शुक्रवार, 29 मई 2026
Nostalogia
शनिवार, 4 अप्रैल 2026
समय समय की बात है
समय समय की बात है
- आशीष कुमार
2014 के आस पास की बात है। उन दिनों फेसबुक पर बहुत सक्रिय हुआ करता था। फेसबुक के जरिये उनसे जुड़े। वो उस साल आईपीएस में चयनित हुए थे। अहमदाबाद में ही थे वो , जितना मुझे याद आता है , किसी चयनित व्यक्ति से रूबरू होने के वो गिने चुने अवसर में एक था। उन दिनों कस्टम हाउस , अहमदाबाद में एक्साइज इंस्पेक्टर के तौर पर जॉब कर रहा था। वही वो मिलने आ गए , मै बड़े गर्व से बाकि लोगो से परिचय कराया कि ये मेरे मित्र है और इनका इसी साल आईपीएस में चयन हुआ है।
विदाई के वक़्त हम ऑफिस के बाहर चाय की एक टपरी पर खड़े होकर चाय पी रहे थे तो वो बोले ये अपना ही कोई भाई बंधू होगा। वो पीछे राजस्थान से थे और तमाम लोग अहमदाबाद में ऐसे काम किया करते थे। उनका कहने या जतलाने का आशय यह था कि वो बड़ी सामान्य पृष्टभूमि से आते थे। मुझे हमेशा से यह चीज बड़ी आकर्षित करती थी ,वही भाव राजा का बेटा अगर राजा बना तो क्या बड़ी बात हुयी , बड्डपन तो वो है कि किसान का बेटा राजा बने।
हम सम्पर्क में बने रहे। 2015 वाले upsc के मैन्स में अहमदाबाद वाले सेंटर पर फिर मिलना हुआ , वही अंतरंगता , प्रेमभाव के साथ वो मिले। उस साल भी वो दोबारा से चयनित हुए , आईपीएस में ही हिमाचल कैडर मिला। पीछे 2014 वो उत्तर प्रदेश कैडर में आईपीएस चुने गए थे। उसके बाद शायद उन्होंने ने एग्जाम न दिया और उत्तर प्रदेश में ही जॉब करने लगे।
अलीगढ़ में वो पोस्टेड थे। कभी कभी बात हो जाती थी। मेरा भी 2018 में चयन हो गया था। अब ज्यादा आत्मविश्वास के साथ सम्पर्क था। अलीगढ़ के दिनों में ही एक मित्र रविंद्र यादव का फोन आया। एक सिफारिश थी, आज सोचता हूँ कि ऐसी सिफारिश अगर आज आये तो एक पल में मना कर दू। सिफरिश थी- किसी की मौत हो गयी थी और परिवार वाले पोस्टमार्डम न कराना चाह रहे थे। जब से क्राइम तक पर शम्स की स्टोरी सुनना शुरू किया तब से ये समझ आ गया कि पोस्ट मार्डम जरूर कराना चाहिए , खास तौर पर जब घर वाले मना कर रहे हो। मैंने अपने उसी आईपीएस मित्र से बात हुयी और उनका काम हो गया।
एक और घटना याद आती है , वो महोबा में पोस्टेड थे। अपने प्रदेश में जितने आईएएस, आईपीएस से सम्पर्क होता है , कही न कही मुँह से निकल ही जाता है। अमुक हमारे बड़े खास है कुछ ऐसा। एक हमारे परिचित या यूँ कहे दूर के रिश्तेदार उसी जिले में परिवहन विभाग में बड़े अधिकारी थे। उनका फोन आया कि आप पुलिस कप्तान साहब को जानते हो क्या ? मेरे हाँ कहने पर और तस्कीद करने लगे अच्छे से जानते हो क्या। जितना समझ आ रहा था कुछ न कुछ अवैध उगाही का मामला रहा होगा। परिवहन विभाग की छवि कुछ ऐसी ही है पुलिस ने मामला बना दिया होगा तो वो भागे भागे फिर रहे थे। खैर आदमी पूरी बात बताता तो है नहीं। उनकी भी सिफारिश की और उनका भी काम हो गया।
जितना मुझे याद है , वो काफी साधारण तरीके से रह थे। दरअसल हर किसी की जिज्ञासा होती है कि किस सीट पर कितना पैसा छाप रहा है , उनका जिला अवैध खनन के लिए जाना जाता था। जितना मैंने उनकी बातचीत से समझा था , उनका परिवार बड़ा साधारण जीवन जी रहा था। बच्चे सामान्य स्कूल में पढ़ रहे थे। तभी वो घटना हुयी।
यह इतना चर्चित मामला है कि गूगल में एक शब्द डालने से सैकड़ो कहानियाँ निकल आएंगी। मैंने जब सुना यकीन न हुआ। यहाँ से मैं कहूँगा कि जब बुरा समय आता है तो आप बच न सकते। उनके जिले में एक व्यक्ति आरोप लगा कर आत्महत्या कर लेता है। इसके आगे की तमाम कहानी न मुझे पता है और न किसी तरह की टिप्पणी करने की पोजीशन में हूँ।
कम से कम 2 साल , पुलिस अपने ही विभाग के उच्च अधिकारी को खोजती रही और न खोज पायी। उनके बारे में जानने का एकलौता साधन इंटरनेट और समाचार पत्र थे। मेरा बड़ा मन था किसी तरह से उनका सम्पर्क मिले। सिविल सेवा के तमाम ग्रुप में उनका नया नंबर जानने की इच्छा होते हुए भी कभी मांग न सका। फिर एक दिन मैंने पढ़ा कि उन्होंने सरेंडर कर दिया अब वो लखनऊ जेल में थे। यहाँ भी जाने का दिल किया , उनसे उनका हाल और उनका उस आत्महत्या का वर्जन जानने की इच्छा थी। मुझे कभी भी यकीन न हुआ कि इसमें उनका कोई लेना देना हो सकता है।
मेरे जेहन से यह चैप्टर क्लोज हो गया था। इसी साल की बात है , ठीक से याद नहीं , शायद जनवरी की बात होगी। मेरे व्हाट ऍप स्टेटस पर उनका उसी पुराने नंबर से रिस्पांस आता है तो एक पल को मुझे यकीन न हुआ। छोटी सी चैट के बाद , मैंने कहा कि मैं किसी दिन आराम से लम्बी बातचीत करता हूँ। उनको काल करने के लिए फुर्सत न मिली , दिन टलते गए। कैसी फितरत है , जब सम्पर्क न था तो बड़ा याद करता रहा और अब जब सामने से जबाब आया तब वक़्त न मिल रहा।
इस होली में घर में फुर्सत से लम्बी बातचीत हुयी। पोस्ट लम्बी होती जा रही है और उनकी बातचीत में तमाम चीजे जानने को मिली । जैसे कि उस मर्डर में उसके ही बिजनेस पार्टनर की बड़ी संदिग्ध भूमिका था और भी तमाम बातें। इनको अफ़सोस यह है कि किसी जूनियर ने विविध तरीक़े के आश्वासन दिया था , इसके चलते ही इन्होने सरेंडर में इतनी देरी की, इस देरी के चलते तमाम नुकसान हुए। अब उनके ऊपर और भी तमाम और मुकदमे थोप दिए गए।
उनकी जिंदगी वहीं आकर खड़ी हो गयी। अहमदाबाद में फैमिली के साथ रह रहे हैं। बॉम्बे में प्राइवेट जॉब की बातचीत चल रही है। उनके तमाम बैचमेट भी यह कहानी पढ़ेंगे , कैडर मेट भी। मुझे नाम बताने की जरूरत नहीं है। उनका वही पुराना नंबर ही चल रहा है। अच्छे में तो हर कोई साथ देता है , उन्हें तमाम तरह की मदद की जरूरत है। जब भी दिल्ली आना होगा , मेरी मुलाकात होगी , जो अपने से बन पड़ेगा करुँगा।
उस घटना का राजनीतिकरण हो गया था इसके चलते ही चीजे इतना बिगड़ी। इसके चलते ही उन्हें किसी से भी सहयोग न मिल पाया। लोग चाहकर भी सच का साथ न दे पाए। मुझे इतना पता है कि सिर्फ आरोप लगाने से , अपराध कभी साबित न होगा और किसी जिले के पुलिस कप्तान को किसी व्यक्ति की हत्या/ आत्महत्या के लिए सीधे तौर पर कैसे ठहराया जा सकता है। एक न एक दिन , सच जरूर सामने आएगा और वो वापस जरूर आएंगे।
© आशीष कुमार , उन्नाव।
शुक्रवार, 27 मार्च 2026
खड़े होकर ध्यान
खड़े होकर ध्यान
जहाँ मै रहता हूँ , वहीं पर एक पार्क है , इतना सघन की जंगल का अहसास होता है। जिम के बाद , मन हुआ कि आज वहीं जाकर थोड़ी देर ध्यान लगाता हूँ। यूँ तो पार्क में तमाम बेंच है पर एक काफी भीतर हट है , उसके पास पास काफी नीरवता रहती है। बड़ी उम्मीद से उधर गया तो देखा वहाँ पहले से कोई मौजूद है , इसलिए आगे बढ़ गया। इसके आगे कोई जगह न थी जहाँ सहजता से ध्यान लगाया जा सके। यूँ ही चलते चलते ख्याल आया की क्यूँ न खड़े होकर ध्यान लगा लिया जाय। वहीं रुक गया , सहजता से आंखे बंद की, तमाम विचार धीरे धीरे स्थिर होने लगे। मन प्रकति , हवा , पक्षिओं के संगीत पर टिकने लगा।
इंस्टाग्राम पर मुझे रील्स में सबसे ज्यादा वो पसंद आती है जो फनी होती है। एक रील याद आती है , जिसमें एक बाबा जी कहते है मैं रोज रात में २ बजे उठकर ध्यान लगाता हूँ , पिछले ५० साल से लगा रहूं पर आज तक न लगा। कितनी फनी पर सही बात बोली। ध्यान लगना होता है मिनट में भी लग जाता है अगर न लगना होगा तो सालों कोशिस करते रहो न लगेगा। मेरे साथ अच्छी बात है कि मेरा मिनट में लग जाता है , यह अलग बात है कि कोई नियमित अभ्यास नहीं करता , बस लग जाता है। ५ मिनट भी अलग ध्यान लगा लिया तो मेरी जुबान भारी हो जाती है। कहने का मतलब मौन स्वतः आ जाता है , कुछ बोलने का मन न करता। पूरे दिन बगैर बोले रह सकता हूँ पर दिन ऐसे कहाँ होते है , किसी न किसी वजह से बोलना ही पड़ता है , बड़ा कष्ट होता है , जब ध्यान से आया मौन तोडना पड़ता है।
ध्यान कहाँ से आया पता नहीं पर बस आ गया। अहमदाबाद के दिनों में मित्र राजेश सोनी ( sdm ,हरियाणा ) के साथ , अहमदाबाद के बाहर एक आश्रम जाया करता था , हर रविवार। क्या शानदार जगह थी। आश्रम , मंदिर जाने ले लिए कभी उत्सुक न रहा , सच तो ये है कि मन हमेशा संदेह से भरा रहता था। पर इस जगह जाकर मेरी काफी धारणा बदल गयी। वहा की तमाम बाते है पर बात ध्यान की चल रही तो वही पर फोकस करते है। वहां जाकर मैंने एक अनोखी बात देखी , वहाँ पर प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ कर ध्यान प्रकिया का अभ्यास कराया जाता था। १ घंटे चुपचाप आंखे बंद करके , ध्यान साधना होता था। मुझे ठीक से याद है कि वो १ घंटा वाकई बड़ा भारी होता था , कोई फोन नहीं , कोई बात नहीं , कुर्सी में पीठ टिका कर बस बैठे रहो। अक्सर मै सो जाता रहा वो भी बड़ी गहरी नींद में। लगभग ४००- ५०० लोग उस बड़े से ध्यान केंद्र में एक साथ ध्यान लगाते थे। बड़ी सकारात्मक ऊर्जा महसूस होती थी।
ध्यान के बाद , बड़ा सात्विक सा नाश्ता भी दिया जाता था। यह सब निःशुल्क होता था। कुछ लगातार रविवार के बाद राजेश सोनी की पहल पर एक गुरु जी ने गुरु मन्त्र दिया। एक बंद कमरे में बैठकर ध्यान लगवाया और अंत में हाथ पकड़ कर गुरु मन्त्र दिया। मेरा मन यह सब शंका से देख रहा था। मै सोच रहा था , इससे कुछ नहीं होता पर हुआ। उनकी सहजता , सरलता और सेवा भाव धीरे धीरे मन में विश्वास जगाने लगा। एक कार्ड भी बनाया गया।
दिल्ली आने के बाद मैंने उसको बहुत मिस किया , शुरू में यहाँ के केंद्र खोजने की कोशिस की , राजेश से बात हुयी तो बताया कि कहीं आउटर में है। धीरे धीरे व्यस्तता बढ़ती गयी। अहमदाबाद के वो कुछ रविवार मेरे जीवन की सबसे सकारात्मक रविवार थे।
© आशीष कुमार , उन्नाव।
२८.०३.२०२६
( नोट :- काफी दिनों बाद , पुराने दिनों की शैली में यह उक्त सृजन , मेरे कुछ मिनट के खड़े खड़े ध्यान को जाता है। मौन जारी है देखते है कितने घंटे चल पता है। )
मंगलवार, 13 जनवरी 2026
World Book Fair Delhi
पुस्तक मेला
वक़्त कितना बीत जाये पर अख़बार पढ़ना बंद न होगा , प्राय सुबह सुबह टैब में पढ़ लेते है। उसी से पता चला पुस्तक मेला लगने वाला है, फिर कुछ मित्रों ने याद दिलाया। आज भी सोच रहा हूँ जाऊ या न जाऊ। मेरे पुराने परचित सोच रहे होंगे भला मेरे जैसा पुस्तक प्रेमी ऐसी दुविधा में क्यू है।
मेरी दुविधा की वजह, शायद वही है जो आपकी भी होगी। मेरे ख्याल से पीछे 5 ... 6 साल ने शायद ही कोई ऐसा साल रहा हो जब प्रगति मैदान के पुस्तक मेला जाना न हुआ हो। हर साल , आगे पीछे जरूर गया। खूब घूमा और किताबे भी खूब खरीदी। अफ़सोस पुरे पुरे साल बीत गए , किताबे ज्यों का त्यों रखी है. सुरेंद्र मोहन पाठक के नावेल से लेकर बारेन बुफेट के एनुअल स्पीच का कलेक्शन , ज्योतिष , और भी विविध विषय पर पता नहीं क्यों अब पढ़ा न जाता है।
न पढ़ने की तमाम बार वजहों को विश्लेषित भी किया है। फ़ोन , टीवी पर ott कंटेंट , पढ़ने की उपयोगिता न समझ आना के साथ साथ सबसे बड़ी वजह फिटनेस के प्रति नया प्रेम है। जब से मैराथॉन में रूचि जागी समय समझ ही न आता है कि वक़्त कहां चला जाता है। सुबह स्ट्रेंथ ट्रेनिंग कर ली तो पुरे दिन शरीर आराम मांगता है , हर वक़्त बुखार , खुमारी सी चढ़ी रहती है। अब जाकर एक चीज समझ आयी है पढ़ाई लिखाई और वर्कआउट दोनों एक साथ करना बड़ा मुश्किल है, खासकर जब आप फुल टाइम जॉब भी कर रहे हो।
पुस्तक मेले में कुछ दिन और बचे है ये पता है कि जाऊंगा तो जरूर और बुक का ढेर भी आएगा , ये भी तय सा है कि बस वो किताबें हर साल की तरह अनछुई ही रह जाएगी।
© आशीष , उन्नाव।
13 जनवरी , 2026 .
Featured Post
SUCCESS TIPS BY NISHANT JAIN IAS 2015 ( RANK 13 )
मुझे किसी भी सफल व्यक्ति की सबसे महतवपूर्ण बात उसके STRUGGLE में दिखती है . इस साल के हिंदी माध्यम के टॉपर निशांत जैन की कहानी बहुत प्रेर...
-
एक दुनिया समानांतर संपादक - राजेंद्र यादव एक दुनिया समानांतर , राजेद्र यादव द्वारा सम्पादित नयी कहनियों का ...
-
निबंध में अच्छे अंक लाने के लिए जरूरी है कि उसमे रोचकता और सरसता का मिश्रण हो.........आज से कुछ लाइन्स या दोहे देने की कोशिश करता हूँ......
-
नीला चाँद कल रात में अंततः इस उपन्यास का पठन पूरा हो गया। शिव प्रसाद सिंह द्वारा लिखे गए इस बहुचर्चित उपन्यास की विषय वस्तु 11 वी सदी के स...