बुधवार, 29 जनवरी 2025
एक अद्वितीय लड़की की अद्वितीय प्रेम कथा
मंगलवार, 7 जनवरी 2025
नौकर की कमीज (1994 )
नौकर की कमीज (1994 )
नए साल का पहला हफ्ता भी न बीता और एक उपन्यास खत्म हो गया। वैसे एक दशक पहले यह बड़ी सामान्य बात होती पर अबके दिनों में यह खुद के लिए बड़ी बात लग रही है और इसी बहाने काफी आरसे से रचनाकर्म में जो ठहराव आ गया था वो भी टूटता नजर आ रहा।
नौकर की कमीज पर बात करने से पहले कुछ और जरूरी बातें है जो पिछले कुछ सालों में महसूस हुआ। किताबों से जुड़ाव हमेशा से रहा यह अलग बात है कि आप उतना पढ़ा नहीं जाता। देश से सबसे बड़े पुस्तक मेला में हर साल जाता रहा और हमेशा पिछले साल से ज्यादा किताबे खरीदी। मेरे ख्याल से पिछले साल 10 हजार से ज्यादा रूपये की ही किताबें खरीदी , दरअसल कथा कहानी से आगे इन्वेस्टमेंट , ज्योतिष , दर्शन में रूचि बढ़ी तो किताबों में खर्च भी बढ़ा , हर बार लाकर फोटो खीच कर स्टेटस में लगाकर ओछा प्रदर्शन भी किया पर वो अनछुई रखी रही। एक कमरे की अलमारी से दूसरे कमरे की अलमारी तक गुजरती रही पर पढ़ी न गयी। कई बार उन्हें कुछ लोगों को उपहार के तौर पर भेंट कर दी।
किताबें और पेन भेंट करना एक शौक सा बन गया। लोग मना भी न कर पाते और खुद को एक सांत्वना भी रहती कि किताबें पढ़ी न गयी तो क्या हुआ किसी काम तो आयी।
अब इस नावेल की भी बात करना जरूरी हो गया है क्युकि उसकी शैली न चाहते हुए कुछ दिनों या समय तक लेखन में अनजाने में ही अनुसरित होती रहेगी। यह भी विडंबना है कि नौकर की कमीज , मेरे पास हार्ड कॉपी है पर किताब पढ़ी गयी है किंडल इ बुक रीडर पर।
ऐसा नहीं है कि नौकर की कमीज को पहले सुना या पढ़ने की कोशिस न की , कई बार उठाया पर २ पेज से ज्यादा पढ़ा न गया। शीर्षक इतना लुभावना कि हर बार मन करे कि देखे कहानी क्या है पर कहानी में विश्लेषण इतना ज्यादा है कि बड़ी हिम्मत और एक खास तरह का मूड हो तभी आप पढ़ सकते है। इस बार जाने क्या हुआ , किस मनोदशा में इस पढ़ना शुरू किया और ३ दिन में खत्म हो गयी। वैसे अगर सीधा कहानी की बात करू तो एक पेज में कहानी समिट सकती है पर शुक्ल जी ने इसको जो विस्तार दिया है वहीं इस उपन्यास को अलग बनाता है। भाषा और शिल्प कई बार आपको कठिन लग सकता है , मैंने भी इसको समझने के लिए u tube का सहारा लिया ताकि समझ सकूँ जो समझा है वो ठीक है या नहीं। जरूरी नहीं जो मैं समझू वही सब समझे।
पूरी कहानी पर बात करने के लिए न समय है और न ही आप कि इसमें रूचि होगी पर अगर आप नौकरीपेशा है , नौकरी की बोरियत से जूझ रहे है , अपने आपको सार्थक न महसूस कर पा रहे हो तो यह आपको अच्छा लग सकता है। अंततः हम सब नौकर ही तो है संतू बाबू की तरह जिसे बुशर्ट उतार कर जबरदस्ती कमीज पहना (इस रूपक को समझना सबके बस की बात नहीं ) दी गयी है और उपन्यास के अंत में सब मिलकर कमीज के टुकड़ो को जला देते है। प्रशंगवस 1999 में मणि कौल ने इस पर एक फिल्म , इसी नाम से बनाई है।
दीवार में एक खड़की रहती थी (1997 ) को भी तमाम बार पढ़ने की कोशिस की है पर दो पन्नों से आगे न बढ़ पाया उम्मीद करता हूँ , जल्द ही उस पर बात होगी.
©आशीष कुमार , उन्नाव ( उत्तर प्रदेश )
मंगलवार, 22 अक्टूबर 2024
अगर जूतों से रेस होती तो मैं भी खरीद लेता
अगर जूतों से रेस होती तो मैं भी खरीद लेता
इस साल (2024) जुलाई से मैंने अपने फिटनेस प्रोग्राम में रनिंग भी जोड़ ली। जुलाई 24 में मेरी कोशिस ३ किलोमीटर दौड़ने की होती थी। अगस्त में मैंने इसे ५ से ७ किलोमीटर कर लिया। 22 सितम्बर 2024 को पहली बार डेकाथलान की दिल्ली वाली रेस में भाग लिया। 10 किलोमीटर मैंने 75 मिनट के अंदर कर लिया जोकि मेरा खुद का टारगेट था। मुझे बहुत ख़ुशी मिली। रेस के सर्टिफिकेट और मैडल बहुत संभाल के रखा है।
इसके साथ ही मन में बहुत से ख्याल आने लगे। लगा कि मुझे एक ऐसा लक्ष्य मिल गया है जिसमें कोई अंत न है। जितना मन करे , जिस टाइम मन करे , जितना तेज मन करे दौड़ो। किसी भी उम्र तक इसे किया जा सकता है। इसीलिए मैंने बहुत सी रेस में एनरोल करा लिया। मैंने टारगेट रखा कि 2026 में टाटा मुंबई मैराथन जोकि जनवरी में होगी , में भाग लूँगा।
इसी बीच काफी सारे जूते जोकि रनिंग के लिए अच्छे माने जाते है भी खरीदे। डेडिकेटेड फिटनेस वाच भी लेनी पड़ी। वेदांत दिल्ली मैराथन में मैंने 10 किलोमीटर में भाग लिया। मुझे पता न था कि यह बहुत अच्छी रेस मानी जाती है। रूट , सभी तरह की व्यवस्था , हर लिहाज से अच्छी थी। जब मैं इंडिया गेट के पास से दौड़ते हुए जा रहा था तो एक बुजुर्ग ने मुझे टोका कि जुटे बहुत अच्छे है तो मैंने कहा थैंक यू। अगली ही लाइन में बोले अगर जूते से रेस होती तो मै भी खरीद लेता। दरअसल वो व्यंग्य कर रहे थे क्युकि मै काफी धीरे दौड़ रहा था। वैसे भी लॉन्ग रेस में प्रैक्टिस और कितने साल से दौड़ रहे हो यह बहुत मैटर करता है। यह सच है कि आपकी स्पीड धीरे धीरे ही बनती है। रेस में बहुत से लोग मिलते है जो काफी उम्र दराज होते है पर बहुत अच्छी स्पीड से दौड़ते है।
मै उन अंकल की बात सुनकर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गया। रेस में तमाम लोग एक दूसरे को मोटीवेट करते रहते है। मैंने उनकी बात का बुरा न माना और उनसे प्रेरणा लेते हुए आगे बढ़ गया। मन में संकल्प लिया कि आने वाले दिनों में अपने महगे जूते को जस्टिफाई जरूर करूंगा।
- आशीष कुमार ,उन्नाव।
( लिखी पिछले साल थी , पोस्ट अब हो रही है। )
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