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मंगलवार, 11 अगस्त 2026

हरे पत्थर वाली अँगूठी

कविता : -हरे पत्थर वाली अँगूठी 

    उसके संघर्ष के 
दिनों में
किसी ने दी थी 
 एक चांदी 
की अँगूठी 
जिसमें जड़ा था
हरा पत्थर,

पत्थर सौभाग्य का
व अंगूठी उनके
मूक प्रेम का प्रतीक
थी, जिसे उसने
पहना बड़े चाव से
कुछ दिनों या 
फिर कुछ
महीनों तक

फिर उसने 
अंगूठी को सम्भालकर
रख दिया,
उस डिब्बे में
जहाँ वो रखता था
अपनी सबसे कीमती चीजें

जीवन अपनी
गति से चला
वो उससे तेज चला
इस कदर की तेजी
कि सब पीछे छोड़ते हुए
उसे पहुँचना था आसमान

हरे पत्थर  वाली अंगूठी 
जोकि मौन प्रेम व
सौभाग्य की प्रतीक थी
उसे खूब फली,
उसे दी नित नई
उचाईयां।

आसमान की ऊचाइयों
से उसे एक दिन
जब उसे अपना
संघर्ष भरा अतीत
याद आया तो
उसने पाया कि


इस सुहाने सफर
में वो अँगूठी
जाने कब कहाँ
खो गयी,
ठीक उनके मूक
प्रेम की तरह ।

©आशीष कुमार, उन्नाव।
19 मई 2021।

रेशमी बाल

कविता : रेशमी बाल

प्रिय तुम्हारे चमकते 
रेशम जैसे बाल,
छितरे रहते ज्यों
आकाश में
घने काले बादल ।

बड़ा सुखद लगता है
उनमें अगुलियां फेरना,
लेना उनकी खुसबू
खूब गहरे, भीतर तक।

प्रिय जब जब तुम
मेरे करीब होती हो,
अक्सर उलझ जाते हैं
मेरे हाथ, अगुलियां।

प्रिय जब तुम विदा लेती हो
छूट जाते है अक्सर
कुछ एक बाल, मेरे साथ
जो हर वक़्त याद दिलाते हैं
कि तुम मेरे साथ हमेशा हो
अटूट, अभिन्न, अविभाज्य।

14 जनवरी, 2020
©आशीष कुमार, उन्नाव।




गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

love

लघुकविता :- कल्पना 


' तुमसे मिलने की मधुर कल्पना, 

हर वक़्त , तुम्हारे ही ख्याल,

कजरारे नयन , रेशमी बाल ,

नरम अधर पर मधुर मुस्कान .




©आशीष कुमार, उन्नाव 

16 जुलाई, 2026 .


 

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