रविवार, 28 जून 2026

Fate


लघुकथा :- किस्मत  

- आशीष कुमार 

    वो अलग थी , सबसे अलग।  उस रास्ते से उनका कई बार गुजरना हुआ। दोनों बातें करते हुए गुजरते थे। लड़की बातों के साथ साथ तमाम चीजे सोचा करती थी। बस्ती पुरानी थी पर अब वहां विकास पहुंच रहा था। वो रास्ता काफी उबड़ खाबड़ था , उसमे तमाम गड्ढे भी हो गए थे। 

    उन्हें साथ हुए काफी वक़्त हो गया था , एक रोज उधर से जब जाना हुआ तो देखा वो रास्ता काफी अच्छी नई सड़क में बदल गया। बीच में पौधे , रोड में पेंट से मार्किग , किनारे हाइलाइटर , गहरा चमकता तारकोल , बेहतरीन तकनीक से बनी , समतल सपाट खूबसूरत रोड। 

" शायद एक दिन मेरी भी किस्मत ऐसे ही बदल जाये " उसने एकाएक कहा। 

" कैसे ? " लड़के ने चौंककर पूछा।  

" इस रोड की तरह " उसने जबाब दिया। 

 © आशीष कुमार , उन्नाव।  

28.06.2026 

सोमवार, 22 जून 2026

Make a Swing

 

 लघुकथा - झूला बना दो 

आशीष कुमार

    उनके बीच में हमेशा कुछ न कुछ गड़बड़ हो जाता था। कोई कहता कुछ था, पर सामने वाला समझता कुछ था। कुछ भाषा और कुछ बोली का असर था। वो हमेशा उसे छेड़ता कि 

"बचपन से ऐसी हो , या कोई खास ट्रेनिंग ली है। "

" मैं नहीं जानती ऐसा क्यों होता है , मैं तो सही ही बोलती हूँ सबसे। मैं हमेशा सही होती हूँ पर लोग मुझे समझ न पाते। " वो मासूमियत से जबाब देती।  

    फिर वो एक  कहानी सुनाती। उसे सजने-सवारने का शौक बचपन से था। उसे अपने हाथों में मेहँदी लगवाना बहुत पसंद था। तमाम बार वो अपने दोनों हाथों में मेंहदी लगवाती। कजरी तीज का त्यौहार था। पूरा शहर उल्लास से भरा। एक शाम वो बाजार गयी। 

     बाजार की तमाम भीड़ में उसका मन मेहँदी लगवा रहे लोगो में अटक गया। उसने भी एक अम्मा जी के पास जाकर बैठ गई। वो हमेशा अलग सोचती थी। 

    " अम्मा , मेरे एक हाथ  में झूला बना दो। " अम्मा को बताकर वो भीड़ में देखते हुए कुछ सोचने लगी।  अम्मा ने तेज हाथों से उसके दूध जैसी गोरे हाथों में मेहँदी रच दी। उठने से पहले उसने अपने हाथों में देखा , उसे झूला समझ न आया। उसने अम्मा से पूछा -

" ये क्या बना दिया अपने " 

"वही जो आपने कहा था—दूल्हा ," अम्मा ने कहा।  

 उस मासूम ने पूरे १५ दिन , अपने अनजान दूल्हे को हाथ में  बैठकर रखा। ये राज किसी को न पता चला।  

© आशीष कुमार , उन्नाव। 

२२ जून 2026  .








रविवार, 21 जून 2026

Dream

लघुकथा -  ख्वाब 

आशीष कुमार


" मैंने  हमेशा से एक ख़वाब देखा है  कि मुझे किसी से बहुत गहरा प्रेम हो , इतना कि मैं उसके बगैर जी न सकूँ ? " उसने  खनकती आवाज में कहा। 

" तो फिर क्या तुम्हें हुआ , मिला कोई ऐसा जिसके बगैर जिंदगी जीना मुश्किल लगे " विभव ने सब जानते हुए भी पायल के मुँह से सुनना चाहा। 

" अब तुम ये पूछ रहे हो , जान बूझ के अनजान बन रहे हो " पायल मुस्कुरा उठी। काफी दिनों के बाद , दोनों साथ बैठे थे। 

" पर मेरा पूरा ख़्वाब जानना चाहोगे "

" हाँ क्यों नहीं " 

" मैंने हमेशा से यही सोचा है कि मुझे सच्चा प्रेम हो फिर वो मेरा दिल तोड़ दे , बगैर कुछ जबाब दिए अचानक से गायब हो जाये। ऐसे जाये कि फिर वो कभी न मिले। दूसरे शब्दों में कहूँ तो मैं बेइंतिहा पीड़ा झेलना चाहती हूँ "

" ये क्या बात हुयी ? ऐसा सोचने की कोई खास वजह ?" विभव ने हैरानी से पूछा " 

" हाँ , मेरे ऐसे ख़्वाब की वजह है। मैंने कहीं पढ़ा था कि जिंदगी में सफल होने के लिए दिल टूटना जरूरी है , मैं बस सफल होना चाहती हूँ , बगैर दिल टूटे मैं कुछ न कर सकती हैं। " पायल ने अपनी बात पूरा करते ही उठकर चली  गयी। 

© आशीष कुमार , उन्नाव 

21 जून 2025

गुरुवार, 18 जून 2026

Money Plant

 

मनीप्लान्ट 


    मेरी  याद में मनीप्लान्ट का जो पौधा याद आता है , वो पौधा मेरे गांव वाले  घर के आँगन का था। आँगन से एक अंदर से नाली जाती थी। उसी के पास , एक टूटी बाल्टी में मिट्टी भर का लगा दिया गया। वो मनीप्लान्ट कहां से आया था , इतना याद नहीं। यह जरूर है , उन्हीं दिनों इससे जुड़े मिथक सुने। जैसे कि मनीप्लान्ट को हमेशा चुरा के लाना चाहिए , इसको लगाने से घर में पैसा आता है। 

    वैसे तो किसान परिवार में , किस्मत से ज्यादा मेहनत पर जोर दिया जाता है। यह मेरी खुद की धारणा है जो समय के साथ आयी है। जैसे हमारा परिवार , उतना धार्मिक नहीं रहा कभी , घर में मंदिर रहा पर रोज उसमें दिया जले , पूजा पाठ हो , ऐसा न होता था। आज सोचता हूँ कि शायद नियमित पूजा पाठ न करने की वजह , समय का आभाव रहा हो।  

    तो वो मनीप्लान्ट शुरू में काफी छोटा था , उसको लेकर मुझे काफी उम्मीदें थी। ऐसा लगता था कि जैसे जैसे यह बड़ा होगा , घर में चीजें ठीक होंगी। वो पेड़ सालों-साल घर में रहा , हमेशा हरा भरा और खूब फैलाव लिए हुए। बाल्टी से निकलकर छज्जे तक फ़ैल गया , दोनों तरफ  दीवालों में डोरियों से वो फैलता ही गया। मनीप्लान्ट का वो पेड़ , सबके लिए पेड़ था , मेरे लिए उम्मीद की किरण। मेरे मन में हमेशा रहा कि मनीप्लान्ट के पेड़ से किस्मत जुडी है। यह मेरे बचपन की बात है , बालमन के कोमल सपने।  

    इसके बाद , एक दूसरा मनीप्लान्ट  पेड़ घर के बाहर लगाया गया। यह काफी बाद की बात है , इसका भी हवाला नहीं है कि आया कहाँ से। यह मनीप्लान्ट की दूसरी किस्म थी। यह बेहद बड़े पत्तो वाला मनीप्लान्ट था। यह पेड़ बड़ा मिलनसार किस्म का था , अपने आस पास के पेड़ों से लिपट गया और उनके साथ साथ बड़ा हुआ। यह पेड़ बगैर किसी देख रेख के ही प्रगति करता गया। इसके पत्ते बहुत ज्यादा बड़े और गहरे हरे रंग के थे। अब तक मैं पढ़ाई लिखाई चप्पल घिसाई के दौर से गुजरता हुआ तमाम संघर्ष , असफलताओं की पीड़ा भुगतने के बाद सफलता का स्वाद चख  चुका था। 

    तमाम सालों से बाहर हूँ पर साल में कई बार घर जाना होता रहा। आँगन का मनी प्लांट न रहा वजह आँगन ही न रहा , उसकी जगह नया निर्माण हो गया पर घर के बाहर वाला मनीप्लांट बढ़ता रहा , वो इतना प्रबल और विशाल था कि उसको बीच बीच में काटना पड़ता। यूँ तो मनीप्लान्ट का पेड़ नाजुक होता है पर मेरे घर के बाहर वाला पेड़ को काटने के लिए कुल्हाड़ी का उपयोग करना पड़ता। 

    मेरी नौकरी बदलती रही , शहर बदलते रहे। अहमदाबाद में रहने के दौरान मुझे याद है न कि मेरे वहां वाले  घर में यह रहा या नहीं। दिल्ली में यह शुरू से जीवन का अभिन्न अंग रहा। यही पर पहली बार मेरे बेहद खुबसूरत मनीप्लाँट देखे। गमले में बीच में नेट के सहारे , करीने से तराशे , सवारे हुए मनीप्लान्ट। तमाम बार अलग अलग जगह से खरीद कर लाये गए , जो कुछ महीने तो खूब अच्छे चलते पर धीरे धीरे वो खत्म हो जाते।  

    इस दौरान मैंने देखा कि इनको मिटटी की जरूरत नहीं , यह किसी भी बोतल में पानी भर कर रखे जा सकते है। उसके बाद से ये मेरे ऑफिस की टेबल का जरुरी हिस्सा बन गया। किसी भी ऑफिस में रहा तो मेरे टेबल पर पहले दिन से ही मनीप्लान्ट का पौधा रहा। कोविड के दिनों में , अपनी टेबल के सामने ४ गमले मनीप्लान्ट के रखा दिया , इससे सोशल डिस्टन्सिंग हुयी।  तमाम बार लोग इसे देखते और हैरान होते।  गमलों से एक तरह का बैरियर बना था। हलांकि उन दिनों फ्रंट पर रह कर काम किया करते थे , सरकारी अफसरों विशेषकर प्रशासन में खुद के बजाय जनता के हित सबसे ऊपर थे। इसलिए यह गमले वाली डिस्टन्सिंग बस अपने मन के लिए थी। मैं उनमें फोकस करके विचारों में डूब सकता था। अपने ऑफिस, वर्तमान से परे जाकर सोच सकता था। पेड़ , प्रकृति में तनाव से मुक्ति की विशेष शक्ति होती है।  

    लिखने पढ़ने वाले लोगों या कहे रचनात्मक लोगों का कॉफ़ी हाउस से विशेष जुड़ाव होता है। कनॉट पैलेस पर तमाम कॉफ़ीहाउस थे। मै पहली बार जहाँ गया वो वही था जिसे मैंने सुना था। आपको शायद न पता हो यह प्राचीन  हुनमान मंदिर के पास की बिल्डिंग के ऊपरी माले पर है , बहुत पुराना। मैंने सुना है , पुराने दिनों में तमाम लेखक , कलाकार यहां आ चुके है। बहुत ही साधारण सी सजावट , बहुत सामान्य से पैसे में कॉफ़ी और उसके साथ तमाम स्नैक्स मिल जाते है।  

    कभी अगर अपने मिजाज के लोग मिले और अंतरंगता अगर इस हद तक हुयी कि मिलते है तो मेरी पहली कोशिस वही रहती है , इंडियन कॉफ़ी हाउस , कनाट पैलेस ऊपरी मजिल वाला। कितनी मुलाकातें , कितनी ही यादे। तमाम बीतती शामों में , कॉफ़ी के बाद बगल की खुली छत पर चहलकदमी , चलते चलते तमाम विचार , तमाम कहानियाँ। ऐसी ही एक शाम कॉफी के बाद , मैंने उससे जिसे मनी प्लांट वाली कहानी सुनाई थी और अपने जीवन की तमाम उपलब्धियों का इसे क्रेडिट दिया था।  उसको भी इस पर यकीन सा हो गया था , मैंने उसे प्रेरणा थी कि यही कॉफ़ी हाउस से मनी प्लांट चुरा लो , बस एक छोटी सी डाल।  उसे यकीन न था कि पर मैंने कहा कि यह चल जायेगा। बाद के तमाम महीनों में उसके रूम में एक बोतल के पानी में वो मनीप्लांट चलता रहा। वैसे आज देखूँ तो उसके जीवन में भी चीजे ठीक हो गयी है क्या इसको क्रेडिट उसी मनीप्लांट को दिया जाय ? 

    खैर मेरे पास मनीप्लान्ट की कहानियाँ उतनी लम्बी और बड़ी है , जितना मेरे गांव वाले घर के बाहर वाले पेड़ की विशालता और फैलाव। उनपर फिर कभी।  क्या आपने  इंडियन कॉफ़ी हाउस , कनॉट पैलेस की कॉफ़ी पी है ?

- आशीष कुमार , उन्नाव।  

१८ जून २०२६।  













  

सोमवार, 15 जून 2026

Without you

 उसके बिना 


    अपने भी जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर , यह जरूर सुना होगा कि किसी के चले जाने का बाद ही उसका महत्व पता चलता है। मैंने भी बड़ी शिद्द्त से यह महसूस किया है, उन दिनों जब वो साथ था तब उसका जिंदगी में  होना सामान्य सी बात थी, अब जब वो हमेशा के लिए खो गया है , मैंने उसे हर रोज याद किया है।  

    जब यमुना एक्सप्रेस पर आगरा से दिल्ली की तरफ आते है तो कुछ टोल के पास एक बड़ा सुन्दर मंदिर का बोर्ड दिखाई पड़ता है। मुझे लगभग 7 साल हो गए, इस रास्ते आते जाते और लगभग हर बार ही इसको देखा। मैं प्रेममंदिर वृंदावन के बोर्ड की बात कर रहा हूँ जो टोल के पास लगे है। तमाम लोगों से इसकी भव्यता , विशालता के  बारे में सुना भी था।  

    कहते है किसी जगह या मंदिर में तब तक  जाना होता नहीं जब आपको वो बुलाये न।  पिछले तमाम सालों से मथुरा , वृन्दावन के पास से गुजरना हुआ पर कभी उधर जाना न हुआ।  पिछले साल , सावन के महीने में कुछ संपर्कों के चलते वृन्दावन जाने का अवसर मिला। होस्ट बड़े सज्जन थे। सैकड़ो मंदिर में कुछ सबसे महत्वपूर्ण की लिस्ट बना दी और उनका क्रम बता दिया। सब जगह बड़ी सुविधा से दर्शन हो गए। बांके बिहारी जी मंदिर में स्थानीय पुलिस  के सहयोग से  काफी सुविधा से दर्शन हो गए। 

    मेरी लिस्ट में सबसे अंत में प्रेम मंदिर था। शाम हो गयी थी. धीरे धीरे बारिश भी  हो रही थी।  मंदिर काफी बड़ा और सुन्दर  बना है। जूते जमा करने की व्यस्था थी और तमाम लोगों ने ऐसे खुले में भी जूते डाल दिए थे। लाइन जरा लम्बी थी। इससे पहले भी मैंने अपने जूते तमाम मंदिर के बाहर ऐसे ही डाल दिए थे। यहाँ पर भी एक कोने में रखकर मंदिर दर्शन के लिए चला गया। करीब 30 मिनट के बाद जब लौटा और अपने जूतों के पास गया तो वो वहाँ न थे। एक पल को यकीन न हुआ कि जूते चोरी भी सकते हैं पर वो हो चुके थे।  ठीक उस क्षण तक वो मेरे तमाम जूतों में महज एक जोड़ी जूते थे  पर खोने के बाद , दिल बैठ सा गया। 

    पिछले साल रनिंग का जोश सा आया था , उससे जुडी तमाम चीजों,  तमाम अलग अलग कम्पनी के जूते , अलग अलग जगह से खरीदे थे। सकनी , होका , ब्रुक्स , नाइके , एसिक्स , प्यूमा  आदि। इनमें से कुछ बहुत मुश्किल से मिले थे। 

    मेरा जो जूता प्रेम मंदिर खोया था , वो HOKA का नीले कलर के जूते थे। ठीक से से याद नहीं कि दिल्ली से लिए थे या गुरुग्राम से। एमआरपी 14000 के आस पास था , मुझे ९००० के मिले थे। शुरू में उन्हें ज्यादा पहनता न था , एक रेस में आजमाया तो बड़ा अच्छा लगा। उनका वजन काफी कम था और बाउंस अच्छा था , शायद कॉर्बन प्लेट वाले थे। उसके बाद तो वो मेरे रेगलर जूतों की तरह हो गए।  उनकी एक और खास बात थी कि लसेस खोले बगैर भी पहना और उतारा जा सकता था।  

    तमाम बार उनके लिए अलग अलग तारीफ सुनी थी। एक शिमला की रेस थी , किसी ने कहा ये कहाँ से लिए , इम्पोर्टेड है क्या ? बड़े अच्छे लग रहे हैं.... धीरे धीरे वो मुझे काफी प्रिय हो गए। इसलिए जब वृन्दावन गया  तो कोई रेस न थी , बस वो कम्फ़र्टेबल थे इसलिए साथ थे। 

    जैसा मैंने शुरू में लिखा , जबतक  चीजे हमारे साथ होती है , उनकी हमें कदर न होती है। उनके खोने के बाद  वो बड़ा याद आये। विशेषकर जब उन्हें स्टोर में पता किया  तो पता चला अब वो नही आ रहे। एक दो बार संयोग बना। एक सज्जन मुझसे मिलने ऑफिस  आते थे। तमाम बार बोलते थे कि सर कोई हेल्प चाहिए तो बताइये , मेरा अमुक काम है , अमुक शहर में होटल है आदि आदि।  मै बाहर आता जाता रहता हूँ आदि।  एक पल को मन में ख्याल आया बोलूं मेरे लिए बाहर से होका के जूते ला सकते हो क्या ? पर ख्याल मन में रह गया कि कौन अहसान ले और फिटिंग का इशू अलग। 

    यूँ तो कुछ और जूते कलेक्शन में जुड़ गए है, पिछले दो सालों में लगभग 2500 km के आस पास रनिंग हो गयी , तमाम शूज फटने को आये। उन सबके बीच मुझे होका का नीला वाला शूज बहुत याद आता है। जैसे कि कोई मोहब्बत की दास्ताँ जो ठीक से शुरू भी हुयी , उसका अंत आ गया।   पिछले दिनों , यमुना एक्सप्रेस से आना जाना हुआ और टोल के पास प्रेममंदिर के होर्डिंग को देख , होका की बड़ी याद आयी।  

( प्रसंगवश , इन दिनों फिल नाईट ( funder नाइके ) की बुक शू डॉग पढ़ी जा रही है ).

- आशीष कुमार , उन्नाव।  

15 जून, 2026 . 




 

Featured Post

SUCCESS TIPS BY NISHANT JAIN IAS 2015 ( RANK 13 )

मुझे किसी भी  सफल व्यक्ति की सबसे महतवपूर्ण बात उसके STRUGGLE  में दिखती है . इस साल के हिंदी माध्यम के टॉपर निशांत जैन की कहानी बहुत प्रेर...