गुरुवार, 16 जुलाई 2026

Bin fere ki mohabt



कविता :- बिन फेरे की मोहब्बत 

-आशीष कुमार 



इस कदर वो मोहब्बत करने लगी थी वो
बिन फेरे के ही व्रत रखने लगी थी वो,
दुनिया से सामने न सही, छुपाकर ही सही
मेहंदी में मेरा नाम, रचने लगी थी वो।



उसकी मोहब्बत की इंतिहा तो देखिए
पाने की जरा भी उम्मीद न थी फिर भी
टूटकर बेतहाशा चाहने लगी थी वो।।

© आशीष कुमार, उन्नाव।
20 जून, 2021.

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