मंगलवार, 11 अगस्त 2026
रेशमी बाल
सोमवार, 10 अगस्त 2026
Share Market
शेयर मार्केट - एक कथा
- आशीष कुमार ,
पिछले दिनों की बात है , एक मित्र के साथ नगरपालिका मार्किट , कनाट पैलेस में कुछ खाने गए थे। एंट्री गेट पर गार्ड , भले मेरी तलाशी ले रहा था, पर उसकी नजर मोबाइल की स्क्रीन पर थी। शेयरमार्किट के चार्ट पर उसकी नजर थी। मैंने अपने साथी से कहा देखा, इसे। मेरे दिमाग में चलने लगा कि इसकी कितनी सैलरी होगी और इसका कितना बड़ा पोर्टफोलियो होगा।
दूसरा वाकया और भी बढ़िया है , जहाँ मैं बाल कटाने जाता हूँ , उसके मालिक/कारीगर की बात। वैसे तो वहाँ एक दर्जन कारीगर होंगे पर मेरे बाल वही काटता है। उसी दौरान शेयर मार्केट की बात होती है। मुझे उसकी बातें बड़ी हैरान करती है। पहला कि वो विदेशी बाजार ( अमेरिकी ) में इन्वेस्ट करता है , उसकी वजह डालर और रुपए के अंतर् को बताता है। वो टेस्ला की बात करेगा , एलन मस्क की बात करेगा।
ऐसी वैसी बातें भी नहीं , काफी गहन और शोधपरक। इतनी गहरी कि मुझे कुछ देर हाँ हूँ करने के बाद , उसकी बस बातें सुननी होती है। एक दिन कहने लगा , मस्क की कम्पनी एम्प्लोयी पर कैपिटल में सबसे अच्छी है , मै हैरान था कि ये बाल काटने वाला है या कोई नामी गिरामी इन्वेस्टर। फिर उसने tcs जैसी कंपनी से तुलना करके बताया कि ये एम्प्लॉय और ग्रॉस कैपिटल का रेश्यो क्या होता है। मस्क की वो ब्रेन वाली कम्पनी का भी काफी ज्ञान दिया। उसके बारे में पढ़ा जरूर है पर जिसका नाम मैं बार बार भूल जाता हूँ।
फिर एक दिन मैंने उसका पोर्टफोलियो देख लिया, 70 लाख की वैल्यू का पोर्टफोलियो। २०१४ से सीमित ही सही पर शेयर मार्किट में ध्यान देने लगे हैं पर इतनी बड़ी वैल्यू का पोर्टफोलियो , मैंने सामने से तो किसी का न देखा। इसके बावजूद वो मेरे बाल काटने में लगा था. उसका इंडियन शेयर मार्किट में इंट्रेस्ट जरा कम रहता है पर उसे इधर के तमाम नामी गिरामी शेयर के नाम , दाम सब मुँह जुबानी याद रहते है।
शेयर मार्किट में ने न जाने कितने लोगो को बनाया है और कितने ही इसमें बर्बाद हुए है। मेरी इसमें सीमित समझ के आधार पर यह कह सकते है कि इसमें अंत में वही लोग बचे रहे हैं जो ट्रेडिंग और ऑप्शन ट्रेडिंग से दूर रहते है। लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट को छोड़ दे तो शेयर मार्किट पूरी तरह से तुक्केबाजी है।
© आशीष कुमार , उन्नाव।
10 अगस्त , 2026
गुरुवार, 30 जुलाई 2026
ओल की सब्जी
संस्मरण :- ओल की सब्जी
आशीष कुमार
वैसे मेरे घर में इसे सूरन के नाम से जानते थे और कभी कभी त्यौहार में इसकी सूखी सब्जी बनती थी. इसे पूरी के साथ खाया जाता था. मुझे कभी विशेष अच्छी न लगी। इसका एक नाम ओल भी होता है यह मुझे बहुत समय के बाद पता चला।
लखनऊ के एक सरकारी हॉस्टल में , मेरे कुछ बढ़िया मित्र बने। शिवेंद्र , इंदरजीत राणा , अरविन्द , सूर्यप्रकाश से बढ़िया दोस्ती हुयी। सबसे अच्छी बात सारे ही, एक एक करके सरकारी नौकरी में सेलेक्ट हो गए। वो इलहाबाद में रहा करते थे। उनके सम्पर्क में आने के बाद , इलहाबाद की दुनिया पता चली। वहाँ कभी रहा नहीं पर मुझे वो अच्छा लगने लगा। मै 4 .. 5 महीने में वहां किताबें लेने के बहाने और कुछ एग्जाम के चलते वहां आना जाना शुरू किया।
यह 20 साल पुरानी बात होगी। एक मित्र से बातचीत हुयी और शाम को उनके पास पहुँचा। एक अच्छे मित्र की तरह वो बाहर गली में लेने आये। इलहाबाद की तमाम यादों में , यह विशेष याद आता है कि सभी को मित्र की आवभगत करने पर बड़ा जोर रहता था। ये मित्र गोरखपुर के थे। शिवेंद्र भाई आज भी सम्पर्क में है। कुछ संघर्ष के बाद सीपीओ एग्जाम से केंद्रीय बल में दरोगा हुए , फिर बाद में उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा हो गए।
शाम को शिवेंद्र भाई ने पूछा कि क्या खाओगे मेरे जबाब था कुछ भी। पहले पनीर की बात हुयी फिर वही बोले पनीर तो बड़ा कॉमन हो गया है। आज आपको ओल की सब्जी खिलाते है। मैं जीवन में पहली बार ओल का नाम सुन रहा था और जैसा कि मै खाने में बड़ा चूजी रहा हूँ , अगर पसंद ना आये तो थाली में खाना छोड़ देने की बड़ी बुरी आदत थी।
जब सब्जी के ठेले पर ओल लेने गए और वहाँ सुरन देखा तो मैं मुस्कुराया कि यह तो सुरन है। खैर , सब्जी आयी और बननी शुरू हुयी। मुझे पता था कि ये कैसी सब्जी बनेगी और इसको लेकर कोई खास उत्साह न था। मैं बगल के रूम में और साथी मित्रों से गप्पे लड़ाने में व्यस्त था।
सब्जी जब बनकर तैयार हुयी तो क्या बेहतरीन खुसबू आ रही थी। सबसे हैरान तब हुआ , जब इसे मैंने रसेदार रूप में देखा। पनीर की तरह टुकड़े , फ्राई करके डाले गए थे। बाकि स्टूडेंट लाइफ मे लड़को से बेहतर ग्रेवी कौन ही बना सकता है। मिक्सी न थी पर ढेर सारा प्याज को कूकर में ही गलाकर , उसमें खड़े मसाले गिलास में कूट के डाले गए थे। बहुत ही बढ़िया खुसबूदार , गाढ़ी ग्रेवी बनी थी।
उस शाम मैंने एक नए स्वाद को जाना। वहां से लौटकर जब घर में माँ से इसे बनाने को बोला तो वो भी हैरान थी। मेरे घर में सालों से इसे सूखी सब्जी के रूप में बनाया जा रहा था , रसेदार रूप में पन्नीर की तरह से फ्राई करके, जब यह बना तो फिर सुखी सब्जी के रूप में हमेशा के लिए बनना बंद हो गया। मैं ओल की रसेदार सब्जी से इतना प्रभावित हुआ कि आगे के सालों में इसका गुणगान , हर किसी करीबी से करता रहा। दर्जनों घरों में , इसको रसेदार रूप में बनवाने के पीछे मेरा हाथ रहा। दरअसल मेरे उन्नाव की तरफ इसे त्यौहार की सब्जी के रूप में जाना जाता था। आज भी पनीर की तुलना में यह मुझे ज्यादा पसंद है। अब तो इसे व्यसायिक खेती करवाने का भी प्लान बना रहा हूँ।
© आशीष कुमार , उन्नाव
31 जुलाई , 2026 .
सोमवार, 20 जुलाई 2026
बेबसी
अवैध ठेला
गुरुवार, 16 जुलाई 2026
Tell No one by Harlan Coben
"Tell No One"
Harlan Coben का नाम मेरे लिए नया नहीं था। Netflix पर उनकी कुछ वेब सीरीज़ देखने का मौका मिला था। उनकी कहानियों की सबसे बड़ी खासियत मुझे यही लगी कि वे शुरुआत से ही आपको अपने साथ बाँध लेती हैं। हर एपिसोड के बाद मन में एक ही सवाल आता था—"आखिर आगे क्या होगा?" शायद यही वजह रही कि मैंने तय किया कि अब उनकी कहानी को स्क्रीन पर नहीं, किताब के पन्नों पर महसूस किया जाए।
"Tell No One" की कहानी भी पहली नज़र में बेहद रोचक लगी। एक पति, जिसकी पत्नी की हत्या हो चुकी है, आठ साल बाद अचानक ऐसे संकेत पाता है जो उसकी पूरी दुनिया बदल देते हैं। क्या उसकी पत्नी सचमुच मर चुकी है? अगर हाँ, तो ये संदेश कौन भेज रहा है? और अगर नहीं, तो इतने सालों तक वह कहाँ थी? बस यही रहस्य इस किताब को पढ़ने के लिए काफी है।
लेकिन मेरे लिए यह किताब सिर्फ एक थ्रिलर नहीं है।यह मेरी नई पढ़ने की आदत की शुरुआत है।
मुझे हमेशा लगता है कि एक लेखक जितना लिखता है, उससे कहीं ज़्यादा उसे पढ़ना चाहिए। लिखने के लिए शब्द तो मिल जाते हैं, लेकिन विचार, दृष्टिकोण और कहानी कहने का तरीका पढ़ने से ही विकसित होता है। मैं हिंदी में लिखता हूँ, लेकिन अब चाहता हूँ कि दुनिया के अच्छे लेखकों को भी पढ़ूँ। शायद उनकी शैली से कुछ सीख सकूँ, शायद अपने लेखन को थोड़ा और बेहतर बना सकूँ।
आज जब अधिकांश लोग मोबाइल स्क्रीन पर कुछ सेकंड की रील देखकर आगे बढ़ जाते हैं, तब किताब के साथ कुछ घंटे बिताना अपने आप में एक अलग अनुभव है। किताब आपको जल्दी नहीं करती। वह आपको रुकना, सोचना और कहानी के साथ जीना सिखाती है।
मुझे नहीं पता कि "Tell No One" पढ़ने के बाद यह मेरी सबसे पसंदीदा किताब बनेगी या नहीं, लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि यह किताब मुझे फिर से पढ़ने की दुनिया में ले जाने वाली पहली सीढ़ी है।
उम्मीद है कि इस एक किताब के बाद मेरी अलमारी में Harlan Coben की और भी किताबें होंगी, और उनके साथ-साथ दूसरे लेखकों की भी। क्योंकि अब महसूस होने लगा है कि अच्छी किताबें सिर्फ समय नहीं बितातीं, वे इंसान को भीतर से थोड़ा बेहतर भी बना देती हैं।
मैं चाहता हूँ कि आने वाले समय में मेरी पहचान सिर्फ एक लेखक के रूप में नहीं, बल्कि एक अच्छे पाठक के रूप में भी बने। शायद हर अच्छा लेखक बनने से पहले एक अच्छा पाठक बनना ज़रूरी होता है।
© आशीष कुमार, उन्नाव
17 july , 2026.
Bin fere ki mohabt
बुधवार, 15 जुलाई 2026
काजल
लघुकथा :- काजल
आशीष कुमार
जीवन में काफी ज्ञानी लोग मिले है , जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा। इस बात का जरा भी घमंड न है। आज जिस मुकाम पर पहुँचा हूँ , उनमें ऐसे लोगो का बड़ा योगदान है। आज ऐसी ही एक कहानी याद आ गयी।
वो काफी होशियार थी , हर काम में तेज। पढ़ने में भी बहुत अच्छी थी। जब स्कूल में पुरुस्कार वितरण होता तो , लगभग सारे उसी को मिलते।
उसका एक छोटा भाई था। एक शाम की बात है , उसकी माँ ने आवाज दी , शाम हो गयी है। भाई को काजल लगा दो। उन दिनों रात में सोते वक़्त हर कोई काजल लगा के सोता था। अब जमाना कितना बदल गया। अब लोगों ने काजल लगाना ही बंद कर दिया। अब तो डॉक्टर भी मना करने लगे कि बच्चों की आँखे खराब हो जाएँगी।
खैर , जैसा की मैंने बताया वो लड़की बड़ी तेज थी। उसे काजल की डिब्बी न मिली। वो परेशान न हुयी। उसे पता था कि काजल कैसे बनाया जाता है। उसकी बुध्दि ने उसे तुरंत प्रेरणा दी। सामने किरोसिन वाला दीपक जल रहा था। किसी खाली बोतल का ढक्क्न लिया। उसमें दीपक से उठते हुए धुएँ को इकट्ठा किया। कुछ ही देर में जरूरत भर का काजल इकट्ठा हो गया।उसने गरमागरम काजल , अपने प्रिय छोटे भाई की आंख में लगा दिया। काजल लगते ही भाई को रात में सूरज नजर आ गया। वो हिरन की तरह , पुरे घर में भागा। उसकी आँखों में जलन होने लगी। लड़की को उसकी इस बेवकूफी के लिए उसकी मां ने जमकर क्लास लगाई।
© आशीष कुमार, उन्नाव।
15 जुलाई , 2026 .
रविवार, 12 जुलाई 2026
दुविधा
लघुकथा :- दुविधा
आशीष कुमार
मेरे सामने पेपर है और मै दुविधा में हूँ।
मेरे सामने अतीत है जो बड़ी तेजी से गुजर रहा है। मेरी परवरिश ऐसी की गयी कि घर से स्कूल और स्कूल से घर। जल्द ही मेरी सरकारी जॉब लग गयी। मेरे जीवन से जुड़े सारे फैसले मैंने पिता जी पर ही छोड़ रखा था। इसलिए शादी के लिए भी जहाँ से रिश्ता आया , वहीं हाँ भी कर दी।
शुरू में सब ठीक था , इनकी नौकरी निजी क्षेत्र में थी , अच्छा कमाते थे। नेचर और लुक दोनों अच्छा था। मुझे जीवन में हर चीज अच्छी लगती थी। शादी के कुछ टाइम बाद , बच्चा भी हो गया। मेरी अध्यापक की नौकरी थी। मैं खुद में हर चीज के लिए सक्षम थी।
मुझे बचपन से आत्मनिर्भर बनाया गया था। मुझे खुद पर बहुत आत्मविश्वास था। मुझे न पता था ,यही आत्मविश्वास मेरे लिए , सबसे बड़ी मुसीबत बन जायेगा।
हमारी शादी के 7 साल होने को आये. बच्चा बड़ा हो रहा था , इसके साथ साथ इनके पिता की मानसिकता छोटी होती जा रही थी। शादी के समय मेरी जॉब से , इनको बड़ा गर्व हुआ था और अब धीरे धीरे मेरी जॉब , इनको दिक्क्त दे रही थी।
शुरू में कोई विशेष बात न थी, छोटी मोटी बहस होती थी। पर धीरे धीरे चीजे खराब होने लगी। कुछ उनका अहं भाव , कुछ नौकरी में इशू , एक मित्र द्वारा साझा व्यापार में धोखा के चलते शराब का सेवन करने लगे। बात यही न रुकी, बहस के साथ साथ अब उनका हाथ भी मुझ पर उठने लगा।
यह बात किसी से मैं बता न सकती थी। पिता जी से भी कुछ हद की बात साझा की और बताया कि चीजे अब बर्दाश्त से बाहर हो रही है। उनका मानना था कि चीजें धीरे धीरे ठीक हो जाएगी। उनको समझना चाहिए था कि अगर ऐसा होता तो मैं उन तक बात लाती ही न।
इस बार स्कूल की छुट्टी होते ही अपने पापा घर आ गयी। भले वो , मुझसे दूर थे पर उनके साथ की बहस , बदतमीजी मेरे जेहन से जा न रही थी। एक रोज बगैर किसी से बताये , कोर्ट चली गयी।
वकील ने पहले समझाने की कोशिस की पर मेरी परेशानी शायद उसे भी समझ आ गयी। मैंने उससे पेपर तैयार करने को बोल दिया। छुट्टी खत्म होने को थी और पेपर भी रेडी हो गए थे।
पिछले कई महीने रोते हुए ही गुजरे थे , मैंने कितने मौके दिए , बार बार माफ़ किया पर शराबी इंसान की बात का क्या भरोसा। अब जब पेपर रेडी होकर सामने है और मुझे बस हस्ताक्षर करने है , मैं बड़ी दुविधा में हूँ।
दुविधा , यह कि यह सब मैं अपने बेटे के अच्छे भविष्य के लिए सोच कर रही हूँ पर कहीं वो बड़ा होकर मुझे ही गलत न समझे। दुनिया क्या कहेगी , समाज क्या सोचेगा। बेटा , बगैर पिता के कमजोर न महसूस करे , उसके विकास में किसी तरह की चुनौती तो न आएगी। फिर ये भी लगता है , उनकी गलत आदतें , मेरी साथ बत्तमीजी को भी देखकर भी उसका बचपन सामान्य न रहेगा।
पीछे मैंने किसी के कहने पर " आपका बंटी " ( मन्नू भंडारी ) भी पढ़ी थी। उसको पढ़कर और भी तमाम प्रश्न उठ खड़े हुए। मेरी दुविधा की वजह शायद मेरी सहज कोमलता है पर अब मै और किसी और के बनाये नियम , उसूलों को न मानूंगी। जो विद्रोह मुझे काफी समय पहले कर देना चाहिए था , अब उसमे देरी करना उचित न होगा।
मैंने एक बार फिर से उन पेपर्स को पढ़ा और उन पर अपने हस्ताक्षर कर दिए।
© आशीष कुमार , उन्नाव।
12 जुलाई , 2026
मंगलवार, 7 जुलाई 2026
Marks
लघुकथा :- निशान
- आशीष कुमार
वो किसी काम से अपने घर आयी थी। वापसी में वो पति के साथ जाना चाहती थी। उसका पति शहर से काम के बाद लौट रहा था। वैसे वो जब अपने घर आयी तो अपने प्रेमी से भी मिली थी , जिसे वो शादी के पहले से जानती थी। उसका प्रेम बहुत गहरा था , जो शादी के बाद भी न टूटा। चीजें साथ-साथ चल रही थी। वो दोहरी भूमिका निभा रही थी।
पति ने पहले टालमटोल किया, पर बाद में राजी हो गया। दोनों साथ-साथ घर गए। उसकी नजरों में , पति बहुत सीधा था पर उसकी बातों में तमाम रहस्य छुपे थे। वो अपने पति पर शक करती थी, पर मजे-मजे में। पर उस दिन , शाम को जब पति के पीठ पर निशान देखे तो वो हैरान थी , एक पल को वो समझ न पायी कि पीठ पर इतने गहरे और लाल निशान कैसे बन गए ? जब उसने अपने पति को टोका तो वो टाल गया।
वो मासूम थी , उसे संदेह था पर पक्का यकीन न था। उसने तमाम जतन किए, पर उसको कोई पक्का न हो पाया कि निशान कैसे थे। पति ने कहा , मुझे न पता क्या है , बाद में बोला कि मेरे ही हाथ लग गए होंगे। उसे फिर भी यकीन न हुआ. उसने पति से उसके हाथो से पीठ पर निशान बनवा के देखे , खुद से करके देखा और अंत में पाया कि पति ही सही बोल रहा है , निशान खुद के हाथ से बन गए होंगे।
उसका मन शांत होकर भी शांत न था। उसको अपने प्रेमी से सारी बातें करनी होती थी। उसने " निशान " के बारे में भी अपने प्रेमी से पूछा -
" ये पक्का प्रेम के निशान है , उसका जरूर कोई लफड़ा चल रहा है " प्रेमी ने मुस्कुराते हुए जबाब दिया।
" तुम इतना यकीन के साथ कैसे कह सकते हो ?" वो जरा चिंता के स्वर में बोली। उसका दिल , अपने देवता जैसे पति पर संदेह न करना चाह रहा था। उसने निशान की फोटो व्हाट्सऐप पर भेजी।
" अरे ये पक्का वही है , मैं जानता हूँ। मैं तो ये भी जानता हूँ लड़की पक्का दुबली पतली होगी , जिसके नाख़ून बड़े होंगे " प्रेमी ने ऐसे बताया जैसे कि उसका खुद का कोई पूर्व अनुभव हो।
(Inspired by " Harlan Coben " , as I recently saw many series based on his books. Mystery lovers can search on Netflix by " Harlan Coben Collection " )
© आशीष कुमार , उन्नाव
7 जुलाई , 2026
Featured Post
SUCCESS TIPS BY NISHANT JAIN IAS 2015 ( RANK 13 )
मुझे किसी भी सफल व्यक्ति की सबसे महतवपूर्ण बात उसके STRUGGLE में दिखती है . इस साल के हिंदी माध्यम के टॉपर निशांत जैन की कहानी बहुत प्रेर...
-
एक दुनिया समानांतर संपादक - राजेंद्र यादव एक दुनिया समानांतर , राजेद्र यादव द्वारा सम्पादित नयी कहनियों का ...
-
निबंध में अच्छे अंक लाने के लिए जरूरी है कि उसमे रोचकता और सरसता का मिश्रण हो.........आज से कुछ लाइन्स या दोहे देने की कोशिश करता हूँ......
-
नीला चाँद कल रात में अंततः इस उपन्यास का पठन पूरा हो गया। शिव प्रसाद सिंह द्वारा लिखे गए इस बहुचर्चित उपन्यास की विषय वस्तु 11 वी सदी के स...

