किताबें मुझे हमेशा से प्रिय रही हैं। शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट से गुजरना हुआ हो और बुक स्टाल पर न गया हो। यह अलग बात है कि मध्यमवर्गीय, ग्रामीण मानसिकता या यूँ कहें, छात्र जीवन की मानसिकता कि कोई चीज लिखित मूल्य पर न लेना, से बाहर आने में वक़्त लगा। पहले किताबें उलट-पलट करके अक्सर मैगज़ीन लेकर चल देता था।
अच्छी किताबें नोट करता था और उन्हें ऐमज़ॉन से ऑर्डर करता था, प्रायः 20% छूट के साथ मिल जाती थीं। तमाम बार दिल्ली पुस्तक मेले से ४–५ हजार की किताबें खरीद लेता था। कुछ पढ़ता था और कुछ विशेष तौर पर भेंट करने के लिए रखता था। जो भी मेरे प्रिय लोग रहे, उनको पुस्तकें जरूर दी हैं। तमाम बार खुद की पढ़ी हुई, तमाम बार कोरी, नई-नवेली।
पीछे से और पीछे जब दिल्ली एयरपोर्ट से आना हुआ तो बुक स्टाल से गुजरा और कुछ पुस्तकें खरीदीं। अंग्रेजी में। एक बुक 100 इयर्स ब्लूप्रिंट करके है, दक्षिण भारत के एक डॉ. ने अपने अनुभव को समेटा है, विषय हेल्थ, फिटनेस, दीर्घायु से जुड़े हैं। इन दिनों मुझे इस विषय पर पढ़ना बहुत अच्छा लगता है।
इस बार जब दिल्ली एयरपोर्ट से गुजरना हुआ तो मुझे अपने कुछ उच्च अधिकारियों को भेंट करने के लिए पुस्तकें लेनी थीं। तीन पुस्तकें लीं। एक हिंदुत्व पर थी, किसी अमेरिकन लेखक (भारतीय मूल के) ने अपने बच्चे को सरल भाषा में हिंदुत्व क्या है, समझाने के लिए लिखी थी। एक पुस्तक सद्गुरु की इनर इंजीनियरिंग थी। तीसरी पुस्तक हॉवर्ड बिज़नेस रिव्यू का १०० इयर्स वाला संकलन था।
हर पुस्तक का अपना महत्व था, पहली पुस्तक भेंट के लिए थी। विषय तो जिन्हें देनी थी, उनके अनुकूल था, पर दिक्कत यह हुई कि इंग्लिश भाषा में थी। पर यह सोचकर कि भेंट में भावना देखी जाती है, न कि ऐसे नीर-क्षीर विवेक लगाया जाता है। उम्मीद है, उन्हें पसंद आई होगी।
दूसरी पुस्तक अपने लिए थी। एक समय के बाद व्यक्ति को ओशो भी अच्छे लगने लगते हैं, अध्यात्म में बड़ा मन लगता है। ऐसा ही कुछ मेरे साथ हो रहा है। सद्गुरु पर पहले एक पुस्तक पढ़ चुका था। किसी लेखिका की बड़ी अच्छी बुक थी। काफी रोचक और तथ्यों के साथ। शायद उनकी जीवनी थी। गौरतलब है कि सद्गुरु (जग्गी वासुदेव) को पहले-पहल मैंने सामान्य ज्ञान के एक तथ्य के रूप में जाना था। उन्हें उस साल पद्म विभूषण मिला था। भारत रत्न के बाद, दूसरे नंबर का पुरस्कार। ऐसे में जानना तो बनता था कि आखिर उनका क्या योगदान है, तब जाना।
पीछे बंगलौर भी जाना हुआ, वक़्त भी था, पर वहाँ न गया जहाँ जाने के लिए लोग लालायित रहते हैं। गुरु, संत, महात्मा के प्रति सम्मान भी है, पर भीतर कहीं न कहीं आशंका भी रहती है कि सब व्यापार है। खैर, हम किसी पर कोई टिप्पणी करने के योग्य कहाँ। जब मैंने इनर इंजीनियरिंग पुस्तक देखी, वो भी हिंदी में, तो तुरंत खरीद ली। काफी नाम सुन रखा था।
क्या गजब पुस्तक मिली। बेहतरीन, लाजवाब, सच में यह पुस्तक पढ़कर बड़ा मजा आया। यह अलग बात है कि मतलब की बातें अंत के कुछ पेज में हैं। इससे जुड़ी एक बड़ी रोचक कहानी है। पीछे, हमारे यहाँ एक अति उच्च अधिकारी का दौरा हुआ। मैं परेशान कि उन्हें कुछ तो देना है। ख्याल आया कि यह इनर इंजीनियरिंग ही पढ़कर दे देता हूँ। यहाँ और कुछ भी तुरंत भेंट करने योग्य वस्तु का मिलना बड़ा कठिन है। इसके चलते मैंने २०० पेज से अधिक की किताब न केवल दो रातों में पढ़ी, वरन् उसके नोट्स भी अपनी डायरी में बनाए। इस तरह से पढ़ी किताब भेंट के तौर पर दे दी। अब इसमें मुझे शर्म भी न आती कि पढ़कर देना कितना उचित है।
तीसरी पुस्तक इस मायने में विशेष है कि यह अब तक मेरी खरीदी पुस्तकों में सबसे ज्यादा मूल्य की है। पुस्तक में 30 लेख हैं और यह 1600 रुपये की है। मैंने खूब सोचा, इससे पहले की सबसे कीमती पुस्तक कोई याद न आई। UPSC की परीक्षा भी पास कर ली, पर इस स्तर पर किताबें न खरीदीं। मैंने सुना है, डॉक्टरों और इंजीनियरिंग की पुस्तकें काफी महँगी आती हैं। मेरी जानकारी में UPSC की शायद ही कोई पुस्तक 1000 रुपये से ऊपर आती हो।
खैर, काफी देर सोचा, फिर ले लिया। हॉवर्ड का नाम काफी है। विषय अलग-अलग हैं और काफी रोचक और शोधपरक हैं। चूँकि इंग्लिश में है, इसलिए पढ़ने की गति उतनी तेज न है।
मुझे यहाँ एक बहुत अच्छा पुस्तकालय भी मिल गया, जिसमें हिंदी की बेहतरीन किताबें हैं, प्रायः राजा राम मोहन राय, कोलकाता के सौजन्य से भेंट की हुई। अगर आप किसी भी पुस्तकालय जाएँ और ऐसी भेंट वाली किताबें न मिलें, ऐसा न हो सकता है। काफी सारी पढ़ी हुई किताबें फिर से पढ़ रहा हूँ और बहुत आनंद भी आ रहा है।
इन्हीं में एक किताब, विमल मित्र द्वारा संपादित अज्ञेय का गद्य संकलन, पढ़ा। 900 पेज से ऊपर, यह मेरी पढ़ी गई सबसे मोटी पुस्तकों में से एक होगी। शायद इतनी मोटी किताबें भी गिनी-चुनी होंगी। शेखर एक जीवनी (इतना प्रसिद्ध) होने के बावजूद अब पढ़ा गया है। पहले कोशिश की थी, पर भाषा की दुरूहता, क्लिष्टता ने पढ़ने न दिया।
यहाँ पुस्तकों के खंड अस्त-व्यस्त हैं। तस्लीमा नसरीन की आत्मकथा का चौथा खंड मिला तो ले आया और कुछ पन्ने पढ़कर वापस कर दिया। (सालों पहले भी ऐसा किया था, विवादित क्यों है, यह पढ़ना था, पर मिला नहीं तो मन न किया।)
नई पुस्तकों में बच्चन की आत्मकथा का चौथा भाग दशद्वार से सोपान तक भी है। बड़ी रोचक और प्रवाहमयी भाषा है, किसी भी दिन एक अच्छी बैठक में खत्म हो जाएगी। बाकी खंड हो सकता है यहाँ न मिलें, पर मेरी प्रतीक्षा सूची में सबसे ऊपर रहेंगे।
मलयालम की साहित्यकार कमला दास की आत्मकथा, माय स्टोरी भी लाया। वजह इसका विवादित होना, और यह पढ़कर कि विवाद की वजह क्या थी, पूरा पढ़ने का मन न किया। इंग्लिश भाषा में होना भी एक वजह हो सकती है।
अंत में एक पुस्तक जो कि हिंदी सूक्ति संकलन है, तीन खंडों में प्रकाशित, बहुत बढ़िया किताब मिली। इसमें 1600 पुस्तकों से लगभग हर विषय पर 20000 अच्छी लाइन्स, कहावतें, शेर-शायरी आदि हैं। पुस्तकालय में जब किताब उलट-पलट रहा था तो एक उक्ति दिखी—
“अपनी प्रिय स्त्री, राजा, छोटे भाई और (उसका नाम न याद आ रहा) के पास खाली हाथ कभी न जाएँ।”
तो क्या इसी वजह से पुस्तकें भेंट करने की आदत है, भगवान जाने। शेष फिर कभी।
विदा।
© आशीष कुमार, उन्नाव।
२१ अक्टूबर, २०२६।





