गुरुवार, 30 जुलाई 2026

ओल की सब्जी

 संस्मरण :- ओल की सब्जी 

आशीष कुमार

    वैसे मेरे घर में इसे सूरन के नाम से जानते थे और कभी कभी त्यौहार में इसकी सूखी सब्जी बनती थी. इसे  पूरी के साथ खाया जाता था. मुझे कभी विशेष अच्छी न लगी। इसका एक नाम ओल भी होता है यह मुझे बहुत समय के बाद पता चला। 

लखनऊ के एक सरकारी हॉस्टल में , मेरे कुछ बढ़िया मित्र बने। शिवेंद्र , इंदरजीत राणा , अरविन्द , सूर्यप्रकाश से बढ़िया दोस्ती हुयी। सबसे अच्छी बात सारे ही, एक एक करके सरकारी नौकरी में सेलेक्ट हो गए।  वो इलहाबाद में रहा करते थे। उनके सम्पर्क में आने के बाद , इलहाबाद की दुनिया पता चली। वहाँ कभी रहा नहीं पर मुझे वो अच्छा लगने लगा। मै 4 .. 5 महीने में वहां किताबें लेने के बहाने और कुछ एग्जाम के चलते वहां आना जाना शुरू किया। 

यह 20 साल पुरानी बात होगी। एक मित्र से बातचीत हुयी और शाम को उनके पास पहुँचा। एक अच्छे मित्र की तरह वो बाहर गली में लेने आये। इलहाबाद की तमाम यादों में , यह विशेष याद आता है कि सभी को मित्र की आवभगत करने पर बड़ा जोर रहता था। ये मित्र गोरखपुर के थे। शिवेंद्र भाई  आज भी सम्पर्क में है। कुछ संघर्ष के बाद सीपीओ एग्जाम से केंद्रीय बल में दरोगा हुए , फिर बाद में उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा हो गए।   

शाम को शिवेंद्र भाई ने पूछा कि क्या खाओगे मेरे जबाब था कुछ भी।  पहले पनीर की बात हुयी फिर वही बोले पनीर तो बड़ा कॉमन हो गया है। आज आपको ओल की सब्जी खिलाते है। मैं जीवन में पहली बार ओल का नाम सुन रहा था और जैसा कि मै खाने में बड़ा चूजी रहा  हूँ , अगर पसंद ना आये तो थाली में खाना छोड़ देने की बड़ी बुरी आदत थी। 

जब सब्जी के ठेले पर ओल लेने गए और वहाँ सुरन देखा तो मैं मुस्कुराया कि यह तो सुरन है। खैर , सब्जी आयी और बननी शुरू हुयी। मुझे पता था कि ये कैसी सब्जी बनेगी और इसको लेकर कोई खास उत्साह न था। मैं बगल के रूम में और साथी मित्रों से गप्पे लड़ाने में व्यस्त था। 

सब्जी जब बनकर तैयार हुयी तो क्या बेहतरीन खुसबू आ रही थी। सबसे हैरान तब हुआ , जब इसे मैंने रसेदार रूप में देखा। पनीर की तरह टुकड़े , फ्राई करके डाले गए थे। बाकि स्टूडेंट लाइफ मे लड़को से बेहतर ग्रेवी कौन ही बना सकता है। मिक्सी न थी पर ढेर सारा प्याज को कूकर में ही गलाकर , उसमें खड़े मसाले गिलास में कूट के डाले गए थे।  बहुत ही  बढ़िया खुसबूदार , गाढ़ी  ग्रेवी बनी थी। 

उस शाम मैंने एक नए स्वाद को जाना। वहां से लौटकर जब घर में माँ से इसे बनाने को बोला तो वो भी हैरान थी। मेरे घर में सालों से इसे सूखी सब्जी के रूप में बनाया जा रहा था , रसेदार रूप में पन्नीर की तरह से फ्राई करके, जब यह बना तो फिर सुखी सब्जी के रूप में हमेशा के लिए बनना बंद हो गया।  मैं ओल की रसेदार सब्जी से इतना प्रभावित हुआ कि आगे के सालों में इसका गुणगान , हर किसी करीबी से करता रहा। दर्जनों घरों में , इसको रसेदार रूप में बनवाने के पीछे मेरा हाथ रहा। दरअसल मेरे उन्नाव की तरफ इसे त्यौहार की सब्जी के रूप  में जाना जाता था।  आज भी पनीर की तुलना में यह मुझे ज्यादा पसंद है। अब तो  इसे व्यसायिक खेती करवाने का भी प्लान बना रहा हूँ।   

 © आशीष कुमार , उन्नाव 

31 जुलाई , 2026 .










      










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