पुस्तक मेला
वक़्त कितना बीत जाये पर अख़बार पढ़ना बंद न होगा , प्राय सुबह सुबह टैब में पढ़ लेते है। उसी से पता चला पुस्तक मेला लगने वाला है, फिर कुछ मित्रों ने याद दिलाया। आज भी सोच रहा हूँ जाऊ या न जाऊ। मेरे पुराने परचित सोच रहे होंगे भला मेरे जैसा पुस्तक प्रेमी ऐसी दुविधा में क्यू है।
मेरी दुविधा की वजह, शायद वही है जो आपकी भी होगी। मेरे ख्याल से पीछे 5 ... 6 साल ने शायद ही कोई ऐसा साल रहा हो जब प्रगति मैदान के पुस्तक मेला जाना न हुआ हो। हर साल , आगे पीछे जरूर गया। खूब घूमा और किताबे भी खूब खरीदी। अफ़सोस पुरे पुरे साल बीत गए , किताबे ज्यों का त्यों रखी है. सुरेंद्र मोहन पाठक के नावेल से लेकर बारेन बुफेट के एनुअल स्पीच का कलेक्शन , ज्योतिष , और भी विविध विषय पर पता नहीं क्यों अब पढ़ा न जाता है।
न पढ़ने की तमाम बार वजहों को विश्लेषित भी किया है। फ़ोन , टीवी पर ott कंटेंट , पढ़ने की उपयोगिता न समझ आना के साथ साथ सबसे बड़ी वजह फिटनेस के प्रति नया प्रेम है। जब से मैराथॉन में रूचि जागी समय समझ ही न आता है कि वक़्त कहां चला जाता है। सुबह स्ट्रेंथ ट्रेनिंग कर ली तो पुरे दिन शरीर आराम मांगता है , हर वक़्त बुखार , खुमारी सी चढ़ी रहती है। अब जाकर एक चीज समझ आयी है पढ़ाई लिखाई और वर्कआउट दोनों एक साथ करना बड़ा मुश्किल है, खासकर जब आप फुल टाइम जॉब भी कर रहे हो।
पुस्तक मेले में कुछ दिन और बचे है ये पता है कि जाऊंगा तो जरूर और बुक का ढेर भी आएगा , ये भी तय सा है कि बस वो किताबें हर साल की तरह अनछुई ही रह जाएगी।
© आशीष , उन्नाव।
13 जनवरी , 2026 .
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