बुधवार, 26 अगस्त 2026

चंद्रकांता की कहानी

लघु लेख :- चंद्रकांता की कहानी 

- आशीष कुमार 

    जब मैं उन्नाव पढ़ने गया तो सबसे पहले  वहां के  राजकीय पुस्तकालय में सदस्यता ली।  2003 की बात होगी। वहाँ सबसे पहले जो पुस्तक माँगी वो देवकीनंदन खत्री जी रचित चंद्रकांता माँगा। इससे पहले मैंने मौरावां के पुस्तकालय में भी इसे खोजा था पर मिला न था। 

    उन्नाव के इस पुस्तकालय में सदस्य भी यह पूछकर बना था कि क्या चंद्रकांता उपन्यास  मिलेगा। जब पता चला कि यह यहां उपलब्ध है तो उसी दिन जो भी जो भी शर्ते व नियमावली थी , उसी दिन पूरी की और शाम को उसके दो भाग लेकर अपने कमरे आया। उन दोनों को पढ़कर अगले दिन जब मैं उन्हें वापस करने गया तो वहाँ काम करने वाली लड़कियाँ (इंटर्न ) हैरान थी। मैंने उन्हें और हैरान करते हुए अगले दो भाग लेकर चला आया। इस नावेल को खत्म करने के बाद , खत्री जी ऐसा जादू चला कि उनके लिखे दो नावेल चंद्रकांता की संतति और भूतनाथ जल्द ही  पढ़ डाले।  

चंद्रकांता का जादू टीवी से जुड़ा था , जब यह दूरदर्शन पर हर रविवार सुबह ९ बजे से १० बजे की बीच आया करता था। उन दिनों गांव में सबके घर टीवी न हुआ करती थी और बिजली की भी दिक्क्त  रहती  था। कुछ  एपिसोड देखे थे और कुछ एपिसोड छूट गए। ऐसे में उनकी याद बनी रही। सीरियल में एक से बढ़कर कलाकार थे। मुझे तेज सिंह का किरदार सबसे अच्छा लगता था , अब याद भी न  है कि वो वैसे था कौन। इरफ़ान खान को  फिल्मों में बाद में जाना , पहले पहल बद्रीनाथ के रूप में उन्हें देखा था। उस सीरियल में सबसे आकर्षक अय्यार थे , कोई किसी का भी रूप धर लेता था। 



    उन बचपन के दिनों में हम मित्र मण्डली की चर्चा का विषय यह हुआ करता था कि कौन सा अय्यार सबसे शक्तिशाली है , या टीम बनाई जाये तो कौन जीतेगा।

    वैसे मैने  जब खत्री जी का नावेल पढ़ा तो देखा यह तो सीरियल से काफी अलग है। बाद के सालों में कमलेश्वर जी साहित्य को पढ़ने के दौरान जाना की टीवी के लिए चंद्रकांता १९९४ में , कमलेश्वर जी ने लिखी थी जो कि मूल स्वरुप से काफी अलग है।

    आपको पता है , देवकीनंदन खत्री जी ने अपने नावेल से तिलस्म का ऐसा जादू बिखेरा था कि सिर्फ चंद्रकांता को पढ़ने के लिए कितने ही लोगों ने देवनागरी लिपि सीखी। सोचो , आज के ai के दौर में जब हर चीज , हर भाषा का अनुवाद सेकंड में उपलब्ध है , एक दौर ऐसा भी था जब लोगों पढ़ने में इतनी रूचि हुआ करती थी कि लोग उपन्यास पढ़ने के लिए लिपि व भाषा सीखने को तत्पर थे। 

यह लेख खत्म करू कुछ और भी याद आ गया। राजकीय पुस्तकालय , उन्नाव जोकि कचहरी के पास है , उसके और डाकघर के बीच में तमाम गुमटी हुआ करती थी। उनमें एक गुमटी मेरी बड़ी प्रिय थी। वहाँ नावेल  १ रूपये के किराये पर मिला करते थे। मेरठ के छपने वाले अपराध , प्रेम और जासूसी नावेल का बड़ा भंडार हुआ करता था। उसकी कहानी , फिर किसी रोज. 

क्या आपको चंद्रकांता सीरियल याद है और आपका सबसे प्रिय किरदार कौन सा था।  


©आशीष कुमार , उन्नाव।  

२६ अगस्त , २०२६ ,   


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