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गुरुवार, 18 जून 2026

Money Plant

 

मनीप्लान्ट 


    मेरी  याद में मनीप्लान्ट का जो पौधा याद आता है , वो पौधा मेरे गांव वाले  घर के आँगन का था। आँगन से एक अंदर से नाली जाती थी। उसी के पास , एक टूटी बाल्टी में मिट्टी भर का लगा दिया गया। वो मनीप्लान्ट कहां से आया था , इतना याद नहीं। यह जरूर है , उन्हीं दिनों इससे जुड़े मिथक सुने। जैसे कि मनीप्लान्ट को हमेशा चुरा के लाना चाहिए , इसको लगाने से घर में पैसा आता है। 

    वैसे तो किसान परिवार में , किस्मत से ज्यादा मेहनत पर जोर दिया जाता है। यह मेरी खुद की धारणा है जो समय के साथ आयी है। जैसे हमारा परिवार , उतना धार्मिक नहीं रहा कभी , घर में मंदिर रहा पर रोज उसमें दिया जले , पूजा पाठ हो , ऐसा न होता था। आज सोचता हूँ कि शायद नियमित पूजा पाठ न करने की वजह , समय का आभाव रहा हो।  

    तो वो मनीप्लान्ट शुरू में काफी छोटा था , उसको लेकर मुझे काफी उम्मीदें थी। ऐसा लगता था कि जैसे जैसे यह बड़ा होगा , घर में चीजें ठीक होंगी। वो पेड़ सालों-साल घर में रहा , हमेशा हरा भरा और खूब फैलाव लिए हुए। बाल्टी से निकलकर छज्जे तक फ़ैल गया , दोनों तरफ  दीवालों में डोरियों से वो फैलता ही गया। मनीप्लान्ट का वो पेड़ , सबके लिए पेड़ था , मेरे लिए उम्मीद की किरण। मेरे मन में हमेशा रहा कि मनीप्लान्ट के पेड़ से किस्मत जुडी है। यह मेरे बचपन की बात है , बालमन के कोमल सपने।  

    इसके बाद , एक दूसरा मनीप्लान्ट  पेड़ घर के बाहर लगाया गया। यह काफी बाद की बात है , इसका भी हवाला नहीं है कि आया कहाँ से। यह मनीप्लान्ट की दूसरी किस्म थी। यह बेहद बड़े पत्तो वाला मनीप्लान्ट था। यह पेड़ बड़ा मिलनसार किस्म का था , अपने आस पास के पेड़ों से लिपट गया और उनके साथ साथ बड़ा हुआ। यह पेड़ बगैर किसी देख रेख के ही प्रगति करता गया। इसके पत्ते बहुत ज्यादा बड़े और गहरे हरे रंग के थे। अब तक मैं पढ़ाई लिखाई चप्पल घिसाई के दौर से गुजरता हुआ तमाम संघर्ष , असफलताओं की पीड़ा भुगतने के बाद सफलता का स्वाद चख  चुका था। 

    तमाम सालों से बाहर हूँ पर साल में कई बार घर जाना होता रहा। आँगन का मनी प्लांट न रहा वजह आँगन ही न रहा , उसकी जगह नया निर्माण हो गया पर घर के बाहर वाला मनीप्लांट बढ़ता रहा , वो इतना प्रबल और विशाल था कि उसको बीच बीच में काटना पड़ता। यूँ तो मनीप्लान्ट का पेड़ नाजुक होता है पर मेरे घर के बाहर वाला पेड़ को काटने के लिए कुल्हाड़ी का उपयोग करना पड़ता। 

    मेरी नौकरी बदलती रही , शहर बदलते रहे। अहमदाबाद में रहने के दौरान मुझे याद है न कि मेरे वहां वाले  घर में यह रहा या नहीं। दिल्ली में यह शुरू से जीवन का अभिन्न अंग रहा। यही पर पहली बार मेरे बेहद खुबसूरत मनीप्लाँट देखे। गमले में बीच में नेट के सहारे , करीने से तराशे , सवारे हुए मनीप्लान्ट। तमाम बार अलग अलग जगह से खरीद कर लाये गए , जो कुछ महीने तो खूब अच्छे चलते पर धीरे धीरे वो खत्म हो जाते।  

    इस दौरान मैंने देखा कि इनको मिटटी की जरूरत नहीं , यह किसी भी बोतल में पानी भर कर रखे जा सकते है। उसके बाद से ये मेरे ऑफिस की टेबल का जरुरी हिस्सा बन गया। किसी भी ऑफिस में रहा तो मेरे टेबल पर पहले दिन से ही मनीप्लान्ट का पौधा रहा। कोविड के दिनों में , अपनी टेबल के सामने ४ गमले मनीप्लान्ट के रखा दिया , इससे सोशल डिस्टन्सिंग हुयी।  तमाम बार लोग इसे देखते और हैरान होते।  गमलों से एक तरह का बैरियर बना था। हलांकि उन दिनों फ्रंट पर रह कर काम किया करते थे , सरकारी अफसरों विशेषकर प्रशासन में खुद के बजाय जनता के हित सबसे ऊपर थे। इसलिए यह गमले वाली डिस्टन्सिंग बस अपने मन के लिए थी। मैं उनमें फोकस करके विचारों में डूब सकता था। अपने ऑफिस, वर्तमान से परे जाकर सोच सकता था। पेड़ , प्रकृति में तनाव से मुक्ति की विशेष शक्ति होती है।  

    लिखने पढ़ने वाले लोगों या कहे रचनात्मक लोगों का कॉफ़ी हाउस से विशेष जुड़ाव होता है। कनॉट पैलेस पर तमाम कॉफ़ीहाउस थे। मै पहली बार जहाँ गया वो वही था जिसे मैंने सुना था। आपको शायद न पता हो यह प्राचीन  हुनमान मंदिर के पास की बिल्डिंग के ऊपरी माले पर है , बहुत पुराना। मैंने सुना है , पुराने दिनों में तमाम लेखक , कलाकार यहां आ चुके है। बहुत ही साधारण सी सजावट , बहुत सामान्य से पैसे में कॉफ़ी और उसके साथ तमाम स्नैक्स मिल जाते है।  

    कभी अगर अपने मिजाज के लोग मिले और अंतरंगता अगर इस हद तक हुयी कि मिलते है तो मेरी पहली कोशिस वही रहती है , इंडियन कॉफ़ी हाउस , कनाट पैलेस ऊपरी मजिल वाला। कितनी मुलाकातें , कितनी ही यादे। तमाम बीतती शामों में , कॉफ़ी के बाद बगल की खुली छत पर चहलकदमी , चलते चलते तमाम विचार , तमाम कहानियाँ। ऐसी ही एक शाम कॉफी के बाद , मैंने उससे जिसे मनी प्लांट वाली कहानी सुनाई थी और अपने जीवन की तमाम उपलब्धियों का इसे क्रेडिट दिया था।  उसको भी इस पर यकीन सा हो गया था , मैंने उसे प्रेरणा थी कि यही कॉफ़ी हाउस से मनी प्लांट चुरा लो , बस एक छोटी सी डाल।  उसे यकीन न था कि पर मैंने कहा कि यह चल जायेगा। बाद के तमाम महीनों में उसके रूम में एक बोतल के पानी में वो मनीप्लांट चलता रहा। वैसे आज देखूँ तो उसके जीवन में भी चीजे ठीक हो गयी है क्या इसको क्रेडिट उसी मनीप्लांट को दिया जाय ? 

    खैर मेरे पास मनीप्लान्ट की कहानियाँ उतनी लम्बी और बड़ी है , जितना मेरे गांव वाले घर के बाहर वाले पेड़ की विशालता और फैलाव। उनपर फिर कभी।  क्या आपने  इंडियन कॉफ़ी हाउस , कनॉट पैलेस की कॉफ़ी पी है ?

- आशीष कुमार , उन्नाव।  

१८ जून २०२६।  













  

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