कविता : -हरे पत्थर वाली अँगूठी
उसके संघर्ष के
दिनों में
किसी ने दी थी
एक चांदी
की अँगूठी
जिसमें जड़ा था
हरा पत्थर,
पत्थर सौभाग्य का
व अंगूठी उनके
मूक प्रेम का प्रतीक
थी, जिसे उसने
पहना बड़े चाव से
कुछ दिनों या
फिर कुछ
महीनों तक
फिर उसने
अंगूठी को सम्भालकर
रख दिया,
उस डिब्बे में
जहाँ वो रखता था
अपनी सबसे कीमती चीजें
जीवन अपनी
गति से चला
वो उससे तेज चला
इस कदर की तेजी
कि सब पीछे छोड़ते हुए
उसे पहुँचना था आसमान
हरे पत्थर वाली अंगूठी
जोकि मौन प्रेम व
सौभाग्य की प्रतीक थी
उसे खूब फली,
उसे दी नित नई
उचाईयां।
आसमान की ऊचाइयों
से उसे एक दिन
जब उसे अपना
संघर्ष भरा अतीत
याद आया तो
उसने पाया कि
इस सुहाने सफर
में वो अँगूठी
जाने कब कहाँ
खो गयी,
ठीक उनके मूक
प्रेम की तरह ।
©आशीष कुमार, उन्नाव।
19 मई 2021।