BOOKS

ममता कालिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ममता कालिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 6 मार्च 2018

दुक्खम सुक्खम : A novel by Mamta Kaliya



दुक्खम सुक्खम  : ममता कालिया का व्यास पुरुस्कार से सम्मानित उपन्यास 


274 पेज का यह नावेल वर्ष 2010 में प्रकाशित हुआ था। इसे 27 वा , 2017 का व्यास सम्मान दिया गया है । 9 दिसंबर की पोस्ट में मैंने लिखा था कि इसे पढ़ने वाला हूँ। तब इसे धीरे धीरे पढ़ता रहा और पिछले दिनों इसे खत्म कर लिया। इस नावेल को खरीदने के बजाय हिंदी समय की वेबसाइट पर जा कर इसे पढ़ता रहा। डिज़िटल संस्करण का फायदा था कि इसे आप चाहे जहाँ पढ़ सकते है। 

ममता जी के एक साक्षात्कार में मैंने पढ़ा था कि यह नावेल उनके पिता की कहानी है। पुरे नावेल में यह बात जेहन में रही और मैंने निष्कर्ष निकला कि कवि मोहन उनके पिता है और उनकी दो बेटी है।  छोटी बेटी के रूप में स्वंय ममता जी ने अपने आप को चित्रित किया है। नावेल के अंतिम पन्नों में काफी बेबाकी से एक किशोर लड़की का चित्र खींचा है। यह उपन्यास दरअसल महात्मा गांधी के महिलाओं पर पड़े प्रभाव की पृष्ठभूमि में लिखा गया.

कथानक वहाँ से शुरु होता है जहाँ कविमोहन , आगरा में रह कर पढ़ाई कर रहा है। आजादी के 20 , 30 पहले से कहानी शुरू होती है। कवि की माँ , पिता , उसकी पत्नी के बारे बताते हुए नावेल आगे बढ़ता है। देखा जाय तो ममता जी का यह नावेल एक परिवार की पूरी कहानी है। हर छोटी -बड़ी घटना है इसमें। कवि की माँ यानि ममता जी की दादी , गाँधी जी के विचारों से बहुत प्रभावित है। वो एक गीत गाया करती थी - 

कटी जिंदगानी , कभी दुक्खम , कभी सुखम। 

इसी से इस नावेल का शीर्षक लिया गया है। सच में नावेल में सुख और दुःख के विविध प्रसंग है। कहानी वहां खत्म हो जाती है जहां कवी की माँ मर जाती है।  कवि की छोटी बेटी यानि ममता अपनी दादी को बहुत याद करती है। मथुरा , आगरा , दिल्ली और पुणे तक यह नावेल फैला है। पुणे में कविमोहन रेडियो में कार्य कर रहे होते है। समग्रतः यह नावेल पठनीय है खास तौर पर आप आराम से , सकून से ज्यादा दिमाग पर जोर न  डालते हुए कुछ सरस् पढ़ना चाहते हो तो इसे पढ़ सकते है। 



आशीष कुमार 
उन्नाव , उत्तर प्रदेश।  

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

Daud : A novel by Mamta Kalia


दौड़ : ममता कालिया का एक नावेल 


काफी अरसे के बाद कोई हिंदी नावेल पढ़ा और उसे खत्म किया। काफी समय से उपन्यास खरीदता जा रहा था पर उनको शुरू कर कभी पूरी तरह से खत्म न कर पाता। 

यह नावेल 2000 में प्रकाशित हुआ था। आकार में यह लघु उपन्यास है। इसकी विषय वस्तु बहुत ही रोचक व सारगर्भित है। ममता कालिया ने अपने समय की तमाम विडंबनाओं को इसमें समेट दिया है। पवन , उसके छोटे भाई सघन तथा इनके माता रेखा व पिता राकेश की कहानी पुरे उपन्यास में फैली है। एक संयोग ही है कि इसमें अहमदाबाद का जिक्र भी हुआ है। दरअसल मै पिछले 6 सालों से अहमदबाद में ही रह रहा हूँ तो कई प्रसंग जैसे मेम नगर , एलिस ब्रिज आदि मुझे काफी रोचक लगे। मेम नगर में मै 4 साल रहा भी हूँ।  

पुरे नावेल में पीढ़ी अंतराल ,  बाजारवाद , उपभोक्तावाद के विविध पहलू छाये हुए है। पवन , अहमदाबाद mba करता है और नौकरी बदलता रहता है। स्टेला से शादी करना उसके लिए बस एक डील है। अपने परिवार की इच्छा के विपरीत सामूहिक विवाह में अपनी शादी करता है। दरअसल उन दोनों के पास वक़्त की बेहद कमी है।  छोटा बेटा सघन चीन चला जाता है और उसके माता पिता , बूढ़ा बूढी कॉलोनी में अकेले रह जाते है।  ममता कालिया ने इस लघु उपन्यास में यह दिखाया है कि लोगो के घरो में ओवन , वैक्यूम क्लीनर जैसी आधुनिक चीजे है पर उनके पास उनके बेटे नहीं है। एक जगह रेडीमेड बेटे का जिक्र कर ममता ने अपने समय की तमाम विद्रूपताओं को उजागर कर दिया है। 

हालांकि मैंने काशी नाथ का नावेल रेहन पर रग्घू पढ़ा तो नहीं है पर उसमे भी इस तरह की समस्या को ही दिखाया गया है।  दरअसल उदारीकरण के बाद जिस तरह से संयुक्त परिवार टूट कर एकल परिवार में बनने लगे और दो नौकरी का चलन बढ़ा उससे भारतीय समाज में पश्चिम जैसे समस्याओं की झलक मिलने लगी। सन 2002 के परिवेश को ममता ने इस लघु उपन्यास में समग्रता  समेटने की कोशिश की है और वह इसमें पूर्णता सफल भी है।  अगर आपको भी यह नावेल पढ़ना हो तो नीचें लिंक से फ्री में डाउनलोड कर सकते है।  


आशीष  कुमार 
उन्नाव , उत्तर प्रदेश।  











Featured Post

SUCCESS TIPS BY NISHANT JAIN IAS 2015 ( RANK 13 )

मुझे किसी भी  सफल व्यक्ति की सबसे महतवपूर्ण बात उसके STRUGGLE  में दिखती है . इस साल के हिंदी माध्यम के टॉपर निशांत जैन की कहानी बहुत प्रेर...