कविता: स्मृतिलीनता
लोग लौट ही आते हैं
तमाम अंतराल के बाद,
एकाएक एक रोज
छोटे से संवाद के बाद
वो बताते है पुराने दिनों की बात
उन दिनों जब संवाद
करना आसान न था
कभी छोटी से मुलाकात
दो शब्द, चार बातें
इनके सिवा ज्यादा कुछ और नहीं
तमाम अव्यक्त भावनाओं के सिवा
पुराने दिनों की यादें
कुछ परिचित जगहे
कुछ परिचित अध्यापक
एक दो नाम,
उन दिनों का
ढेर सारा संकोच
फिर घूमकर वहीं
आ जाना कि
उन दिनों मिलते तो
ये होता, वैसा होता
उन दिनों का
तमाम अनकहा
धीरे धीरे व्यक्त होता है
रह जाता है वर्तमान में
तमाम कुछ कहने को..
© आशीष कुमार, उन्नाव।
29 मई, 2026.