VYAKHYA
गुरुवार, 16 जुलाई 2026
Bin fere ki mohabt
बुधवार, 15 जुलाई 2026
काजल
लघुकथा :- काजल
आशीष कुमार
जीवन में काफी ज्ञानी लोग मिले है , जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा। इस बात का जरा भी घमंड न है। आज जिस मुकाम पर पहुँचा हूँ , उनमें ऐसे लोगो का बड़ा योगदान है। आज ऐसी ही एक कहानी याद आ गयी।
वो काफी होशियार थी , हर काम में तेज। पढ़ने में भी बहुत अच्छी थी। जब स्कूल में पुरुस्कार वितरण होता तो , लगभग सारे उसी को मिलते।
उसका एक छोटा भाई था। एक शाम की बात है , उसकी माँ ने आवाज दी , शाम हो गयी है। भाई को काजल लगा दो। उन दिनों रात में सोते वक़्त हर कोई काजल लगा के सोता था। अब जमाना कितना बदल गया। अब लोगों ने काजल लगाना ही बंद कर दिया। अब तो डॉक्टर भी मना करने लगे कि बच्चों की आँखे खराब हो जाएँगी।
खैर , जैसा की मैंने बताया वो लड़की बड़ी तेज थी। उसे काजल की डिब्बी न मिली। वो परेशान न हुयी। उसे पता था कि काजल कैसे बनाया जाता है। उसकी बुध्दि ने उसे तुरंत प्रेरणा दी। सामने किरोसिन वाला दीपक जल रहा था। किसी खाली बोतल का ढक्क्न लिया। उसमें दीपक से उठते हुए धुएँ को इकट्ठा किया। कुछ ही देर में जरूरत भर का काजल इकट्ठा हो गया।उसने गरमागरम काजल , अपने प्रिय छोटे भाई की आंख में लगा दिया। काजल लगते ही भाई को रात में सूरज नजर आ गया। वो हिरन की तरह , पुरे घर में भागा। उसकी आँखों में जलन होने लगी। लड़की को उसकी इस बेवकूफी के लिए उसकी मां ने जमकर क्लास लगाई।
© आशीष कुमार, उन्नाव।
15 जुलाई , 2026 .
रविवार, 12 जुलाई 2026
दुविधा
लघुकथा :- दुविधा
आशीष कुमार
मेरे सामने पेपर है और मै दुविधा में हूँ।
मेरे सामने अतीत है जो बड़ी तेजी से गुजर रहा है। मेरी परवरिश ऐसी की गयी कि घर से स्कूल और स्कूल से घर। जल्द ही मेरी सरकारी जॉब लग गयी। मेरे जीवन से जुड़े सारे फैसले मैंने पिता जी पर ही छोड़ रखा था। इसलिए शादी के लिए भी जहाँ से रिश्ता आया , वहीं हाँ भी कर दी।
शुरू में सब ठीक था , इनकी नौकरी निजी क्षेत्र में थी , अच्छा कमाते थे। नेचर और लुक दोनों अच्छा था। मुझे जीवन में हर चीज अच्छी लगती थी। शादी के कुछ टाइम बाद , बच्चा भी हो गया। मेरी अध्यापक की नौकरी थी। मैं खुद में हर चीज के लिए सक्षम थी।
मुझे बचपन से आत्मनिर्भर बनाया गया था। मुझे खुद पर बहुत आत्मविश्वास था। मुझे न पता था ,यही आत्मविश्वास मेरे लिए , सबसे बड़ी मुसीबत बन जायेगा।
हमारी शादी के 7 साल होने को आये. बच्चा बड़ा हो रहा था , इसके साथ साथ इनके पिता की मानसिकता छोटी होती जा रही थी। शादी के समय मेरी जॉब से , इनको बड़ा गर्व हुआ था और अब धीरे धीरे मेरी जॉब , इनको दिक्क्त दे रही थी।
शुरू में कोई विशेष बात न थी, छोटी मोटी बहस होती थी। पर धीरे धीरे चीजे खराब होने लगी। कुछ उनका अहं भाव , कुछ नौकरी में इशू , एक मित्र द्वारा साझा व्यापार में धोखा के चलते शराब का सेवन करने लगे। बात यही न रुकी, बहस के साथ साथ अब उनका हाथ भी मुझ पर उठने लगा।
यह बात किसी से मैं बता न सकती थी। पिता जी से भी कुछ हद की बात साझा की और बताया कि चीजे अब बर्दाश्त से बाहर हो रही है। उनका मानना था कि चीजें धीरे धीरे ठीक हो जाएगी। उनको समझना चाहिए था कि अगर ऐसा होता तो मैं उन तक बात लाती ही न।
इस बार स्कूल की छुट्टी होते ही अपने पापा घर आ गयी। भले वो , मुझसे दूर थे पर उनके साथ की बहस , बदतमीजी मेरे जेहन से जा न रही थी। एक रोज बगैर किसी से बताये , कोर्ट चली गयी।
वकील ने पहले समझाने की कोशिस की पर मेरी परेशानी शायद उसे भी समझ आ गयी। मैंने उससे पेपर तैयार करने को बोल दिया। छुट्टी खत्म होने को थी और पेपर भी रेडी हो गए थे।
पिछले कई महीने रोते हुए ही गुजरे थे , मैंने कितने मौके दिए , बार बार माफ़ किया पर शराबी इंसान की बात का क्या भरोसा। अब जब पेपर रेडी होकर सामने है और मुझे बस हस्ताक्षर करने है , मैं बड़ी दुविधा में हूँ।
दुविधा , यह कि यह सब मैं अपने बेटे के अच्छे भविष्य के लिए सोच कर रही हूँ पर कहीं वो बड़ा होकर मुझे ही गलत न समझे। दुनिया क्या कहेगी , समाज क्या सोचेगा। बेटा , बगैर पिता के कमजोर न महसूस करे , उसके विकास में किसी तरह की चुनौती तो न आएगी। फिर ये भी लगता है , उनकी गलत आदतें , मेरी साथ बत्तमीजी को भी देखकर भी उसका बचपन सामान्य न रहेगा।
पीछे मैंने किसी के कहने पर " आपका बंटी " ( मन्नू भंडारी ) भी पढ़ी थी। उसको पढ़कर और भी तमाम प्रश्न उठ खड़े हुए। मेरी दुविधा की वजह शायद मेरी सहज कोमलता है पर अब मै और किसी और के बनाये नियम , उसूलों को न मानूंगी। जो विद्रोह मुझे काफी समय पहले कर देना चाहिए था , अब उसमे देरी करना उचित न होगा।
मैंने एक बार फिर से उन पेपर्स को पढ़ा और उन पर अपने हस्ताक्षर कर दिए।
© आशीष कुमार , उन्नाव।
12 जुलाई , 2026
मंगलवार, 7 जुलाई 2026
Marks
लघुकथा :- निशान
- आशीष कुमार
वो किसी काम से अपने घर आयी थी। वापसी में वो पति के साथ जाना चाहती थी। उसका पति शहर से काम के बाद लौट रहा था। वैसे वो जब अपने घर आयी तो अपने प्रेमी से भी मिली थी , जिसे वो शादी के पहले से जानती थी। उसका प्रेम बहुत गहरा था , जो शादी के बाद भी न टूटा। चीजें साथ-साथ चल रही थी। वो दोहरी भूमिका निभा रही थी।
पति ने पहले टालमटोल किया, पर बाद में राजी हो गया। दोनों साथ-साथ घर गए। उसकी नजरों में , पति बहुत सीधा था पर उसकी बातों में तमाम रहस्य छुपे थे। वो अपने पति पर शक करती थी, पर मजे-मजे में। पर उस दिन , शाम को जब पति के पीठ पर निशान देखे तो वो हैरान थी , एक पल को वो समझ न पायी कि पीठ पर इतने गहरे और लाल निशान कैसे बन गए ? जब उसने अपने पति को टोका तो वो टाल गया।
वो मासूम थी , उसे संदेह था पर पक्का यकीन न था। उसने तमाम जतन किए, पर उसको कोई पक्का न हो पाया कि निशान कैसे थे। पति ने कहा , मुझे न पता क्या है , बाद में बोला कि मेरे ही हाथ लग गए होंगे। उसे फिर भी यकीन न हुआ. उसने पति से उसके हाथो से पीठ पर निशान बनवा के देखे , खुद से करके देखा और अंत में पाया कि पति ही सही बोल रहा है , निशान खुद के हाथ से बन गए होंगे।
उसका मन शांत होकर भी शांत न था। उसको अपने प्रेमी से सारी बातें करनी होती थी। उसने " निशान " के बारे में भी अपने प्रेमी से पूछा -
" ये पक्का प्रेम के निशान है , उसका जरूर कोई लफड़ा चल रहा है " प्रेमी ने मुस्कुराते हुए जबाब दिया।
" तुम इतना यकीन के साथ कैसे कह सकते हो ?" वो जरा चिंता के स्वर में बोली। उसका दिल , अपने देवता जैसे पति पर संदेह न करना चाह रहा था। उसने निशान की फोटो व्हाट्सऐप पर भेजी।
" अरे ये पक्का वही है , मैं जानता हूँ। मैं तो ये भी जानता हूँ लड़की पक्का दुबली पतली होगी , जिसके नाख़ून बड़े होंगे " प्रेमी ने ऐसे बताया जैसे कि उसका खुद का कोई पूर्व अनुभव हो।
(Inspired by " Harlan Coben " , as I recently saw many series based on his books. Mystery lovers can search on Netflix by " Harlan Coben Collection " )
© आशीष कुमार , उन्नाव
7 जुलाई , 2026
शुक्रवार, 3 जुलाई 2026
Kutch's Mango
कच्छ के आम
आपका भी ज्यादातर अनुभव यही होगा कि लोग काम के वक़्त ही याद करते हैं। वैसे आजकल लोग खुद में इतने बिजी हैं कि वो आपको याद ही नहीं करते हैं। ऐसे में सौभाग्यवश मेरे मित्रता सूची में तमाम लोग ऐसे भी हैं जो खुद से याद करते है वो भी हमारे लिए, हमारे भले के लिए। यह उनका प्रेम है , आज उनमें से एक की कहानी।
अहमदाबाद की एक लाइब्रेरी में उससे संपर्क हुआ था। बेहद स्मार्ट , खूबसूरत , उजला रंग , मीठी बोली। कभी ktm बाइक से , कभी सफेद नई फॉर्च्यूनर से। ये उन दिनों की बात है जब अपने पास 100 CC की बजाज डिस्कवर हुआ करती थी। सोचो उन दिनों , कितने प्रभावित करते रहे होंगे ऐसे लोग। एक और साथी इनोवा से आता था। बाद में दोनों ही अपने मित्र बन गए। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सफलता मिलने से पहले वाले साथी थे।
आज पहले साथी की बात। उसने बस तैयारी शुरू ही की थी। मैं लंबे समय से तैयारी करके काफी पक चूका था। PRE और मेंस पास होना मेरे लिए कोई बड़ी और नई बात न थी। उसके लिए यह काफी मायने रखता था। एक दो बार उसी ने मेरा PRE रिजल्ट देखा था। खैर उसी शुभ लाइब्रेरी से मेरा upsc में अंतिम चयन हुआ। लाइब्रेरी के केयरटेकर ने अगले दिन पेपर में प्रकाशित मेरे से जुडी कटिंग को नोटिसबोर्ड में चिपका दिया।
अब मुझे ठीक से याद नहीं कि वो दिल्ली किस साल आया , पर वो भी आ गया। राजेंद्रनगर में , एक दो बार उसके रूम जाना हुआ। उसका भी एक दो बार ऑफिस आना हुआ , एक दो बार घर भी। वो कच्छ , गुजरात एरिया से था। अब कच्छ का जिक्र हुआ है तो बताऊँ , मेरी अब तक घूमी गई जगहों में सबसे बेहतरीन जगह है। उस यात्रा से पहली बार फेसबुक में पोस्ट लिखनी शुरू हुयी थी।
तो जब से हर्ष भाई दिल्ली आए , वो लगातार अपने कच्छ की विशेष मिठाई और आम भिजवाते रहे। पूरे साल शायद ही बात हो , मुलाकात हो, पर आम और मिठाई जरूर आती रही। आम और मिठाई , दोनों ही मुझे विशेष रूप से पसंद है। कच्छ वाले आम , अपने मलिहाबाद वाली दसहरी के ठीक पहले आते हैं। स्वाद में बढ़िया , रसीले , गूदेदार , पतले छिलके वाले। अब तो ऐसा हो गया है कि फोन उसका आने पर , मेरा पहला शब्द यही होता ' आम भिजवाने हैं , या मिठाई। इस साल हर्ष भाई की शादी हो गयी और वो अब फिर से अहमदाबाद रहने लगे पर इसबार भी पिछले दिनों , ट्रैन , अपने दिल्ली वाले मित्र के जरिये दो पेटी आम भिजवा ही दिए।
©आशीष कुमार, उन्नाव।
३ जुलाई , २०२६
रविवार, 28 जून 2026
Fate
लघुकथा :- किस्मत
- आशीष कुमार
वो अलग थी , सबसे अलग। उस रास्ते से उनका कई बार गुजरना हुआ। दोनों बातें करते हुए गुजरते थे। लड़की बातों के साथ साथ तमाम चीजे सोचा करती थी। बस्ती पुरानी थी पर अब वहां विकास पहुंच रहा था। वो रास्ता काफी उबड़ खाबड़ था , उसमे तमाम गड्ढे भी हो गए थे।
उन्हें साथ हुए काफी वक़्त हो गया था , एक रोज उधर से जब जाना हुआ तो देखा वो रास्ता काफी अच्छी नई सड़क में बदल गया। बीच में पौधे , रोड में पेंट से मार्किग , किनारे हाइलाइटर , गहरा चमकता तारकोल , बेहतरीन तकनीक से बनी , समतल सपाट खूबसूरत रोड।
" शायद एक दिन मेरी भी किस्मत ऐसे ही बदल जाये " उसने एकाएक कहा।
" कैसे ? " लड़के ने चौंककर पूछा।
" इस रोड की तरह " उसने जबाब दिया।
© आशीष कुमार , उन्नाव।
28.06.2026
सोमवार, 22 जून 2026
Make a Swing
लघुकथा - झूला बना दो
आशीष कुमार
उनके बीच में हमेशा कुछ न कुछ गड़बड़ हो जाता था। कोई कहता कुछ था, पर सामने वाला समझता कुछ था। कुछ भाषा और कुछ बोली का असर था। वो हमेशा उसे छेड़ता कि
"बचपन से ऐसी हो , या कोई खास ट्रेनिंग ली है। "
" मैं नहीं जानती ऐसा क्यों होता है , मैं तो सही ही बोलती हूँ सबसे। मैं हमेशा सही होती हूँ पर लोग मुझे समझ न पाते। " वो मासूमियत से जबाब देती।
फिर वो एक कहानी सुनाती। उसे सजने-सवारने का शौक बचपन से था। उसे अपने हाथों में मेहँदी लगवाना बहुत पसंद था। तमाम बार वो अपने दोनों हाथों में मेंहदी लगवाती। कजरी तीज का त्यौहार था। पूरा शहर उल्लास से भरा। एक शाम वो बाजार गयी।
बाजार की तमाम भीड़ में उसका मन मेहँदी लगवा रहे लोगो में अटक गया। उसने भी एक अम्मा जी के पास जाकर बैठ गई। वो हमेशा अलग सोचती थी।
" अम्मा , मेरे एक हाथ में झूला बना दो। " अम्मा को बताकर वो भीड़ में देखते हुए कुछ सोचने लगी। अम्मा ने तेज हाथों से उसके दूध जैसी गोरे हाथों में मेहँदी रच दी। उठने से पहले उसने अपने हाथों में देखा , उसे झूला समझ न आया। उसने अम्मा से पूछा -
" ये क्या बना दिया अपने "
"वही जो आपने कहा था—दूल्हा ," अम्मा ने कहा।
उस मासूम ने पूरे १५ दिन , अपने अनजान दूल्हे को हाथ में बैठकर रखा। ये राज किसी को न पता चला।
© आशीष कुमार , उन्नाव।
२२ जून 2026 .
रविवार, 21 जून 2026
Dream
लघुकथा - ख्वाब
आशीष कुमार
" मैंने हमेशा से एक ख़वाब देखा है कि मुझे किसी से बहुत गहरा प्रेम हो , इतना कि मैं उसके बगैर जी न सकूँ ? " उसने खनकती आवाज में कहा।
" तो फिर क्या तुम्हें हुआ , मिला कोई ऐसा जिसके बगैर जिंदगी जीना मुश्किल लगे " विभव ने सब जानते हुए भी पायल के मुँह से सुनना चाहा।
" अब तुम ये पूछ रहे हो , जान बूझ के अनजान बन रहे हो " पायल मुस्कुरा उठी। काफी दिनों के बाद , दोनों साथ बैठे थे।
" पर मेरा पूरा ख़्वाब जानना चाहोगे "
" हाँ क्यों नहीं "
" मैंने हमेशा से यही सोचा है कि मुझे सच्चा प्रेम हो फिर वो मेरा दिल तोड़ दे , बगैर कुछ जबाब दिए अचानक से गायब हो जाये। ऐसे जाये कि फिर वो कभी न मिले। दूसरे शब्दों में कहूँ तो मैं बेइंतिहा पीड़ा झेलना चाहती हूँ "
" ये क्या बात हुयी ? ऐसा सोचने की कोई खास वजह ?" विभव ने हैरानी से पूछा "
" हाँ , मेरे ऐसे ख़्वाब की वजह है। मैंने कहीं पढ़ा था कि जिंदगी में सफल होने के लिए दिल टूटना जरूरी है , मैं बस सफल होना चाहती हूँ , बगैर दिल टूटे मैं कुछ न कर सकती हैं। " पायल ने अपनी बात पूरा करते ही उठकर चली गयी।
© आशीष कुमार , उन्नाव
21 जून 2025
गुरुवार, 18 जून 2026
Money Plant
मनीप्लान्ट
मेरी याद में मनीप्लान्ट का जो पौधा याद आता है , वो पौधा मेरे गांव वाले घर के आँगन का था। आँगन से एक अंदर से नाली जाती थी। उसी के पास , एक टूटी बाल्टी में मिट्टी भर का लगा दिया गया। वो मनीप्लान्ट कहां से आया था , इतना याद नहीं। यह जरूर है , उन्हीं दिनों इससे जुड़े मिथक सुने। जैसे कि मनीप्लान्ट को हमेशा चुरा के लाना चाहिए , इसको लगाने से घर में पैसा आता है।
वैसे तो किसान परिवार में , किस्मत से ज्यादा मेहनत पर जोर दिया जाता है। यह मेरी खुद की धारणा है जो समय के साथ आयी है। जैसे हमारा परिवार , उतना धार्मिक नहीं रहा कभी , घर में मंदिर रहा पर रोज उसमें दिया जले , पूजा पाठ हो , ऐसा न होता था। आज सोचता हूँ कि शायद नियमित पूजा पाठ न करने की वजह , समय का आभाव रहा हो।
तो वो मनीप्लान्ट शुरू में काफी छोटा था , उसको लेकर मुझे काफी उम्मीदें थी। ऐसा लगता था कि जैसे जैसे यह बड़ा होगा , घर में चीजें ठीक होंगी। वो पेड़ सालों-साल घर में रहा , हमेशा हरा भरा और खूब फैलाव लिए हुए। बाल्टी से निकलकर छज्जे तक फ़ैल गया , दोनों तरफ दीवालों में डोरियों से वो फैलता ही गया। मनीप्लान्ट का वो पेड़ , सबके लिए पेड़ था , मेरे लिए उम्मीद की किरण। मेरे मन में हमेशा रहा कि मनीप्लान्ट के पेड़ से किस्मत जुडी है। यह मेरे बचपन की बात है , बालमन के कोमल सपने।
इसके बाद , एक दूसरा मनीप्लान्ट पेड़ घर के बाहर लगाया गया। यह काफी बाद की बात है , इसका भी हवाला नहीं है कि आया कहाँ से। यह मनीप्लान्ट की दूसरी किस्म थी। यह बेहद बड़े पत्तो वाला मनीप्लान्ट था। यह पेड़ बड़ा मिलनसार किस्म का था , अपने आस पास के पेड़ों से लिपट गया और उनके साथ साथ बड़ा हुआ। यह पेड़ बगैर किसी देख रेख के ही प्रगति करता गया। इसके पत्ते बहुत ज्यादा बड़े और गहरे हरे रंग के थे। अब तक मैं पढ़ाई लिखाई चप्पल घिसाई के दौर से गुजरता हुआ तमाम संघर्ष , असफलताओं की पीड़ा भुगतने के बाद सफलता का स्वाद चख चुका था।
तमाम सालों से बाहर हूँ पर साल में कई बार घर जाना होता रहा। आँगन का मनी प्लांट न रहा वजह आँगन ही न रहा , उसकी जगह नया निर्माण हो गया पर घर के बाहर वाला मनीप्लांट बढ़ता रहा , वो इतना प्रबल और विशाल था कि उसको बीच बीच में काटना पड़ता। यूँ तो मनीप्लान्ट का पेड़ नाजुक होता है पर मेरे घर के बाहर वाला पेड़ को काटने के लिए कुल्हाड़ी का उपयोग करना पड़ता।
मेरी नौकरी बदलती रही , शहर बदलते रहे। अहमदाबाद में रहने के दौरान मुझे याद है न कि मेरे वहां वाले घर में यह रहा या नहीं। दिल्ली में यह शुरू से जीवन का अभिन्न अंग रहा। यही पर पहली बार मेरे बेहद खुबसूरत मनीप्लाँट देखे। गमले में बीच में नेट के सहारे , करीने से तराशे , सवारे हुए मनीप्लान्ट। तमाम बार अलग अलग जगह से खरीद कर लाये गए , जो कुछ महीने तो खूब अच्छे चलते पर धीरे धीरे वो खत्म हो जाते।
इस दौरान मैंने देखा कि इनको मिटटी की जरूरत नहीं , यह किसी भी बोतल में पानी भर कर रखे जा सकते है। उसके बाद से ये मेरे ऑफिस की टेबल का जरुरी हिस्सा बन गया। किसी भी ऑफिस में रहा तो मेरे टेबल पर पहले दिन से ही मनीप्लान्ट का पौधा रहा। कोविड के दिनों में , अपनी टेबल के सामने ४ गमले मनीप्लान्ट के रखा दिया , इससे सोशल डिस्टन्सिंग हुयी। तमाम बार लोग इसे देखते और हैरान होते। गमलों से एक तरह का बैरियर बना था। हलांकि उन दिनों फ्रंट पर रह कर काम किया करते थे , सरकारी अफसरों विशेषकर प्रशासन में खुद के बजाय जनता के हित सबसे ऊपर थे। इसलिए यह गमले वाली डिस्टन्सिंग बस अपने मन के लिए थी। मैं उनमें फोकस करके विचारों में डूब सकता था। अपने ऑफिस, वर्तमान से परे जाकर सोच सकता था। पेड़ , प्रकृति में तनाव से मुक्ति की विशेष शक्ति होती है।
लिखने पढ़ने वाले लोगों या कहे रचनात्मक लोगों का कॉफ़ी हाउस से विशेष जुड़ाव होता है। कनॉट पैलेस पर तमाम कॉफ़ीहाउस थे। मै पहली बार जहाँ गया वो वही था जिसे मैंने सुना था। आपको शायद न पता हो यह प्राचीन हुनमान मंदिर के पास की बिल्डिंग के ऊपरी माले पर है , बहुत पुराना। मैंने सुना है , पुराने दिनों में तमाम लेखक , कलाकार यहां आ चुके है। बहुत ही साधारण सी सजावट , बहुत सामान्य से पैसे में कॉफ़ी और उसके साथ तमाम स्नैक्स मिल जाते है।
कभी अगर अपने मिजाज के लोग मिले और अंतरंगता अगर इस हद तक हुयी कि मिलते है तो मेरी पहली कोशिस वही रहती है , इंडियन कॉफ़ी हाउस , कनाट पैलेस ऊपरी मजिल वाला। कितनी मुलाकातें , कितनी ही यादे। तमाम बीतती शामों में , कॉफ़ी के बाद बगल की खुली छत पर चहलकदमी , चलते चलते तमाम विचार , तमाम कहानियाँ। ऐसी ही एक शाम कॉफी के बाद , मैंने उससे जिसे मनी प्लांट वाली कहानी सुनाई थी और अपने जीवन की तमाम उपलब्धियों का इसे क्रेडिट दिया था। उसको भी इस पर यकीन सा हो गया था , मैंने उसे प्रेरणा थी कि यही कॉफ़ी हाउस से मनी प्लांट चुरा लो , बस एक छोटी सी डाल। उसे यकीन न था कि पर मैंने कहा कि यह चल जायेगा। बाद के तमाम महीनों में उसके रूम में एक बोतल के पानी में वो मनीप्लांट चलता रहा। वैसे आज देखूँ तो उसके जीवन में भी चीजे ठीक हो गयी है क्या इसको क्रेडिट उसी मनीप्लांट को दिया जाय ?
खैर मेरे पास मनीप्लान्ट की कहानियाँ उतनी लम्बी और बड़ी है , जितना मेरे गांव वाले घर के बाहर वाले पेड़ की विशालता और फैलाव। उनपर फिर कभी। क्या आपने इंडियन कॉफ़ी हाउस , कनॉट पैलेस की कॉफ़ी पी है ?
- आशीष कुमार , उन्नाव।
१८ जून २०२६।
सोमवार, 15 जून 2026
Without you
उसके बिना
अपने भी जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर , यह जरूर सुना होगा कि किसी के चले जाने का बाद ही उसका महत्व पता चलता है। मैंने भी बड़ी शिद्द्त से यह महसूस किया है, उन दिनों जब वो साथ था तब उसका जिंदगी में होना सामान्य सी बात थी, अब जब वो हमेशा के लिए खो गया है , मैंने उसे हर रोज याद किया है।
जब यमुना एक्सप्रेस पर आगरा से दिल्ली की तरफ आते है तो कुछ टोल के पास एक बड़ा सुन्दर मंदिर का बोर्ड दिखाई पड़ता है। मुझे लगभग 7 साल हो गए, इस रास्ते आते जाते और लगभग हर बार ही इसको देखा। मैं प्रेममंदिर वृंदावन के बोर्ड की बात कर रहा हूँ जो टोल के पास लगे है। तमाम लोगों से इसकी भव्यता , विशालता के बारे में सुना भी था।
कहते है किसी जगह या मंदिर में तब तक जाना होता नहीं जब आपको वो बुलाये न। पिछले तमाम सालों से मथुरा , वृन्दावन के पास से गुजरना हुआ पर कभी उधर जाना न हुआ। पिछले साल , सावन के महीने में कुछ संपर्कों के चलते वृन्दावन जाने का अवसर मिला। होस्ट बड़े सज्जन थे। सैकड़ो मंदिर में कुछ सबसे महत्वपूर्ण की लिस्ट बना दी और उनका क्रम बता दिया। सब जगह बड़ी सुविधा से दर्शन हो गए। बांके बिहारी जी मंदिर में स्थानीय पुलिस के सहयोग से काफी सुविधा से दर्शन हो गए।
मेरी लिस्ट में सबसे अंत में प्रेम मंदिर था। शाम हो गयी थी. धीरे धीरे बारिश भी हो रही थी। मंदिर काफी बड़ा और सुन्दर बना है। जूते जमा करने की व्यस्था थी और तमाम लोगों ने ऐसे खुले में भी जूते डाल दिए थे। लाइन जरा लम्बी थी। इससे पहले भी मैंने अपने जूते तमाम मंदिर के बाहर ऐसे ही डाल दिए थे। यहाँ पर भी एक कोने में रखकर मंदिर दर्शन के लिए चला गया। करीब 30 मिनट के बाद जब लौटा और अपने जूतों के पास गया तो वो वहाँ न थे। एक पल को यकीन न हुआ कि जूते चोरी भी सकते हैं पर वो हो चुके थे। ठीक उस क्षण तक वो मेरे तमाम जूतों में महज एक जोड़ी जूते थे पर खोने के बाद , दिल बैठ सा गया।
पिछले साल रनिंग का जोश सा आया था , उससे जुडी तमाम चीजों, तमाम अलग अलग कम्पनी के जूते , अलग अलग जगह से खरीदे थे। सकनी , होका , ब्रुक्स , नाइके , एसिक्स , प्यूमा आदि। इनमें से कुछ बहुत मुश्किल से मिले थे।
मेरा जो जूता प्रेम मंदिर खोया था , वो HOKA का नीले कलर के जूते थे। ठीक से से याद नहीं कि दिल्ली से लिए थे या गुरुग्राम से। एमआरपी 14000 के आस पास था , मुझे ९००० के मिले थे। शुरू में उन्हें ज्यादा पहनता न था , एक रेस में आजमाया तो बड़ा अच्छा लगा। उनका वजन काफी कम था और बाउंस अच्छा था , शायद कॉर्बन प्लेट वाले थे। उसके बाद तो वो मेरे रेगलर जूतों की तरह हो गए। उनकी एक और खास बात थी कि लसेस खोले बगैर भी पहना और उतारा जा सकता था।
तमाम बार उनके लिए अलग अलग तारीफ सुनी थी। एक शिमला की रेस थी , किसी ने कहा ये कहाँ से लिए , इम्पोर्टेड है क्या ? बड़े अच्छे लग रहे हैं.... धीरे धीरे वो मुझे काफी प्रिय हो गए। इसलिए जब वृन्दावन गया तो कोई रेस न थी , बस वो कम्फ़र्टेबल थे इसलिए साथ थे।
जैसा मैंने शुरू में लिखा , जबतक चीजे हमारे साथ होती है , उनकी हमें कदर न होती है। उनके खोने के बाद वो बड़ा याद आये। विशेषकर जब उन्हें स्टोर में पता किया तो पता चला अब वो नही आ रहे। एक दो बार संयोग बना। एक सज्जन मुझसे मिलने ऑफिस आते थे। तमाम बार बोलते थे कि सर कोई हेल्प चाहिए तो बताइये , मेरा अमुक काम है , अमुक शहर में होटल है आदि आदि। मै बाहर आता जाता रहता हूँ आदि। एक पल को मन में ख्याल आया बोलूं मेरे लिए बाहर से होका के जूते ला सकते हो क्या ? पर ख्याल मन में रह गया कि कौन अहसान ले और फिटिंग का इशू अलग।
यूँ तो कुछ और जूते कलेक्शन में जुड़ गए है, पिछले दो सालों में लगभग 2500 km के आस पास रनिंग हो गयी , तमाम शूज फटने को आये। उन सबके बीच मुझे होका का नीला वाला शूज बहुत याद आता है। जैसे कि कोई मोहब्बत की दास्ताँ जो ठीक से शुरू भी हुयी , उसका अंत आ गया। पिछले दिनों , यमुना एक्सप्रेस से आना जाना हुआ और टोल के पास प्रेममंदिर के होर्डिंग को देख , होका की बड़ी याद आयी।
( प्रसंगवश , इन दिनों फिल नाईट ( funder नाइके ) की बुक शू डॉग पढ़ी जा रही है ).
- आशीष कुमार , उन्नाव।
15 जून, 2026 .
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निबंध में अच्छे अंक लाने के लिए जरूरी है कि उसमे रोचकता और सरसता का मिश्रण हो.........आज से कुछ लाइन्स या दोहे देने की कोशिश करता हूँ......
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