समय समय की बात है
- आशीष कुमार
2014 के आस पास की बात है। उन दिनों फेसबुक पर बहुत सक्रिय हुआ करता था। फेसबुक के जरिये उनसे जुड़े। वो उस साल आईपीएस में चयनित हुए थे। अहमदाबाद में ही थे वो , जितना मुझे याद आता है , किसी चयनित व्यक्ति से रूबरू होने के वो गिने चुने अवसर में एक था। उन दिनों कस्टम हाउस , अहमदाबाद में एक्साइज इंस्पेक्टर के तौर पर जॉब कर रहा था। वही वो मिलने आ गए , मै बड़े गर्व से बाकि लोगो से परिचय कराया कि ये मेरे मित्र है और इनका इसी साल आईपीएस में चयन हुआ है।
विदाई के वक़्त हम ऑफिस के बाहर चाय की एक टपरी पर खड़े होकर चाय पी रहे थे तो वो बोले ये अपना ही कोई भाई बंधू होगा। वो पीछे राजस्थान से थे और तमाम लोग अहमदाबाद में ऐसे काम किया करते थे। उनका कहने या जतलाने का आशय यह था कि वो बड़ी सामान्य पृष्टभूमि से आते थे। मुझे हमेशा से यह चीज बड़ी आकर्षित करती थी ,वही भाव राजा का बेटा अगर राजा बना तो क्या बड़ी बात हुयी , बड्डपन तो वो है कि किसान का बेटा राजा बने।
हम सम्पर्क में बने रहे। 2015 वाले upsc के मैन्स में अहमदाबाद वाले सेंटर पर फिर मिलना हुआ , वही अंतरंगता , प्रेमभाव के साथ वो मिले। उस साल भी वो दोबारा से चयनित हुए , आईपीएस में ही हिमाचल कैडर मिला। पीछे 2014 वो उत्तर प्रदेश कैडर में आईपीएस चुने गए थे। उसके बाद शायद उन्होंने ने एग्जाम न दिया और उत्तर प्रदेश में ही जॉब करने लगे।
अलीगढ़ में वो पोस्टेड थे। कभी कभी बात हो जाती थी। मेरा भी 2018 में चयन हो गया था। अब ज्यादा आत्मविश्वास के साथ सम्पर्क था। अलीगढ़ के दिनों में ही एक मित्र रविंद्र यादव का फोन आया। एक सिफारिश थी, आज सोचता हूँ कि ऐसी सिफारिश अगर आज आये तो एक पल में मना कर दू। सिफरिश थी- किसी की मौत हो गयी थी और परिवार वाले पोस्टमार्डम न कराना चाह रहे थे। जब से क्राइम तक पर शम्स की स्टोरी सुनना शुरू किया तब से ये समझ आ गया कि पोस्ट मार्डम जरूर कराना चाहिए , खास तौर पर जब घर वाले मना कर रहे हो। मैंने अपने उसी आईपीएस मित्र से बात हुयी और उनका काम हो गया।
एक और घटना याद आती है , वो महोबा में पोस्टेड थे। अपने प्रदेश में जितने आईएएस, आईपीएस से सम्पर्क होता है , कही न कही मुँह से निकल ही जाता है। अमुक हमारे बड़े खास है कुछ ऐसा। एक हमारे परिचित या यूँ कहे दूर के रिश्तेदार उसी जिले में परिवहन विभाग में बड़े अधिकारी थे। उनका फोन आया कि आप पुलिस कप्तान साहब को जानते हो क्या ? मेरे हाँ कहने पर और तस्कीद करने लगे अच्छे से जानते हो क्या। जितना समझ आ रहा था कुछ न कुछ अवैध उगाही का मामला रहा होगा। परिवहन विभाग की छवि कुछ ऐसी ही है पुलिस ने मामला बना दिया होगा तो वो भागे भागे फिर रहे थे। खैर आदमी पूरी बात बताता तो है नहीं। उनकी भी सिफारिश की और उनका भी काम हो गया।
जितना मुझे याद है , वो काफी साधारण तरीके से रह थे। दरअसल हर किसी की जिज्ञासा होती है कि किस सीट पर कितना पैसा छाप रहा है , उनका जिला अवैध खनन के लिए जाना जाता था। जितना मैंने उनकी बातचीत से समझा था , उनका परिवार बड़ा साधारण जीवन जी रहा था। बच्चे सामान्य स्कूल में पढ़ रहे थे। तभी वो घटना हुयी।
यह इतना चर्चित मामला है कि गूगल में एक शब्द डालने से सैकड़ो कहानियाँ निकल आएंगी। मैंने जब सुना यकीन न हुआ। यहाँ से मैं कहूँगा कि जब बुरा समय आता है तो आप बच न सकते। उनके जिले में एक व्यक्ति आरोप लगा कर आत्महत्या कर लेता है। इसके आगे की तमाम कहानी न मुझे पता है और न किसी तरह की टिप्पणी करने की पोजीशन में हूँ।
कम से कम 2 साल , पुलिस अपने ही विभाग के उच्च अधिकारी को खोजती रही और न खोज पायी। उनके बारे में जानने का एकलौता साधन इंटरनेट और समाचार पत्र थे। मेरा बड़ा मन था किसी तरह से उनका सम्पर्क मिले। सिविल सेवा के तमाम ग्रुप में उनका नया नंबर जानने की इच्छा होते हुए भी कभी मांग न सका। फिर एक दिन मैंने पढ़ा कि उन्होंने सरेंडर कर दिया अब वो लखनऊ जेल में थे। यहाँ भी जाने का दिल किया , उनसे उनका हाल और उनका उस आत्महत्या का वर्जन जानने की इच्छा थी। मुझे कभी यकीन हुआ कि इसमें उनका कोई लेना देना हो सकता है।
मेरे जेहन से यह चैप्टर क्लोज हो गया था। इसी साल की बात है , ठीक से याद नहीं , शायद जनवरी की बात होगी। मेरे व्हाट ऍप स्टेटस पर उनका उसी पुराने नंबर से रिस्पांस आता है तो एक पल को मुझे यकीन न हुआ। छोटी सी चैट के बाद , मैंने कहा कि मैं किसी दिन आराम से लम्बी बातचीत करता हूँ। उनको काल करने के लिए फुर्सत न मिली , दिन टलते गए। कैसी फितरत है , जब सम्पर्क न था तो बड़ा याद करता रहा और अब जब सामने से जबाब आया तब वक़्त न मिल रहा।
इस होली में घर में फुर्सत से लम्बी बातचीत हुयी। पोस्ट लम्बी होती जा रही है और उनकी बातचीत में तमाम चीजे जानने को मिली । जैसे कि उस मर्डर में उसके ही बिजनेस पार्टनर की बड़ी संदिग्ध भूमिका था और भी तमाम बातें। इनको अफ़सोस यह है कि किसी जूनियर ने विविध तरीक़े के आश्वासन दिया था , इसके चलते ही इन्होने सरेंडर में इतनी देरी की, इस देरी के चलते तमाम नुकसान हुए। अब उनके ऊपर और भी तमाम और मुकदमे थोप दिए गए।
उनकी जिंदगी वहीं आकर खड़ी हो गयी। अहमदाबाद में फैमिली के साथ रह रहे हैं। बॉम्बे में प्राइवेट जॉब की बातचीत चल रही है। उनके तमाम बैचमेट भी यह कहानी पढ़ेंगे , कैडर मेट भी। मुझे नाम बताने की जरूरत नहीं है। उनका वही पुराना नंबर ही चल रहा है। अच्छे में तो हर कोई साथ देता है , उन्हें तमाम तरह की मदद की जरूरत है। जब भी दिल्ली आना होगा , मेरी मुलाकात होगी , जो अपने से बन पड़ेगा करुँगा।
उस घटना का राजनीतिकरण हो गया था इसके चलते ही चीजे इतना बिगड़ी। इसके चलते ही उन्हें किसी से भी सहयोग न मिल पाया। लोग चाहकर भी सच का साथ न दे पाए। मुझे इतना पता है कि सिर्फ आरोप लगाने से , अपराध कभी साबित न होगा और किसी जिले के पुलिस कप्तान को किसी व्यक्ति की हत्या/ आत्महत्या के लिए सीधे तौर पर कैसे ठहराया जा सकता है। एक न एक दिन , सच जरूर सामने आएगा और वो वापस जरूर आएंगे।
© आशीष कुमार , उन्नाव।










