाई 2026

Tell No one by Harlan Coben


"Tell No One"


           किताबें पढ़ना हमेशा से मेरा पसंदीदा शौक रहा है। बचपन से ही जब भी समय मिलता, किसी न किसी किताब के साथ बैठ जाता था। पढ़ते-पढ़ते कब समय निकल जाता, इसका एहसास भी नहीं होता था। लेकिन नौकरी की व्यस्तताओं और जीवन की भागदौड़ में यह आदत कहीं पीछे छूट गई। काफी समय बाद मैं फिर से एक पूरी अंग्रेज़ी किताब पढ़ने जा रहा हूँ। इसलिए Harlan Coben की Tell No One मेरे लिए सिर्फ एक उपन्यास नहीं, बल्कि अपनी पुरानी पढ़ने की आदत को फिर से जीवित करने की एक नई शुरुआत है।इसी सोच के साथ मैंने Harlan Coben का उपन्यास "Tell No One" मंगाया है।



    Harlan Coben का नाम मेरे लिए नया नहीं था। Netflix पर उनकी कुछ वेब सीरीज़ देखने का मौका मिला था। उनकी कहानियों की सबसे बड़ी खासियत मुझे यही लगी कि वे शुरुआत से ही आपको अपने साथ बाँध लेती हैं। हर एपिसोड के बाद मन में एक ही सवाल आता था—"आखिर आगे क्या होगा?" शायद यही वजह रही कि मैंने तय किया कि अब उनकी कहानी को स्क्रीन पर नहीं, किताब के पन्नों पर महसूस किया जाए।



"Tell No One" की कहानी भी पहली नज़र में बेहद रोचक लगी। एक पति, जिसकी पत्नी की हत्या हो चुकी है, आठ साल बाद अचानक ऐसे संकेत पाता है जो उसकी पूरी दुनिया बदल देते हैं। क्या उसकी पत्नी सचमुच मर चुकी है? अगर हाँ, तो ये संदेश कौन भेज रहा है? और अगर नहीं, तो इतने सालों तक वह कहाँ थी? बस यही रहस्य इस किताब को पढ़ने के लिए काफी है।

लेकिन मेरे लिए यह किताब सिर्फ एक थ्रिलर नहीं है।यह मेरी नई पढ़ने की आदत की शुरुआत है।

मुझे हमेशा लगता है कि एक लेखक जितना लिखता है, उससे कहीं ज़्यादा उसे पढ़ना चाहिए। लिखने के लिए शब्द तो मिल जाते हैं, लेकिन विचार, दृष्टिकोण और कहानी कहने का तरीका पढ़ने से ही विकसित होता है। मैं हिंदी में लिखता हूँ, लेकिन अब चाहता हूँ कि दुनिया के अच्छे लेखकों को भी पढ़ूँ। शायद उनकी शैली से कुछ सीख सकूँ, शायद अपने लेखन को थोड़ा और बेहतर बना सकूँ।

आज जब अधिकांश लोग मोबाइल स्क्रीन पर कुछ सेकंड की रील देखकर आगे बढ़ जाते हैं, तब किताब के साथ कुछ घंटे बिताना अपने आप में एक अलग अनुभव है। किताब आपको जल्दी नहीं करती। वह आपको रुकना, सोचना और कहानी के साथ जीना सिखाती है।

मुझे नहीं पता कि "Tell No One" पढ़ने के बाद यह मेरी सबसे पसंदीदा किताब बनेगी या नहीं, लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि यह किताब मुझे फिर से पढ़ने की दुनिया में ले जाने वाली पहली सीढ़ी है।

उम्मीद है कि इस एक किताब के बाद मेरी अलमारी में Harlan Coben की और भी किताबें होंगी, और उनके साथ-साथ दूसरे लेखकों की भी। क्योंकि अब महसूस होने लगा है कि अच्छी किताबें सिर्फ समय नहीं बितातीं, वे इंसान को भीतर से थोड़ा बेहतर भी बना देती हैं।

मैं चाहता हूँ कि आने वाले समय में मेरी पहचान सिर्फ एक लेखक के रूप में नहीं, बल्कि एक अच्छे पाठक के रूप में भी बने। शायद हर अच्छा लेखक बनने से पहले एक अच्छा पाठक बनना ज़रूरी होता है।

© आशीष कुमार, उन्नाव

17 july , 2026. 

Bin fere ki mohabt



कविता :- बिन फेरे की मोहब्बत 

-आशीष कुमार 



इस कदर वो मोहब्बत करने लगी थी वो
बिन फेरे के ही व्रत रखने लगी थी वो,
दुनिया से सामने न सही, छुपाकर ही सही
मेहंदी में मेरा नाम, रचने लगी थी वो।



उसकी मोहब्बत की इंतिहा तो देखिए
पाने की जरा भी उम्मीद न थी फिर भी
टूटकर बेतहाशा चाहने लगी थी वो।।

© आशीष कुमार, उन्नाव।
20 जून, 2021.

बुधवार, 15 जुलाई 2026

काजल

लघुकथा :-  काजल 

आशीष कुमार 

    जीवन में काफी ज्ञानी लोग मिले है , जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा। इस बात का जरा भी घमंड न है। आज जिस मुकाम पर पहुँचा हूँ , उनमें ऐसे लोगो का बड़ा योगदान है।  आज ऐसी  ही एक कहानी याद आ गयी।  

वो काफी होशियार थी , हर काम में तेज। पढ़ने में भी बहुत अच्छी थी। जब स्कूल में पुरुस्कार वितरण होता तो , लगभग सारे उसी को मिलते। 

उसका एक छोटा भाई था। एक शाम की बात है , उसकी माँ ने आवाज दी , शाम हो गयी है। भाई को काजल लगा दो। उन दिनों रात में सोते वक़्त हर कोई काजल लगा के सोता था। अब जमाना कितना बदल गया। अब लोगों ने काजल लगाना ही बंद कर दिया। अब तो डॉक्टर भी मना करने लगे कि बच्चों की आँखे खराब हो जाएँगी।  

खैर , जैसा की मैंने बताया वो लड़की बड़ी तेज थी। उसे काजल की डिब्बी न मिली। वो परेशान न हुयी। उसे पता था कि काजल कैसे बनाया जाता है। उसकी बुध्दि ने उसे तुरंत प्रेरणा दी। सामने किरोसिन वाला दीपक जल रहा था। किसी खाली बोतल का ढक्क्न लिया। उसमें दीपक से उठते हुए धुएँ को इकट्ठा किया। कुछ ही देर में जरूरत भर का  काजल इकट्ठा हो गया। 

उसने गरमागरम काजल , अपने प्रिय छोटे भाई की आंख में लगा दिया। काजल लगते ही भाई को रात में सूरज नजर आ  गया।  वो हिरन की तरह , पुरे घर में भागा। उसकी आँखों में जलन होने लगी। लड़की को उसकी इस  बेवकूफी के लिए उसकी मां ने जमकर क्लास लगाई।  

© आशीष कुमार, उन्नाव। 

15 जुलाई , 2026 .



रविवार, 12 जुलाई 2026

दुविधा

 

लघुकथा :-  दुविधा 

आशीष कुमार

    मेरे सामने पेपर है और मै दुविधा में हूँ। 

    मेरे सामने अतीत है जो बड़ी तेजी से गुजर रहा है।  मेरी परवरिश ऐसी की गयी कि घर से स्कूल और स्कूल से घर। जल्द ही मेरी सरकारी जॉब लग गयी। मेरे जीवन से जुड़े सारे फैसले मैंने पिता जी पर ही छोड़ रखा था। इसलिए शादी के लिए भी जहाँ से रिश्ता आया , वहीं हाँ भी कर दी। 

    शुरू में सब ठीक था , इनकी नौकरी निजी क्षेत्र में थी , अच्छा कमाते थे। नेचर और लुक दोनों अच्छा था। मुझे जीवन में हर चीज अच्छी लगती थी। शादी के कुछ टाइम बाद , बच्चा भी हो गया। मेरी अध्यापक की नौकरी थी। मैं खुद में हर चीज के लिए सक्षम थी। 

मुझे बचपन से आत्मनिर्भर बनाया गया था। मुझे खुद पर बहुत आत्मविश्वास था। मुझे न पता था ,यही आत्मविश्वास मेरे लिए , सबसे बड़ी मुसीबत बन जायेगा। 

हमारी शादी के 7 साल होने को आये. बच्चा बड़ा हो रहा था , इसके साथ साथ इनके पिता की मानसिकता छोटी होती जा रही थी। शादी के समय मेरी जॉब से , इनको बड़ा गर्व हुआ था और अब धीरे धीरे मेरी जॉब , इनको दिक्क्त दे रही थी। 

शुरू में कोई विशेष बात न थी, छोटी मोटी बहस होती थी। पर धीरे धीरे चीजे खराब होने लगी।  कुछ उनका अहं भाव , कुछ नौकरी में इशू , एक मित्र द्वारा साझा व्यापार में धोखा के चलते शराब का सेवन करने लगे। बात यही न रुकी, बहस के साथ साथ अब उनका हाथ भी मुझ पर उठने लगा। 

यह बात किसी से मैं बता न सकती थी। पिता जी से भी कुछ हद की बात साझा की और बताया कि चीजे अब बर्दाश्त से बाहर हो रही है। उनका मानना था कि चीजें धीरे धीरे ठीक हो जाएगी। उनको समझना चाहिए था कि अगर ऐसा होता तो मैं उन तक बात लाती ही न। 

इस बार स्कूल की छुट्टी होते ही अपने पापा घर आ गयी। भले वो , मुझसे दूर थे पर उनके साथ की बहस , बदतमीजी मेरे जेहन से जा न रही थी। एक रोज बगैर किसी से बताये , कोर्ट चली गयी। 

वकील ने पहले समझाने की कोशिस की पर मेरी परेशानी शायद उसे भी समझ आ गयी। मैंने उससे पेपर तैयार करने को बोल दिया। छुट्टी खत्म होने को थी और पेपर भी रेडी हो गए थे।  

पिछले कई महीने रोते हुए ही गुजरे थे , मैंने कितने मौके दिए , बार बार माफ़ किया पर शराबी इंसान की बात का क्या भरोसा। अब जब पेपर रेडी होकर सामने है और मुझे बस हस्ताक्षर करने है , मैं बड़ी दुविधा में हूँ। 

दुविधा , यह कि यह सब मैं अपने बेटे के अच्छे भविष्य के लिए सोच कर रही हूँ पर कहीं वो बड़ा होकर मुझे ही गलत न समझे। दुनिया क्या कहेगी , समाज क्या सोचेगा। बेटा , बगैर पिता के कमजोर न महसूस करे , उसके विकास में किसी तरह की चुनौती तो न आएगी। फिर ये भी लगता है , उनकी गलत आदतें , मेरी साथ बत्तमीजी को भी देखकर भी उसका बचपन सामान्य न रहेगा।  

पीछे मैंने किसी के कहने पर " आपका बंटी " ( मन्नू भंडारी ) भी पढ़ी थी। उसको पढ़कर और भी तमाम प्रश्न उठ खड़े हुए। मेरी दुविधा की वजह शायद मेरी सहज कोमलता है पर अब मै और किसी और के बनाये नियम , उसूलों को न मानूंगी। जो विद्रोह मुझे काफी समय पहले कर देना चाहिए था , अब उसमे देरी करना उचित न होगा।  

मैंने एक बार फिर से उन पेपर्स को पढ़ा और उन पर अपने हस्ताक्षर कर दिए।  


©  आशीष कुमार , उन्नाव।  

12 जुलाई , 2026  





  







मंगलवार, 7 जुलाई 2026

Marks

 

लघुकथा :- निशान 

- आशीष कुमार 

    वो किसी काम से अपने घर आयी थी। वापसी में वो पति के साथ जाना चाहती थी। उसका पति शहर से काम के बाद लौट रहा था। वैसे वो जब अपने घर आयी तो अपने प्रेमी से भी मिली थी , जिसे वो शादी के पहले से जानती थी। उसका प्रेम बहुत गहरा था , जो शादी के बाद भी न टूटा। चीजें साथ-साथ चल रही थी। वो दोहरी भूमिका निभा रही थी।  

    पति ने पहले टालमटोल किया, पर बाद में राजी हो गया। दोनों साथ-साथ घर गए।  उसकी नजरों में , पति बहुत सीधा था पर उसकी बातों में तमाम रहस्य छुपे थे। वो अपने पति पर शक करती थी, पर मजे-मजे में। पर उस दिन , शाम को जब पति के पीठ पर निशान देखे तो वो हैरान थी , एक पल को वो समझ न पायी कि पीठ पर इतने गहरे और लाल निशान कैसे बन गए ? जब उसने अपने पति को टोका तो वो टाल गया। 



    वो मासूम थी , उसे संदेह था पर पक्का यकीन न था। उसने तमाम जतन किए, पर उसको कोई पक्का न हो पाया कि निशान कैसे थे। पति ने कहा , मुझे न पता क्या है , बाद में बोला कि मेरे ही हाथ  लग गए होंगे। उसे फिर भी यकीन न हुआ. उसने  पति से उसके हाथो से पीठ पर निशान बनवा के देखे , खुद से करके देखा और अंत में पाया कि पति ही सही बोल रहा है , निशान खुद के हाथ से  बन गए होंगे। 

    उसका मन शांत होकर भी शांत न था। उसको अपने प्रेमी से सारी बातें करनी होती थी। उसने " निशान " के बारे में भी अपने प्रेमी से पूछा - 

" ये पक्का प्रेम के निशान है , उसका जरूर कोई लफड़ा चल रहा है " प्रेमी ने मुस्कुराते हुए जबाब दिया। 

" तुम इतना यकीन के साथ कैसे कह सकते हो ?" वो जरा चिंता के स्वर में बोली। उसका दिल , अपने देवता जैसे पति पर संदेह न करना चाह रहा था। उसने निशान की फोटो व्हाट्सऐप पर भेजी। 

" अरे ये पक्का वही है , मैं जानता हूँ। मैं तो ये भी जानता हूँ लड़की पक्का दुबली पतली होगी , जिसके नाख़ून बड़े होंगे " प्रेमी ने ऐसे बताया जैसे कि उसका खुद का कोई  पूर्व अनुभव हो। 

(Inspired by " Harlan Coben " , as I recently saw many series based on his books. Mystery lovers can search on Netflix by " Harlan Coben Collection " ) 

© आशीष कुमार , उन्नाव 

7 जुलाई , 2026 

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

Kutch's Mango

कच्छ के आम 

    आपका भी ज्यादातर अनुभव यही होगा कि लोग काम के वक़्त ही याद करते हैं। वैसे आजकल लोग खुद में इतने बिजी हैं कि वो आपको याद ही नहीं करते  हैं। ऐसे में सौभाग्यवश मेरे मित्रता सूची में तमाम लोग ऐसे भी हैं  जो खुद से  याद करते है वो भी हमारे लिए, हमारे भले के लिए। यह उनका प्रेम है , आज उनमें से एक की कहानी।  

    अहमदाबाद की एक लाइब्रेरी में उससे संपर्क हुआ था। बेहद स्मार्ट , खूबसूरत , उजला रंग , मीठी बोली। कभी ktm बाइक से , कभी सफेद नई  फॉर्च्यूनर से। ये उन दिनों की बात है जब अपने पास 100 CC  की बजाज डिस्कवर हुआ करती थी। सोचो उन दिनों , कितने प्रभावित करते  रहे होंगे ऐसे लोग। एक और साथी इनोवा से आता था। बाद में दोनों ही अपने मित्र बन गए। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सफलता मिलने से पहले वाले साथी थे।  

    आज पहले साथी की बात। उसने बस तैयारी शुरू ही की थी। मैं  लंबे समय से तैयारी करके काफी पक चूका था। PRE और मेंस पास होना मेरे लिए कोई बड़ी और नई बात न थी। उसके लिए यह काफी मायने रखता था। एक दो बार उसी ने मेरा PRE  रिजल्ट देखा था। खैर उसी शुभ लाइब्रेरी से मेरा upsc में अंतिम  चयन हुआ। लाइब्रेरी के केयरटेकर ने अगले दिन पेपर  में प्रकाशित मेरे से जुडी कटिंग को नोटिसबोर्ड में चिपका दिया।  

    अब मुझे ठीक से याद नहीं कि वो दिल्ली किस साल आया , पर वो भी आ गया। राजेंद्रनगर में , एक दो बार उसके रूम जाना हुआ। उसका भी एक दो बार ऑफिस आना हुआ , एक दो बार घर भी। वो कच्छ , गुजरात एरिया से था। अब कच्छ का जिक्र हुआ है तो बताऊँ , मेरी अब तक घूमी गई जगहों में सबसे बेहतरीन जगह है। उस यात्रा से पहली बार फेसबुक में पोस्ट लिखनी शुरू हुयी थी। 



    तो जब से हर्ष भाई दिल्ली आए , वो लगातार अपने कच्छ की विशेष मिठाई और आम भिजवाते रहे। पूरे साल शायद ही बात हो , मुलाकात हो, पर आम और मिठाई जरूर आती रही। आम और मिठाई , दोनों ही मुझे विशेष रूप से पसंद है। कच्छ वाले आम , अपने मलिहाबाद वाली दसहरी के ठीक पहले आते हैं। स्वाद में बढ़िया , रसीले , गूदेदार , पतले छिलके वाले। अब तो ऐसा हो गया है कि फोन उसका आने पर , मेरा पहला शब्द यही होता ' आम भिजवाने हैं , या मिठाई।  इस साल हर्ष भाई की शादी हो गयी और वो अब फिर से अहमदाबाद रहने लगे पर इसबार भी पिछले दिनों , ट्रैन , अपने दिल्ली वाले मित्र के जरिये दो पेटी आम भिजवा ही दिए।    


©आशीष कुमार, उन्नाव। 

३ जुलाई , २०२६ 





रविवार, 28 जून 2026

Fate


लघुकथा :- किस्मत  

- आशीष कुमार 

    वो अलग थी , सबसे अलग।  उस रास्ते से उनका कई बार गुजरना हुआ। दोनों बातें करते हुए गुजरते थे। लड़की बातों के साथ साथ तमाम चीजे सोचा करती थी। बस्ती पुरानी थी पर अब वहां विकास पहुंच रहा था। वो रास्ता काफी उबड़ खाबड़ था , उसमे तमाम गड्ढे भी हो गए थे। 

    उन्हें साथ हुए काफी वक़्त हो गया था , एक रोज उधर से जब जाना हुआ तो देखा वो रास्ता काफी अच्छी नई सड़क में बदल गया। बीच में पौधे , रोड में पेंट से मार्किग , किनारे हाइलाइटर , गहरा चमकता तारकोल , बेहतरीन तकनीक से बनी , समतल सपाट खूबसूरत रोड। 

" शायद एक दिन मेरी भी किस्मत ऐसे ही बदल जाये " उसने एकाएक कहा। 

" कैसे ? " लड़के ने चौंककर पूछा।  

" इस रोड की तरह " उसने जबाब दिया। 

 © आशीष कुमार , उन्नाव।  

28.06.2026 

सोमवार, 22 जून 2026

Make a Swing

 

 लघुकथा - झूला बना दो 

आशीष कुमार

    उनके बीच में हमेशा कुछ न कुछ गड़बड़ हो जाता था। कोई कहता कुछ था, पर सामने वाला समझता कुछ था। कुछ भाषा और कुछ बोली का असर था। वो हमेशा उसे छेड़ता कि 

"बचपन से ऐसी हो , या कोई खास ट्रेनिंग ली है। "

" मैं नहीं जानती ऐसा क्यों होता है , मैं तो सही ही बोलती हूँ सबसे। मैं हमेशा सही होती हूँ पर लोग मुझे समझ न पाते। " वो मासूमियत से जबाब देती।  

    फिर वो एक  कहानी सुनाती। उसे सजने-सवारने का शौक बचपन से था। उसे अपने हाथों में मेहँदी लगवाना बहुत पसंद था। तमाम बार वो अपने दोनों हाथों में मेंहदी लगवाती। कजरी तीज का त्यौहार था। पूरा शहर उल्लास से भरा। एक शाम वो बाजार गयी। 

     बाजार की तमाम भीड़ में उसका मन मेहँदी लगवा रहे लोगो में अटक गया। उसने भी एक अम्मा जी के पास जाकर बैठ गई। वो हमेशा अलग सोचती थी। 

    " अम्मा , मेरे एक हाथ  में झूला बना दो। " अम्मा को बताकर वो भीड़ में देखते हुए कुछ सोचने लगी।  अम्मा ने तेज हाथों से उसके दूध जैसी गोरे हाथों में मेहँदी रच दी। उठने से पहले उसने अपने हाथों में देखा , उसे झूला समझ न आया। उसने अम्मा से पूछा -

" ये क्या बना दिया अपने " 

"वही जो आपने कहा था—दूल्हा ," अम्मा ने कहा।  

 उस मासूम ने पूरे १५ दिन , अपने अनजान दूल्हे को हाथ में  बैठकर रखा। ये राज किसी को न पता चला।  

© आशीष कुमार , उन्नाव। 

२२ जून 2026  .








रविवार, 21 जून 2026

Dream

लघुकथा -  ख्वाब 

आशीष कुमार


" मैंने  हमेशा से एक ख़वाब देखा है  कि मुझे किसी से बहुत गहरा प्रेम हो , इतना कि मैं उसके बगैर जी न सकूँ ? " उसने  खनकती आवाज में कहा। 

" तो फिर क्या तुम्हें हुआ , मिला कोई ऐसा जिसके बगैर जिंदगी जीना मुश्किल लगे " विभव ने सब जानते हुए भी पायल के मुँह से सुनना चाहा। 

" अब तुम ये पूछ रहे हो , जान बूझ के अनजान बन रहे हो " पायल मुस्कुरा उठी। काफी दिनों के बाद , दोनों साथ बैठे थे। 

" पर मेरा पूरा ख़्वाब जानना चाहोगे "

" हाँ क्यों नहीं " 

" मैंने हमेशा से यही सोचा है कि मुझे सच्चा प्रेम हो फिर वो मेरा दिल तोड़ दे , बगैर कुछ जबाब दिए अचानक से गायब हो जाये। ऐसे जाये कि फिर वो कभी न मिले। दूसरे शब्दों में कहूँ तो मैं बेइंतिहा पीड़ा झेलना चाहती हूँ "

" ये क्या बात हुयी ? ऐसा सोचने की कोई खास वजह ?" विभव ने हैरानी से पूछा " 

" हाँ , मेरे ऐसे ख़्वाब की वजह है। मैंने कहीं पढ़ा था कि जिंदगी में सफल होने के लिए दिल टूटना जरूरी है , मैं बस सफल होना चाहती हूँ , बगैर दिल टूटे मैं कुछ न कर सकती हैं। " पायल ने अपनी बात पूरा करते ही उठकर चली  गयी। 

© आशीष कुमार , उन्नाव 

21 जून 2025

गुरुवार, 18 जून 2026

Money Plant

 

मनीप्लान्ट 


    मेरी  याद में मनीप्लान्ट का जो पौधा याद आता है , वो पौधा मेरे गांव वाले  घर के आँगन का था। आँगन से एक अंदर से नाली जाती थी। उसी के पास , एक टूटी बाल्टी में मिट्टी भर का लगा दिया गया। वो मनीप्लान्ट कहां से आया था , इतना याद नहीं। यह जरूर है , उन्हीं दिनों इससे जुड़े मिथक सुने। जैसे कि मनीप्लान्ट को हमेशा चुरा के लाना चाहिए , इसको लगाने से घर में पैसा आता है। 

    वैसे तो किसान परिवार में , किस्मत से ज्यादा मेहनत पर जोर दिया जाता है। यह मेरी खुद की धारणा है जो समय के साथ आयी है। जैसे हमारा परिवार , उतना धार्मिक नहीं रहा कभी , घर में मंदिर रहा पर रोज उसमें दिया जले , पूजा पाठ हो , ऐसा न होता था। आज सोचता हूँ कि शायद नियमित पूजा पाठ न करने की वजह , समय का आभाव रहा हो।  

    तो वो मनीप्लान्ट शुरू में काफी छोटा था , उसको लेकर मुझे काफी उम्मीदें थी। ऐसा लगता था कि जैसे जैसे यह बड़ा होगा , घर में चीजें ठीक होंगी। वो पेड़ सालों-साल घर में रहा , हमेशा हरा भरा और खूब फैलाव लिए हुए। बाल्टी से निकलकर छज्जे तक फ़ैल गया , दोनों तरफ  दीवालों में डोरियों से वो फैलता ही गया। मनीप्लान्ट का वो पेड़ , सबके लिए पेड़ था , मेरे लिए उम्मीद की किरण। मेरे मन में हमेशा रहा कि मनीप्लान्ट के पेड़ से किस्मत जुडी है। यह मेरे बचपन की बात है , बालमन के कोमल सपने।  

    इसके बाद , एक दूसरा मनीप्लान्ट  पेड़ घर के बाहर लगाया गया। यह काफी बाद की बात है , इसका भी हवाला नहीं है कि आया कहाँ से। यह मनीप्लान्ट की दूसरी किस्म थी। यह बेहद बड़े पत्तो वाला मनीप्लान्ट था। यह पेड़ बड़ा मिलनसार किस्म का था , अपने आस पास के पेड़ों से लिपट गया और उनके साथ साथ बड़ा हुआ। यह पेड़ बगैर किसी देख रेख के ही प्रगति करता गया। इसके पत्ते बहुत ज्यादा बड़े और गहरे हरे रंग के थे। अब तक मैं पढ़ाई लिखाई चप्पल घिसाई के दौर से गुजरता हुआ तमाम संघर्ष , असफलताओं की पीड़ा भुगतने के बाद सफलता का स्वाद चख  चुका था। 

    तमाम सालों से बाहर हूँ पर साल में कई बार घर जाना होता रहा। आँगन का मनी प्लांट न रहा वजह आँगन ही न रहा , उसकी जगह नया निर्माण हो गया पर घर के बाहर वाला मनीप्लांट बढ़ता रहा , वो इतना प्रबल और विशाल था कि उसको बीच बीच में काटना पड़ता। यूँ तो मनीप्लान्ट का पेड़ नाजुक होता है पर मेरे घर के बाहर वाला पेड़ को काटने के लिए कुल्हाड़ी का उपयोग करना पड़ता। 

    मेरी नौकरी बदलती रही , शहर बदलते रहे। अहमदाबाद में रहने के दौरान मुझे याद है न कि मेरे वहां वाले  घर में यह रहा या नहीं। दिल्ली में यह शुरू से जीवन का अभिन्न अंग रहा। यही पर पहली बार मेरे बेहद खुबसूरत मनीप्लाँट देखे। गमले में बीच में नेट के सहारे , करीने से तराशे , सवारे हुए मनीप्लान्ट। तमाम बार अलग अलग जगह से खरीद कर लाये गए , जो कुछ महीने तो खूब अच्छे चलते पर धीरे धीरे वो खत्म हो जाते।  

    इस दौरान मैंने देखा कि इनको मिटटी की जरूरत नहीं , यह किसी भी बोतल में पानी भर कर रखे जा सकते है। उसके बाद से ये मेरे ऑफिस की टेबल का जरुरी हिस्सा बन गया। किसी भी ऑफिस में रहा तो मेरे टेबल पर पहले दिन से ही मनीप्लान्ट का पौधा रहा। कोविड के दिनों में , अपनी टेबल के सामने ४ गमले मनीप्लान्ट के रखा दिया , इससे सोशल डिस्टन्सिंग हुयी।  तमाम बार लोग इसे देखते और हैरान होते।  गमलों से एक तरह का बैरियर बना था। हलांकि उन दिनों फ्रंट पर रह कर काम किया करते थे , सरकारी अफसरों विशेषकर प्रशासन में खुद के बजाय जनता के हित सबसे ऊपर थे। इसलिए यह गमले वाली डिस्टन्सिंग बस अपने मन के लिए थी। मैं उनमें फोकस करके विचारों में डूब सकता था। अपने ऑफिस, वर्तमान से परे जाकर सोच सकता था। पेड़ , प्रकृति में तनाव से मुक्ति की विशेष शक्ति होती है।  

    लिखने पढ़ने वाले लोगों या कहे रचनात्मक लोगों का कॉफ़ी हाउस से विशेष जुड़ाव होता है। कनॉट पैलेस पर तमाम कॉफ़ीहाउस थे। मै पहली बार जहाँ गया वो वही था जिसे मैंने सुना था। आपको शायद न पता हो यह प्राचीन  हुनमान मंदिर के पास की बिल्डिंग के ऊपरी माले पर है , बहुत पुराना। मैंने सुना है , पुराने दिनों में तमाम लेखक , कलाकार यहां आ चुके है। बहुत ही साधारण सी सजावट , बहुत सामान्य से पैसे में कॉफ़ी और उसके साथ तमाम स्नैक्स मिल जाते है।  

    कभी अगर अपने मिजाज के लोग मिले और अंतरंगता अगर इस हद तक हुयी कि मिलते है तो मेरी पहली कोशिस वही रहती है , इंडियन कॉफ़ी हाउस , कनाट पैलेस ऊपरी मजिल वाला। कितनी मुलाकातें , कितनी ही यादे। तमाम बीतती शामों में , कॉफ़ी के बाद बगल की खुली छत पर चहलकदमी , चलते चलते तमाम विचार , तमाम कहानियाँ। ऐसी ही एक शाम कॉफी के बाद , मैंने उससे जिसे मनी प्लांट वाली कहानी सुनाई थी और अपने जीवन की तमाम उपलब्धियों का इसे क्रेडिट दिया था।  उसको भी इस पर यकीन सा हो गया था , मैंने उसे प्रेरणा थी कि यही कॉफ़ी हाउस से मनी प्लांट चुरा लो , बस एक छोटी सी डाल।  उसे यकीन न था कि पर मैंने कहा कि यह चल जायेगा। बाद के तमाम महीनों में उसके रूम में एक बोतल के पानी में वो मनीप्लांट चलता रहा। वैसे आज देखूँ तो उसके जीवन में भी चीजे ठीक हो गयी है क्या इसको क्रेडिट उसी मनीप्लांट को दिया जाय ? 

    खैर मेरे पास मनीप्लान्ट की कहानियाँ उतनी लम्बी और बड़ी है , जितना मेरे गांव वाले घर के बाहर वाले पेड़ की विशालता और फैलाव। उनपर फिर कभी।  क्या आपने  इंडियन कॉफ़ी हाउस , कनॉट पैलेस की कॉफ़ी पी है ?

- आशीष कुमार , उन्नाव।  

१८ जून २०२६।  













  

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