बुधवार, 16 सितंबर 2026

समुद्र की बेटी से एक यादगार भेंट


सुबह का समय था , स्टाफ ने बोला सर कोई मिलना चाहता है। एयरफोर्स से कोई ऑफिसर हैं। मैंने कहा भेज दीजिए  

 मेरे सामने  भारतीय वायुसेना की अधिकारी श्रद्धा पी. राजू थी। मैंने कहा कि आपका नाम सुना सुना लग  रहा है।  वो मुस्करायी। फिर बातचीत में पता चला कि वो उस काम से जुडी है , जिस पर upsc सामान्य अध्ययन का प्र्श्न बनाया था।   

श्रद्धा पी. राजू उस ऐतिहासिक महिला त्रि-सेवा समुद्री अभियान की उपनेता रही हैं, जिसमें भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना की महिला अधिकारियों ने त्रिवेणी नौका से विश्व की समुद्री परिक्रमा की। हजारों समुद्री मील की यात्रा, अनिश्चित मौसम, विकराल लहरें, सीमित साधन और अपने सामने फैला अनंत जल यह यात्रा केवल भौगोलिक दूरी तय करने का नाम नहीं थी। यह मनुष्य की सहनशक्ति, धैर्य और आत्मविश्वास की परीक्षा भी थी।

मैं उनसे समुद्र के बारे में पूछता गया और वे अपने अनुभव सुनाती गईं। कभी तेज हवाएँ, कभी ऊँची लहरें, कभी विश्राम का अभाव, कभी नौका में उत्पन्न तकनीकी कठिनाइयाँ। समुद्र में कोई ऐसी सुविधा नहीं कि आवश्यकता पड़ते ही किसी को बुला लिया जाए। वहाँ साथ चल रहे लोग ही एक-दूसरे का सहारा होते हैं। जो समस्या सामने है, उसका समाधान भी वहीं खोजना होता है।


उनकी बातें सुनते हुए मेरे मन में समुद्र की वह छवि बदल रही थी, जिसे हम प्रायः चित्रों में देखते हैं। दूर तक फैला नीला जल, स्वच्छ आकाश और क्षितिज पर डूबता सूर्य निस्संदेह सुंदर है; पर समुद्र का एक दूसरा रूप भी है कठोर, अनिश्चित और मनुष्य के अहंकार को बहुत शीघ्र छोटा कर देने वाला। शायद समुद्र यह सिखाता है कि प्रकृति से बड़ा कोई नहीं। और शायद वही समुद्र यह भी सिखाता है कि मनुष्य स्वयं को जितना कमजोर समझता है, वास्तव में वह उससे कहीं अधिक सक्षम है।

बातचीत स्वाभाविक रूप से शारीरिक क्षमता और सहनशक्ति की ओर भी गई। मैं काफी टाइम से फिटनेस के लिए कुछ न कुछ करता रहता हूँ , किसी उल्लेखनीय स्तर तो न कुछ किया पर अब जीवन शैली में फिजिकल एक्टिविटी के अटूट हिस्सा बना गया है।  लंबी दूरी की दौड़ में मेरी अपनी रुचि होने के कारण यह विषय मुझे और भी प्रिय लगा। मैंने अनुभव किया है कि लंबी दौड़ केवल पैरों से नहीं दौड़ी जाती। एक निश्चित दूरी के बाद शरीर पीछे हटने लगता है और मन को आगे आकर नेतृत्व करना पड़ता है। 

श्रद्धा जी से बातचीत के बाद अपनी रोजमर्रा की कठिनाइयाँ भी कुछ छोटी लगने लगीं। हम कभी नींद कम होने पर परेशान हो जाते हैं, कभी मौसम को दोष देते हैं, कभी थकान को और कभी परिस्थितियों को। पर महीनों तक खुले समुद्र में रहना शायद मनुष्य को यह सिखा देता है कि असुविधा और कठिनाई में बहुत अंतर होता है।

ऐसी यात्राएँ केवल शरीर को नहीं तपातीं, मन को भी नया आकार देती हैं। घर, परिवार, सामान्य भोजन, मीठा जल, शांत नींद जिन चीजों को हम सहज उपलब्ध मानते हैं, उनका महत्व शायद तब सबसे अधिक समझ में आता है जब वे सहज उपलब्ध न हों। इतनी बड़ी उपलब्धि के बाद भी श्रद्धा पी. राजू की सहजता और सरलता ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया। मुझे लगा कि वास्तविक उपलब्धियाँ मनुष्य को ऊँचा अवश्य उठाती हैं, किंतु यदि व्यक्तित्व सचमुच बड़ा हो तो उसके पैर जमीन पर ही रहते हैं।

मैंने कहा आप ने वास्कोडिगामा , कोलम्बस वाला काम कर दिखाया है। वो मुस्कुरायी। आज की यह भेंट मेरे लिए केवल एक अधिकारी से मुलाक़ात नहीं थी। यह साहस, अनुशासन, सहनशक्ति और नारी सामर्थ्य से एक छोटा-सा साक्षात्कार था। चलते वक़्त मैंने उन्हें कुछ सलाह दी जैसे कि अपनी इस यात्रा को शब्दबध्द करिये , किसी पुस्तक के रूप में इस साहसिक यात्रा को पढ़ना , तमाम लोगो को लिए प्रेरणा बनेगा। दूसरा किसी पॉडकॉस्ट में भी इसे बतलाइये। 

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© आशीष कुमार, उन्नाव

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

How I cracked Ias exam

 मैंने आईएएस की परीक्षा कैसे पास की


    काफी समय से अपने ब्लॉग पर लिखता आ रहा हूँ। वर्षों में इतनी सामग्री जमा हो गई है कि उससे शायद 10 किताबें तक तैयार हो सकती हैं। लिखना तो लगातार होता रहा, लेकिन उन्हें पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने के लिए समय और मन दोनों एक साथ नहीं मिल पाए।

    अब कुछ समय मिला है, तो पुराने लेखों को फिर से पढ़ने, सँवारने, विषयवार जोड़ने और किताब का रूप देने में मन लग रहा है।सच कहूँ तो अपनी वर्षों पुरानी रचनाओं को एक-एक करके पुस्तक बनते देखना अपने आप में एक अलग ही सुख है।

    शायद लेखन की भी अपनी यात्रा होती है पहले विचार आते हैं, फिर शब्द बनते हैं, वर्षों तक कहीं सुरक्षित पड़े रहते हैं और एक दिन वही शब्द पुस्तक बनकर नई यात्रा शुरू करते हैं।अभी शुरुआत है… बहुत-सी पुरानी रचनाएँ और कई पुस्तकें अपनी बारी का इंतज़ार कर रही हैं।धीरे-धीरे उन्हें भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास रहेगा।







मैंने आईएएस की परीक्षा कैसे पास की’ केवल सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी संबंधी पुस्तक नहीं, बल्कि लंबे संघर्ष, आत्मविश्वास और निरंतर सीखने की एक यात्रा है। लेखक आशीष कुमार ने सामान्य ग्रामीण पृष्ठभूमि, सीमित संसाधनों और सरकारी नौकरी के साथ तैयारी करते हुए लगभग नौ वर्षों तक संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा का सामना किया और अपने अंतिम प्रयास में सफलता प्राप्त की। पुस्तक इसी वास्तविक अनुभव से निकले व्यावहारिक सूत्रों को सरल हिंदी में प्रस्तुत करती है।

पुस्तक के 40 अध्याय लक्ष्य निर्धारण, समय-प्रबंधन, पढ़ने की सही पद्धति, पुनरावृत्ति, उत्तर-लेखन, मुख्य परीक्षा की रणनीति, समाचारपत्रों के उपयोग, एकाग्रता, अध्ययन-कक्ष, समय-सारिणी, व्यक्तित्व विकास और आत्मअनुशासन जैसे विषयों पर केंद्रित हैं। लेखक बार-बार यह स्पष्ट करते हैं कि सफलता किसी एक कोचिंग, पुस्तक, रणनीति या असाधारण प्रतिभा पर निर्भर नहीं होती; अपनी परिस्थितियों को समझकर लगातार प्रयास करना अधिक महत्वपूर्ण है।

इस पुस्तक की विशेषता इसका अनुभवजन्य और आत्मीय स्वर है। असफलताओं, सीमाओं और कठिनाइयों को छिपाने के बजाय लेखक उन्हें सीख में बदलते हैं। इसलिए यह पुस्तक केवल यूपीएससी अभ्यर्थियों के लिए नहीं, बल्कि हर उस विद्यार्थी और युवा के लिए उपयोगी है जो बड़े लक्ष्य के लिए धैर्य, अनुशासन और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहता है।

आशीष कुमार, उन्नाव .


गुरुवार, 3 सितंबर 2026

कृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर मेरा पहला Kindle eBook प्रकाशित


प्रिय मित्रों , आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं। 

    आज मेरे लिए अत्यंत हर्ष और भावनाओं से भरा दिन है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव श्रीकृष्ण जन्माष्टमीके पावन अवसर पर मेरा पहला उपन्यास Kindle eBook के रूप में प्रकाशित हुआ है।

    लेखन मेरे लिए केवल शब्दों को पन्नों पर उतारने का माध्यम नहीं है, बल्कि जीवन के अनुभवों, भावनाओं, स्मृतियों और मन में उठते प्रश्नों को पाठकों तक पहुँचाने की एक यात्रा है। लंबे समय से हिंदी साहित्य, विशेषकर उपन्यासों, के प्रति मेरा गहरा लगाव रहा है। आज उसी लगाव ने मुझे लेखक के रूप में अपना पहला कदम रखने का अवसर दिया है।

    यह पुस्तक मेरे लिए केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि अनेक विचारों, कल्पनाओं और संवेदनाओं का संकलन है। आशा है कि इसके पात्र, घटनाएँ और भावनाएँ पाठकों के मन को छुएँगी तथा उन्हें सोचने के लिए कुछ नए प्रश्न देंगी।

    श्रीकृष्ण का जीवन हमें कर्म, प्रेम, साहस और सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। इसी शुभ दिन पर अपनी पहली ई-पुस्तक का प्रकाशन मेरे लिए ईश्वर का आशीर्वाद और एक नई साहित्यिक यात्रा की शुरुआत है।







    मैं अपने परिवार, मित्रों, शुभचिंतकों और सभी पाठकों का हृदय से आभारी हूँ, जिन्होंने मुझे निरंतर प्रोत्साहित किया। आप सभी से विनम्र अनुरोध है कि मेरी Kindle eBook पढ़ें और अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया अवश्य साझा करें।आपका स्नेह और सुझाव मेरी आगामी रचनाओं के लिए प्रेरणा बनेंगे।

पुस्तक का नाम: Hari Cigarette

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लेखक: आशीष कुमार
Kindle पर उपलब्ध

संपर्क: ashunao@gmail.com
ब्लॉग: https://asheeshunnao.blogspot.com/


     पुस्तक कैसे खरीदें और पढ़ें?

पाठक Amazon पर पुस्तक का नाम “Hari Cigarette” खोजकर इसे खरीद सकते हैं। खरीदने के बाद Kindle
eBook उसी Amazon खाते की Kindle Library में उपलब्ध हो जाएगी।

इसे पढ़ने के लिए अलग Kindle मशीन लेना आवश्यक नहीं है। पाठक अपने मोबाइल या टैबलेट में मुफ्त Amazon Kindle App डाउनलोड करके, उसी Amazon खाते से Sign In कर, पुस्तक पढ़ सकते हैं। इसे Kindle e-Reader या कम्प्यूटर के ब्राउज़र पर Kindle Cloud Reader के माध्यम से भी पढ़ा जा सकता है।

पाठकों से विनम्र अनुरोध

पुस्तक पढ़ने के बाद कृपया Amazon पर अपनी ईमानदार समीक्षा (Review) और रेटिंग अवश्य दें। आपकी प्रतिक्रिया नए पाठकों तक पुस्तक पहुँचाने में सहायता करेगी और मेरे आगामी लेखन के लिए प्रेरणा बनेगी।

आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए हृदय से धन्यवाद।

आशीष कुमार, उन्नाव





बुधवार, 26 अगस्त 2026

चंद्रकांता की कहानी

लघु लेख :- चंद्रकांता की कहानी 

- आशीष कुमार 

    जब मैं उन्नाव पढ़ने गया तो सबसे पहले  वहां के  राजकीय पुस्तकालय में सदस्यता ली।  2003 की बात होगी। वहाँ सबसे पहले जो पुस्तक माँगी वो देवकीनंदन खत्री जी रचित चंद्रकांता माँगा। इससे पहले मैंने मौरावां के पुस्तकालय में भी इसे खोजा था पर मिला न था। 

    उन्नाव के इस पुस्तकालय में सदस्य भी यह पूछकर बना था कि क्या चंद्रकांता उपन्यास  मिलेगा। जब पता चला कि यह यहां उपलब्ध है तो उसी दिन जो भी जो भी शर्ते व नियमावली थी , उसी दिन पूरी की और शाम को उसके दो भाग लेकर अपने कमरे आया। उन दोनों को पढ़कर अगले दिन जब मैं उन्हें वापस करने गया तो वहाँ काम करने वाली लड़कियाँ (इंटर्न ) हैरान थी। मैंने उन्हें और हैरान करते हुए अगले दो भाग लेकर चला आया। इस नावेल को खत्म करने के बाद , खत्री जी ऐसा जादू चला कि उनके लिखे दो नावेल चंद्रकांता की संतति और भूतनाथ जल्द ही  पढ़ डाले।  

चंद्रकांता का जादू टीवी से जुड़ा था , जब यह दूरदर्शन पर हर रविवार सुबह ९ बजे से १० बजे की बीच आया करता था। उन दिनों गांव में सबके घर टीवी न हुआ करती थी और बिजली की भी दिक्क्त  रहती  था। कुछ  एपिसोड देखे थे और कुछ एपिसोड छूट गए। ऐसे में उनकी याद बनी रही। सीरियल में एक से बढ़कर कलाकार थे। मुझे तेज सिंह का किरदार सबसे अच्छा लगता था , अब याद भी न  है कि वो वैसे था कौन। इरफ़ान खान को  फिल्मों में बाद में जाना , पहले पहल बद्रीनाथ के रूप में उन्हें देखा था। उस सीरियल में सबसे आकर्षक अय्यार थे , कोई किसी का भी रूप धर लेता था। 



    उन बचपन के दिनों में हम मित्र मण्डली की चर्चा का विषय यह हुआ करता था कि कौन सा अय्यार सबसे शक्तिशाली है , या टीम बनाई जाये तो कौन जीतेगा।

    वैसे मैने  जब खत्री जी का नावेल पढ़ा तो देखा यह तो सीरियल से काफी अलग है। बाद के सालों में कमलेश्वर जी साहित्य को पढ़ने के दौरान जाना की टीवी के लिए चंद्रकांता १९९४ में , कमलेश्वर जी ने लिखी थी जो कि मूल स्वरुप से काफी अलग है।

    आपको पता है , देवकीनंदन खत्री जी ने अपने नावेल से तिलस्म का ऐसा जादू बिखेरा था कि सिर्फ चंद्रकांता को पढ़ने के लिए कितने ही लोगों ने देवनागरी लिपि सीखी। सोचो , आज के ai के दौर में जब हर चीज , हर भाषा का अनुवाद सेकंड में उपलब्ध है , एक दौर ऐसा भी था जब लोगों पढ़ने में इतनी रूचि हुआ करती थी कि लोग उपन्यास पढ़ने के लिए लिपि व भाषा सीखने को तत्पर थे। 

यह लेख खत्म करू कुछ और भी याद आ गया। राजकीय पुस्तकालय , उन्नाव जोकि कचहरी के पास है , उसके और डाकघर के बीच में तमाम गुमटी हुआ करती थी। उनमें एक गुमटी मेरी बड़ी प्रिय थी। वहाँ नावेल  १ रूपये के किराये पर मिला करते थे। मेरठ के छपने वाले अपराध , प्रेम और जासूसी नावेल का बड़ा भंडार हुआ करता था। उसकी कहानी , फिर किसी रोज. 

क्या आपको चंद्रकांता सीरियल याद है और आपका सबसे प्रिय किरदार कौन सा था।  


©आशीष कुमार , उन्नाव।  

२६ अगस्त , २०२६ ,   


गुरुवार, 13 अगस्त 2026

TEA and Maska Bun

 

चाय और मस्का बन 

आशीष कुमार

तमाम बार कुछ विषयों पर लिखते हुए ऐसा लगता है , इस पर लिख चुका हूँ। पीछे पलटकर देखने की आदत न है इसलिए चेक भी न करता हूँ।  पर फिर सोचता हूँ कि अगर लिखा भी होगा तो क्या हुआ , इस बार कुछ नया होगा। 

जितना मुझे याद आता है , मस्का बन से पहला परिचय , इलाहाबाद में हुआ था। एक टाइप टेस्ट देने गया था। अरविन्द ( कमांडेंट , SSB ) के पास हॉस्टल में रुका था। सुबह पास के चौराहे पर चाय पीने गए , वही पहली बार मस्का बन खाया। काफी बड़ा था। चाय खत्म हो गयी वो न खत्म हुआ। फिर तमाम जगहों पर खाया और चाय के साथ खाने के लिए मेरी पसंदीदा चीजों में वो एक है।  

कई बार चाय को देश का राष्ट्रीय पेय पदार्थ कहते है। पिछले दिनों , लखनऊ में शर्मा जी चाय पर जाना हुआ। मस्का बन , समोसा और कुल्हड़ वाली चाय। काफी दिनों बाद , अच्छी चाय पी। 



अहमदाबाद के दिनों में भी कुछ चाय की टपरी फेमस थी। एक सरखेज गाँधी नगर हाईवे पर खेतला आपा की चाय , दूसरा स्पीपा के बाहर वाली टपरी , तीसरा शुभ लाइब्रेरी के पास वाली कड़क चाय। खेतला आपा  वाली चाय बहुत विशाल मात्रा में बनती थी। हमेशा लाइन लगी रहती थी। पूरी पूरी रात वहाँ भीड़ रहती। 



स्पीपा के पास वाली चाय पर सिविल सेवा की तैयारी कर रहे लोगो की भीड़ रहती थी। मेरा उधर कभी-कभी ही जाना होता था। देखा जाए तो शुभ लाइब्रेरी वाली चाय मैंने सबसे ज्यादा पी होगी। बहुत कड़क चाय होती थी। चाय बनाने वाला , घंटो चाय में चमचा डाल कर उसे घोटता रहता।  घंटो असर रहता था उसका। दोपहर में एक गिलास चाय , देर शाम तक दिमाग को एक्टिव रखती थी। 

मुझे अब याद आया , उन्नाव के दिनों में बहुत ज्यादा चाय पीता था। उन दिनों , लोगों के घर जाकर टूशन पढ़ाने का काम था। लगभग हर जगह चाय दी जाती थी। उस चाय के सहारे , 5 से 6  घंटे , सायकल से एक घर से दूसरे घर जाना होता था। कई बार चाय और नाश्ता इतना ज्यादा हो जाता था कि घर आकर खाना बनाने और खाने का मन न होता था।  आज पीछे पलट के देखता हूँ तो खुद को ही यकीन न होता है कि वैसे भी दिन थे क्या ?

" हमने जो गुजारी है , 

तुम पर गुजरती तो 

तुम गुजर ही जाते " 


 तो चाय पीने का कोटा , कई साल पहले ही पूरा हो चुका था। अब एक चाय भी भारी लगती है , पेट में एसिड सा बनने लगता है।  इसलिए इन दिनों , कॉफ़ी पसंद आती है. सुबह-सुबह खुद से बीन्स ग्राइंड करके , खुद से  ब्लैक कॉफ़ी पीना एक आदत बन चुकी है।

© आशीष कुमार, उन्नाव। 

13 अगस्त , 2026 .  










मंगलवार, 11 अगस्त 2026

7 YEARS IN AHMEDABAD



7 साल अहमदाबाद में (०१) 


जनवरी 2012 की एक रात मैंने जब साबरमती ट्रेन अहमदाबाद के लिए पकड़ी थी तो मैं पूरी तरह से निश्चित था कि बस कुछ महीने की जॉब है , जल्द ही नई नौकरी मिलेगी और मैं अहमदाबाद छोड़ दूँगा। वो  समय मेरे जीवन कुछ ऐसा समय था जब मुझे हर साल नई नौकरी मिल रही थी। एक नौकरी ज्वाइन करता तो अगली बड़ी नौकरी का रिजल्ट आ चूका होता। मैं सेंट्रल एक्साइज एंड कस्टम विभाग में इंस्पेक्टर बन चूका था। सिविल सेवा 2011 की मुख्य परीक्षा  अच्छी गयी थी और मैं उम्मीद कर रहा था कि जल्द ही परीक्षा पास कर लूँगा।  

कुछ महीने बाद इंटरव्यू कॉल भी आ गयी। अब उम्मीद बढ़ गयी थी।  मेरी वर्तमान जॉब बढ़िया थी , शहर बढ़िया था पर मन संतुष्ट न था। मैंने UPSC को कम करके आँका था। इंटरव्यू तो फेल हुआ ही , अगले साल का PRE एग्जाम भी फेल हो गया। मुझे ठीक से याद है वो जुलाई 2012  के आखिरी दिन थे। जिस दिन PRE का रिजल्ट आया , बहुत बड़ा सदमा लगा कि अब इस अजनबी शहर में रहना पड़ेगा। 

उन दिनों मैं मेम नगर एरिया में रहता था। उसी दिन शाम को हिमालया मॉल गया और क्रोमा स्टोर  से एक लैपटॉप खरीदा। उसके बाद दिसंबर 2012  तक जी भर कर फिल्में देखी। टोरेंट का दौर था। हिंदी , अंग्रेजी फिल्मों के साथ चीनी ,कोरियन , जापानी फिल्में देखता गया। मन में यह था कि इतना फिल्में देखो कि उनसे ऊब जाओ। क्या दिन , क्या रात , फिल्में चलती रही और समय गुजरता रहा।

जीवन  के साथ प्रयोग करने की पुरानी आदत थी । इससे पहले के दौर में फिल्मों की तरह नॉवेल , कथा कहानी का पढ़ने का जूनून सवार हुआ था। दिन / रात , महीने साल केवल एक ही काम पढ़ना। हिंदी , बंगाली , मलयालम , मराठी , कन्नड़ , रुसी मतलब अनुवाद में जो मिले बस पढ़ जाओ।  पहले इन चीजों का जिक्र किया करता था कि इतने नावेल पढ़ चूका हूँ पर अब लगता है कि उनका का कोई मतलब नहीं। मैंने जो भी नावेल पढ़े थे वो केवल मनोरंजन की दृष्टि से पढ़े थे। अगर आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ता तो शायद कुछ और ही व्यक्तित्व होता। 


अहमदाबाद मेरे लिए अजनबी जगह थी। उन दिनों मुझे इस शहर में सबसे ज्यादा जो चीज हैरान करती थी वो यह कि इस शहर में साइकिल से चलने वाले लोग न के बराबर है। सड़कों पर दो पहिया से ज्यादा चार पहिया वाले वाहन थे। घर कम थे , फ्लैट अधिक। शहर में समृद्धि हर तरफ देखी जा सकती थी। मैं उत्तर प्रदेश के एक सामान्य जिले से लम्बा ग्रामीण जीवन जीकर आया था। इसलिए शहर के साथ ताल मेल जल्द न बैठा सका। 

हम जहाँ रहते थे वहाँ से कुछ दुरी पर ही अहमदाबाद का सुप्रसिद्ध ड्राइव इन सिनेमा था। प्रायः मैं, मनोज श्रीवास्तव के साथ टहलते हुए फिल्म देखने चले जाते। मनोज श्रीवास्तव हमारे जिले उन्नाव से ही थे। हम पहले से परिचित थे और यहाँ पर भी एक ही विभाग में सहकर्मी थे। इसके चलते ज्यादा अहमदाबाद के शुरुआती साल ज्यादा कठिन न लगे।  

जहाँ मैं रहता था वहाँ से ऑफिस 2 किलोमीटर दूर था। दोनों ही साल मैं पैदल ही ऑफिस आता जाता रहा। इस समय मैं फील्ड में जॉब कर रहा था। मेरा काफी लोगों से मिलना होता , अक्सर मुझे लोग कहते कि " फिर मिलेंगे" मैं उन्हें हाँ भी करता पर मैं जानता था कि मैं उनसे कभी नहीं मिलूंगा।

कुछ दिन तक हमने बाहर होटल में खाना खाया। अहमदाबाद में मुझे एक और अनोखी चीज लगी। यहाँ पर अनलिमिटेड थाली का चलन खूब था। हर बजट के लिए थाली। 50 रूपये से लेकर 100 रूपये वाली। उन्हीं दिनों एक होटल पर  हार्दिक थककर से मुलाकात हुयी। दरअसल मैं और मनोज खाने के बाद कुछ upsc पर बात कर रहे थे। उन बातों को सुनकर हार्दिक ने हमसे बात की पहल की। हार्दिक से लम्बी और गहरी दोस्ती हुयी। उनसे जुडी इतनी बातें है कि उन पर अलग से पोस्ट लिखी जा सकती है। लिखूंगा कभी। इन दिनों वो इसरो में क्लास वन अधिकारी है। उनकी कहानी भी बड़ी मोटिवेशनल है।


बाद में मैंने अपने रूम में खाना बनाने लगे। मैं और मनोज दोनों ही खाना बनांने में कुशल थे। होटल में अधिक दिन खाना सेहत के लिहाज से अच्छा न था। उसी साल कुंदन कुमार से भी परिचय हुआ। वो हमारे विभाग में ही थे और हमसे सीनियर थे। उस साल मैं pre फेल हुआ था और उनका पहली बार मैन्स देने का अवसर था। यह भी अजीब बात है कि हम पहली बार मुखर्जी नगर के एक रूम में मिले। वो दिल्ली में कोचिंग के लिए थे और संयोग से मैं भी किसी काम से दिल्ली गया था।


 इसके बाद मुझे अपने ऑफिस के मुख्यालय में पोस्ट दी गयी। यह ऑफिस , मेरे रूम से लगभग 5 किलोमीटर दूर था। इतनी दूर पैदल जाना संभव न था। काफी दिनों से एक अच्छी साइकिल लेने का मन था। जल्द ही एक गियर वाली काफी महॅगी साइकिल खरीद ली। रेड कलर की साइकिल से घूमने में खूब मजा आता था। कुछ दिन ऑफिस उससे गया। जल्द ही मुझे अहसास हुआ कि इससे इज्जत की बाट लग जाएगी। जिस ऑफिस में बहुतायत लोग कार से आते थे और कुछ लोग मोटर साइकिल से आते थे वहां पर साइकिल से जाना मुझे अजीब लगने लगा। कभी कभी सोचता कि अगर कोई कुछ कहेगा तो बोल दूंगा कि मेरे एक महीने की सैलरी से बाइक मिल जाएगी पर जल्द ही मुझे बाइक लेनी पड़ी।

बाइक लेने का सबसे प्रमुख कारण , अहमदाबाद का ट्रैफिक था। दूसरा साइकिल बहुत नाजुक थी। अक्सर उसमें कुछ न कुछ  बिगड़ने भी लगा था। साइकिल के दिनों सबसे ज्यादा फ़ायदा मुझे अपनी बेली पर दिखा। उतना फ्लैट कभी नहीं रहा। मुझे आज भी लगता है कि फिटनेस के लिए साइकिल से बेहतर कोई चीज नहीं।

© आशीष कुमार , उन्नाव , उत्तर प्रदेश। 







































हरे पत्थर वाली अँगूठी

कविता : -हरे पत्थर वाली अँगूठी 

    उसके संघर्ष के 
दिनों में
किसी ने दी थी 
 एक चांदी 
की अँगूठी 
जिसमें जड़ा था
हरा पत्थर,

पत्थर सौभाग्य का
व अंगूठी उनके
मूक प्रेम का प्रतीक
थी, जिसे उसने
पहना बड़े चाव से
कुछ दिनों या 
फिर कुछ
महीनों तक

फिर उसने 
अंगूठी को सम्भालकर
रख दिया,
उस डिब्बे में
जहाँ वो रखता था
अपनी सबसे कीमती चीजें

जीवन अपनी
गति से चला
वो उससे तेज चला
इस कदर की तेजी
कि सब पीछे छोड़ते हुए
उसे पहुँचना था आसमान

हरे पत्थर  वाली अंगूठी 
जोकि मौन प्रेम व
सौभाग्य की प्रतीक थी
उसे खूब फली,
उसे दी नित नई
उचाईयां।

आसमान की ऊचाइयों
से उसे एक दिन
जब उसे अपना
संघर्ष भरा अतीत
याद आया तो
उसने पाया कि


इस सुहाने सफर
में वो अँगूठी
जाने कब कहाँ
खो गयी,
ठीक उनके मूक
प्रेम की तरह ।

©आशीष कुमार, उन्नाव।
19 मई 2021।

रेशमी बाल

कविता : रेशमी बाल

प्रिय तुम्हारे चमकते 
रेशम जैसे बाल,
छितरे रहते ज्यों
आकाश में
घने काले बादल ।

बड़ा सुखद लगता है
उनमें अगुलियां फेरना,
लेना उनकी खुसबू
खूब गहरे, भीतर तक।

प्रिय जब जब तुम
मेरे करीब होती हो,
अक्सर उलझ जाते हैं
मेरे हाथ, अगुलियां।

प्रिय जब तुम विदा लेती हो
छूट जाते है अक्सर
कुछ एक बाल, मेरे साथ
जो हर वक़्त याद दिलाते हैं
कि तुम मेरे साथ हमेशा हो
अटूट, अभिन्न, अविभाज्य।

14 जनवरी, 2020
©आशीष कुमार, उन्नाव।




सोमवार, 10 अगस्त 2026

Share Market

 

शेयर मार्केट - एक कथा 

- आशीष कुमार ,

    पिछले दिनों की बात है , एक मित्र के साथ नगरपालिका मार्किट , कनाट पैलेस में कुछ खाने गए थे। एंट्री गेट पर गार्ड , भले  मेरी तलाशी ले रहा था, पर उसकी नजर मोबाइल की स्क्रीन पर थी। शेयरमार्किट के चार्ट पर उसकी नजर थी। मैंने अपने साथी से कहा देखा, इसे। मेरे दिमाग में चलने लगा कि इसकी कितनी सैलरी होगी और इसका कितना बड़ा पोर्टफोलियो होगा। 

    दूसरा वाकया और भी बढ़िया है , जहाँ मैं बाल कटाने जाता हूँ , उसके मालिक/कारीगर की बात। वैसे तो वहाँ एक दर्जन कारीगर होंगे पर मेरे बाल वही काटता है। उसी दौरान शेयर मार्केट की बात होती है। मुझे उसकी बातें बड़ी हैरान करती है। पहला कि वो विदेशी बाजार ( अमेरिकी ) में इन्वेस्ट करता है , उसकी वजह डालर और रुपए के अंतर् को बताता है। वो टेस्ला की बात करेगा , एलन मस्क की बात करेगा। 



ऐसी वैसी बातें भी नहीं , काफी गहन और शोधपरक। इतनी गहरी कि मुझे कुछ देर हाँ हूँ करने के बाद , उसकी बस बातें सुननी होती है। एक दिन कहने लगा , मस्क की कम्पनी  एम्प्लोयी पर कैपिटल में सबसे अच्छी है , मै हैरान था कि ये बाल काटने वाला है या कोई नामी गिरामी इन्वेस्टर। फिर उसने tcs जैसी कंपनी से तुलना करके बताया कि ये एम्प्लॉय और ग्रॉस कैपिटल का रेश्यो क्या होता है। मस्क की वो ब्रेन वाली कम्पनी का भी काफी ज्ञान दिया। उसके बारे में पढ़ा जरूर है पर जिसका नाम मैं बार बार भूल जाता हूँ। 

some poems by me

फिर एक दिन मैंने उसका पोर्टफोलियो देख लिया, 70 लाख की वैल्यू का पोर्टफोलियो। २०१४  से सीमित ही सही पर शेयर मार्किट में ध्यान देने लगे  हैं पर इतनी बड़ी वैल्यू का पोर्टफोलियो , मैंने सामने  से तो किसी का  न देखा। इसके बावजूद वो मेरे बाल काटने में लगा था. उसका इंडियन शेयर मार्किट में इंट्रेस्ट जरा कम रहता है पर उसे इधर के तमाम नामी गिरामी शेयर के नाम , दाम सब मुँह जुबानी याद रहते है।  

शेयर मार्किट में ने न जाने कितने लोगो को बनाया है और कितने ही इसमें बर्बाद हुए है। मेरी इसमें सीमित समझ के आधार पर यह कह सकते है कि इसमें अंत में वही लोग बचे रहे हैं जो ट्रेडिंग और ऑप्शन ट्रेडिंग से दूर रहते है। लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट को छोड़ दे तो शेयर मार्किट  पूरी तरह से तुक्केबाजी है। 

check some stories

© आशीष कुमार , उन्नाव। 

10 अगस्त , 2026 









गुरुवार, 30 जुलाई 2026

ओल की सब्जी

 संस्मरण :- ओल की सब्जी 

आशीष कुमार

    वैसे मेरे घर में इसे सूरन के नाम से जानते थे और कभी कभी त्यौहार में इसकी सूखी सब्जी बनती थी. इसे  पूरी के साथ खाया जाता था. मुझे कभी विशेष अच्छी न लगी। इसका एक नाम ओल भी होता है यह मुझे बहुत समय के बाद पता चला। 

लखनऊ के एक सरकारी हॉस्टल में , मेरे कुछ बढ़िया मित्र बने। शिवेंद्र , इंदरजीत राणा , अरविन्द , सूर्यप्रकाश से बढ़िया दोस्ती हुयी। सबसे अच्छी बात सारे ही, एक एक करके सरकारी नौकरी में सेलेक्ट हो गए।  वो इलहाबाद में रहा करते थे। उनके सम्पर्क में आने के बाद , इलहाबाद की दुनिया पता चली। वहाँ कभी रहा नहीं पर मुझे वो अच्छा लगने लगा। मै 4 .. 5 महीने में वहां किताबें लेने के बहाने और कुछ एग्जाम के चलते वहां आना जाना शुरू किया। 

यह 20 साल पुरानी बात होगी। एक मित्र से बातचीत हुयी और शाम को उनके पास पहुँचा। एक अच्छे मित्र की तरह वो बाहर गली में लेने आये। इलहाबाद की तमाम यादों में , यह विशेष याद आता है कि सभी को मित्र की आवभगत करने पर बड़ा जोर रहता था। ये मित्र गोरखपुर के थे। शिवेंद्र भाई  आज भी सम्पर्क में है। कुछ संघर्ष के बाद सीपीओ एग्जाम से केंद्रीय बल में दरोगा हुए , फिर बाद में उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा हो गए।   

शाम को शिवेंद्र भाई ने पूछा कि क्या खाओगे मेरे जबाब था कुछ भी।  पहले पनीर की बात हुयी फिर वही बोले पनीर तो बड़ा कॉमन हो गया है। आज आपको ओल की सब्जी खिलाते है। मैं जीवन में पहली बार ओल का नाम सुन रहा था और जैसा कि मै खाने में बड़ा चूजी रहा  हूँ , अगर पसंद ना आये तो थाली में खाना छोड़ देने की बड़ी बुरी आदत थी। 

जब सब्जी के ठेले पर ओल लेने गए और वहाँ सुरन देखा तो मैं मुस्कुराया कि यह तो सुरन है। खैर , सब्जी आयी और बननी शुरू हुयी। मुझे पता था कि ये कैसी सब्जी बनेगी और इसको लेकर कोई खास उत्साह न था। मैं बगल के रूम में और साथी मित्रों से गप्पे लड़ाने में व्यस्त था। 

सब्जी जब बनकर तैयार हुयी तो क्या बेहतरीन खुसबू आ रही थी। सबसे हैरान तब हुआ , जब इसे मैंने रसेदार रूप में देखा। पनीर की तरह टुकड़े , फ्राई करके डाले गए थे। बाकि स्टूडेंट लाइफ मे लड़को से बेहतर ग्रेवी कौन ही बना सकता है। मिक्सी न थी पर ढेर सारा प्याज को कूकर में ही गलाकर , उसमें खड़े मसाले गिलास में कूट के डाले गए थे।  बहुत ही  बढ़िया खुसबूदार , गाढ़ी  ग्रेवी बनी थी। 

उस शाम मैंने एक नए स्वाद को जाना। वहां से लौटकर जब घर में माँ से इसे बनाने को बोला तो वो भी हैरान थी। मेरे घर में सालों से इसे सूखी सब्जी के रूप में बनाया जा रहा था , रसेदार रूप में पन्नीर की तरह से फ्राई करके, जब यह बना तो फिर सुखी सब्जी के रूप में हमेशा के लिए बनना बंद हो गया।  मैं ओल की रसेदार सब्जी से इतना प्रभावित हुआ कि आगे के सालों में इसका गुणगान , हर किसी करीबी से करता रहा। दर्जनों घरों में , इसको रसेदार रूप में बनवाने के पीछे मेरा हाथ रहा। दरअसल मेरे उन्नाव की तरफ इसे त्यौहार की सब्जी के रूप  में जाना जाता था।  आज भी पनीर की तुलना में यह मुझे ज्यादा पसंद है। अब तो  इसे व्यसायिक खेती करवाने का भी प्लान बना रहा हूँ।   

 © आशीष कुमार , उन्नाव 

31 जुलाई , 2026 .










      










सोमवार, 20 जुलाई 2026

बेबसी

लघुकविता : बेबसी 

 प्रिय तुम जानती भी हो,या नहीं,
कि मैं बेबस सा हूँ,दिल से मजबूर हूँ
तुम्हारे लिए ,तुम्हारे एकनिष्ठ  प्रेम में।

चाहता हूँ कि, तुम भी चाहो मुझे
 उसी शिद्दत व बेकरारी से
देखो उन्हीं तीखी, गहरी नजरों से
जिनसे मैं तुम्हे देखा करता हूँ 
अक्सर अपनी मुलाक़ातों में ।


© आशीष कुमार, उन्नाव ।
5 फरवरी, 2020, हैडो, पोर्ट ब्लेयर।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

Tell No one by Harlan Coben


"Tell No One"


           किताबें पढ़ना हमेशा से मेरा पसंदीदा शौक रहा है। बचपन से ही जब भी समय मिलता, किसी न किसी किताब के साथ बैठ जाता था। पढ़ते-पढ़ते कब समय निकल जाता, इसका एहसास भी नहीं होता था। लेकिन नौकरी की व्यस्तताओं और जीवन की भागदौड़ में यह आदत कहीं पीछे छूट गई। काफी समय बाद मैं फिर से एक पूरी अंग्रेज़ी किताब पढ़ने जा रहा हूँ। इसलिए Harlan Coben की Tell No One मेरे लिए सिर्फ एक उपन्यास नहीं, बल्कि अपनी पुरानी पढ़ने की आदत को फिर से जीवित करने की एक नई शुरुआत है।इसी सोच के साथ मैंने Harlan Coben का उपन्यास "Tell No One" मंगाया है।



    Harlan Coben का नाम मेरे लिए नया नहीं था। Netflix पर उनकी कुछ वेब सीरीज़ देखने का मौका मिला था। उनकी कहानियों की सबसे बड़ी खासियत मुझे यही लगी कि वे शुरुआत से ही आपको अपने साथ बाँध लेती हैं। हर एपिसोड के बाद मन में एक ही सवाल आता था—"आखिर आगे क्या होगा?" शायद यही वजह रही कि मैंने तय किया कि अब उनकी कहानी को स्क्रीन पर नहीं, किताब के पन्नों पर महसूस किया जाए।



"Tell No One" की कहानी भी पहली नज़र में बेहद रोचक लगी। एक पति, जिसकी पत्नी की हत्या हो चुकी है, आठ साल बाद अचानक ऐसे संकेत पाता है जो उसकी पूरी दुनिया बदल देते हैं। क्या उसकी पत्नी सचमुच मर चुकी है? अगर हाँ, तो ये संदेश कौन भेज रहा है? और अगर नहीं, तो इतने सालों तक वह कहाँ थी? बस यही रहस्य इस किताब को पढ़ने के लिए काफी है।

लेकिन मेरे लिए यह किताब सिर्फ एक थ्रिलर नहीं है।यह मेरी नई पढ़ने की आदत की शुरुआत है।

मुझे हमेशा लगता है कि एक लेखक जितना लिखता है, उससे कहीं ज़्यादा उसे पढ़ना चाहिए। लिखने के लिए शब्द तो मिल जाते हैं, लेकिन विचार, दृष्टिकोण और कहानी कहने का तरीका पढ़ने से ही विकसित होता है। मैं हिंदी में लिखता हूँ, लेकिन अब चाहता हूँ कि दुनिया के अच्छे लेखकों को भी पढ़ूँ। शायद उनकी शैली से कुछ सीख सकूँ, शायद अपने लेखन को थोड़ा और बेहतर बना सकूँ।

आज जब अधिकांश लोग मोबाइल स्क्रीन पर कुछ सेकंड की रील देखकर आगे बढ़ जाते हैं, तब किताब के साथ कुछ घंटे बिताना अपने आप में एक अलग अनुभव है। किताब आपको जल्दी नहीं करती। वह आपको रुकना, सोचना और कहानी के साथ जीना सिखाती है।

मुझे नहीं पता कि "Tell No One" पढ़ने के बाद यह मेरी सबसे पसंदीदा किताब बनेगी या नहीं, लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि यह किताब मुझे फिर से पढ़ने की दुनिया में ले जाने वाली पहली सीढ़ी है।

उम्मीद है कि इस एक किताब के बाद मेरी अलमारी में Harlan Coben की और भी किताबें होंगी, और उनके साथ-साथ दूसरे लेखकों की भी। क्योंकि अब महसूस होने लगा है कि अच्छी किताबें सिर्फ समय नहीं बितातीं, वे इंसान को भीतर से थोड़ा बेहतर भी बना देती हैं।

मैं चाहता हूँ कि आने वाले समय में मेरी पहचान सिर्फ एक लेखक के रूप में नहीं, बल्कि एक अच्छे पाठक के रूप में भी बने। शायद हर अच्छा लेखक बनने से पहले एक अच्छा पाठक बनना ज़रूरी होता है।

© आशीष कुमार, उन्नाव

17 july , 2026. 

Bin fere ki mohabt



कविता :- बिन फेरे की मोहब्बत 

-आशीष कुमार 



इस कदर वो मोहब्बत करने लगी थी वो
बिन फेरे के ही व्रत रखने लगी थी वो,
दुनिया से सामने न सही, छुपाकर ही सही
मेहंदी में मेरा नाम, रचने लगी थी वो।



उसकी मोहब्बत की इंतिहा तो देखिए
पाने की जरा भी उम्मीद न थी फिर भी
टूटकर बेतहाशा चाहने लगी थी वो।।

© आशीष कुमार, उन्नाव।
20 जून, 2021.

बुधवार, 15 जुलाई 2026

काजल

लघुकथा :-  काजल 

आशीष कुमार 

    जीवन में काफी ज्ञानी लोग मिले है , जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा। इस बात का जरा भी घमंड न है। आज जिस मुकाम पर पहुँचा हूँ , उनमें ऐसे लोगो का बड़ा योगदान है।  आज ऐसी  ही एक कहानी याद आ गयी।  

वो काफी होशियार थी , हर काम में तेज। पढ़ने में भी बहुत अच्छी थी। जब स्कूल में पुरुस्कार वितरण होता तो , लगभग सारे उसी को मिलते। 

उसका एक छोटा भाई था। एक शाम की बात है , उसकी माँ ने आवाज दी , शाम हो गयी है। भाई को काजल लगा दो। उन दिनों रात में सोते वक़्त हर कोई काजल लगा के सोता था। अब जमाना कितना बदल गया। अब लोगों ने काजल लगाना ही बंद कर दिया। अब तो डॉक्टर भी मना करने लगे कि बच्चों की आँखे खराब हो जाएँगी।  

खैर , जैसा की मैंने बताया वो लड़की बड़ी तेज थी। उसे काजल की डिब्बी न मिली। वो परेशान न हुयी। उसे पता था कि काजल कैसे बनाया जाता है। उसकी बुध्दि ने उसे तुरंत प्रेरणा दी। सामने किरोसिन वाला दीपक जल रहा था। किसी खाली बोतल का ढक्क्न लिया। उसमें दीपक से उठते हुए धुएँ को इकट्ठा किया। कुछ ही देर में जरूरत भर का  काजल इकट्ठा हो गया। 

उसने गरमागरम काजल , अपने प्रिय छोटे भाई की आंख में लगा दिया। काजल लगते ही भाई को रात में सूरज नजर आ  गया।  वो हिरन की तरह , पुरे घर में भागा। उसकी आँखों में जलन होने लगी। लड़की को उसकी इस  बेवकूफी के लिए उसकी मां ने जमकर क्लास लगाई।  

© आशीष कुमार, उन्नाव। 

15 जुलाई , 2026 .



रविवार, 12 जुलाई 2026

दुविधा

 

लघुकथा :-  दुविधा 

आशीष कुमार

    मेरे सामने पेपर है और मै दुविधा में हूँ। 

    मेरे सामने अतीत है जो बड़ी तेजी से गुजर रहा है।  मेरी परवरिश ऐसी की गयी कि घर से स्कूल और स्कूल से घर। जल्द ही मेरी सरकारी जॉब लग गयी। मेरे जीवन से जुड़े सारे फैसले मैंने पिता जी पर ही छोड़ रखा था। इसलिए शादी के लिए भी जहाँ से रिश्ता आया , वहीं हाँ भी कर दी। 

    शुरू में सब ठीक था , इनकी नौकरी निजी क्षेत्र में थी , अच्छा कमाते थे। नेचर और लुक दोनों अच्छा था। मुझे जीवन में हर चीज अच्छी लगती थी। शादी के कुछ टाइम बाद , बच्चा भी हो गया। मेरी अध्यापक की नौकरी थी। मैं खुद में हर चीज के लिए सक्षम थी। 

मुझे बचपन से आत्मनिर्भर बनाया गया था। मुझे खुद पर बहुत आत्मविश्वास था। मुझे न पता था ,यही आत्मविश्वास मेरे लिए , सबसे बड़ी मुसीबत बन जायेगा। 

हमारी शादी के 7 साल होने को आये. बच्चा बड़ा हो रहा था , इसके साथ साथ इनके पिता की मानसिकता छोटी होती जा रही थी। शादी के समय मेरी जॉब से , इनको बड़ा गर्व हुआ था और अब धीरे धीरे मेरी जॉब , इनको दिक्क्त दे रही थी। 

शुरू में कोई विशेष बात न थी, छोटी मोटी बहस होती थी। पर धीरे धीरे चीजे खराब होने लगी।  कुछ उनका अहं भाव , कुछ नौकरी में इशू , एक मित्र द्वारा साझा व्यापार में धोखा के चलते शराब का सेवन करने लगे। बात यही न रुकी, बहस के साथ साथ अब उनका हाथ भी मुझ पर उठने लगा। 

यह बात किसी से मैं बता न सकती थी। पिता जी से भी कुछ हद की बात साझा की और बताया कि चीजे अब बर्दाश्त से बाहर हो रही है। उनका मानना था कि चीजें धीरे धीरे ठीक हो जाएगी। उनको समझना चाहिए था कि अगर ऐसा होता तो मैं उन तक बात लाती ही न। 

इस बार स्कूल की छुट्टी होते ही अपने पापा घर आ गयी। भले वो , मुझसे दूर थे पर उनके साथ की बहस , बदतमीजी मेरे जेहन से जा न रही थी। एक रोज बगैर किसी से बताये , कोर्ट चली गयी। 

वकील ने पहले समझाने की कोशिस की पर मेरी परेशानी शायद उसे भी समझ आ गयी। मैंने उससे पेपर तैयार करने को बोल दिया। छुट्टी खत्म होने को थी और पेपर भी रेडी हो गए थे।  

पिछले कई महीने रोते हुए ही गुजरे थे , मैंने कितने मौके दिए , बार बार माफ़ किया पर शराबी इंसान की बात का क्या भरोसा। अब जब पेपर रेडी होकर सामने है और मुझे बस हस्ताक्षर करने है , मैं बड़ी दुविधा में हूँ। 

दुविधा , यह कि यह सब मैं अपने बेटे के अच्छे भविष्य के लिए सोच कर रही हूँ पर कहीं वो बड़ा होकर मुझे ही गलत न समझे। दुनिया क्या कहेगी , समाज क्या सोचेगा। बेटा , बगैर पिता के कमजोर न महसूस करे , उसके विकास में किसी तरह की चुनौती तो न आएगी। फिर ये भी लगता है , उनकी गलत आदतें , मेरी साथ बत्तमीजी को भी देखकर भी उसका बचपन सामान्य न रहेगा।  

पीछे मैंने किसी के कहने पर " आपका बंटी " ( मन्नू भंडारी ) भी पढ़ी थी। उसको पढ़कर और भी तमाम प्रश्न उठ खड़े हुए। मेरी दुविधा की वजह शायद मेरी सहज कोमलता है पर अब मै और किसी और के बनाये नियम , उसूलों को न मानूंगी। जो विद्रोह मुझे काफी समय पहले कर देना चाहिए था , अब उसमे देरी करना उचित न होगा।  

मैंने एक बार फिर से उन पेपर्स को पढ़ा और उन पर अपने हस्ताक्षर कर दिए।  


©  आशीष कुमार , उन्नाव।  

12 जुलाई , 2026  





  







मंगलवार, 7 जुलाई 2026

Marks

 

लघुकथा :- निशान 

- आशीष कुमार 

    वो किसी काम से अपने घर आयी थी। वापसी में वो पति के साथ जाना चाहती थी। उसका पति शहर से काम के बाद लौट रहा था। वैसे वो जब अपने घर आयी तो अपने प्रेमी से भी मिली थी , जिसे वो शादी के पहले से जानती थी। उसका प्रेम बहुत गहरा था , जो शादी के बाद भी न टूटा। चीजें साथ-साथ चल रही थी। वो दोहरी भूमिका निभा रही थी।  

    पति ने पहले टालमटोल किया, पर बाद में राजी हो गया। दोनों साथ-साथ घर गए।  उसकी नजरों में , पति बहुत सीधा था पर उसकी बातों में तमाम रहस्य छुपे थे। वो अपने पति पर शक करती थी, पर मजे-मजे में। पर उस दिन , शाम को जब पति के पीठ पर निशान देखे तो वो हैरान थी , एक पल को वो समझ न पायी कि पीठ पर इतने गहरे और लाल निशान कैसे बन गए ? जब उसने अपने पति को टोका तो वो टाल गया। 



    वो मासूम थी , उसे संदेह था पर पक्का यकीन न था। उसने तमाम जतन किए, पर उसको कोई पक्का न हो पाया कि निशान कैसे थे। पति ने कहा , मुझे न पता क्या है , बाद में बोला कि मेरे ही हाथ  लग गए होंगे। उसे फिर भी यकीन न हुआ. उसने  पति से उसके हाथो से पीठ पर निशान बनवा के देखे , खुद से करके देखा और अंत में पाया कि पति ही सही बोल रहा है , निशान खुद के हाथ से  बन गए होंगे। 

    उसका मन शांत होकर भी शांत न था। उसको अपने प्रेमी से सारी बातें करनी होती थी। उसने " निशान " के बारे में भी अपने प्रेमी से पूछा - 

" ये पक्का प्रेम के निशान है , उसका जरूर कोई लफड़ा चल रहा है " प्रेमी ने मुस्कुराते हुए जबाब दिया। 

" तुम इतना यकीन के साथ कैसे कह सकते हो ?" वो जरा चिंता के स्वर में बोली। उसका दिल , अपने देवता जैसे पति पर संदेह न करना चाह रहा था। उसने निशान की फोटो व्हाट्सऐप पर भेजी। 

" अरे ये पक्का वही है , मैं जानता हूँ। मैं तो ये भी जानता हूँ लड़की पक्का दुबली पतली होगी , जिसके नाख़ून बड़े होंगे " प्रेमी ने ऐसे बताया जैसे कि उसका खुद का कोई  पूर्व अनुभव हो। 

(Inspired by " Harlan Coben " , as I recently saw many series based on his books. Mystery lovers can search on Netflix by " Harlan Coben Collection " ) 

© आशीष कुमार , उन्नाव 

7 जुलाई , 2026 

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

Kutch's Mango

कच्छ के आम 

    आपका भी ज्यादातर अनुभव यही होगा कि लोग काम के वक़्त ही याद करते हैं। वैसे आजकल लोग खुद में इतने बिजी हैं कि वो आपको याद ही नहीं करते  हैं। ऐसे में सौभाग्यवश मेरे मित्रता सूची में तमाम लोग ऐसे भी हैं  जो खुद से  याद करते है वो भी हमारे लिए, हमारे भले के लिए। यह उनका प्रेम है , आज उनमें से एक की कहानी।  

    अहमदाबाद की एक लाइब्रेरी में उससे संपर्क हुआ था। बेहद स्मार्ट , खूबसूरत , उजला रंग , मीठी बोली। कभी ktm बाइक से , कभी सफेद नई  फॉर्च्यूनर से। ये उन दिनों की बात है जब अपने पास 100 CC  की बजाज डिस्कवर हुआ करती थी। सोचो उन दिनों , कितने प्रभावित करते  रहे होंगे ऐसे लोग। एक और साथी इनोवा से आता था। बाद में दोनों ही अपने मित्र बन गए। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सफलता मिलने से पहले वाले साथी थे।  

    आज पहले साथी की बात। उसने बस तैयारी शुरू ही की थी। मैं  लंबे समय से तैयारी करके काफी पक चूका था। PRE और मेंस पास होना मेरे लिए कोई बड़ी और नई बात न थी। उसके लिए यह काफी मायने रखता था। एक दो बार उसी ने मेरा PRE  रिजल्ट देखा था। खैर उसी शुभ लाइब्रेरी से मेरा upsc में अंतिम  चयन हुआ। लाइब्रेरी के केयरटेकर ने अगले दिन पेपर  में प्रकाशित मेरे से जुडी कटिंग को नोटिसबोर्ड में चिपका दिया।  

    अब मुझे ठीक से याद नहीं कि वो दिल्ली किस साल आया , पर वो भी आ गया। राजेंद्रनगर में , एक दो बार उसके रूम जाना हुआ। उसका भी एक दो बार ऑफिस आना हुआ , एक दो बार घर भी। वो कच्छ , गुजरात एरिया से था। अब कच्छ का जिक्र हुआ है तो बताऊँ , मेरी अब तक घूमी गई जगहों में सबसे बेहतरीन जगह है। उस यात्रा से पहली बार फेसबुक में पोस्ट लिखनी शुरू हुयी थी। 



    तो जब से हर्ष भाई दिल्ली आए , वो लगातार अपने कच्छ की विशेष मिठाई और आम भिजवाते रहे। पूरे साल शायद ही बात हो , मुलाकात हो, पर आम और मिठाई जरूर आती रही। आम और मिठाई , दोनों ही मुझे विशेष रूप से पसंद है। कच्छ वाले आम , अपने मलिहाबाद वाली दसहरी के ठीक पहले आते हैं। स्वाद में बढ़िया , रसीले , गूदेदार , पतले छिलके वाले। अब तो ऐसा हो गया है कि फोन उसका आने पर , मेरा पहला शब्द यही होता ' आम भिजवाने हैं , या मिठाई।  इस साल हर्ष भाई की शादी हो गयी और वो अब फिर से अहमदाबाद रहने लगे पर इसबार भी पिछले दिनों , ट्रैन , अपने दिल्ली वाले मित्र के जरिये दो पेटी आम भिजवा ही दिए।    


©आशीष कुमार, उन्नाव। 

३ जुलाई , २०२६ 





रविवार, 28 जून 2026

Fate


लघुकथा :- किस्मत  

- आशीष कुमार 

    वो अलग थी , सबसे अलग।  उस रास्ते से उनका कई बार गुजरना हुआ। दोनों बातें करते हुए गुजरते थे। लड़की बातों के साथ साथ तमाम चीजे सोचा करती थी। बस्ती पुरानी थी पर अब वहां विकास पहुंच रहा था। वो रास्ता काफी उबड़ खाबड़ था , उसमे तमाम गड्ढे भी हो गए थे। 

    उन्हें साथ हुए काफी वक़्त हो गया था , एक रोज उधर से जब जाना हुआ तो देखा वो रास्ता काफी अच्छी नई सड़क में बदल गया। बीच में पौधे , रोड में पेंट से मार्किग , किनारे हाइलाइटर , गहरा चमकता तारकोल , बेहतरीन तकनीक से बनी , समतल सपाट खूबसूरत रोड। 

" शायद एक दिन मेरी भी किस्मत ऐसे ही बदल जाये " उसने एकाएक कहा। 

" कैसे ? " लड़के ने चौंककर पूछा।  

" इस रोड की तरह " उसने जबाब दिया। 

 © आशीष कुमार , उन्नाव।  

28.06.2026 

सोमवार, 22 जून 2026

Make a Swing

 

 लघुकथा - झूला बना दो 

आशीष कुमार

    उनके बीच में हमेशा कुछ न कुछ गड़बड़ हो जाता था। कोई कहता कुछ था, पर सामने वाला समझता कुछ था। कुछ भाषा और कुछ बोली का असर था। वो हमेशा उसे छेड़ता कि 

"बचपन से ऐसी हो , या कोई खास ट्रेनिंग ली है। "

" मैं नहीं जानती ऐसा क्यों होता है , मैं तो सही ही बोलती हूँ सबसे। मैं हमेशा सही होती हूँ पर लोग मुझे समझ न पाते। " वो मासूमियत से जबाब देती।  

    फिर वो एक  कहानी सुनाती। उसे सजने-सवारने का शौक बचपन से था। उसे अपने हाथों में मेहँदी लगवाना बहुत पसंद था। तमाम बार वो अपने दोनों हाथों में मेंहदी लगवाती। कजरी तीज का त्यौहार था। पूरा शहर उल्लास से भरा। एक शाम वो बाजार गयी। 

     बाजार की तमाम भीड़ में उसका मन मेहँदी लगवा रहे लोगो में अटक गया। उसने भी एक अम्मा जी के पास जाकर बैठ गई। वो हमेशा अलग सोचती थी। 

    " अम्मा , मेरे एक हाथ  में झूला बना दो। " अम्मा को बताकर वो भीड़ में देखते हुए कुछ सोचने लगी।  अम्मा ने तेज हाथों से उसके दूध जैसी गोरे हाथों में मेहँदी रच दी। उठने से पहले उसने अपने हाथों में देखा , उसे झूला समझ न आया। उसने अम्मा से पूछा -

" ये क्या बना दिया अपने " 

"वही जो आपने कहा था—दूल्हा ," अम्मा ने कहा।  

 उस मासूम ने पूरे १५ दिन , अपने अनजान दूल्हे को हाथ में  बैठकर रखा। ये राज किसी को न पता चला।  

© आशीष कुमार , उन्नाव। 

२२ जून 2026  .








रविवार, 21 जून 2026

Dream

लघुकथा -  ख्वाब 

आशीष कुमार


" मैंने  हमेशा से एक ख़वाब देखा है  कि मुझे किसी से बहुत गहरा प्रेम हो , इतना कि मैं उसके बगैर जी न सकूँ ? " उसने  खनकती आवाज में कहा। 

" तो फिर क्या तुम्हें हुआ , मिला कोई ऐसा जिसके बगैर जिंदगी जीना मुश्किल लगे " विभव ने सब जानते हुए भी पायल के मुँह से सुनना चाहा। 

" अब तुम ये पूछ रहे हो , जान बूझ के अनजान बन रहे हो " पायल मुस्कुरा उठी। काफी दिनों के बाद , दोनों साथ बैठे थे। 

" पर मेरा पूरा ख़्वाब जानना चाहोगे "

" हाँ क्यों नहीं " 

" मैंने हमेशा से यही सोचा है कि मुझे सच्चा प्रेम हो फिर वो मेरा दिल तोड़ दे , बगैर कुछ जबाब दिए अचानक से गायब हो जाये। ऐसे जाये कि फिर वो कभी न मिले। दूसरे शब्दों में कहूँ तो मैं बेइंतिहा पीड़ा झेलना चाहती हूँ "

" ये क्या बात हुयी ? ऐसा सोचने की कोई खास वजह ?" विभव ने हैरानी से पूछा " 

" हाँ , मेरे ऐसे ख़्वाब की वजह है। मैंने कहीं पढ़ा था कि जिंदगी में सफल होने के लिए दिल टूटना जरूरी है , मैं बस सफल होना चाहती हूँ , बगैर दिल टूटे मैं कुछ न कर सकती हैं। " पायल ने अपनी बात पूरा करते ही उठकर चली  गयी। 

© आशीष कुमार , उन्नाव 

21 जून 2025

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