लघुकथा :- काजल
आशीष कुमार
जीवन में काफी ज्ञानी लोग मिले है , जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा। इस बात का जरा भी घमंड न है। आज जिस मुकाम पर पहुँचा हूँ , उनमें ऐसे लोगो का बड़ा योगदान है। आज ऐसी ही एक कहानी याद आ गयी।
वो काफी होशियार थी , हर काम में तेज। पढ़ने में भी बहुत अच्छी थी। जब स्कूल में पुरुस्कार वितरण होता तो , लगभग सारे उसी को मिलते।
उसका एक छोटा भाई था। एक शाम की बात है , उसकी माँ ने आवाज दी , शाम हो गयी है। भाई को काजल लगा दो। उन दिनों रात में सोते वक़्त हर कोई काजल लगा के सोता था। अब जमाना कितना बदल गया। अब लोगों ने काजल लगाना ही बंद कर दिया। अब तो डॉक्टर भी मना करने लगे कि बच्चों की आँखे खराब हो जाएँगी।
खैर , जैसा की मैंने बताया वो लड़की बड़ी तेज थी। उसे काजल की डिब्बी न मिली। वो परेशान न हुयी। उसे पता था कि काजल कैसे बनाया जाता है। उसकी बुध्दि ने उसे तुरंत प्रेरणा दी। सामने किरोसिन वाला दीपक जल रहा था। किसी खाली बोतल का ढक्क्न लिया। उसमें दीपक से उठते हुए धुएँ को इकट्ठा किया। कुछ ही देर में जरूरत भर का काजल इकट्ठा हो गया।उसने गरमागरम काजल , अपने प्रिय छोटे भाई की आंख में लगा दिया। काजल लगते ही भाई को रात में सूरज नजर आ गया। वो हिरन की तरह , पुरे घर में भागा। उसकी आँखों में जलन होने लगी। लड़की को उसकी इस बेवकूफी के लिए उसकी मां ने जमकर क्लास लगाई।
© आशीष कुमार, उन्नाव।
15 जुलाई , 2026 .