लघुकथा : अवैध ठेला
शाम 4 बजे से रात 9 तक तमाम ग्राहकों की हाय किचकिच के बाद जब उसने अपने बोरे के नीचे से रूपये निकाल कर गिने। यही वो पल होते है जब वो अपनी कमर सीधी करता है और लाभ की खुशी उसके चेहरे से झलकती है। आज 2000 की सब्जी , बड़े बाजार से लाया था और कम से कम 700 रूपये का लाभ होने की सोच रहा था। सरसरी तौर पर उसने नोटों को गिना केवल 1900 रूपये। उसने कुछ हैरान होते फिर गिना 1900 रूपये ही थे। सारी सब्जी बेचने के बाद भी बस 1900 रूपये। ऐसा कैसे ? उसे कुछ याद आया 7 बजे दो सिपाही आये थे 100 रूपये की सब्जी ले गए थे। उनसे पैसे लेने का कोई तुक नहीं। एक बार उसने माँगने की कोशिश की थी तब सिपाही ने बताया कि उनकी पगार बड़ी ही कम है अब जब पगार कम है तो भला उनसे कैसे रूपये मांगे ।
अगले घंटे नगरपालिका से कोई आकर धमका रहा था कि अवैध जगह पर ठेला क्यों लगा रखा है , देखते नहीं इससे कितनी तकलीफ होती है। 500 रूपये लेकर नगरपालिका को उसके ठेले से कोई शिकायत नहीं थी। रात 10 बजे घर पहुंचा तो उसके मन में भूख न थी। भूखे पेट वो सोच रहा था कि यह धंधा अब उसके बस का नहीं है।
© आशीष कुमार , उन्नाव।
20 JULY, 2026.