खड़े होकर ध्यान
जहाँ मै रहता हूँ , वहीं पर एक पार्क है , इतना सघन की जंगल का अहसास होता है। जिम के बाद , मन हुआ कि आज वहीं जाकर थोड़ी देर ध्यान लगाता हूँ। यूँ तो पार्क में तमाम बेंच है पर एक काफी भीतर हट है , उसके पास पास काफी नीरवता रहती है। बड़ी उम्मीद से उधर गया तो देखा वहाँ पहले से कोई मौजूद है , इसलिए आगे बढ़ गया। इसके आगे कोई जगह न थी जहाँ सहजता से ध्यान लगाया जा सके। यूँ ही चलते चलते ख्याल आया की क्यूँ न खड़े होकर ध्यान लगा लिया जाय। वहीं रुक गया , सहजता से आंखे बंद की, तमाम विचार धीरे धीरे स्थिर होने लगे। मन प्रकति , हवा , पक्षिओं के संगीत पर टिकने लगा।
इंस्टाग्राम पर मुझे रील्स में सबसे ज्यादा वो पसंद आती है जो फनी होती है। एक रील याद आती है , जिसमें एक बाबा जी कहते है मैं रोज रात में २ बजे उठकर ध्यान लगाता हूँ , पिछले ५० साल से लगा रहूं पर आज तक न लगा। कितनी फनी पर सही बात बोली। ध्यान लगना होता है मिनट में भी लग जाता है अगर न लगना होगा तो सालों कोशिस करते रहो न लगेगा। मेरे साथ अच्छी बात है कि मेरा मिनट में लग जाता है , यह अलग बात है कि कोई नियमित अभ्यास नहीं करता , बस लग जाता है। ५ मिनट भी अलग ध्यान लगा लिया तो मेरी जुबान भारी हो जाती है। कहने का मतलब मौन स्वतः आ जाता है , कुछ बोलने का मन न करता। पूरे दिन बगैर बोले रह सकता हूँ पर दिन ऐसे कहाँ होते है , किसी न किसी वजह से बोलना ही पड़ता है , बड़ा कष्ट होता है , जब ध्यान से आया मौन तोडना पड़ता है।
ध्यान कहाँ से आया पता नहीं पर बस आ गया। अहमदाबाद के दिनों में मित्र राजेश सोनी ( sdm ,हरियाणा ) के साथ , अहमदाबाद के बाहर एक आश्रम जाया करता था , हर रविवार। क्या शानदार जगह थी। आश्रम , मंदिर जाने ले लिए कभी उत्सुक न रहा , सच तो ये है कि मन हमेशा संदेह से भरा रहता था। पर इस जगह जाकर मेरी काफी धारणा बदल गयी। वहा की तमाम बाते है पर बात ध्यान की चल रही तो वही पर फोकस करते है। वहां जाकर मैंने एक अनोखी बात देखी , वहाँ पर प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ कर ध्यान प्रकिया का अभ्यास कराया जाता था। १ घंटे चुपचाप आंखे बंद करके , ध्यान साधना होता था। मुझे ठीक से याद है कि वो १ घंटा वाकई बड़ा भारी होता था , कोई फोन नहीं , कोई बात नहीं , कुर्सी में पीठ टिका कर बस बैठे रहो। अक्सर मै सो जाता रहा वो भी बड़ी गहरी नींद में। लगभग ४००- ५०० लोग उस बड़े से ध्यान केंद्र में एक साथ ध्यान लगाते थे। बड़ी सकारात्मक ऊर्जा महसूस होती थी।
ध्यान के बाद , बड़ा सात्विक सा नाश्ता भी दिया जाता था। यह सब निःशुल्क होता था। कुछ लगातार रविवार के बाद राजेश सोनी की पहल पर एक गुरु जी ने गुरु मन्त्र दिया। एक बंद कमरे में बैठकर ध्यान लगवाया और अंत में हाथ पकड़ कर गुरु मन्त्र दिया। मेरा मन यह सब शंका से देख रहा था। मै सोच रहा था , इससे कुछ नहीं होता पर हुआ। उनकी सहजता , सरलता और सेवा भाव धीरे धीरे मन में विश्वास जगाने लगा। एक कार्ड भी बनाया गया।
दिल्ली आने के बाद मैंने उसको बहुत मिस किया , शुरू में यहाँ के केंद्र खोजने की कोशिस की , राजेश से बात हुयी तो बताया कि कहीं आउटर में है। धीरे धीरे व्यस्तता बढ़ती गयी। अहमदाबाद के वो कुछ रविवार मेरे जीवन की सबसे सकारात्मक रविवार थे।
© आशीष कुमार , उन्नाव।
२८.०३.२०२६
( नोट :- काफी दिनों बाद , पुराने दिनों की शैली में यह उक्त सृजन , मेरे कुछ मिनट के खड़े खड़े ध्यान को जाता है। मौन जारी है देखते है कितने घंटे चल पता है। )










