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रविवार, 12 जुलाई 2026

दुविधा

 

लघुकथा :-  दुविधा 

आशीष कुमार

    मेरे सामने पेपर है और मै दुविधा में हूँ। 

    मेरे सामने अतीत है जो बड़ी तेजी से गुजर रहा है।  मेरी परवरिश ऐसी की गयी कि घर से स्कूल और स्कूल से घर। जल्द ही मेरी सरकारी जॉब लग गयी। मेरे जीवन से जुड़े सारे फैसले मैंने पिता जी पर ही छोड़ रखा था। इसलिए शादी के लिए भी जहाँ से रिश्ता आया , वहीं हाँ भी कर दी। 

    शुरू में सब ठीक था , इनकी नौकरी निजी क्षेत्र में थी , अच्छा कमाते थे। नेचर और लुक दोनों अच्छा था। मुझे जीवन में हर चीज अच्छी लगती थी। शादी के कुछ टाइम बाद , बच्चा भी हो गया। मेरी अध्यापक की नौकरी थी। मैं खुद में हर चीज के लिए सक्षम थी। 

मुझे बचपन से आत्मनिर्भर बनाया गया था। मुझे खुद पर बहुत आत्मविश्वास था। मुझे न पता था ,यही आत्मविश्वास मेरे लिए , सबसे बड़ी मुसीबत बन जायेगा। 

हमारी शादी के 7 साल होने को आये. बच्चा बड़ा हो रहा था , इसके साथ साथ इनके पिता की मानसिकता छोटी होती जा रही थी। शादी के समय मेरी जॉब से , इनको बड़ा गर्व हुआ था और अब धीरे धीरे मेरी जॉब , इनको दिक्क्त दे रही थी। 

शुरू में कोई विशेष बात न थी, छोटी मोटी बहस होती थी। पर धीरे धीरे चीजे खराब होने लगी।  कुछ उनका अहं भाव , कुछ नौकरी में इशू , एक मित्र द्वारा साझा व्यापार में धोखा के चलते शराब का सेवन करने लगे। बात यही न रुकी, बहस के साथ साथ अब उनका हाथ भी मुझ पर उठने लगा। 

यह बात किसी से मैं बता न सकती थी। पिता जी से भी कुछ हद की बात साझा की और बताया कि चीजे अब बर्दाश्त से बाहर हो रही है। उनका मानना था कि चीजें धीरे धीरे ठीक हो जाएगी। उनको समझना चाहिए था कि अगर ऐसा होता तो मैं उन तक बात लाती ही न। 

इस बार स्कूल की छुट्टी होते ही अपने पापा घर आ गयी। भले वो , मुझसे दूर थे पर उनके साथ की बहस , बदतमीजी मेरे जेहन से जा न रही थी। एक रोज बगैर किसी से बताये , कोर्ट चली गयी। 

वकील ने पहले समझाने की कोशिस की पर मेरी परेशानी शायद उसे भी समझ आ गयी। मैंने उससे पेपर तैयार करने को बोल दिया। छुट्टी खत्म होने को थी और पेपर भी रेडी हो गए थे।  

पिछले कई महीने रोते हुए ही गुजरे थे , मैंने कितने मौके दिए , बार बार माफ़ किया पर शराबी इंसान की बात का क्या भरोसा। अब जब पेपर रेडी होकर सामने है और मुझे बस हस्ताक्षर करने है , मैं बड़ी दुविधा में हूँ। 

दुविधा , यह कि यह सब मैं अपने बेटे के अच्छे भविष्य के लिए सोच कर रही हूँ पर कहीं वो बड़ा होकर मुझे ही गलत न समझे। दुनिया क्या कहेगी , समाज क्या सोचेगा। बेटा , बगैर पिता के कमजोर न महसूस करे , उसके विकास में किसी तरह की चुनौती तो न आएगी। फिर ये भी लगता है , उनकी गलत आदतें , मेरी साथ बत्तमीजी को भी देखकर भी उसका बचपन सामान्य न रहेगा।  

पीछे मैंने किसी के कहने पर " आपका बंटी " ( मन्नू भंडारी ) भी पढ़ी थी। उसको पढ़कर और भी तमाम प्रश्न उठ खड़े हुए। मेरी दुविधा की वजह शायद मेरी सहज कोमलता है पर अब मै और किसी और के बनाये नियम , उसूलों को न मानूंगी। जो विद्रोह मुझे काफी समय पहले कर देना चाहिए था , अब उसमे देरी करना उचित न होगा।  

मैंने एक बार फिर से उन पेपर्स को पढ़ा और उन पर अपने हस्ताक्षर कर दिए।  


©  आशीष कुमार , उन्नाव।  

12 जुलाई , 2026  





  







मंगलवार, 7 जुलाई 2026

Marks

 

लघुकथा :- निशान 

- आशीष कुमार 

    वो किसी काम से अपने घर आयी थी। वापसी में वो पति के साथ जाना चाहती थी। उसका पति शहर से काम के बाद लौट रहा था। वैसे वो जब अपने घर आयी तो अपने प्रेमी से भी मिली थी , जिसे वो शादी के पहले से जानती थी। उसका प्रेम बहुत गहरा था , जो शादी के बाद भी न टूटा। चीजें साथ-साथ चल रही थी। वो दोहरी भूमिका निभा रही थी।  

    पति ने पहले टालमटोल किया, पर बाद में राजी हो गया। दोनों साथ-साथ घर गए।  उसकी नजरों में , पति बहुत सीधा था पर उसकी बातों में तमाम रहस्य छुपे थे। वो अपने पति पर शक करती थी, पर मजे-मजे में। पर उस दिन , शाम को जब पति के पीठ पर निशान देखे तो वो हैरान थी , एक पल को वो समझ न पायी कि पीठ पर इतने गहरे और लाल निशान कैसे बन गए ? जब उसने अपने पति को टोका तो वो टाल गया। 



    वो मासूम थी , उसे संदेह था पर पक्का यकीन न था। उसने तमाम जतन किए, पर उसको कोई पक्का न हो पाया कि निशान कैसे थे। पति ने कहा , मुझे न पता क्या है , बाद में बोला कि मेरे ही हाथ  लग गए होंगे। उसे फिर भी यकीन न हुआ. उसने  पति से उसके हाथो से पीठ पर निशान बनवा के देखे , खुद से करके देखा और अंत में पाया कि पति ही सही बोल रहा है , निशान खुद के हाथ से  बन गए होंगे। 

    उसका मन शांत होकर भी शांत न था। उसको अपने प्रेमी से सारी बातें करनी होती थी। उसने " निशान " के बारे में भी अपने प्रेमी से पूछा - 

" ये पक्का प्रेम के निशान है , उसका जरूर कोई लफड़ा चल रहा है " प्रेमी ने मुस्कुराते हुए जबाब दिया। 

" तुम इतना यकीन के साथ कैसे कह सकते हो ?" वो जरा चिंता के स्वर में बोली। उसका दिल , अपने देवता जैसे पति पर संदेह न करना चाह रहा था। उसने निशान की फोटो व्हाट्सऐप पर भेजी। 

" अरे ये पक्का वही है , मैं जानता हूँ। मैं तो ये भी जानता हूँ लड़की पक्का दुबली पतली होगी , जिसके नाख़ून बड़े होंगे " प्रेमी ने ऐसे बताया जैसे कि उसका खुद का कोई  पूर्व अनुभव हो। 

(Inspired by " Harlan Coben " , as I recently saw many series based on his books. Mystery lovers can search on Netflix by " Harlan Coben Collection " ) 

© आशीष कुमार , उन्नाव 

7 जुलाई , 2026 

रविवार, 28 जून 2026

Fate


लघुकथा :- किस्मत  

- आशीष कुमार 

    वो अलग थी , सबसे अलग।  उस रास्ते से उनका कई बार गुजरना हुआ। दोनों बातें करते हुए गुजरते थे। लड़की बातों के साथ साथ तमाम चीजे सोचा करती थी। बस्ती पुरानी थी पर अब वहां विकास पहुंच रहा था। वो रास्ता काफी उबड़ खाबड़ था , उसमे तमाम गड्ढे भी हो गए थे। 

    उन्हें साथ हुए काफी वक़्त हो गया था , एक रोज उधर से जब जाना हुआ तो देखा वो रास्ता काफी अच्छी नई सड़क में बदल गया। बीच में पौधे , रोड में पेंट से मार्किग , किनारे हाइलाइटर , गहरा चमकता तारकोल , बेहतरीन तकनीक से बनी , समतल सपाट खूबसूरत रोड। 

" शायद एक दिन मेरी भी किस्मत ऐसे ही बदल जाये " उसने एकाएक कहा। 

" कैसे ? " लड़के ने चौंककर पूछा।  

" इस रोड की तरह " उसने जबाब दिया। 

 © आशीष कुमार , उन्नाव।  

28.06.2026 

रविवार, 21 जून 2026

Dream

लघुकथा -  ख्वाब 

आशीष कुमार


" मैंने  हमेशा से एक ख़वाब देखा है  कि मुझे किसी से बहुत गहरा प्रेम हो , इतना कि मैं उसके बगैर जी न सकूँ ? " उसने  खनकती आवाज में कहा। 

" तो फिर क्या तुम्हें हुआ , मिला कोई ऐसा जिसके बगैर जिंदगी जीना मुश्किल लगे " विभव ने सब जानते हुए भी पायल के मुँह से सुनना चाहा। 

" अब तुम ये पूछ रहे हो , जान बूझ के अनजान बन रहे हो " पायल मुस्कुरा उठी। काफी दिनों के बाद , दोनों साथ बैठे थे। 

" पर मेरा पूरा ख़्वाब जानना चाहोगे "

" हाँ क्यों नहीं " 

" मैंने हमेशा से यही सोचा है कि मुझे सच्चा प्रेम हो फिर वो मेरा दिल तोड़ दे , बगैर कुछ जबाब दिए अचानक से गायब हो जाये। ऐसे जाये कि फिर वो कभी न मिले। दूसरे शब्दों में कहूँ तो मैं बेइंतिहा पीड़ा झेलना चाहती हूँ "

" ये क्या बात हुयी ? ऐसा सोचने की कोई खास वजह ?" विभव ने हैरानी से पूछा " 

" हाँ , मेरे ऐसे ख़्वाब की वजह है। मैंने कहीं पढ़ा था कि जिंदगी में सफल होने के लिए दिल टूटना जरूरी है , मैं बस सफल होना चाहती हूँ , बगैर दिल टूटे मैं कुछ न कर सकती हैं। " पायल ने अपनी बात पूरा करते ही उठकर चली  गयी। 

© आशीष कुमार , उन्नाव 

21 जून 2025

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