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शुक्रवार, 29 मई 2026
Nostalogia
शनिवार, 4 अप्रैल 2026
समय समय की बात है
समय समय की बात है
- आशीष कुमार
2014 के आस पास की बात है। उन दिनों फेसबुक पर बहुत सक्रिय हुआ करता था। फेसबुक के जरिये उनसे जुड़े। वो उस साल आईपीएस में चयनित हुए थे। अहमदाबाद में ही थे वो , जितना मुझे याद आता है , किसी चयनित व्यक्ति से रूबरू होने के वो गिने चुने अवसर में एक था। उन दिनों कस्टम हाउस , अहमदाबाद में एक्साइज इंस्पेक्टर के तौर पर जॉब कर रहा था। वही वो मिलने आ गए , मै बड़े गर्व से बाकि लोगो से परिचय कराया कि ये मेरे मित्र है और इनका इसी साल आईपीएस में चयन हुआ है।
विदाई के वक़्त हम ऑफिस के बाहर चाय की एक टपरी पर खड़े होकर चाय पी रहे थे तो वो बोले ये अपना ही कोई भाई बंधू होगा। वो पीछे राजस्थान से थे और तमाम लोग अहमदाबाद में ऐसे काम किया करते थे। उनका कहने या जतलाने का आशय यह था कि वो बड़ी सामान्य पृष्टभूमि से आते थे। मुझे हमेशा से यह चीज बड़ी आकर्षित करती थी ,वही भाव राजा का बेटा अगर राजा बना तो क्या बड़ी बात हुयी , बड्डपन तो वो है कि किसान का बेटा राजा बने।
हम सम्पर्क में बने रहे। 2015 वाले upsc के मैन्स में अहमदाबाद वाले सेंटर पर फिर मिलना हुआ , वही अंतरंगता , प्रेमभाव के साथ वो मिले। उस साल भी वो दोबारा से चयनित हुए , आईपीएस में ही हिमाचल कैडर मिला। पीछे 2014 वो उत्तर प्रदेश कैडर में आईपीएस चुने गए थे। उसके बाद शायद उन्होंने ने एग्जाम न दिया और उत्तर प्रदेश में ही जॉब करने लगे।
अलीगढ़ में वो पोस्टेड थे। कभी कभी बात हो जाती थी। मेरा भी 2018 में चयन हो गया था। अब ज्यादा आत्मविश्वास के साथ सम्पर्क था। अलीगढ़ के दिनों में ही एक मित्र रविंद्र यादव का फोन आया। एक सिफारिश थी, आज सोचता हूँ कि ऐसी सिफारिश अगर आज आये तो एक पल में मना कर दू। सिफरिश थी- किसी की मौत हो गयी थी और परिवार वाले पोस्टमार्डम न कराना चाह रहे थे। जब से क्राइम तक पर शम्स की स्टोरी सुनना शुरू किया तब से ये समझ आ गया कि पोस्ट मार्डम जरूर कराना चाहिए , खास तौर पर जब घर वाले मना कर रहे हो। मैंने अपने उसी आईपीएस मित्र से बात हुयी और उनका काम हो गया।
एक और घटना याद आती है , वो महोबा में पोस्टेड थे। अपने प्रदेश में जितने आईएएस, आईपीएस से सम्पर्क होता है , कही न कही मुँह से निकल ही जाता है। अमुक हमारे बड़े खास है कुछ ऐसा। एक हमारे परिचित या यूँ कहे दूर के रिश्तेदार उसी जिले में परिवहन विभाग में बड़े अधिकारी थे। उनका फोन आया कि आप पुलिस कप्तान साहब को जानते हो क्या ? मेरे हाँ कहने पर और तस्कीद करने लगे अच्छे से जानते हो क्या। जितना समझ आ रहा था कुछ न कुछ अवैध उगाही का मामला रहा होगा। परिवहन विभाग की छवि कुछ ऐसी ही है पुलिस ने मामला बना दिया होगा तो वो भागे भागे फिर रहे थे। खैर आदमी पूरी बात बताता तो है नहीं। उनकी भी सिफारिश की और उनका भी काम हो गया।
जितना मुझे याद है , वो काफी साधारण तरीके से रह थे। दरअसल हर किसी की जिज्ञासा होती है कि किस सीट पर कितना पैसा छाप रहा है , उनका जिला अवैध खनन के लिए जाना जाता था। जितना मैंने उनकी बातचीत से समझा था , उनका परिवार बड़ा साधारण जीवन जी रहा था। बच्चे सामान्य स्कूल में पढ़ रहे थे। तभी वो घटना हुयी।
यह इतना चर्चित मामला है कि गूगल में एक शब्द डालने से सैकड़ो कहानियाँ निकल आएंगी। मैंने जब सुना यकीन न हुआ। यहाँ से मैं कहूँगा कि जब बुरा समय आता है तो आप बच न सकते। उनके जिले में एक व्यक्ति आरोप लगा कर आत्महत्या कर लेता है। इसके आगे की तमाम कहानी न मुझे पता है और न किसी तरह की टिप्पणी करने की पोजीशन में हूँ।
कम से कम 2 साल , पुलिस अपने ही विभाग के उच्च अधिकारी को खोजती रही और न खोज पायी। उनके बारे में जानने का एकलौता साधन इंटरनेट और समाचार पत्र थे। मेरा बड़ा मन था किसी तरह से उनका सम्पर्क मिले। सिविल सेवा के तमाम ग्रुप में उनका नया नंबर जानने की इच्छा होते हुए भी कभी मांग न सका। फिर एक दिन मैंने पढ़ा कि उन्होंने सरेंडर कर दिया अब वो लखनऊ जेल में थे। यहाँ भी जाने का दिल किया , उनसे उनका हाल और उनका उस आत्महत्या का वर्जन जानने की इच्छा थी। मुझे कभी भी यकीन न हुआ कि इसमें उनका कोई लेना देना हो सकता है।
मेरे जेहन से यह चैप्टर क्लोज हो गया था। इसी साल की बात है , ठीक से याद नहीं , शायद जनवरी की बात होगी। मेरे व्हाट ऍप स्टेटस पर उनका उसी पुराने नंबर से रिस्पांस आता है तो एक पल को मुझे यकीन न हुआ। छोटी सी चैट के बाद , मैंने कहा कि मैं किसी दिन आराम से लम्बी बातचीत करता हूँ। उनको काल करने के लिए फुर्सत न मिली , दिन टलते गए। कैसी फितरत है , जब सम्पर्क न था तो बड़ा याद करता रहा और अब जब सामने से जबाब आया तब वक़्त न मिल रहा।
इस होली में घर में फुर्सत से लम्बी बातचीत हुयी। पोस्ट लम्बी होती जा रही है और उनकी बातचीत में तमाम चीजे जानने को मिली । जैसे कि उस मर्डर में उसके ही बिजनेस पार्टनर की बड़ी संदिग्ध भूमिका था और भी तमाम बातें। इनको अफ़सोस यह है कि किसी जूनियर ने विविध तरीक़े के आश्वासन दिया था , इसके चलते ही इन्होने सरेंडर में इतनी देरी की, इस देरी के चलते तमाम नुकसान हुए। अब उनके ऊपर और भी तमाम और मुकदमे थोप दिए गए।
उनकी जिंदगी वहीं आकर खड़ी हो गयी। अहमदाबाद में फैमिली के साथ रह रहे हैं। बॉम्बे में प्राइवेट जॉब की बातचीत चल रही है। उनके तमाम बैचमेट भी यह कहानी पढ़ेंगे , कैडर मेट भी। मुझे नाम बताने की जरूरत नहीं है। उनका वही पुराना नंबर ही चल रहा है। अच्छे में तो हर कोई साथ देता है , उन्हें तमाम तरह की मदद की जरूरत है। जब भी दिल्ली आना होगा , मेरी मुलाकात होगी , जो अपने से बन पड़ेगा करुँगा।
उस घटना का राजनीतिकरण हो गया था इसके चलते ही चीजे इतना बिगड़ी। इसके चलते ही उन्हें किसी से भी सहयोग न मिल पाया। लोग चाहकर भी सच का साथ न दे पाए। मुझे इतना पता है कि सिर्फ आरोप लगाने से , अपराध कभी साबित न होगा और किसी जिले के पुलिस कप्तान को किसी व्यक्ति की हत्या/ आत्महत्या के लिए सीधे तौर पर कैसे ठहराया जा सकता है। एक न एक दिन , सच जरूर सामने आएगा और वो वापस जरूर आएंगे।
© आशीष कुमार , उन्नाव।
शुक्रवार, 27 मार्च 2026
खड़े होकर ध्यान
खड़े होकर ध्यान
जहाँ मै रहता हूँ , वहीं पर एक पार्क है , इतना सघन की जंगल का अहसास होता है। जिम के बाद , मन हुआ कि आज वहीं जाकर थोड़ी देर ध्यान लगाता हूँ। यूँ तो पार्क में तमाम बेंच है पर एक काफी भीतर हट है , उसके पास पास काफी नीरवता रहती है। बड़ी उम्मीद से उधर गया तो देखा वहाँ पहले से कोई मौजूद है , इसलिए आगे बढ़ गया। इसके आगे कोई जगह न थी जहाँ सहजता से ध्यान लगाया जा सके। यूँ ही चलते चलते ख्याल आया की क्यूँ न खड़े होकर ध्यान लगा लिया जाय। वहीं रुक गया , सहजता से आंखे बंद की, तमाम विचार धीरे धीरे स्थिर होने लगे। मन प्रकति , हवा , पक्षिओं के संगीत पर टिकने लगा।
इंस्टाग्राम पर मुझे रील्स में सबसे ज्यादा वो पसंद आती है जो फनी होती है। एक रील याद आती है , जिसमें एक बाबा जी कहते है मैं रोज रात में २ बजे उठकर ध्यान लगाता हूँ , पिछले ५० साल से लगा रहूं पर आज तक न लगा। कितनी फनी पर सही बात बोली। ध्यान लगना होता है मिनट में भी लग जाता है अगर न लगना होगा तो सालों कोशिस करते रहो न लगेगा। मेरे साथ अच्छी बात है कि मेरा मिनट में लग जाता है , यह अलग बात है कि कोई नियमित अभ्यास नहीं करता , बस लग जाता है। ५ मिनट भी अलग ध्यान लगा लिया तो मेरी जुबान भारी हो जाती है। कहने का मतलब मौन स्वतः आ जाता है , कुछ बोलने का मन न करता। पूरे दिन बगैर बोले रह सकता हूँ पर दिन ऐसे कहाँ होते है , किसी न किसी वजह से बोलना ही पड़ता है , बड़ा कष्ट होता है , जब ध्यान से आया मौन तोडना पड़ता है।
ध्यान कहाँ से आया पता नहीं पर बस आ गया। अहमदाबाद के दिनों में मित्र राजेश सोनी ( sdm ,हरियाणा ) के साथ , अहमदाबाद के बाहर एक आश्रम जाया करता था , हर रविवार। क्या शानदार जगह थी। आश्रम , मंदिर जाने ले लिए कभी उत्सुक न रहा , सच तो ये है कि मन हमेशा संदेह से भरा रहता था। पर इस जगह जाकर मेरी काफी धारणा बदल गयी। वहा की तमाम बाते है पर बात ध्यान की चल रही तो वही पर फोकस करते है। वहां जाकर मैंने एक अनोखी बात देखी , वहाँ पर प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ कर ध्यान प्रकिया का अभ्यास कराया जाता था। १ घंटे चुपचाप आंखे बंद करके , ध्यान साधना होता था। मुझे ठीक से याद है कि वो १ घंटा वाकई बड़ा भारी होता था , कोई फोन नहीं , कोई बात नहीं , कुर्सी में पीठ टिका कर बस बैठे रहो। अक्सर मै सो जाता रहा वो भी बड़ी गहरी नींद में। लगभग ४००- ५०० लोग उस बड़े से ध्यान केंद्र में एक साथ ध्यान लगाते थे। बड़ी सकारात्मक ऊर्जा महसूस होती थी।
ध्यान के बाद , बड़ा सात्विक सा नाश्ता भी दिया जाता था। यह सब निःशुल्क होता था। कुछ लगातार रविवार के बाद राजेश सोनी की पहल पर एक गुरु जी ने गुरु मन्त्र दिया। एक बंद कमरे में बैठकर ध्यान लगवाया और अंत में हाथ पकड़ कर गुरु मन्त्र दिया। मेरा मन यह सब शंका से देख रहा था। मै सोच रहा था , इससे कुछ नहीं होता पर हुआ। उनकी सहजता , सरलता और सेवा भाव धीरे धीरे मन में विश्वास जगाने लगा। एक कार्ड भी बनाया गया।
दिल्ली आने के बाद मैंने उसको बहुत मिस किया , शुरू में यहाँ के केंद्र खोजने की कोशिस की , राजेश से बात हुयी तो बताया कि कहीं आउटर में है। धीरे धीरे व्यस्तता बढ़ती गयी। अहमदाबाद के वो कुछ रविवार मेरे जीवन की सबसे सकारात्मक रविवार थे।
© आशीष कुमार , उन्नाव।
२८.०३.२०२६
( नोट :- काफी दिनों बाद , पुराने दिनों की शैली में यह उक्त सृजन , मेरे कुछ मिनट के खड़े खड़े ध्यान को जाता है। मौन जारी है देखते है कितने घंटे चल पता है। )
मंगलवार, 13 जनवरी 2026
World Book Fair Delhi
पुस्तक मेला
वक़्त कितना बीत जाये पर अख़बार पढ़ना बंद न होगा , प्राय सुबह सुबह टैब में पढ़ लेते है। उसी से पता चला पुस्तक मेला लगने वाला है, फिर कुछ मित्रों ने याद दिलाया। आज भी सोच रहा हूँ जाऊ या न जाऊ। मेरे पुराने परचित सोच रहे होंगे भला मेरे जैसा पुस्तक प्रेमी ऐसी दुविधा में क्यू है।
मेरी दुविधा की वजह, शायद वही है जो आपकी भी होगी। मेरे ख्याल से पीछे 5 ... 6 साल ने शायद ही कोई ऐसा साल रहा हो जब प्रगति मैदान के पुस्तक मेला जाना न हुआ हो। हर साल , आगे पीछे जरूर गया। खूब घूमा और किताबे भी खूब खरीदी। अफ़सोस पुरे पुरे साल बीत गए , किताबे ज्यों का त्यों रखी है. सुरेंद्र मोहन पाठक के नावेल से लेकर बारेन बुफेट के एनुअल स्पीच का कलेक्शन , ज्योतिष , और भी विविध विषय पर पता नहीं क्यों अब पढ़ा न जाता है।
न पढ़ने की तमाम बार वजहों को विश्लेषित भी किया है। फ़ोन , टीवी पर ott कंटेंट , पढ़ने की उपयोगिता न समझ आना के साथ साथ सबसे बड़ी वजह फिटनेस के प्रति नया प्रेम है। जब से मैराथॉन में रूचि जागी समय समझ ही न आता है कि वक़्त कहां चला जाता है। सुबह स्ट्रेंथ ट्रेनिंग कर ली तो पुरे दिन शरीर आराम मांगता है , हर वक़्त बुखार , खुमारी सी चढ़ी रहती है। अब जाकर एक चीज समझ आयी है पढ़ाई लिखाई और वर्कआउट दोनों एक साथ करना बड़ा मुश्किल है, खासकर जब आप फुल टाइम जॉब भी कर रहे हो।
पुस्तक मेले में कुछ दिन और बचे है ये पता है कि जाऊंगा तो जरूर और बुक का ढेर भी आएगा , ये भी तय सा है कि बस वो किताबें हर साल की तरह अनछुई ही रह जाएगी।
© आशीष , उन्नाव।
13 जनवरी , 2026 .
शनिवार, 20 दिसंबर 2025
Blocking
सोमवार, 30 जून 2025
सड़क जो आगे से बंद है
शुक्रवार, 20 जून 2025
महुवे का पेड़
महुवे का पेड़
- आशीष कुमार
तमाम बार उस रात की याद आयी , तमाम बार दिल किया लिखुँ उस रात के बारे में पर आलस में लिख न पाया। कल रात "कोहरे में कैद रंग" उपन्यास पढ़ रहा था। शुरू के पन्नों में ही जो घटना थी , जहाँ लड़के को उसका पिता कस्बे जाने के लिए अकेले आधे रास्ते में छोड़ देता है और लड़का शव यात्रा को देख डर सा जाता है। मुझे फिर से वहीं महुवे के पेड़ के नीचे गुजारी एक सर्द रात याद आ गयी।
मेरे गांव के पास एक क़स्बा है पुरवा , वहाँ से नहर गुजरती है। उसी नहर से एक छोटी नहर मेरे गांव के पास से गुजरती है। इस छोटी नहर से छोटी छोटी नाली निकली थी। जिनसे मेरे खेतों तक पानी आता था। खेतों में पानी लगाना भी उन दिनों काफी बड़ा काम हुआ करता था। तमाम लोग दिन में लगा लेते थे , कुछ लोगो को रात में बारी मिलती थी। एक शाम खेतों में मैं , मम्मी और पापा थे। पता चला कि आज रात में अपने खेतों में पानी लगेगा। कुछ सूखी लकड़ियाँ, पुवाल आदि महुवे के पेड़ के नीचे डाल दी गयी. उसके बाद हम सब घर चले गए।
वो सर्दी की एक अँधेरी रात थी। मैं , पापा के साथ घर से कुछ खाना लेकर खेतों की ओर चला। मुझे ठीक से याद नहीं पर उम्र 6 - 7 साल ही रही होगी। मैंने एक लाठी ले रखी थी , अपने चारो तरफ कम्बल लपेट रखा था जो बार बार जमीन में घिसट रहा था. एक हाथ में स्टील वाला तीन खाने का टिफिन भी था। पापा के पास वो तीन सेल वाली एक टॉर्च थी. हम बात करते चले जा रहे थे। बातें हमारी घूम फिर कर कुछ निश्चित विषयों पर होती थी। पिता जी के अपने परिवार और उनके रिश्तेदारों ने उनका बहुत कभी कोई सहयोग या सम्मान न किया। उन्ही दिनों से सोचा करता था कि बड़ा होकर उन सबसे बदला लूंगा।
महुवे के पेड़ के पास पहुँच कर लकड़ी जला दी गयी। सर्दी काफी बढ़ गयी थी। चारों ओर घना अँधेरा था। पिता जी ने नाली में जाकर पानी का बहाव देखा। पानी में कुछ पत्ते या घास तोड़ के डाल कर देखा तो पता चला पानी कम आ रहा है। दरअसल नाली के ऊपरी हिस्से में दूसरे किसान भी भी पानी काट लेते थे , कई बार इधर का बहाव ही बंद कर देते थे। उन दिनों खेतों में पानी लगाने को लेकर लड़ाई हो जाया करती थी। पिता जी ने बोला मैं आगे तक जाकर आता हूँ। मुझे वहीं महुवे के पेड़ के नीचे रुके रहने को बोला। वो चले गए। मैं अकेला वहीं रुका रहा। कुछ देर तक आग जलती रही फिर वो मंद पड़ती गयी।
पिता जी को गए काफी देर हो गयी। अँधेरा काफी था। मुझे डर लग रहा था। एक उम्मीद में कि थोड़ा आगे ही पिता जी होंगे मैं कुछ दूर आगे तक गया। आवाज भी लगाई पर बदले में पिता जी की कोई आवाज न आयी. मैं परेशान था कि कम से कम महुवे के पेड़ के नीचे कुछ हद तक सुरक्षित था। जगह क्यू ही छोड़ी। जब मैं परेशान , डरा हुआ वापस लौट रहा था , मुझे लगा कोई मेरा पीछा कर रहा है. मैं जैसे तैसे महुवे के पेड़ के पास पहुँचा। पुवाल में कंबल ओढ़ के रोता हुआ सो गया। मुझे पता नहीं कब पिता जी लौटे और कब सुबह हुयी।
वो महुवे का पेड़ सूख गया। उसके कटने के बाद वहां काफी जगह निकल आयी। आज जब खेत जाना होता है तो कार खड़ी व मोड़ने की जगह वही है। चीजें बहुत बदल गयी है। बड़े वाले बोरवेल हो गए है। अपने साथ साथ पड़ोसियों का भी भला हो रहा है।
पिता जी असमय 2010 में चले गए। चीजे बदलना बस उसी वक़्त शुरू हुयी थी। 2010 में पहली सरकारी नौकरी लगी थी। मन में कसक सी रहती है कि उन्होंने अपने बदले हुए दिन ज्यादा न देख पाए। उनके संघर्षो के जिम्मेदार लोगों से बदला लेने के मेरे पास दो रास्ते थे एक हिंसक , दूसरा उन्हें सामाजिक आर्थिक तौर पर इतना पीछे छोड़ देना कि जब भी सामने पड़े तो खुद ही नजरे न मिला पाएं। मैंने दूसरा रास्ता चुना। कहते है समय के साथ लोगों को माफ़ कर देना चाहिए, तमाम बार सोचा कि सब भूल जाऊ और शायद काफी हद तक भूल भी चूका हूँ पर तमाम बार करीबी रिश्तेदार , पारिवारिक लोगों को ये समझ न आता है कि मै इतना रिज़र्व क्यू रहता हूँ। वजह उपर वर्णित कुछ ऐसी ही यादें है , जो गाहे , बगाहे याद आ जाती है।
©- आशीष कुमार , उन्नाव।
20 जून 2025
मंगलवार, 13 मई 2025
किताबें और रेड सैंडल्स
2014 -15 के बीच में मुझे लिखने का बहुत जूनून सा हो गया था। डायरी से बाहर दिन प्रतिदिन के अनुभव , प्रेक्षण आदि अब ब्लॉग , फेसबुक पर आने लगे थे। लोगों को सरल शब्दों में अपनी बात रखने का तरीका बड़ा पसंद आया। धीरे धीरे फैन फॉलोविंग भी बढ़ी। देश में ही नहीं विदेश में भी अपने कुछ पाठक थे। हजारों कहना तो गलत होगा पर , सैकड़ो की संख्या में लोग , पोस्ट को बड़ी रूचि से पढ़ा करते थे। उनमें तमाम बार लोग लाइक , कमेंट से बढ़कर इनबॉक्स में भी आ जाते।
उन दिनों अहमदबाद में अपनी सर्विस चल रही थी। सिविल सेवा की तैयारी भी चल रही थी पर कोई खास जोश न था। प्री , मैन्स , इंटरव्यू के क्रमिक असफलताएं ने मुझे डिजिटल दुनिया में ज्यादा रमने में बाध्य कर दिया था। मैं लोगों से बात करता था , तमाम बार चैट से बाहर फ़ोन , मेसेज , व्हाट ऍप तक लोग आ जाते। लोग मतलब विपरीतलिंगी। तो उनमें दर्जनों लोग होंगे , जिनसे तमाम बातें हुयी। एक मैडम स्वीडन से थी , इंडियन थी। उच्च शिक्षित , उच्च कुल से पर प्रेम मुस्लिम लड़के से हो गया। दोनों विदेश सेटल हो गए। कैडबरी , में बड़ी पोस्ट पर थी। लड़का भी उच्च वेतनमान पर था , पर इसके बावजूद घर वालों से सहयोग न मिला। ऐसे में तमाम बार , अपने बातों को सुनाने के लिए मेरा इनबॉक्स मुफीद जगह थी। तमाम बार स्वम् से अपने पिक्स शेयर किये जोकि पहली बार में फेक से लगे पर वो वाकई बहुत सुन्दर थी , दरअसल लड़का भी परफेक्ट था। उनकी कहानी फिर कभी , किसी दूसरी पोस्ट में। मुझे नहीं पता , हो सकता हो अभी भी हो फेसबुक पर जुडी हो।
आज कहानी ऐसे ही एक दूसरे व्यक्ति की , जिससे ऐसे ही सम्पर्क हुआ। धीरे धीरे तमाम बातें होने लगी। उनकी किशोरावस्था थी। बातों में बड़ी रूचि व आकर्षण था। जब हम किसी अच्छे लगने वाले विपरीतलिंगी से बातें करते हैं तो धीरे धीरे हर बात शेयर करने लगते है। ऐसे ही एक रोज वो प्रकरण हुआ था।
इन दिनों , हर घर , सोसाइटी में ऐमज़ॉन , फ्लिपकार्ट , मिंत्रा से समान मांगना बड़ी आम बात हो गयी है। उन दिनों चलन था पर काफी कम स्तर पर। मैं इन प्लेटफार्म से किताबें मंगाया करता था। तो उस दिन उसने बातों बातों में बताया कि आज उसने रेड सैंडल ऑनलाइन मंगाई है साथ ही उनकी तस्वीर भी भेज दी।
सच कह रहा हूँ , मैं चौंक गया. मै हैरान था , मेरे समझ में न आ रहा था कि इनसे भी सैंडल भी मगाई जा सकती है। मैंने बोला - मै पहली बार सुन रहा हूँ , कि फ्लिपकार्ट से कोई सैंडल भी माँगता है। मैंने तो बस किताबें ही मंगाई हैं। अब चौकने की बारी सामने वाले की थी। फिलिपकार्ट से बुक्स , भला कौन मंगवाता है ? मैं पहली बार सुन रही हूँ कि कोई किताबें ऑनलाइन मंगवाता है। हम दोनों बहुत दिनों तक , इस प्रकरण को लेकर हसते रहे। यह किस्सा , मैंने तमाम बार अपने मित्र मण्डली में सुनाया है। आज आपसे शेयर कर रहा हूँ क्युकि पिछले दिनों फ्लिपकार्ट में मेगा सेल लगी थी और कुछ जल्दी सोने वाले लोग भी उस दिन जग कर इसका इंतजार कर रहे थे तो मुझे पुराने किस्से याद आ गए।
©आशीष कुमार , उन्नाव।
बुधवार, 7 मई 2025
बनारस यात्रा
बनारस यात्रा
बनारस घूमने की चाह बहुत सालों से थी , पर संयोग न बना। पूर्व में प्रयागराज , गोरखपुर से आगे न गया। इतिहास की पढ़ाई की है और साहित्य का शौक रहा है। दोनों में ही बनारस का विशेष स्थान है। महाजनपद के समय से लेकर , साहित्य में नीला चाँद , काशी का अस्सी , फिल्मों में मशान आदि से मन में तमाम छवि अंकित थी।
इस साल होली में विशेषरूप से बनारस जाने के लिए सोचा था। प्रिय मित्र प्रीतम सिंह , बनारस सदर में ही तहसीलदार के तौर पर पदस्त है , उनसे अक्सर बात , मुलाकात होती थी तो तमाम आमंत्रण उनके भी थे। सुबह सुबह , गूगल मैप के सहारे , गाड़ी से निकले। फतेहपुर के हाईवे पर चाय पी। जब इलहाबाद पार किया तो मुझे पूर्वांचल की झलक दिखना शुरू हुयी। हाईवे से गुजरते हुए , किसी क्षेत्र का ज्यादा अनुमान न लग पाता है , इसके बावजूद ऐसा लग था कि अतीत की तरफ सफर कर रहा हूँ।
प्रीतम सिंह की कहानी पहले भी लिखी है , बहुत सज्जन , विनम्र , मेरे प्रति विशेष आदर व लगाव रखते है। अपने सरकारी आवास पर बहुत अच्छी व्यवस्था कर रही थी. बड़ा सा घर था। स्नान आदि के बाद , उनके मगवाये बनारसी व्यंजन चखे। बनारस कचौड़ी तो बहुत फेमस है , खाकर मज़ा आ गया। मीठा भी बहुत अच्छा था। अलसुबह में निकलने व सफर की थकान के चलते आराम करने का मन था।
कुछ देर आराम के बाद प्रीतम के सौजन्य से एक बनारसी सज्नन हमारे साथ गाड़ी में थे जो कि आगे हमारे पथ प्रदर्शक बने। सबसे पहले हनुमान मंदिर गए। ट्रैफिक बहुत ज्यादा था। गाड़ी पार्क करने की जगह न थी। रास्ते भीड़ ही भीड़ थी. मंदिर में काफी जल्दी दर्शन हो गए। उसके बाद बाबा विश्वनाथ मंदिर गए।
यहां की भीड़ देखकर हिम्मत डोलने लगी। दर्शन vip कोटे से हुए , पर उसमे भी एक कहानी बन गयी। चारों तरफ से लाइन लग के दर्शन हो रहे थे। एक अलग कम छोटी लाइन में लगकर मंदिर के कपाट तक गया। मै बस वो दूध चढ़ाने के बाद उसका नीचे तक जाना ही देख पाए। बाबा विश्वनाथ की मूर्ति देख ही न पाया। मेरे साथ मंदिर के प्रबंधन से जो साथ थे , उनसे बताया कि जब तक नजर आगे जाये , तब तो लाइन आगे बढ़ा दी गयी। इस बार वो और शॉर्टकट से , ले गए। अच्छे से दर्शन हुये। उन्ही से काफी इतिहास पता चला , प्राचीन कुएं का पानी पिया। काफी खुशी थी। बगैर सम्पर्क के उस भीड़ मै शायद दर्शन न कर पाता।
मंदिर में दर्शन के बाद , बनारस की भीड़ ,गलियों में वहां की संस्कृति को करीब से जानने का मौका मिला। एक जगह टमाटर चाट, पापड़ी चाट, आइसक्रीम , पानी बताशे खाये। वापस प्रीतम के आवास पर आराम किया। शाम को प्रीतम ने बनारस के घाट , गंगा आरती के लिए बोट का इंतजाम करा रखा था। नमो घाट से पीछे की तरफ आते कितने घाट दिखे , एक बढ़कर एक, सब जगह आरती शुरू हो गयी थी. गंगा में सैकड़ो बोट थे, हजारों तीर्थ यात्री। दिन में गर्मी , भीड़ में काफी परेशान हुआ था, बनारस को लेकर मेरा उत्साह मर गया था, दिल कर रहा लौट जाऊ, अब क्या ही घुमू।
पर शाम का नौका सफर पुरे दिन की थकान मिटा दी। ठंडी ठंडी हवा चल रही थी। नाव में बैठ , किनारे घाटों की भीड़ , पूजा का माहौल देखना बहुत सुखद था। बीच में मणिकर्णिका घाट दिखा , इसके बारे में खूब पढ़ा और सुना था। मुझे ऐसा लगता था कि वो गंगा के दूसरे साइड होगा पर यहां बीचोबीच देखकर , हैरान हुआ। उस घाट में जलती चिता , देख एक पल को दिमाग रुक सा गया। ज्यादातर घाट में आरती शुरू हो गयी थी , हमारी बोट जरा देर से निकली थी। इसलिए हमें सबसे आखिर वाले घाट आना पड़ा , दो घाट पास पास में थे , बोट से उतरकर बड़े आराम से आरती देखी। उन छटा का को शब्दों में बयान करना कठिन है। अद्भुत, अद्वितीय , पारलौकिक सा।
उसी शाम मन थक चुका था , दिल में आया कि रात को ही घर लौट जाऊ। प्रीतम दिन में व्यस्त थे , शाम को साथ में डिनर किया। डिनर के बाद गाड़ी वापसी के लिए मोड दी ,सुबह के ५ बजे फिर से घर में थे। सुबह ४ बजे निकले थे। बनारस यात्रा से समझ आया कि कुछ जगह पर गाड़ी के बजाय पैदल घूमना चाहिए और सही से आनंद के लिए अकेले , बगैर किसी ताम झाम के साथ घूमना चाहिए। तामझाम से चीजे आसान तो हो जाती है पर जल्दी जल्दी में यात्रा व देशाटन से जो आनंद मिलता है , उससे मन वंचित रह जाता है। बनारस एक बार फिर से जाऊँगा पर सही मौसम व तरीके से , आराम व तसल्ली से घाट घाट , गली गली भटकूंगा , तभी मन को तृप्ति मिलेगी.
©आशीष कुमार , उन्नाव।
शुक्रवार, 2 मई 2025
मैं किंग नहीं किंगमेकर हूँ
साल 2012 -13 की बात है , अहमदबाद में एक्साइज इंस्पेक्टर के तौर पर जॉब कर रहा था , उन्हीं दिनों चुनाव में ड्यूटी लगी। अहमदाबाद से कुछ दूर दंधुका तालुका में। मेरा सर्विसलांस-(चुनाव में अवैध धन का प्रयोग न होने पाए ) का काम था। एक महीने पहले से ड्यूटी शुरू हो गयी थी।
अहमदाबाद से धधुका की दुरी कुछ ज्यादा थी ,जिसे रोज आ जाकर करना मुश्किल था। सीधा कोई साधन न था। मैंने एक सीनियर (सुपरिंटेंडेंट ) सर को अपनी प्रॉब्लम बतायी उन्होने कहा कोई दिक्क्त नहीं वहाँ उनका कोई रिश्तेदार था। बोले उससे मिल लेना सारी हेल्प मिल जाएगी। मैंने कुछ आशंका जाहिर कि तो बोले तुम कुछ न सोचो , बस एक बार उससे मिल लेना।
अगले दिन धंधुका पहुँचा , दिन में अपनी ड्यूटी ज्वाइन करके , उन सज्जन को फोन किया और अपने सीनियर का जिक्र किया। बोले- हा ठीक है. यही पेट्रोल पंप पर आ जाओ। कुछ देर बाद मैं धंधुका के मुख्य चौराहे पर स्थित एक पेट्रोल पंप पर था। वही एक ऑफिस में उनसे मुलाकात हुयी। उस समय वहाँ काफी भीड़ थी। मुझे अब ठीक से न चेहरा याद है न ही नाम पर उनको देख कर कुछ ऐसा हुआ कि कई सालों तक उनकी छवि अंकित रही। काफी रोबीला चेहरा , सर पर बाल छोटे छोटे , लम्बी चौड़ी पर्सनालिटी।
जब लोग चले गए तो उनसे बात हुयी। मेरे मन में बड़ी जिज्ञासा थी कि वो करते क्या है , मुझे उस समय तक पता न था कि पेट्रोल पंप उनका है या किसी और का. जब कुछ बातें हुयी तो ऐसा समझ आया कि इनका बड़ा कारोबार है , खुद से कुछ बता न रहे थे। आप ने देखा होगा कि छोटा आदमी ही बेवजह दिखावा करता है , एक लेवल के बाद आदमी जो धन या पद में उच्चतम स्तर पर जा पहुँचता है वो अपने बारे में कम से कम बात करता है। उन सज्जन की यही बात नोटिस कि मैं उन्हें काफी हलके में ले रहा था और वो थे कि मुस्कुरा रहे थे। बातों बातों में मैंने पूछा - आप चुनाव नहीं लड़ते या ऐसा ही कुछ। उस वक़्त भी कुछ वहां बैठे थे बोले भैया को क्या जरूरत, अभी जो इधर बैठे थे वो राज्य सभा सांसद थे, उनके बगल में विधायक जी थे, ये जिला पंचायत अध्यक्ष जी है। मै हैरान हो गया। भैया जी बोले - मैं किंग नहीं , किंगमेकर हूँ , मुझे इसमें ज्यादा अच्छा लगता है।"
मुझे एक पल को यकीन न हुआ , भाई ये सज्जन कौन हैं , इस स्तर के लोग यहाँ बैठ के मीटिंग कर रहे थे। दरअसल मै एक ऐसे प्रदेश से सम्बन्ध रखता हूँ , जहाँ का छुटभैया नेता के काफिले में दो चार गाड़ी जरूर होती है। वहां इस स्तर को लोग शांति से मीटिंग कर रहे थे।
शाम हो चुकी थी , मैंने भैया से बोलै - कहाँ रुकूंगा। उन्होंने किसी को आवाज देकर बुलाया और बोले वो सरकारी वाला गेस्ट हाउस खुलवा दो जाकर। मेरे पुराने पाठकों को लोथल वाली पोस्ट याद होगी। ये उसी समय की बात है। उस टाइम कुछ फूलों की तस्वीर पोस्ट की थी , ये उसी गेस्ट हाउस का गार्डन थे। गेस्टहॉउस वाला बता रहा था , इसी गेस्टहॉउस में कुछ दिन पहले CM भी आकर रुके थे। उस गेस्ट हाउस का केयर टेकर पहले आनाकानी कर रहा था , फिर भइया जी के नाम पर तुरंत एक कमरा खोल दिया। शाम को वहीं व्यक्ति लेने आया , शाम को भोजन उन भैया के घर था। मेरे मन में उनके घर को लेकर अलग सी कल्पना थी , जब घर पंहुचा तो वो एक बहुत बड़ा सा घर घर था। एक बुजुर्ग थे जो रसोई में थे। मैं अकेला खाना खा रहा था और वो गर्म गर्म खाना बनाकर दे रहे थे। कुछ बात हुयी , गुजराती मुझे ज्यादा आती न थी। यही समझा कि इधर तमाम गेस्ट आते ही रहते है और उनका काम सबके लिए खाना बनना होता है। रात में उन भैया का फोन आया पूछा कोई दिक्क्त तो नहीं। मैने कहा नहीं सब बहुत अच्छा है।
मुझे वहां २ या ३ दिन रहना पड़ा , उसके बाद मुझे गाड़ी और कुछ पुलिस का स्टाफ ड्यूटी के लिए मिल गया। उन्हीं लोगो ने ड्यूटी के बाद , किसी न किसी की कार रुकवा के अहमदाबाद रोज आने जाने का इंतजाम करा दिया।
मेरे मन उन सज्जन की छवि बहुत सालों तक बनी रही , उनके प्रभाव का मन में बड़ा असर हुआ। उनका बोलना " किंग नहीं , किंगमेकर " बड़ा गजब लगता। सच में पर्दे के पीछे रहकर शक्तिशाली प्रभाव रखना , उसका अलग ही आनंद है। भले दुनिया आपको बहुत न जानती हो पर आप के नाम से काम हो जाये, उसकी बात ही अलग होती है।
©-आशीष कुमार, उन्नाव , उत्तर प्रदेश।
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