प्रिय तुम्हारे चमकते
रेशम जैसे बाल,
छितरे रहते ज्यों
आकाश में
घने काले बादल ।
बड़ा सुखद लगता है
उनमें अगुलियां फेरना,
लेना उनकी खुसबू
खूब गहरे, भीतर तक।
प्रिय जब जब तुम
मेरे करीब होती हो,
अक्सर उलझ जाते हैं
मेरे हाथ, अगुलियां।
प्रिय जब तुम विदा लेती हो
छूट जाते है अक्सर
कुछ एक बाल, मेरे साथ
जो हर वक़्त याद दिलाते हैं
कि तुम मेरे साथ हमेशा हो
अटूट, अभिन्न, अविभाज्य।
14 जनवरी, 2020
©आशीष कुमार, उन्नाव।
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