चाय और मस्का बन
आशीष कुमार
तमाम बार कुछ विषयों पर लिखते हुए ऐसा लगता है , इस पर लिख चुका हूँ। पीछे पलटकर देखने की आदत न है इसलिए चेक भी न करता हूँ। पर फिर सोचता हूँ कि अगर लिखा भी होगा तो क्या हुआ , इस बार कुछ नया होगा।
जितना मुझे याद आता है , मस्का बन से पहला परिचय , इलाहाबाद में हुआ था। एक टाइप टेस्ट देने गया था। अरविन्द ( कमांडेंट , SSB ) के पास हॉस्टल में रुका था। सुबह पास के चौराहे पर चाय पीने गए , वही पहली बार मस्का बन खाया। काफी बड़ा था। चाय खत्म हो गयी वो न खत्म हुआ। फिर तमाम जगहों पर खाया और चाय के साथ खाने के लिए मेरी पसंदीदा चीजों में वो एक है।
कई बार चाय को देश का राष्ट्रीय पेय पदार्थ कहते है। पिछले दिनों , लखनऊ में शर्मा जी चाय पर जाना हुआ। मस्का बन , समोसा और कुल्हड़ वाली चाय। काफी दिनों बाद , अच्छी चाय पी।
अहमदाबाद के दिनों में भी कुछ चाय की टपरी फेमस थी। एक सरखेज गाँधी नगर हाईवे पर खेतला आपा की चाय , दूसरा स्पीपा के बाहर वाली टपरी , तीसरा शुभ लाइब्रेरी के पास वाली कड़क चाय। खेतला आपा वाली चाय बहुत विशाल मात्रा में बनती थी। हमेशा लाइन लगी रहती थी। पूरी पूरी रात वहाँ भीड़ रहती।
स्पीपा के पास वाली चाय पर सिविल सेवा की तैयारी कर रहे लोगो की भीड़ रहती थी। मेरा उधर कभी-कभी ही जाना होता था। देखा जाए तो शुभ लाइब्रेरी वाली चाय मैंने सबसे ज्यादा पी होगी। बहुत कड़क चाय होती थी। चाय बनाने वाला , घंटो चाय में चमचा डाल कर उसे घोटता रहता। घंटो असर रहता था उसका। दोपहर में एक गिलास चाय , देर शाम तक दिमाग को एक्टिव रखती थी।
मुझे अब याद आया , उन्नाव के दिनों में बहुत ज्यादा चाय पीता था। उन दिनों , लोगों के घर जाकर टूशन पढ़ाने का काम था। लगभग हर जगह चाय दी जाती थी। उस चाय के सहारे , 5 से 6 घंटे , सायकल से एक घर से दूसरे घर जाना होता था। कई बार चाय और नाश्ता इतना ज्यादा हो जाता था कि घर आकर खाना बनाने और खाने का मन न होता था। आज पीछे पलट के देखता हूँ तो खुद को ही यकीन न होता है कि वैसे भी दिन थे क्या ?
" हमने जो गुजारी है ,
तुम पर गुजरती तो
तुम गुजर ही जाते "
तो चाय पीने का कोटा , कई साल पहले ही पूरा हो चुका था। अब एक चाय भी भारी लगती है , पेट में एसिड सा बनने लगता है। इसलिए इन दिनों , कॉफ़ी पसंद आती है. सुबह-सुबह खुद से बीन्स ग्राइंड करके , खुद से ब्लैक कॉफ़ी पीना एक आदत बन चुकी है।
© आशीष कुमार, उन्नाव।
13 अगस्त , 2026 .


