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शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

करेली व अरहर की दाल

एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा 

वैसे ये करेली हैं, इनका स्वाद लाजबाब होता है। अरहर की गाढ़ी दाल, करेली की प्याज वाली बढ़िया खरी खरी सूखी सब्जी व चावल ( अगर थोड़ा चिपचिपे वाले भात बन जाय तो क्या ही पूछना ) ..इस पर बढ़िया शुद्ध देशी घी डालिये और स्वाद का अलौकिक आनंद लीजिये।

-आशीष

बुधवार, 26 अगस्त 2020

AAM PAPAD OR AMAVAT

अमावट/आम पापड़ 

पता नहीं जब आप इसे पढ़ने जा रहे, उससे पहले उक्त शब्दों को सुना है या नहीं। अगर आप गांव देहात से जुड़े है तो आपने अमावट के बारे में जरूर सुना होगा। अमावट यानी जिसको सुनकर ही मुँह में पानी आ जाय, क्या बच्चे क्या जवान सबके मुँह को भाने वाला। 

अभी अमावट खाते खाते इसके तमाम पहलुओं पर मन विचार करने लगा। अच्छा बता तो दूँ कि अमावट यानी क्या ...फलों के राजा आम के बारे में तो आप जानते ही होंगे। अमावट , Mango के रस से बनाया जाता है। आमों का रस निकालिये, एक कपड़े पर उसकी परत बनाइये, धूप में सुखाइये। अगले दिन उसी परत पर यही किया दोहराइए। आपको कई दिनों तक ऐसा करना पड़ेगा। तब जाकर तैयार होगा अमावट, जिसे ज्यादा साफ सुथरी भाषा में लोग आम पापड़ कह देते हैं।
मेरा जब भी home जाना होता, mother से एक ही फरमाइश होती कि कहीं से अमावट खरीद लेना। धीरे धीरे लोग अमावट बनाना बन्द कर रहे है, वजह इसमें बहुत ताम झाम होता है और यह बड़ी मेहनत व धैर्य का काम है।

मैंने ऐसा सुना है कि मेरे दादा के childhood में आम की बहुत बड़ी बाग हुआ करती थी। रोज बैलगाड़ी भर आम आया करते थे। मेरे बचपन मे पुरानी बाग के एक्का दुक्का पेड़ बचे थे, बड़े जबर व तगड़े। हमारे बचपन में एक झोला आम न मिलते तो bullckcart भर रोज के आम वाली बात फर्जी लगती।

खैर मेरे बाबा ने फिर से बाग लगाई, पुरानी बाग में देसी पेड़ ज्यादा थे। इस बार बाबा ने मीठे व स्वादिष्ट पेड़ो की पौध तैयार की। पेड़ रोपे गए, वो बड़े हुए और हमने अपनी आँखों से देखा। किसी किसी दिन बाग में 4 से 5 बोरा आम इक्क्ठा होते। घर आते। अब इतने आमों को खाये कौन..कुछ इधर उधर बाटे जाए । 
बचे आमों  दादी को बड़े से कठोलवा ( लकड़ी का बना बड़ा सा भगोना/ओखली) में मूसल से मसल मसल कर आमरस बनाते देखा। छत पर अमावट के लिए तमाम कपड़े पड़े रहते। वैसे अगर आप अमावट को बनते देख ले तो शायद कभी खाने का मन न करे। तमाम मखियाँ, पीली बर्र आमरस चाटने को बेताब दिखेंगी। आमरस को निकाल कर कपड़ो पर रोज परत बनाने का चाची करती थी। आम का सीजन खत्म होने पर घर में 50/70 किलो तक अमावट तैयार होता। यही हाल मौसी के घर पर भी देखा। मुझे याद है एक बार उनके घर 1 कुन्तल अमावट बेचा गया था। घर के खाने के लिए लोग अच्छे व मीठे आमों के रस को अलग निकाल कर अमावट के अच्छे साफ टुकड़े तैयार करते। बाकी काला, खट्टा, गीला अमावट बेचने को तैयार किया जाता। जितना साफ अमावट, उतने बढ़िया दाम।
( आम पूूड़ी )

इस बार भी घर गया तो अमावट याद आया। मां से पूछा कि अमावट तो बोली अब लोगों ने अमावट बनाना बन्द सा कर दिया। अबकि औरतों से कहाँ इतना काम हो पायेगा। एक दो लोगों को बताया कि उन्होंने अपनी जरुरत भर के लिए अमावट बनाया है, बेचेंगी नहीं। खैर , मुझे इस बार भी मां ने किसी जगह से अच्छी क्वालिटी के अमावट का जुगाड़ कर दिया। 
एक बात बताना भूल गया, अमावट को चाहे तो आप सूखा खाये अगर मन करे तो उसे एक दिन पहले पानी मे भिगो कर बढ़िया मीठी चटनी के रूप में खाये, मजा दोनों तरह से आएगा।
(अमावट को दांतों से चबाने में अलग ही आनंद आता है)

थोड़ा बौद्धिक स्तर पर बात करें तो अमावट के रूप में हमारे यहाँ अतीत से food processing का चलन है। लोग जब बहुत मात्रा में आम गिरने लगते तो उसके रस को धूप में सुखाकर संरक्षित कर लिया करते। उसे पूरे साल ( कई बार 2, 3 साल) तक उपयोग में लाते।

तो अब आप बताइए कि आप ने अमावट को चखा है या अभी इसके स्वाद से वंचित है ?

© आशीष कुमार, उन्नाव।
26 अगस्त, 2020।


रविवार, 16 अगस्त 2020

गाँव का आनंद



सिके हुए दो भुट्टे सामने आए
तबियत खिल गयी
ताज़ा स्वाद मिला दूधिया दानों का
तबियत खिल गयी
दाँतो की मौजूदगी का सुफल मिला
तबियत खिल गयी

बाबा नागार्जुन की एक कविता






धीमी आंच में नरम नरम , नमक के व नींबू के साथ

शनिवार, 1 अगस्त 2020

FRIENDSHIP DAY


आज किसी ने फ़्रेंड्स डे के लिए व्हाट्स एप पर विश किया तब ही याद आया इसके बारे में। इन दिनों इतने दिन मनाये जाने लगे हैं कि आये दिन कुछ न कुछ होता ही है।

मित्रता दिवस पर एक बात याद आ गयी। पिछले साल की बात होगी। मेरे फोन पर एक कॉल आयी। अहमदाबाद से कोई था। बोला कि " सर , आप मेरी दुकान पर चाय पीने आया करते थे, sir मैंने चाय की एक नई दुकान खोली है..बड़ी मेहरबानी होगी अगर आप उद्घाटन पर आए .." मैंने दिमाग पर बहुत जोर डाला पर याद न आया कि कौन है ये..एक गुजराती जब हिंदी बोलता है तो चीजें समझी तो जा सकती हैं पर पूरी तरह से स्पष्ट नहीं।
वो कह रहा था कि अमुक भाई ने no दिया है , आप लाइब्रेरी आया करते थे , वही मेरी दुकान है ..
मेरा मन खुशी से अभिभूत था कि उसके बुलाये में कितना प्रेम व सम्मान है .. पर मै तब तक अहमदाबाद छोड़ चुका था, इसलिए उसे विन्रमता से मना करते हुए यह वादा किया कि जब अहमदाबाद आना होगा तब उसके दुकान पर चाय पीने जरूर आऊंगा।

हालांकि आज तक न जान पाया कि वो कौन सी दुकान से था। शायद पुरानी किसी पोस्ट में अहमदाबाद की चाय की दुकानों पर लिख चुका हूँ। क्या गजब चाय बनाते हैं.. खूब गाढ़ी, कड़क , खुशबूदार। खेतला आपा ( खेत के भगवान यानी सर्प ..यही लोगो है उनका) की s.g. highway ( सरखेज- गांधीनगर राजमार्ग ) वाली दुकान तो बहुत ही नामचीन है। एक बार मे 400 - 500 लीटर के भगोने में चाय बनती है जो 10- 15 मिनट में खत्म भी हो जाती है .. टोकन के लिए लाइन लगती है। मेरे ख्याल से वो 24 घंटे खुली रहती है।

अब उसकी कई फ्रेंचाइजी खुल गयी हैं। शायद राजकोट से यह शुरू हुई थी। उनकी चाय का बड़ा यूनिक से टेस्ट है। मैं जहां तक सोच पता हूँ मेरे पास जिस दुकान का फ़ोन आया था वो शुभ लाइब्रेरी के पास थी। काफी पुरानी दुकान थी। बहुत ही कड़क चाय होती थी। वो अपने समय से ही चाय देता था, अगर जल्दी देने को कहो तो भड़क जाता था, उसका कहना था कि जल्दी के चक्कर मे टेस्ट से समझौता नहीं कर सकता।

मुझे अहमदाबाद की तमाम चाय की दुकानें याद आती हैं। स्पीपा ( गुजराती सिविल सेवा का संस्थान ) , सेटेलाइट के गेट के दिनों तरफ की दुकानों की चाय बहुत सही मिलती थी। एक पुदीना वाली चाय की बड़ी फेमस दुकान थी, जहां एक बार dr के साथ , बारिश में चाय पकौड़े खाने गए थे। न्यू राणिप , जहां मैं रहता था, वहां पर भी एक बहुत सही दुकान थी। अच्छा चाय भी बजट के अनुरूप मिल जाती थी। रेहड़ी वाले अध्दि चाय मांगते जो 5 रुपये में मिल जाती थी। वो दिन में कई चाय पीते।  तमाम किस्से हैं वहां के चाय से जुड़े ..

वैसे आपको यह तो याद है ही न , हमारे माननीय  के जीवन में चाय का बड़ा महत्व रहा है वो भी गुजरात से ही है और आज किस मुकाम पर हैं वो.. इसलिए जब मुझे अहमदाबाद से चाय की दुकान के उदघाटन के लिए प्रेम से बुलावा आया तो यह मेरे लिए बड़े ही सम्मान की बात थी, पर परिस्थिति वश उसमें जा न सका।

 तमाम पाठकों को मित्रता दिवस की शुभकामनाएं

(सृजन वंदे भारत मिशन की ड्यूटी पर एयरपोर्ट जाते समय, )
© आशीष कुमार, उन्नाव
2 अगस्त , 2020।

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