बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

हाल के दिनों की किताबें


    किताबें मुझे हमेशा से प्रिय रही हैं। शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट से गुजरना हुआ हो और बुक स्टाल पर न गया हो। यह अलग बात है कि मध्यमवर्गीय, ग्रामीण मानसिकता या यूँ कहें, छात्र जीवन की मानसिकता कि कोई चीज लिखित मूल्य पर न लेना, से बाहर आने में वक़्त लगा। पहले किताबें उलट-पलट करके अक्सर मैगज़ीन लेकर चल देता था।

अच्छी किताबें नोट करता था और उन्हें ऐमज़ॉन से ऑर्डर करता था, प्रायः 20% छूट के साथ मिल जाती थीं। तमाम बार दिल्ली पुस्तक मेले से ४–५ हजार की किताबें खरीद लेता था। कुछ पढ़ता था और कुछ विशेष तौर पर भेंट करने के लिए रखता था। जो भी मेरे प्रिय लोग रहे, उनको पुस्तकें जरूर दी हैं। तमाम बार खुद की पढ़ी हुई, तमाम बार कोरी, नई-नवेली।

पीछे से और पीछे जब दिल्ली एयरपोर्ट से आना हुआ तो बुक स्टाल से गुजरा और कुछ पुस्तकें खरीदीं। अंग्रेजी में। एक बुक 100 इयर्स ब्लूप्रिंट करके है, दक्षिण भारत के एक डॉ. ने अपने अनुभव को समेटा है, विषय हेल्थ, फिटनेस, दीर्घायु से जुड़े हैं। इन दिनों मुझे इस विषय पर पढ़ना बहुत अच्छा लगता है।

इस बार जब दिल्ली एयरपोर्ट से गुजरना हुआ तो मुझे अपने कुछ उच्च अधिकारियों को भेंट करने के लिए पुस्तकें लेनी थीं। तीन पुस्तकें लीं। एक हिंदुत्व पर थी, किसी अमेरिकन लेखक (भारतीय मूल के) ने अपने बच्चे को सरल भाषा में हिंदुत्व क्या है, समझाने के लिए लिखी थी। एक पुस्तक सद्गुरु की इनर इंजीनियरिंग थी। तीसरी पुस्तक हॉवर्ड बिज़नेस रिव्यू का १०० इयर्स वाला संकलन था।

हर पुस्तक का अपना महत्व था, पहली पुस्तक भेंट के लिए थी। विषय तो जिन्हें देनी थी, उनके अनुकूल था, पर दिक्कत यह हुई कि इंग्लिश भाषा में थी। पर यह सोचकर कि भेंट में भावना देखी जाती है, न कि ऐसे नीर-क्षीर विवेक लगाया जाता है। उम्मीद है, उन्हें पसंद आई होगी।

दूसरी पुस्तक अपने लिए थी। एक समय के बाद व्यक्ति को ओशो भी अच्छे लगने लगते हैं, अध्यात्म में बड़ा मन लगता है। ऐसा ही कुछ मेरे साथ हो रहा है। सद्गुरु पर पहले एक पुस्तक पढ़ चुका था। किसी लेखिका की बड़ी अच्छी बुक थी। काफी रोचक और तथ्यों के साथ। शायद उनकी जीवनी थी। गौरतलब है कि सद्गुरु (जग्गी वासुदेव) को पहले-पहल मैंने सामान्य ज्ञान के एक तथ्य के रूप में जाना था। उन्हें उस साल पद्म विभूषण मिला था। भारत रत्न के बाद, दूसरे नंबर का पुरस्कार। ऐसे में जानना तो बनता था कि आखिर उनका क्या योगदान है, तब जाना।

पीछे बंगलौर भी जाना हुआ, वक़्त भी था, पर वहाँ न गया जहाँ जाने के लिए लोग लालायित रहते हैं। गुरु, संत, महात्मा के प्रति सम्मान भी है, पर भीतर कहीं न कहीं आशंका भी रहती है कि सब व्यापार है। खैर, हम किसी पर कोई टिप्पणी करने के योग्य कहाँ। जब मैंने इनर इंजीनियरिंग पुस्तक देखी, वो भी हिंदी में, तो तुरंत खरीद ली। काफी नाम सुन रखा था।

क्या गजब पुस्तक मिली। बेहतरीन, लाजवाब, सच में यह पुस्तक पढ़कर बड़ा मजा आया। यह अलग बात है कि मतलब की बातें अंत के कुछ पेज में हैं। इससे जुड़ी एक बड़ी रोचक कहानी है। पीछे, हमारे यहाँ एक अति उच्च अधिकारी का दौरा हुआ। मैं परेशान कि उन्हें कुछ तो देना है। ख्याल आया कि यह इनर इंजीनियरिंग ही पढ़कर दे देता हूँ। यहाँ और कुछ भी तुरंत भेंट करने योग्य वस्तु का मिलना बड़ा कठिन है। इसके चलते मैंने २०० पेज से अधिक की किताब न केवल दो रातों में पढ़ी, वरन् उसके नोट्स भी अपनी डायरी में बनाए। इस तरह से पढ़ी किताब भेंट के तौर पर दे दी। अब इसमें मुझे शर्म भी न आती कि पढ़कर देना कितना उचित है।

तीसरी पुस्तक इस मायने में विशेष है कि यह अब तक मेरी खरीदी पुस्तकों में सबसे ज्यादा मूल्य की है। पुस्तक में 30 लेख हैं और यह 1600 रुपये की है। मैंने खूब सोचा, इससे पहले की सबसे कीमती पुस्तक कोई याद न आई। UPSC की परीक्षा भी पास कर ली, पर इस स्तर पर किताबें न खरीदीं। मैंने सुना है, डॉक्टरों और इंजीनियरिंग की पुस्तकें काफी महँगी आती हैं। मेरी जानकारी में UPSC की शायद ही कोई पुस्तक 1000 रुपये से ऊपर आती हो।

खैर, काफी देर सोचा, फिर ले लिया। हॉवर्ड का नाम काफी है। विषय अलग-अलग हैं और काफी रोचक और शोधपरक हैं। चूँकि इंग्लिश में है, इसलिए पढ़ने की गति उतनी तेज न है।

मुझे यहाँ एक बहुत अच्छा पुस्तकालय भी मिल गया, जिसमें हिंदी की बेहतरीन किताबें हैं, प्रायः राजा राम मोहन राय, कोलकाता के सौजन्य से भेंट की हुई। अगर आप किसी भी पुस्तकालय जाएँ और ऐसी भेंट वाली किताबें न मिलें, ऐसा न हो सकता है। काफी सारी पढ़ी हुई किताबें फिर से पढ़ रहा हूँ और बहुत आनंद भी आ रहा है।

इन्हीं में एक किताब, विमल मित्र द्वारा संपादित अज्ञेय का गद्य संकलन, पढ़ा। 900 पेज से ऊपर, यह मेरी पढ़ी गई सबसे मोटी पुस्तकों में से एक होगी। शायद इतनी मोटी किताबें भी गिनी-चुनी होंगी। शेखर एक जीवनी (इतना प्रसिद्ध) होने के बावजूद अब पढ़ा गया है। पहले कोशिश की थी, पर भाषा की दुरूहता, क्लिष्टता ने पढ़ने न दिया।

यहाँ पुस्तकों के खंड अस्त-व्यस्त हैं। तस्लीमा नसरीन की आत्मकथा का चौथा खंड मिला तो ले आया और कुछ पन्ने पढ़कर वापस कर दिया। (सालों पहले भी ऐसा किया था, विवादित क्यों है, यह पढ़ना था, पर मिला नहीं तो मन न किया।)

नई पुस्तकों में बच्चन की आत्मकथा का चौथा भाग दशद्वार से सोपान तक भी है। बड़ी रोचक और प्रवाहमयी भाषा है, किसी भी दिन एक अच्छी बैठक में  खत्म हो जाएगी। बाकी खंड हो सकता है यहाँ न मिलें, पर मेरी प्रतीक्षा सूची में सबसे ऊपर रहेंगे।

मलयालम की साहित्यकार कमला दास की आत्मकथा, माय स्टोरी भी लाया। वजह इसका विवादित होना, और यह पढ़कर कि विवाद की वजह क्या थी, पूरा पढ़ने का मन न किया। इंग्लिश भाषा में होना भी एक वजह हो सकती है।

अंत में एक पुस्तक जो कि हिंदी सूक्ति संकलन है, तीन खंडों में प्रकाशित, बहुत बढ़िया किताब मिली। इसमें 1600 पुस्तकों से लगभग हर विषय पर 20000 अच्छी लाइन्स, कहावतें, शेर-शायरी आदि हैं। पुस्तकालय में जब किताब उलट-पलट रहा था तो एक उक्ति दिखी—

“अपनी प्रिय स्त्री, राजा, छोटे भाई और (उसका नाम न याद आ रहा) के पास खाली हाथ कभी न जाएँ।”

तो क्या इसी वजह से पुस्तकें भेंट करने की आदत है, भगवान जाने। शेष फिर कभी।

विदा।

© आशीष कुमार, उन्नाव।
२१ अक्टूबर, २०२६।

बुधवार, 16 सितंबर 2026

समुद्र की बेटी से एक यादगार भेंट


सुबह का समय था , स्टाफ ने बोला सर कोई मिलना चाहता है। एयरफोर्स से कोई ऑफिसर हैं। मैंने कहा भेज दीजिए  

 मेरे सामने  भारतीय वायुसेना की अधिकारी श्रद्धा पी. राजू थी। मैंने कहा कि आपका नाम सुना सुना लग  रहा है।  वो मुस्करायी। फिर बातचीत में पता चला कि वो उस काम से जुडी है , जिस पर upsc सामान्य अध्ययन का प्र्श्न बनाया था।   

श्रद्धा पी. राजू उस ऐतिहासिक महिला त्रि-सेवा समुद्री अभियान की उपनेता रही हैं, जिसमें भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना की महिला अधिकारियों ने त्रिवेणी नौका से विश्व की समुद्री परिक्रमा की। हजारों समुद्री मील की यात्रा, अनिश्चित मौसम, विकराल लहरें, सीमित साधन और अपने सामने फैला अनंत जल यह यात्रा केवल भौगोलिक दूरी तय करने का नाम नहीं थी। यह मनुष्य की सहनशक्ति, धैर्य और आत्मविश्वास की परीक्षा भी थी।

मैं उनसे समुद्र के बारे में पूछता गया और वे अपने अनुभव सुनाती गईं। कभी तेज हवाएँ, कभी ऊँची लहरें, कभी विश्राम का अभाव, कभी नौका में उत्पन्न तकनीकी कठिनाइयाँ। समुद्र में कोई ऐसी सुविधा नहीं कि आवश्यकता पड़ते ही किसी को बुला लिया जाए। वहाँ साथ चल रहे लोग ही एक-दूसरे का सहारा होते हैं। जो समस्या सामने है, उसका समाधान भी वहीं खोजना होता है।


उनकी बातें सुनते हुए मेरे मन में समुद्र की वह छवि बदल रही थी, जिसे हम प्रायः चित्रों में देखते हैं। दूर तक फैला नीला जल, स्वच्छ आकाश और क्षितिज पर डूबता सूर्य निस्संदेह सुंदर है; पर समुद्र का एक दूसरा रूप भी है कठोर, अनिश्चित और मनुष्य के अहंकार को बहुत शीघ्र छोटा कर देने वाला। शायद समुद्र यह सिखाता है कि प्रकृति से बड़ा कोई नहीं। और शायद वही समुद्र यह भी सिखाता है कि मनुष्य स्वयं को जितना कमजोर समझता है, वास्तव में वह उससे कहीं अधिक सक्षम है।

बातचीत स्वाभाविक रूप से शारीरिक क्षमता और सहनशक्ति की ओर भी गई। मैं काफी टाइम से फिटनेस के लिए कुछ न कुछ करता रहता हूँ , किसी उल्लेखनीय स्तर तो न कुछ किया पर अब जीवन शैली में फिजिकल एक्टिविटी के अटूट हिस्सा बना गया है।  लंबी दूरी की दौड़ में मेरी अपनी रुचि होने के कारण यह विषय मुझे और भी प्रिय लगा। मैंने अनुभव किया है कि लंबी दौड़ केवल पैरों से नहीं दौड़ी जाती। एक निश्चित दूरी के बाद शरीर पीछे हटने लगता है और मन को आगे आकर नेतृत्व करना पड़ता है। 

श्रद्धा जी से बातचीत के बाद अपनी रोजमर्रा की कठिनाइयाँ भी कुछ छोटी लगने लगीं। हम कभी नींद कम होने पर परेशान हो जाते हैं, कभी मौसम को दोष देते हैं, कभी थकान को और कभी परिस्थितियों को। पर महीनों तक खुले समुद्र में रहना शायद मनुष्य को यह सिखा देता है कि असुविधा और कठिनाई में बहुत अंतर होता है।

ऐसी यात्राएँ केवल शरीर को नहीं तपातीं, मन को भी नया आकार देती हैं। घर, परिवार, सामान्य भोजन, मीठा जल, शांत नींद जिन चीजों को हम सहज उपलब्ध मानते हैं, उनका महत्व शायद तब सबसे अधिक समझ में आता है जब वे सहज उपलब्ध न हों। इतनी बड़ी उपलब्धि के बाद भी श्रद्धा पी. राजू की सहजता और सरलता ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया। मुझे लगा कि वास्तविक उपलब्धियाँ मनुष्य को ऊँचा अवश्य उठाती हैं, किंतु यदि व्यक्तित्व सचमुच बड़ा हो तो उसके पैर जमीन पर ही रहते हैं।

मैंने कहा आप ने वास्कोडिगामा , कोलम्बस वाला काम कर दिखाया है। वो मुस्कुरायी। आज की यह भेंट मेरे लिए केवल एक अधिकारी से मुलाक़ात नहीं थी। यह साहस, अनुशासन, सहनशक्ति और नारी सामर्थ्य से एक छोटा-सा साक्षात्कार था। चलते वक़्त मैंने उन्हें कुछ सलाह दी जैसे कि अपनी इस यात्रा को शब्दबध्द करिये , किसी पुस्तक के रूप में इस साहसिक यात्रा को पढ़ना , तमाम लोगो को लिए प्रेरणा बनेगा। दूसरा किसी पॉडकॉस्ट में भी इसे बतलाइये। 

click here to know more about her.

© आशीष कुमार, उन्नाव

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

How I cracked Ias exam

 मैंने आईएएस की परीक्षा कैसे पास की


    काफी समय से अपने ब्लॉग पर लिखता आ रहा हूँ। वर्षों में इतनी सामग्री जमा हो गई है कि उससे शायद 10 किताबें तक तैयार हो सकती हैं। लिखना तो लगातार होता रहा, लेकिन उन्हें पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने के लिए समय और मन दोनों एक साथ नहीं मिल पाए।

    अब कुछ समय मिला है, तो पुराने लेखों को फिर से पढ़ने, सँवारने, विषयवार जोड़ने और किताब का रूप देने में मन लग रहा है।सच कहूँ तो अपनी वर्षों पुरानी रचनाओं को एक-एक करके पुस्तक बनते देखना अपने आप में एक अलग ही सुख है।

    शायद लेखन की भी अपनी यात्रा होती है पहले विचार आते हैं, फिर शब्द बनते हैं, वर्षों तक कहीं सुरक्षित पड़े रहते हैं और एक दिन वही शब्द पुस्तक बनकर नई यात्रा शुरू करते हैं।अभी शुरुआत है… बहुत-सी पुरानी रचनाएँ और कई पुस्तकें अपनी बारी का इंतज़ार कर रही हैं।धीरे-धीरे उन्हें भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास रहेगा।







मैंने आईएएस की परीक्षा कैसे पास की’ केवल सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी संबंधी पुस्तक नहीं, बल्कि लंबे संघर्ष, आत्मविश्वास और निरंतर सीखने की एक यात्रा है। लेखक आशीष कुमार ने सामान्य ग्रामीण पृष्ठभूमि, सीमित संसाधनों और सरकारी नौकरी के साथ तैयारी करते हुए लगभग नौ वर्षों तक संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा का सामना किया और अपने अंतिम प्रयास में सफलता प्राप्त की। पुस्तक इसी वास्तविक अनुभव से निकले व्यावहारिक सूत्रों को सरल हिंदी में प्रस्तुत करती है।

पुस्तक के 40 अध्याय लक्ष्य निर्धारण, समय-प्रबंधन, पढ़ने की सही पद्धति, पुनरावृत्ति, उत्तर-लेखन, मुख्य परीक्षा की रणनीति, समाचारपत्रों के उपयोग, एकाग्रता, अध्ययन-कक्ष, समय-सारिणी, व्यक्तित्व विकास और आत्मअनुशासन जैसे विषयों पर केंद्रित हैं। लेखक बार-बार यह स्पष्ट करते हैं कि सफलता किसी एक कोचिंग, पुस्तक, रणनीति या असाधारण प्रतिभा पर निर्भर नहीं होती; अपनी परिस्थितियों को समझकर लगातार प्रयास करना अधिक महत्वपूर्ण है।

इस पुस्तक की विशेषता इसका अनुभवजन्य और आत्मीय स्वर है। असफलताओं, सीमाओं और कठिनाइयों को छिपाने के बजाय लेखक उन्हें सीख में बदलते हैं। इसलिए यह पुस्तक केवल यूपीएससी अभ्यर्थियों के लिए नहीं, बल्कि हर उस विद्यार्थी और युवा के लिए उपयोगी है जो बड़े लक्ष्य के लिए धैर्य, अनुशासन और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहता है।

आशीष कुमार, उन्नाव .


गुरुवार, 3 सितंबर 2026

कृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर मेरा पहला Kindle eBook प्रकाशित


प्रिय मित्रों , आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं। 

    आज मेरे लिए अत्यंत हर्ष और भावनाओं से भरा दिन है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव श्रीकृष्ण जन्माष्टमीके पावन अवसर पर मेरा पहला उपन्यास Kindle eBook के रूप में प्रकाशित हुआ है।

    लेखन मेरे लिए केवल शब्दों को पन्नों पर उतारने का माध्यम नहीं है, बल्कि जीवन के अनुभवों, भावनाओं, स्मृतियों और मन में उठते प्रश्नों को पाठकों तक पहुँचाने की एक यात्रा है। लंबे समय से हिंदी साहित्य, विशेषकर उपन्यासों, के प्रति मेरा गहरा लगाव रहा है। आज उसी लगाव ने मुझे लेखक के रूप में अपना पहला कदम रखने का अवसर दिया है।

    यह पुस्तक मेरे लिए केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि अनेक विचारों, कल्पनाओं और संवेदनाओं का संकलन है। आशा है कि इसके पात्र, घटनाएँ और भावनाएँ पाठकों के मन को छुएँगी तथा उन्हें सोचने के लिए कुछ नए प्रश्न देंगी।

    श्रीकृष्ण का जीवन हमें कर्म, प्रेम, साहस और सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। इसी शुभ दिन पर अपनी पहली ई-पुस्तक का प्रकाशन मेरे लिए ईश्वर का आशीर्वाद और एक नई साहित्यिक यात्रा की शुरुआत है।







    मैं अपने परिवार, मित्रों, शुभचिंतकों और सभी पाठकों का हृदय से आभारी हूँ, जिन्होंने मुझे निरंतर प्रोत्साहित किया। आप सभी से विनम्र अनुरोध है कि मेरी Kindle eBook पढ़ें और अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया अवश्य साझा करें।आपका स्नेह और सुझाव मेरी आगामी रचनाओं के लिए प्रेरणा बनेंगे।

पुस्तक का नाम: Hari Cigarette

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लेखक: आशीष कुमार
Kindle पर उपलब्ध

संपर्क: ashunao@gmail.com
ब्लॉग: https://asheeshunnao.blogspot.com/


     पुस्तक कैसे खरीदें और पढ़ें?

पाठक Amazon पर पुस्तक का नाम “Hari Cigarette” खोजकर इसे खरीद सकते हैं। खरीदने के बाद Kindle
eBook उसी Amazon खाते की Kindle Library में उपलब्ध हो जाएगी।

इसे पढ़ने के लिए अलग Kindle मशीन लेना आवश्यक नहीं है। पाठक अपने मोबाइल या टैबलेट में मुफ्त Amazon Kindle App डाउनलोड करके, उसी Amazon खाते से Sign In कर, पुस्तक पढ़ सकते हैं। इसे Kindle e-Reader या कम्प्यूटर के ब्राउज़र पर Kindle Cloud Reader के माध्यम से भी पढ़ा जा सकता है।

पाठकों से विनम्र अनुरोध

पुस्तक पढ़ने के बाद कृपया Amazon पर अपनी ईमानदार समीक्षा (Review) और रेटिंग अवश्य दें। आपकी प्रतिक्रिया नए पाठकों तक पुस्तक पहुँचाने में सहायता करेगी और मेरे आगामी लेखन के लिए प्रेरणा बनेगी।

आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए हृदय से धन्यवाद।

— आशीष कुमार, उन्नाव





बुधवार, 26 अगस्त 2026

चंद्रकांता की कहानी

लघु लेख :- चंद्रकांता की कहानी 

- आशीष कुमार 

    जब मैं उन्नाव पढ़ने गया तो सबसे पहले  वहां के  राजकीय पुस्तकालय में सदस्यता ली।  2003 की बात होगी। वहाँ सबसे पहले जो पुस्तक माँगी वो देवकीनंदन खत्री जी रचित चंद्रकांता माँगा। इससे पहले मैंने मौरावां के पुस्तकालय में भी इसे खोजा था पर मिला न था। 

    उन्नाव के इस पुस्तकालय में सदस्य भी यह पूछकर बना था कि क्या चंद्रकांता उपन्यास  मिलेगा। जब पता चला कि यह यहां उपलब्ध है तो उसी दिन जो भी जो भी शर्ते व नियमावली थी , उसी दिन पूरी की और शाम को उसके दो भाग लेकर अपने कमरे आया। उन दोनों को पढ़कर अगले दिन जब मैं उन्हें वापस करने गया तो वहाँ काम करने वाली लड़कियाँ (इंटर्न ) हैरान थी। मैंने उन्हें और हैरान करते हुए अगले दो भाग लेकर चला आया। इस नावेल को खत्म करने के बाद , खत्री जी ऐसा जादू चला कि उनके लिखे दो नावेल चंद्रकांता की संतति और भूतनाथ जल्द ही  पढ़ डाले।  

चंद्रकांता का जादू टीवी से जुड़ा था , जब यह दूरदर्शन पर हर रविवार सुबह ९ बजे से १० बजे की बीच आया करता था। उन दिनों गांव में सबके घर टीवी न हुआ करती थी और बिजली की भी दिक्क्त  रहती  था। कुछ  एपिसोड देखे थे और कुछ एपिसोड छूट गए। ऐसे में उनकी याद बनी रही। सीरियल में एक से बढ़कर कलाकार थे। मुझे तेज सिंह का किरदार सबसे अच्छा लगता था , अब याद भी न  है कि वो वैसे था कौन। इरफ़ान खान को  फिल्मों में बाद में जाना , पहले पहल बद्रीनाथ के रूप में उन्हें देखा था। उस सीरियल में सबसे आकर्षक अय्यार थे , कोई किसी का भी रूप धर लेता था। 



    उन बचपन के दिनों में हम मित्र मण्डली की चर्चा का विषय यह हुआ करता था कि कौन सा अय्यार सबसे शक्तिशाली है , या टीम बनाई जाये तो कौन जीतेगा।

    वैसे मैने  जब खत्री जी का नावेल पढ़ा तो देखा यह तो सीरियल से काफी अलग है। बाद के सालों में कमलेश्वर जी साहित्य को पढ़ने के दौरान जाना की टीवी के लिए चंद्रकांता १९९४ में , कमलेश्वर जी ने लिखी थी जो कि मूल स्वरुप से काफी अलग है।

    आपको पता है , देवकीनंदन खत्री जी ने अपने नावेल से तिलस्म का ऐसा जादू बिखेरा था कि सिर्फ चंद्रकांता को पढ़ने के लिए कितने ही लोगों ने देवनागरी लिपि सीखी। सोचो , आज के ai के दौर में जब हर चीज , हर भाषा का अनुवाद सेकंड में उपलब्ध है , एक दौर ऐसा भी था जब लोगों पढ़ने में इतनी रूचि हुआ करती थी कि लोग उपन्यास पढ़ने के लिए लिपि व भाषा सीखने को तत्पर थे। 

यह लेख खत्म करू कुछ और भी याद आ गया। राजकीय पुस्तकालय , उन्नाव जोकि कचहरी के पास है , उसके और डाकघर के बीच में तमाम गुमटी हुआ करती थी। उनमें एक गुमटी मेरी बड़ी प्रिय थी। वहाँ नावेल  १ रूपये के किराये पर मिला करते थे। मेरठ के छपने वाले अपराध , प्रेम और जासूसी नावेल का बड़ा भंडार हुआ करता था। उसकी कहानी , फिर किसी रोज. 

क्या आपको चंद्रकांता सीरियल याद है और आपका सबसे प्रिय किरदार कौन सा था।  


©आशीष कुमार , उन्नाव।  

२६ अगस्त , २०२६ ,   


गुरुवार, 13 अगस्त 2026

TEA and Maska Bun

 

चाय और मस्का बन 

आशीष कुमार

तमाम बार कुछ विषयों पर लिखते हुए ऐसा लगता है , इस पर लिख चुका हूँ। पीछे पलटकर देखने की आदत न है इसलिए चेक भी न करता हूँ।  पर फिर सोचता हूँ कि अगर लिखा भी होगा तो क्या हुआ , इस बार कुछ नया होगा। 

जितना मुझे याद आता है , मस्का बन से पहला परिचय , इलाहाबाद में हुआ था। एक टाइप टेस्ट देने गया था। अरविन्द ( कमांडेंट , SSB ) के पास हॉस्टल में रुका था। सुबह पास के चौराहे पर चाय पीने गए , वही पहली बार मस्का बन खाया। काफी बड़ा था। चाय खत्म हो गयी वो न खत्म हुआ। फिर तमाम जगहों पर खाया और चाय के साथ खाने के लिए मेरी पसंदीदा चीजों में वो एक है।  

कई बार चाय को देश का राष्ट्रीय पेय पदार्थ कहते है। पिछले दिनों , लखनऊ में शर्मा जी चाय पर जाना हुआ। मस्का बन , समोसा और कुल्हड़ वाली चाय। काफी दिनों बाद , अच्छी चाय पी। 



अहमदाबाद के दिनों में भी कुछ चाय की टपरी फेमस थी। एक सरखेज गाँधी नगर हाईवे पर खेतला आपा की चाय , दूसरा स्पीपा के बाहर वाली टपरी , तीसरा शुभ लाइब्रेरी के पास वाली कड़क चाय। खेतला आपा  वाली चाय बहुत विशाल मात्रा में बनती थी। हमेशा लाइन लगी रहती थी। पूरी पूरी रात वहाँ भीड़ रहती। 



स्पीपा के पास वाली चाय पर सिविल सेवा की तैयारी कर रहे लोगो की भीड़ रहती थी। मेरा उधर कभी-कभी ही जाना होता था। देखा जाए तो शुभ लाइब्रेरी वाली चाय मैंने सबसे ज्यादा पी होगी। बहुत कड़क चाय होती थी। चाय बनाने वाला , घंटो चाय में चमचा डाल कर उसे घोटता रहता।  घंटो असर रहता था उसका। दोपहर में एक गिलास चाय , देर शाम तक दिमाग को एक्टिव रखती थी। 

मुझे अब याद आया , उन्नाव के दिनों में बहुत ज्यादा चाय पीता था। उन दिनों , लोगों के घर जाकर टूशन पढ़ाने का काम था। लगभग हर जगह चाय दी जाती थी। उस चाय के सहारे , 5 से 6  घंटे , सायकल से एक घर से दूसरे घर जाना होता था। कई बार चाय और नाश्ता इतना ज्यादा हो जाता था कि घर आकर खाना बनाने और खाने का मन न होता था।  आज पीछे पलट के देखता हूँ तो खुद को ही यकीन न होता है कि वैसे भी दिन थे क्या ?

" हमने जो गुजारी है , 

तुम पर गुजरती तो 

तुम गुजर ही जाते " 


 तो चाय पीने का कोटा , कई साल पहले ही पूरा हो चुका था। अब एक चाय भी भारी लगती है , पेट में एसिड सा बनने लगता है।  इसलिए इन दिनों , कॉफ़ी पसंद आती है. सुबह-सुबह खुद से बीन्स ग्राइंड करके , खुद से  ब्लैक कॉफ़ी पीना एक आदत बन चुकी है।

© आशीष कुमार, उन्नाव। 

13 अगस्त , 2026 .  










मंगलवार, 11 अगस्त 2026

7 YEARS IN AHMEDABAD



7 साल अहमदाबाद में (०१) 


जनवरी 2012 की एक रात मैंने जब साबरमती ट्रेन अहमदाबाद के लिए पकड़ी थी तो मैं पूरी तरह से निश्चित था कि बस कुछ महीने की जॉब है , जल्द ही नई नौकरी मिलेगी और मैं अहमदाबाद छोड़ दूँगा। वो  समय मेरे जीवन कुछ ऐसा समय था जब मुझे हर साल नई नौकरी मिल रही थी। एक नौकरी ज्वाइन करता तो अगली बड़ी नौकरी का रिजल्ट आ चूका होता। मैं सेंट्रल एक्साइज एंड कस्टम विभाग में इंस्पेक्टर बन चूका था। सिविल सेवा 2011 की मुख्य परीक्षा  अच्छी गयी थी और मैं उम्मीद कर रहा था कि जल्द ही परीक्षा पास कर लूँगा।  

कुछ महीने बाद इंटरव्यू कॉल भी आ गयी। अब उम्मीद बढ़ गयी थी।  मेरी वर्तमान जॉब बढ़िया थी , शहर बढ़िया था पर मन संतुष्ट न था। मैंने UPSC को कम करके आँका था। इंटरव्यू तो फेल हुआ ही , अगले साल का PRE एग्जाम भी फेल हो गया। मुझे ठीक से याद है वो जुलाई 2012  के आखिरी दिन थे। जिस दिन PRE का रिजल्ट आया , बहुत बड़ा सदमा लगा कि अब इस अजनबी शहर में रहना पड़ेगा। 

उन दिनों मैं मेम नगर एरिया में रहता था। उसी दिन शाम को हिमालया मॉल गया और क्रोमा स्टोर  से एक लैपटॉप खरीदा। उसके बाद दिसंबर 2012  तक जी भर कर फिल्में देखी। टोरेंट का दौर था। हिंदी , अंग्रेजी फिल्मों के साथ चीनी ,कोरियन , जापानी फिल्में देखता गया। मन में यह था कि इतना फिल्में देखो कि उनसे ऊब जाओ। क्या दिन , क्या रात , फिल्में चलती रही और समय गुजरता रहा।

जीवन  के साथ प्रयोग करने की पुरानी आदत थी । इससे पहले के दौर में फिल्मों की तरह नॉवेल , कथा कहानी का पढ़ने का जूनून सवार हुआ था। दिन / रात , महीने साल केवल एक ही काम पढ़ना। हिंदी , बंगाली , मलयालम , मराठी , कन्नड़ , रुसी मतलब अनुवाद में जो मिले बस पढ़ जाओ।  पहले इन चीजों का जिक्र किया करता था कि इतने नावेल पढ़ चूका हूँ पर अब लगता है कि उनका का कोई मतलब नहीं। मैंने जो भी नावेल पढ़े थे वो केवल मनोरंजन की दृष्टि से पढ़े थे। अगर आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ता तो शायद कुछ और ही व्यक्तित्व होता। 


अहमदाबाद मेरे लिए अजनबी जगह थी। उन दिनों मुझे इस शहर में सबसे ज्यादा जो चीज हैरान करती थी वो यह कि इस शहर में साइकिल से चलने वाले लोग न के बराबर है। सड़कों पर दो पहिया से ज्यादा चार पहिया वाले वाहन थे। घर कम थे , फ्लैट अधिक। शहर में समृद्धि हर तरफ देखी जा सकती थी। मैं उत्तर प्रदेश के एक सामान्य जिले से लम्बा ग्रामीण जीवन जीकर आया था। इसलिए शहर के साथ ताल मेल जल्द न बैठा सका। 

हम जहाँ रहते थे वहाँ से कुछ दुरी पर ही अहमदाबाद का सुप्रसिद्ध ड्राइव इन सिनेमा था। प्रायः मैं, मनोज श्रीवास्तव के साथ टहलते हुए फिल्म देखने चले जाते। मनोज श्रीवास्तव हमारे जिले उन्नाव से ही थे। हम पहले से परिचित थे और यहाँ पर भी एक ही विभाग में सहकर्मी थे। इसके चलते ज्यादा अहमदाबाद के शुरुआती साल ज्यादा कठिन न लगे।  

जहाँ मैं रहता था वहाँ से ऑफिस 2 किलोमीटर दूर था। दोनों ही साल मैं पैदल ही ऑफिस आता जाता रहा। इस समय मैं फील्ड में जॉब कर रहा था। मेरा काफी लोगों से मिलना होता , अक्सर मुझे लोग कहते कि " फिर मिलेंगे" मैं उन्हें हाँ भी करता पर मैं जानता था कि मैं उनसे कभी नहीं मिलूंगा।

कुछ दिन तक हमने बाहर होटल में खाना खाया। अहमदाबाद में मुझे एक और अनोखी चीज लगी। यहाँ पर अनलिमिटेड थाली का चलन खूब था। हर बजट के लिए थाली। 50 रूपये से लेकर 100 रूपये वाली। उन्हीं दिनों एक होटल पर  हार्दिक थककर से मुलाकात हुयी। दरअसल मैं और मनोज खाने के बाद कुछ upsc पर बात कर रहे थे। उन बातों को सुनकर हार्दिक ने हमसे बात की पहल की। हार्दिक से लम्बी और गहरी दोस्ती हुयी। उनसे जुडी इतनी बातें है कि उन पर अलग से पोस्ट लिखी जा सकती है। लिखूंगा कभी। इन दिनों वो इसरो में क्लास वन अधिकारी है। उनकी कहानी भी बड़ी मोटिवेशनल है।


बाद में मैंने अपने रूम में खाना बनाने लगे। मैं और मनोज दोनों ही खाना बनांने में कुशल थे। होटल में अधिक दिन खाना सेहत के लिहाज से अच्छा न था। उसी साल कुंदन कुमार से भी परिचय हुआ। वो हमारे विभाग में ही थे और हमसे सीनियर थे। उस साल मैं pre फेल हुआ था और उनका पहली बार मैन्स देने का अवसर था। यह भी अजीब बात है कि हम पहली बार मुखर्जी नगर के एक रूम में मिले। वो दिल्ली में कोचिंग के लिए थे और संयोग से मैं भी किसी काम से दिल्ली गया था।


 इसके बाद मुझे अपने ऑफिस के मुख्यालय में पोस्ट दी गयी। यह ऑफिस , मेरे रूम से लगभग 5 किलोमीटर दूर था। इतनी दूर पैदल जाना संभव न था। काफी दिनों से एक अच्छी साइकिल लेने का मन था। जल्द ही एक गियर वाली काफी महॅगी साइकिल खरीद ली। रेड कलर की साइकिल से घूमने में खूब मजा आता था। कुछ दिन ऑफिस उससे गया। जल्द ही मुझे अहसास हुआ कि इससे इज्जत की बाट लग जाएगी। जिस ऑफिस में बहुतायत लोग कार से आते थे और कुछ लोग मोटर साइकिल से आते थे वहां पर साइकिल से जाना मुझे अजीब लगने लगा। कभी कभी सोचता कि अगर कोई कुछ कहेगा तो बोल दूंगा कि मेरे एक महीने की सैलरी से बाइक मिल जाएगी पर जल्द ही मुझे बाइक लेनी पड़ी।

बाइक लेने का सबसे प्रमुख कारण , अहमदाबाद का ट्रैफिक था। दूसरा साइकिल बहुत नाजुक थी। अक्सर उसमें कुछ न कुछ  बिगड़ने भी लगा था। साइकिल के दिनों सबसे ज्यादा फ़ायदा मुझे अपनी बेली पर दिखा। उतना फ्लैट कभी नहीं रहा। मुझे आज भी लगता है कि फिटनेस के लिए साइकिल से बेहतर कोई चीज नहीं।

© आशीष कुमार , उन्नाव , उत्तर प्रदेश। 







































हरे पत्थर वाली अँगूठी

कविता : -हरे पत्थर वाली अँगूठी 

    उसके संघर्ष के 
दिनों में
किसी ने दी थी 
 एक चांदी 
की अँगूठी 
जिसमें जड़ा था
हरा पत्थर,

पत्थर सौभाग्य का
व अंगूठी उनके
मूक प्रेम का प्रतीक
थी, जिसे उसने
पहना बड़े चाव से
कुछ दिनों या 
फिर कुछ
महीनों तक

फिर उसने 
अंगूठी को सम्भालकर
रख दिया,
उस डिब्बे में
जहाँ वो रखता था
अपनी सबसे कीमती चीजें

जीवन अपनी
गति से चला
वो उससे तेज चला
इस कदर की तेजी
कि सब पीछे छोड़ते हुए
उसे पहुँचना था आसमान

हरे पत्थर  वाली अंगूठी 
जोकि मौन प्रेम व
सौभाग्य की प्रतीक थी
उसे खूब फली,
उसे दी नित नई
उचाईयां।

आसमान की ऊचाइयों
से उसे एक दिन
जब उसे अपना
संघर्ष भरा अतीत
याद आया तो
उसने पाया कि


इस सुहाने सफर
में वो अँगूठी
जाने कब कहाँ
खो गयी,
ठीक उनके मूक
प्रेम की तरह ।

©आशीष कुमार, उन्नाव।
19 मई 2021।

रेशमी बाल

कविता : रेशमी बाल

प्रिय तुम्हारे चमकते 
रेशम जैसे बाल,
छितरे रहते ज्यों
आकाश में
घने काले बादल ।

बड़ा सुखद लगता है
उनमें अगुलियां फेरना,
लेना उनकी खुसबू
खूब गहरे, भीतर तक।

प्रिय जब जब तुम
मेरे करीब होती हो,
अक्सर उलझ जाते हैं
मेरे हाथ, अगुलियां।

प्रिय जब तुम विदा लेती हो
छूट जाते है अक्सर
कुछ एक बाल, मेरे साथ
जो हर वक़्त याद दिलाते हैं
कि तुम मेरे साथ हमेशा हो
अटूट, अभिन्न, अविभाज्य।

14 जनवरी, 2020
©आशीष कुमार, उन्नाव।




सोमवार, 10 अगस्त 2026

Share Market

 

शेयर मार्केट - एक कथा 

- आशीष कुमार ,

    पिछले दिनों की बात है , एक मित्र के साथ नगरपालिका मार्किट , कनाट पैलेस में कुछ खाने गए थे। एंट्री गेट पर गार्ड , भले  मेरी तलाशी ले रहा था, पर उसकी नजर मोबाइल की स्क्रीन पर थी। शेयरमार्किट के चार्ट पर उसकी नजर थी। मैंने अपने साथी से कहा देखा, इसे। मेरे दिमाग में चलने लगा कि इसकी कितनी सैलरी होगी और इसका कितना बड़ा पोर्टफोलियो होगा। 

    दूसरा वाकया और भी बढ़िया है , जहाँ मैं बाल कटाने जाता हूँ , उसके मालिक/कारीगर की बात। वैसे तो वहाँ एक दर्जन कारीगर होंगे पर मेरे बाल वही काटता है। उसी दौरान शेयर मार्केट की बात होती है। मुझे उसकी बातें बड़ी हैरान करती है। पहला कि वो विदेशी बाजार ( अमेरिकी ) में इन्वेस्ट करता है , उसकी वजह डालर और रुपए के अंतर् को बताता है। वो टेस्ला की बात करेगा , एलन मस्क की बात करेगा। 



ऐसी वैसी बातें भी नहीं , काफी गहन और शोधपरक। इतनी गहरी कि मुझे कुछ देर हाँ हूँ करने के बाद , उसकी बस बातें सुननी होती है। एक दिन कहने लगा , मस्क की कम्पनी  एम्प्लोयी पर कैपिटल में सबसे अच्छी है , मै हैरान था कि ये बाल काटने वाला है या कोई नामी गिरामी इन्वेस्टर। फिर उसने tcs जैसी कंपनी से तुलना करके बताया कि ये एम्प्लॉय और ग्रॉस कैपिटल का रेश्यो क्या होता है। मस्क की वो ब्रेन वाली कम्पनी का भी काफी ज्ञान दिया। उसके बारे में पढ़ा जरूर है पर जिसका नाम मैं बार बार भूल जाता हूँ। 

some poems by me

फिर एक दिन मैंने उसका पोर्टफोलियो देख लिया, 70 लाख की वैल्यू का पोर्टफोलियो। २०१४  से सीमित ही सही पर शेयर मार्किट में ध्यान देने लगे  हैं पर इतनी बड़ी वैल्यू का पोर्टफोलियो , मैंने सामने  से तो किसी का  न देखा। इसके बावजूद वो मेरे बाल काटने में लगा था. उसका इंडियन शेयर मार्किट में इंट्रेस्ट जरा कम रहता है पर उसे इधर के तमाम नामी गिरामी शेयर के नाम , दाम सब मुँह जुबानी याद रहते है।  

शेयर मार्किट में ने न जाने कितने लोगो को बनाया है और कितने ही इसमें बर्बाद हुए है। मेरी इसमें सीमित समझ के आधार पर यह कह सकते है कि इसमें अंत में वही लोग बचे रहे हैं जो ट्रेडिंग और ऑप्शन ट्रेडिंग से दूर रहते है। लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट को छोड़ दे तो शेयर मार्किट  पूरी तरह से तुक्केबाजी है। 

check some stories

© आशीष कुमार , उन्नाव। 

10 अगस्त , 2026 









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