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रविवार, 24 नवंबर 2019

Story : Court wala aadmi

संस्मरण : " कोर्ट वाला आदमी " 

आशीष कुमार 

जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि  इस साल के पहले दिन यानि 1 जनवरी को मैं अहमदाबाद से दिल्ली के लिए आ गया। दिल्ली को लेकर तमाम आशंकाये थी। पहले दिन ही कोर्स डायरेक्टर ने हिदायत भी दे दी कि शाम को या देर रात में जरा सभल कर निकलना। सतर्क रहना , जरा सा अलग मिजाज का शहर है।  

अब यह ठीक ये याद नहीं दिन कौन सा था पर इतना निश्चित है कि अभी हफ्ता भी न बीता होगा  और  यह घटना घटित हो गयी। अकादमी के पीछे , हेडगवार हॉस्पिटल वाली गली में एक सरदार जी ठेला मैंने दूर से देखा था। एक शाम अपने रूम पार्टनर (प्रतीक बायल , आईएएस19  कर्नाटक कैडर) के साथ उधर से गुजरा। मुझे अलग 2 स्ट्रीट फ़ूड का स्वाद चखना बहुत पसंद है। 

सरदार जी के पास ठेले पर पहुँच कर देखा तो पता चला कि वो कोयले पर चीजे रोस्ट करके बेचते है। अपने भी देखा होगा , पनीर , कबाब , चिकेन आदि सींक में टगे हुए रंग - बिरंगे। मैं बड़ी तल्लीनता से सरदार जी को देख रहा था। वो एक हाथ से पंखा करते ताकि आंच बनी रहे, रोस्ट वाली चीजों पर अमूल का बटर भी ब्रश से लगाते जा रहे थे , साथ ही तैयार चीजों को कटोरे में डालकर अमूल क्रीम , मसाला आदि डाल कर सर्व भी करते जा रहे थे। हम दोनों उनके पीछे खड़े थे। सामने भी कई लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। 

तभी सामने से एक आदमी ने पूछा - " भाई आपके कोई बड़े भाई है क्या " 
मैंने कहा "नहीं तो।"
उसने कहा कि आप जैसे ही एक लोग अमुक ऑफिस में काम करते हैं इसलिए पूछा। मैंने मुस्कुरा कर कुछ न बोला। उन दिनों मेरा अलग लुक था ( खूब भरा चेहरा , बड़ी मुछे ) पता नहीं क्यों लोग अक्सर भरम में पड़ रहे थे। पिछले दिनों बैंक में गार्ड ने बड़ी गर्मजोशी से सलूट ठोका , बाद में पता चला कि वो मुझे किसी बड़ी ब्राँच का मैनेजर समझ बैठा था। 

खैर सामने वाला जब तक कुछ बोले , प्रतीक ने बोला " ये sdm साहब है " . मैंने प्रतीक की ओर देखते हुए बस अरे बोल पाया। मेरा भावार्थ यह था कि इससे क्या बोलना ये क्या समझेगा। तबतक उसने भी बड़े जोश में बोला। मै भी यही कोर्ट ( हम करकरडूमा कोर्ट के पीछे तरह खड़े थे ) में काम करता हूँ। मैं सरदार जी के कार्य में तल्लीन था। तभी एक आदमी ने पैसे को लेकर बहस शुरू कर दी। उसने कहा कि वो पहले ही दे चूका है। वो नशे में था। सरदार जी पूछ रहे कि क्या paytm किया था क्या ? सरदार जी बोलने लगे कि तमाम बार ऐसा हुआ लोगों ने खाया पिया और पैसे दिए बगैर निकल लिए। 

इस बीच दूसरी घटना घटी। इस नशे वाले व्यक्ति ने , उस कोर्ट वाले के पास जाकर चेहरे को घूरने लगा। कोर्ट वाले ने पूछा " मुझे जानते हो क्या " वो नशे वाला आदमी बोला " नहीं " तो कोर्ट वाले ने हम लोगों की तरह देखते हुए उससे  बोला " भाई साहब , इस तरह से नहीं देखा जाता है। " इसके बाद की 1 मिनट की बहस मैं सुन न पाया। इधर ठेले के सामने एक दूसरा आदमी  दूसरा ज्ञान दे था कि "शराबी आदमी के झगड़े में कभी नहीं पड़ना चाहिए , एक बार मेरे घर के सामने दो शराबी झगड़ रहे थे मैं बचाने गया तो दोनों मिलकर मुझे मारने लगे। "

तबतक इधर का माहौल काफी गर्म हो चूका था। कोर्ट वाले आदमी ने उस शराबी से बोला " तू बस चला जा , मै इधर ही कोर्ट में काम करता हूँ " शराबी ने लड़खड़ाते हुयी जुबान में बोला " मैं भी कोर्ट में काम करता हूँ " इसपर कोर्टवाले आदमी का मूड और खराब हो गया। उसे लगा कि उसको हल्के में लिया जा रहा है. वो और तेज में बोला " कहां के कोर्ट में " 
शराबी ने बोला " इधर के कोर्ट में " 
"इस कोर्ट में कहां पर" 
इसपर शराबी ने बोला " मेरे जीजा कोर्ट में काम करते है " अब कोर्टवाले आदमी का गुस्सा चरम पर चढ़ गया वो बोला " साला , झूठ बोल रहा है कभी बोलता है मैं काम करता हूँ , कभी बोलता है जीजा काम करता है। तू निकल ले यहाँ से नहीं तो पीट दूँगा। " इस शराबी ने कहा " तुम खुद झूठ बोल रहे हो कि कोर्ट में काम करते हो " इतना कहना था कि कोर्टवाले आदमी ने एक फोन मिलाया और बोला " यार , राहुल यहाँ कोर्ट के पीछे आना , पंगा हो गया है। " कोर्टवाले आदमी ने हम लोगों की तरफ देखते हुआ बोला उधर शराब पीने बैठा था , कुछ खाने को लेने आया था और ये साला अपने आप ही उलझ गया। 

थोड़ा सा शराबी के लुक का वर्णन कर दूँ। यह 30 - 35 वर्ष के नौजवान थे। पीठ पर काला बैग लाद रखा था। स्प्लेंडर बाइक से थे। ऐसा लग रहा था कि 10 - 15 हजार वाली  प्राइवेट जॉब जैसे सेल्समेन , मेकेनिक करते होंगे। रंग बड़ा साफ , अच्छा चेहरा पर भरपूर नशे में। क्या पता आज ऑफिस में बॉस से डांट लगी हो उसके चलते ही नशा किया हो।  

इतने में राहुल आ गए और आते ही मामला समझे बगैर दो जोरदार थप्पड़ नशे वाले नौजवान को दे दिया। हालांकि अब कोर्टवाले आदमी ने राहुल को समझाने लगा कि मारो मत। लोग भी  अब  समझाने को दौड़े "अरे जाने दो भाई।"
" छोड़ दो उसे " 
समझ न आये कि अब भी वो अपनी बाइक पर बैठा था पर जाने की नहीं सोच रहा था। लोगो ने गौर किया कि राहुल ने उसके बाइक की चाभी निकाल रखी थी वो जाये तो भला कैसे। खैर कुछ और मारने के बाद उसे जाने दिया। 

मुझे न जाने क्यू उस शराबी से बड़ी सहानुभूति हुयी। मैंने साथी से कहा - " यार अच्छा नहीं लग रहा, बेवजह ही उसकी पिटाई हो गयी। " साथी ने कहा - "बुलाने को तो पुलिस बुला ली जाती पर सरदार जी का ठेला अवैध रूप में चल रहा हैं, वो भी नाहक परेशान होते। हो सकता उनका ठेला ही जब्त हो जाता। " मैंने इस पहलू पर गौर ही न किया था। 

पुरे प्रकरण में मुझे न जाने क्यू यह लगता रहा कि वो कोर्ट वाले आदमी ने सिर्फ दिखाने के लिए ही उस शराबी को पीटा था और क्या पता वो उसे sdm वाली बात से ज्यादा जोश आ गया हो। वो कोर्ट वाली बात बार बार बोल कर क्या साबित करना चाहता था। क्या यह कि कोर्ट में काम करते है तो उनके के लिए कोई कानून नहीं है। इतना जरूर है वो ड्राइवर , जज का चपरासी या माली वाले स्टाफ से ज्यादा कुछ नहीं लग रहा था पर उसका कृत्य ------! 

खैर दिल्ली के मिजाज की कुछ हदतक झलक मिल गयी थी। इधर साथी लोगो ने जब यह कहानी सुनी तो उन्होंने एक टैग लाइन बना ली। जब भी कोई दोहरी चीजे बोलता, कुछ भी दो विकल्प दे देता तो कहा जाने लगा -
" कभी बोलता है मै कोर्ट में काम करता हूँ , कभी कहता है जीजा करते है --- मारो साले को " . 


रविवार , नवंबर 24 , 2019 
 ©आशीष कुमार , उन्नाव उत्तर प्रदेश। 

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