शेयर मार्केट - एक कथा
- आशीष कुमार ,
पिछले दिनों की बात है , एक मित्र के साथ नगरपालिका मार्किट , कनाट पैलेस में कुछ खाने गए थे। एंट्री गेट पर गार्ड , भले मेरी तलाशी ले रहा था, पर उसकी नजर मोबाइल की स्क्रीन पर थी। शेयरमार्किट के चार्ट पर उसकी नजर थी। मैंने अपने साथी से कहा देखा, इसे। मेरे दिमाग में चलने लगा कि इसकी कितनी सैलरी होगी और इसका कितना बड़ा पोर्टफोलियो होगा।
दूसरा वाकया और भी बढ़िया है , जहाँ मैं बाल कटाने जाता हूँ , उसके मालिक/कारीगर की बात। वैसे तो वहाँ एक दर्जन कारीगर होंगे पर मेरे बाल वही काटता है। उसी दौरान शेयर मार्केट की बात होती है। मुझे उसकी बातें बड़ी हैरान करती है। पहला कि वो विदेशी बाजार ( अमेरिकी ) में इन्वेस्ट करता है , उसकी वजह डालर और रुपए के अंतर् को बताता है। वो टेस्ला की बात करेगा , एलन मस्क की बात करेगा।
ऐसी वैसी बातें भी नहीं , काफी गहन और शोधपरक। इतनी गहरी कि मुझे कुछ देर हाँ हूँ करने के बाद , उसकी बस बातें सुननी होती है। एक दिन कहने लगा , मस्क की कम्पनी एम्प्लोयी पर कैपिटल में सबसे अच्छी है , मै हैरान था कि ये बाल काटने वाला है या कोई नामी गिरामी इन्वेस्टर। फिर उसने tcs जैसी कंपनी से तुलना करके बताया कि ये एम्प्लॉय और ग्रॉस कैपिटल का रेश्यो क्या होता है। मस्क की वो ब्रेन वाली कम्पनी का भी काफी ज्ञान दिया। उसके बारे में पढ़ा जरूर है पर जिसका नाम मैं बार बार भूल जाता हूँ।
फिर एक दिन मैंने उसका पोर्टफोलियो देख लिया, 70 लाख की वैल्यू का पोर्टफोलियो। २०१४ से सीमित ही सही पर शेयर मार्किट में ध्यान देने लगे हैं पर इतनी बड़ी वैल्यू का पोर्टफोलियो , मैंने सामने से तो किसी का न देखा। इसके बावजूद वो मेरे बाल काटने में लगा था. उसका इंडियन शेयर मार्किट में इंट्रेस्ट जरा कम रहता है पर उसे इधर के तमाम नामी गिरामी शेयर के नाम , दाम सब मुँह जुबानी याद रहते है।
शेयर मार्किट में ने न जाने कितने लोगो को बनाया है और कितने ही इसमें बर्बाद हुए है। मेरी इसमें सीमित समझ के आधार पर यह कह सकते है कि इसमें अंत में वही लोग बचे रहे हैं जो ट्रेडिंग और ऑप्शन ट्रेडिंग से दूर रहते है। लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट को छोड़ दे तो शेयर मार्किट पूरी तरह से तुक्केबाजी है।
© आशीष कुमार , उन्नाव।
10 अगस्त , 2026

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