सुबह का समय था , स्टाफ ने बोला सर कोई मिलना चाहता है। एयरफोर्स से कोई ऑफिसर हैं। मैंने कहा भेज दीजिए
श्रद्धा पी. राजू उस ऐतिहासिक महिला त्रि-सेवा समुद्री अभियान की उपनेता रही हैं, जिसमें भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना की महिला अधिकारियों ने त्रिवेणी नौका से विश्व की समुद्री परिक्रमा की। हजारों समुद्री मील की यात्रा, अनिश्चित मौसम, विकराल लहरें, सीमित साधन और अपने सामने फैला अनंत जल यह यात्रा केवल भौगोलिक दूरी तय करने का नाम नहीं थी। यह मनुष्य की सहनशक्ति, धैर्य और आत्मविश्वास की परीक्षा भी थी।
मैं उनसे समुद्र के बारे में पूछता गया और वे अपने अनुभव सुनाती गईं। कभी तेज हवाएँ, कभी ऊँची लहरें, कभी विश्राम का अभाव, कभी नौका में उत्पन्न तकनीकी कठिनाइयाँ। समुद्र में कोई ऐसी सुविधा नहीं कि आवश्यकता पड़ते ही किसी को बुला लिया जाए। वहाँ साथ चल रहे लोग ही एक-दूसरे का सहारा होते हैं। जो समस्या सामने है, उसका समाधान भी वहीं खोजना होता है।
उनकी बातें सुनते हुए मेरे मन में समुद्र की वह छवि बदल रही थी, जिसे हम प्रायः चित्रों में देखते हैं। दूर तक फैला नीला जल, स्वच्छ आकाश और क्षितिज पर डूबता सूर्य निस्संदेह सुंदर है; पर समुद्र का एक दूसरा रूप भी है कठोर, अनिश्चित और मनुष्य के अहंकार को बहुत शीघ्र छोटा कर देने वाला। शायद समुद्र यह सिखाता है कि प्रकृति से बड़ा कोई नहीं। और शायद वही समुद्र यह भी सिखाता है कि मनुष्य स्वयं को जितना कमजोर समझता है, वास्तव में वह उससे कहीं अधिक सक्षम है।
बातचीत स्वाभाविक रूप से शारीरिक क्षमता और सहनशक्ति की ओर भी गई। मैं काफी टाइम से फिटनेस के लिए कुछ न कुछ करता रहता हूँ , किसी उल्लेखनीय स्तर तो न कुछ किया पर अब जीवन शैली में फिजिकल एक्टिविटी के अटूट हिस्सा बना गया है। लंबी दूरी की दौड़ में मेरी अपनी रुचि होने के कारण यह विषय मुझे और भी प्रिय लगा। मैंने अनुभव किया है कि लंबी दौड़ केवल पैरों से नहीं दौड़ी जाती। एक निश्चित दूरी के बाद शरीर पीछे हटने लगता है और मन को आगे आकर नेतृत्व करना पड़ता है।
श्रद्धा जी से बातचीत के बाद अपनी रोजमर्रा की कठिनाइयाँ भी कुछ छोटी लगने लगीं। हम कभी नींद कम होने पर परेशान हो जाते हैं, कभी मौसम को दोष देते हैं, कभी थकान को और कभी परिस्थितियों को। पर महीनों तक खुले समुद्र में रहना शायद मनुष्य को यह सिखा देता है कि असुविधा और कठिनाई में बहुत अंतर होता है।
ऐसी यात्राएँ केवल शरीर को नहीं तपातीं, मन को भी नया आकार देती हैं। घर, परिवार, सामान्य भोजन, मीठा जल, शांत नींद जिन चीजों को हम सहज उपलब्ध मानते हैं, उनका महत्व शायद तब सबसे अधिक समझ में आता है जब वे सहज उपलब्ध न हों। इतनी बड़ी उपलब्धि के बाद भी श्रद्धा पी. राजू की सहजता और सरलता ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया। मुझे लगा कि वास्तविक उपलब्धियाँ मनुष्य को ऊँचा अवश्य उठाती हैं, किंतु यदि व्यक्तित्व सचमुच बड़ा हो तो उसके पैर जमीन पर ही रहते हैं।
मैंने कहा आप ने वास्कोडिगामा , कोलम्बस वाला काम कर दिखाया है। वो मुस्कुरायी। आज की यह भेंट मेरे लिए केवल एक अधिकारी से मुलाक़ात नहीं थी। यह साहस, अनुशासन, सहनशक्ति और नारी सामर्थ्य से एक छोटा-सा साक्षात्कार था। चलते वक़्त मैंने उन्हें कुछ सलाह दी जैसे कि अपनी इस यात्रा को शब्दबध्द करिये , किसी पुस्तक के रूप में इस साहसिक यात्रा को पढ़ना , तमाम लोगो को लिए प्रेरणा बनेगा। दूसरा किसी पॉडकॉस्ट में भी इसे बतलाइये।
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